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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

मोक्ष्यपातं : सांप-सीढी का खेल

मोक्ष्यपातं : सांप-सीढी का खेल



सांप-सीढ़ी का खेल भरत में 'मोक्ष पातं' के नाम से बच्चों को धर्म सिखाने के लिए खेलाया जाता था।
जहां सीढ़ी मोक्ष का रास्ता है और सांप पाप का रास्ता है।

इस खेल की अवधारणा 13वीं सदी में कवि संत 'ज्ञानदेव' ने दी थी।

मौलिक खेल में जिन खानों में सीढ़ी मिलती थी वो थे- 12वां खाना आस्था का था, 51वां खाना विश्वास का, 57वां खाना उदारता का, 76वां ज्ञान का और 78वां खाना वैराग्य का था। और जीन खानों में सांप मिलते थे वो इस प्रकार थे- 41 वां खाना अवमानना का, 44 वां खाना अहंकार का, 49 वां खाना अश्लीलता का, 52 वां खाना चोरी का, 58 वां खाना झूठ का, 62 वां खाना शराब पीने का, 69 वां खाना उधर लेने का, 73 वां खाना हत्या का , 84 वां खाना क्रोध का, 92 वां खाना लालच का, 95 वां खाना घमंड का ,99 वां खाना वासना का हुआ करता था। 100वें खाने में पहुचने पे मोक्ष मिल जाता था।

1892 में ये खेल अंग्रेज इंग्लैंड ले गए और सांप-सीढ़ी नाम से प्रचलित किया।

हनुमान जी ने अपना परिचय कुछ यूँ दिया

रावण ने अभिमान में आकर श्री हनुमान जी से प्रश्न कर दिया कि आखिर तुम हो कौन जो लंका में घुसकर लंका को ही तहस नहस करने लग गये तो हनुमान जी ने अपना परिचय कुछ यूँ दिया
 
सुनु रावन ब्रह्माण्ड निकाया ।
पाइ जासु बल बिरचति माया ।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा ।
पालत सृजत हरत दससीसा ।।
जा बल सीस धरत सहसानन ।
अंडकोस समेत गिरि कानन ।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता ।
तुम्ह से सठन्ह सिखावनु दाता ।।
हर को दंड कठिन जेहिं भंजा ।
तेहि समेत नृप दल मद गंजा ।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली ।
बधे सकल अतुलित बलसाली ।।
जाके बल लवलेस तेँ जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि ।।
अर्थात्
हनुमान जी बोले ः
हे रावण सुन जिनका बल पाकर माया सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों के समूहों की रचना करती है जिसके बल से ब्रह्मा विष्णु महेश सृष्टि का सृजन पालन व संहार करते हैं  जिनके बल से सहस्त्र फनों वाले शेष जी पर्वत और वन सहित समस्त ब्रह्माण्ड को सिर पर धारण करते हैँ जो देवताओं की रक्षा के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की देह धारण करते हैं और तुम्हारे जैसे मूर्खों को शिक्षा देने वाले हैं जिन्होनें शिव जी का धनुष तोड़ डाला और उसी के साथ राजाओं के समूह का गर्व तोड़ डाला था
जिन्होनें खर दूषण त्रिशिया और बालि को मारा जिन्हें तुम अतुलनीय बलवान मानते रहे जिनके लेश मात्र से तुमऩे चराचर जगत को जीत लिया और जिनकी पत्नी को तुम चुरा कर ले आये  मै उन्ही भगवान श्रीराम का दूत हूँ
और नाम है  = हनुमान =
।। जय जय श्रीराम ।।

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