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रविवार, 17 मार्च 2013

आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार गुड़ का उपभोग

आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार गुड़ का उपभोग 
गुड़ और शक्कर ईख, ताड़ आदि के रस को गरम कर सुखाने से प्राप्त होने वाला ठोस पदार्थ । इसका रंग हलके पीले से लेकर गाढ़े भूरे तक हो सकता है। भूरा रंग कभी कभी काले रंग का भी आभास देता है। यह खाने में मीठा होता है। प्राकृतिक पदार्थों में सबसे अधिक मीठा कहा जा सकता है। अन्य वस्तुओं की मिठास की तुलना गुड़ से की जाती हैं। साधारणत: यह सूखा, ठोस पदार्थ होता हैं, पर वर्षा ऋतु जब हवा में नमी अधिक रहती है तब पानी को अवशोषित कर अर्धतरल सा हो जाता है। यह पानी में अत्यधिक विलेय होता है और इसमें उपस्थित अपद्रव्य, जैसे कोयले, पत्ते, ईख के छोटे टुकड़े आदि, सरलतर से अलग किए जा सकते हैं। अपद्रव्यों में कभी कभी मिट्टी का भी अंश रहता है, जिसके सूक्ष्म कणों को पूर्णत: अलग करना तो कठिन होता हैं किंतु बड़े बड़े का विलयन में नीचे बैठ जाते हैं तथा अलग किए जा सकते हैं। गरम करने पर यह पहले पिघलने सा लगता है और अंत में जलने के पूर्व अत्यधिक भूरा काला सा हो जाता है।

भारत के ग्रामीण इलाकों मे गुड़ का उपयोग चीनी के स्थान पर किया जाता है। गुड़ लोहतत्व का एक प्रमुख स्रोत है और रक्ताल्पता (एनीमिया) के शिकार व्यक्ति को चीनी के स्थान पर इसके सेवन की सलाह दी जाती है।
गुड़ उपयोगी खाद्य पदार्थ माना जाता है। इसका उपयोग भारत में अति प्राचीन काल से होता आ रहा है। भारत की साधारण जनता इसका व्यापक रूप में उपयोग करती है ।गुजरात और कोलाहपुर का गुड़ और शक्कर विशेष प्रकार के हैं तथा यह भोजन का एक आवश्यक व्यंजन है। इसमें कुछ ऐसे पौष्टिक तत्व विद्यमान रहते हैं जो चीनी में नहीं रहते। स्वच्छ चीनी में केवल चीनी ही रहती हैं, पर गुड़ में 90 प्रतिशत के लगभग ही चीनी रहती है। शेष में ग्लूकोज, खनिज पदार्थ, विटामिन आदि स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी पदार्थ भी रहते हैं। आयुर्वेदिक दवाओं तथा भोज्य पदार्थों में विभिन्न रूपों में इसका उपयोग होता है।गुड़ को बनाते समय इसमे विभिन्न मसाले डाल कर मसाले वाला गूड़ तैयार किया जाता है। मसालों मे प्रमुख रूप से इलायची, सौंफ, काली मिर्च, मूँगफली और कसा हुआ नारियल मिलाया जाता है। इसे आम तौर पर भोजन के पश्चात हाजमा दुरुस्त करने के लिए खाया जाता है।कुछ लोगों द्वारा गुड़ को विशेष रूप से परिशुद्ध चीनी से अधिक पौष्टिक माना जाता है,

परिशुद्ध चीनी के विपरीत, इसमे अधिक खनिज लवण होते है। इसके अतिरिक्त, इसकी निर्माण प्रक्रिया मे रासायनिक वस्तुएं इस्तेमाल नहीं की जाती है। भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार गुड़ का उपभोग गले और फेफड़ों के संक्रमण के उपचार में लाभदायक होता है; साहू और सक्सेना ने पाया कि चूहों मे गुड़ के प्रयोग से कोयले और सिलिका धूल से होने वाली फेफड़ों की क्षति को रोका जा सकता है। गांधी जी के अनुसार चूँकि गुड़ तेजी से रक्त में नही मिलता है इसलिए यह चीनी की तुलना में, अधिक स्वास्थ्यवर्धक है। वैसे, वह अपने स्वयं के व्यक्तिगत आहार में भी इसका प्रयोग करते थे साथ ही वह दूसरो को भी इसके प्रयोग की सलाह देते थे। इसमें सकरोज 59.7 प्रतिशत, ग्लूकोज 21.8 प्रतिशत, खनिज तरल 3.26 प्रतिशत तथा जल अंश 8.86 प्रतिशत मौजूद होते हैं। इनके अलावा गुड़ में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा तथा ताम्र भी अच्छी मात्रा में होता है। खनिज तरल होने के कारण ही गुड़ का रंग हमेशा काला दिखाई देता है। गुड़ में ग्लूकोज होने के कारण यह जल्दी हजम हो जाता है। गुड़ में ‘बी’ ग्रुप के कुछ जीवन सत्व भी मिलते हैं।गुड़ खाने का मतलब है शरीर से अवांछित कणों की साफ़ सफाई निकासी .गुड़ हमारे श्वसनी क्षेत्र (Respiratory tracts),खाना ले जाने वाली पाइप,भोजन की नली जो भोजन को मुख से आमाशय या उदर तक पहुंचाती है (food pipe ,oesophagus) को स्वच्छ रखता है .पेट और आँतों की सफाई करता है रक्तविकार वाले व्यक्ति को चीनी के स्थान पर गुड़ की चाय, दूध, लस्सी किसी भी पेय में लाभदायक है। खाने के बाद २५ग्राम गुड़ नित्य खाने से उदर- वायु, उदर- विकार ठीक होते हैं, शरीर में यौवन बना रहता है। शारीरिक श्रम करने वाले मजदूर गुड़ खाकर अपने शरीर की टूट-फूट को ठीक कर लेते हैं, थकावट मिटा लेते हैं। ह्रदय की दुर्बलता में गुण खाने से लाभ होता है। सर्द ऋतु में गुण और काले तिल के लड्डू खाने से ज़काम, खाँसी, दमा, ब्रांकाइटिस आदि रोग दूर होते हैं। यहाँ पर मैं आपको ज्ञान के लिए बता दूं के परम पूज्य स्वामी रामदेव जी के द्वारा निर्मित मधुरम शक्कर इसका एक मात्र उदाहरण है।इस शक्कर से आप चाय तक बना सकते हैं क्योंकि ये बिल्कुल रासायन रहित है और दूध में डाल कर उबाल सकते हैं जबकि बाजार से मिलने वाली शक्कर से चाय,दूध फट जाते हैं।दुर्भाग्य से मिलावट के कारण इन स्वदेशी उत्पादों की गुणवता पर असर पड़ा है।

उपवास (फ़ास्टिंग) क्यों और कैसे करें?

उपवास (फ़ास्टिंग) क्यों और कैसे करें?

विधि पूर्वक उपवास के माध्यम से शरीर की स्वयं का ईलाज करने की आंतरिक शक्ति को अधिकतम कार्यक्छम बनाया जा सकता है।संपूर्ण विश्राम अवस्था में शरीर में पानी अथवा फ़लों के रस के अलावा कुछ नहीं लेना उपवास कहलाता है।
गंभीर रोगों से ग्रसित व्यक्ति को जीवन शैली में वांछित बदलाव करना जरूरी होता है। उपवास करने के बाद जीवन शैली में बदलाव करना आसान हो जाता है। उपवास की सबसे उत्तम और सुरक्छित विधि फ़लों के रस पर आधारित उपवास है। केवल पानी पर आधारित उपवास भी प्रचलित है और बहुत वर्षों पुराना उपवास का विधान है। लेकिन उपवास संबंधी विशिष्ट चिकित्सकों का मत है कि फ़लों के रस पर आधारित उपवास बनिस्बत सुरक्छित और अधिक कारगर रहता है।
उपवास के दौरान शरीर में एकत्रित विजातीय पदार्थ( टाक्सिक मेटर) भस्म होने लगते हैं और शरीर से बाहर निकलने लगते हैं। इस निष्कासन की प्रक्रिया को सहारा देने के लिये हम पानी के बजाय फ़लों का क्छारीय( अल्केलाईन) रस इस्तेमाल करते हैं। इससे यूरिक एसीड व अन्य विजातीय पदार्थ आसानी से निष्काशित होंगे। हां ,ज्यूस में जो शर्करा होती है उससे हृदय को भी शक्ति मिलती रहेगी। हरी सजियों के रस में और फ़लों के रस में जो विटामिन, मिनरल्सऔर सूक्छ्म पौषक तत्व होते हैं वे हमारे शरीर की प्रणालियों को चुस्त-दुरुस्त बनाने में जुट जाते हैं। सभी ज्यूस ताजे फ़लों और सब्जियों से निकालकर तुरंत पीना चाहिए।फ़्रीज में रखे ज्यूस लाभदायक नहीं होते हैं।
उपवास शुरू करने के पहिले एनीमा लगाकर आंतों की भली प्रकार सफ़ाई कर लेना चाहिये।अवशिष्ट पदार्थ आंतों में जमे रहेंगे तो पेट में गेस बनने से तकलीफ़ होगी। बाद में उपवास की अवधि में एक दिन छोडकर एनीमा व्यवहार में लाना चाहिये।जब प्यास लगे तो मामूली गरम जल पर्याप्त मात्रा में पीना चाहिये। आप चाहें तो ज्यूस में पानी मिलाकर डायलुट करके पी सकते हैं। दिन भर में कुल तरल ६ से ८ गिलास (ज्यूस और पानी) पीना उत्तम है
उपवास के दौरान शरीर में उपस्थित विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने में काफ़ी ऊर्जा खर्च होती है। इसलिये रोगी को संपूर्ण विश्राम की सलाह दी जाती है। मानसिक तनाव तो बिल्कुल भी नहीं रहना चाहिये। केवल चहल कदमी करने की अनुमति रहती है।
कितने दिन का उपवास करें?
उपवास कम से कम ५ दिन और अधिकतम ४० दिन का किया जा सकता है। उपवास के अवधि में आपको थकावट ,मितली,उल्टी होना,दस्त लगना, पेट में दर्द होना,पेट फ़ूलना,जोडों में दर्द,सिर दर्द,चमडी में खुल्जली होना, घबराहट आदि सामान्य लक्छणों का अनुभव होगा। यह इसलिये होता है कि विजातीय पदार्थ बाहर निकलने की प्रक्रिया में ज्यादा मात्रा में रक्त प्रवाह में आ जाते हैं। रक्त में इनकी मात्रा ज्यादा होने से ऊपरोक्त लक्छण प्रकट होते हैं।
उपवास विधि का प्रयोग करके शराब ,धूम्रपान,कोकेन गांजा आदि मादक द्रव्य सेवन करने की आदत से मुक्ति पाई जा सकती है। साधारण अवस्था में इन पदार्थों का सेवन बंद करने पर जो विथड्राल सिम्पटम पैदा होते हैं वे उपवास करने पर नहीं होते हैं। बहुत से लोगों को आश्चर्य होता है कि उपवास विधि से शराब और धूम्रपान बडी आसानी से छोडा जा सकता है। मोटापा दूर करने के लिये उपवास विधि का सहारा लेना सर्वोत्तम उपाय है। एक ताजा अध्ययन में बताया गया है कि उपवास के जरिये केन्सर रोग में भी लाभ उठाया जा सकता है।

गन्ना (SUGARCANE )

गन्ना (SUGARCANE )

--------------------------- इसे ईख या साठा भी कहते हैं !
सुश्रुत संहिता के अनुसार गन्ने को दाँतों से चबाकर उसका रस चूसने पर वह दाहकारी नहीं होता और इससे दाँत मजबूत होते हैं। अतः गन्ना चूस कर खाना चाहिए।
भावप्रकाश निघण्टु के अनुसार गन्ना रक्तपित्त नामक व्याधि को नष्ट करने वाला, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, कफकारक, पाक तथा रस में मधुर, स्निग्ध, भारी, मूत्रवर्धक व शीतल होता है। ये सब पके हुए गन्ने के गुण हैं।

पथरी
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ईख चूसते रहने से पथरी टुकड़े -टुकड़े हो कर निकल जाती है ! गन्ने का रस भी लाभदायक है !
रक्त विकार
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खाने के बाद एक गिलास गन्ने का रस पीने से रक्त साफ होता है ! गन्ना नेत्रों के लिए भी हितकर है !

पीलिया
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जौ का सत्तू खाकर ऊपर से गन्ने का रस पियें ! एक सप्ताह में पीलिया ठीक हो जायेगा !

हिचकी
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गन्ने का रस पीने से हिचकी बंद हो जाती है !

शक्तिवर्धक
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ईख भोजन पचाता है ! शक्तिदाता है ! पेट की गर्मी , हृदय की जलन को दूर करता है !!!!!

विशेषः यकृत की कमजोरी वाले, हिचकी, रक्तविकार, नेत्ररोग, पीलिया, पित्तप्रकोप व जलीय अंश की कमी के रोगी को गन्ना चूसकर ही सेवन करना चाहिए। इसके नियमित सेवन से शरीर का दुबलापन दूर होता है और पेट की गर्मी व हृदय की जलन दूर होती है। शरीर में थकावट दूर होकर तरावट आती है। पेशाब की रुकावट व जलन भी दूर होती है।
सावधानीः मधुमेह, पाचनशक्ति की मंदता, कफ व कृमि के रोगवालों को गन्ने के रस का सेवन नहीं करना चाहिए। कमजोर मसूढ़ेवाले, पायरिया व दाँतों के रोगियों को गन्ना चूसकर सेवन नहीं करना चाहिए। एक मुख्य बात यह है कि बाजारू मशीनों द्वारा निकाले गये रस से संक्रामक रोग होने की संभावना रहती है। अतः गन्ने का रस निकलवाते समय शुद्धता का विशेष ध्यान रखें।

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