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रविवार, 1 अगस्त 2021

गौमाता व भैंस में अंतर


*गौमाता व भैंस में अंतर* 

हमने बचपन में दादी और मां से एक दोहा सुना था...🤗

गाय माता गोमती बाछडियो गणेश !🙏
भैंसड़ी तो भूतनी, पाडड़ियो पगलेट !!🐃
🤗🤗😁😁 

डेयरी ने सब प्रकार के दूध को मिक्स कर दिया... 😇

*दोनों में अंतर :*

1. भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खां जायें वह नही बचायेगी, जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी परन्तु जीते जी बच्चे पर आंच नही आने देगी। इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है।

2. भैंस के दो बेटे बड़े होकर यानि  दो झोटे एक गांव में मिलकर नहीं रह सकते। आमना सामना होते ही एक दूसरे को मारेंगे, भाई भाई  का दुश्मन ! परन्तु  गाय के 10 साण्ड इकट्ठे रह सकते हैं, ये भाईचारे का प्रमाण है।

3. भैंस गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी वह स्वच्छता प्रिय है।

4. भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी यादास्त जीरो है। गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो वह घर का रास्ता जानती है, आ जायेगी ! गाय के दूध में स्मृति तेज है।

5. दस भैंस बान्धकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी मां को नही पहचान सकता जबकि गोशालाओं में दिन भर गाय व बच्चे अलग अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी मां को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गोदुग्ध की मेमरी।

6. जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध दे देती है परन्तु  गाय थोड़ा सा दूध ऊपर चढ़ा लेती है, और जब उसके बच्चे को छोड़ेंगे तो उस चढाये दूध को उतार देती है ! ये गुण माँ के हैं जो भैंस मे नही हैं।

7. गली में बच्चे खेल रहे हों और भैंस भागती आ जाये तो बच्चों पर पैर अवश्य रखेगी लेकिन गाय आ जाये तो कभी भी बच्चों पर पैर नही रखेगी।

8. भैंस धूप और गर्मी सहन नहीं कर सकती जबकि गाय मई जून में भी धूप में बैठ सकती है।

9. भैंस का दूध तामसिक होता है जबकि गाय का सात्विक ! भैंस का दूध आलस्य भरा होता  है, उसका बच्चा दिन भर ऐसे पड़ा रहेगा जैसेे अफीम या भांग खाकर पड़ा है, जब दूध निकालने का समय होगा तो मालिक उसे ठोकरें मारकर उठायेगा परन्तु गाय का बछड़ा इतना उछलेगा कि आप रस्सा खोल नही पायेंगे ठीक से।
*🙏जय गौमाता🙏🚩🚩*

प्राचीन सभ्यता में बृक्ष वनस्पति को पुजन , संरक्षण एवं संवर्धन का प्रचलन


Vedic science 
वृक्ष एवं वनस्पति विज्ञान ( BOTANY AND LIFE IN PLANTS )

पृथ्वी के हर प्राचीन सभ्यता में बृक्ष वनस्पति को पुजन ,  संरक्षण एवं संवर्धन का प्रचलन रहा।
आज हम अपने जीवनकाल में एक बड़े बृक्ष नही लगाते और दिल्ली जैसे बड़े शहरो में प्रदुषण के लिए सरकार पर उंगली उठाते है। परंतु प्राचीन काल में बृक्ष को महत्व दिया जाता था । वेल पीपल जैसे पौधे रोपने पर धन एवं संतान की दीर्घायु की मान्यता वांध दिया गया ताकि पर्यावरण संरक्षण हो।
ये भी सही है बृक्ष है तो ही हम है।

वैदिक काल से ही भारत वर्ष में प्रकृति के निरीक्षण, परीक्षण एवं विश्लेषण की प्रवृत्ति रही है। इसी प्रक्रिया में वनस्पति जगत का भी विश्लेषण किया गया। प्राचीन वांगमय में इसके अनेक संदर्भ ज्ञात होते हैं। अथर्ववेद में पौधों को आकृति तथा अन्य लक्षणों के आधार पर सात उपविभागों में बांटा गया, यथा- (१) वृक्ष (२) तृण (३) औषधि (४) गुल्म (५) लता (६) अवतान (७) वनस्पति।

आगे चलकर महाभारत, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, शुक्रनीति, वृहत्‌ संहिता, पाराशर, चरक, सुश्रुत, उदयन आदि द्वारा वनस्पति, उसकी उत्पत्ति, उसके अंग, क्रिया, उनके विभिन्न प्रकार, उपयोग आदि का विस्तार से वर्णन किया गया, जिसके कुछ उदाहरण हम निम्न संदर्भों में देख सकते हैं। 

पौधों में जीवन
पौधे जड़ नहीं होते अपितु उनमें जीवन होता है। वे चेतन जीव की तरह सर्दी-गर्मी के प्रति संवेदनशील रहते हैं, उन्हें भी हर्ष और शोक होता है। वे मूल से पानी पीते हैं, उन्हें भी रोग होता है इत्यादि तथ्य हजारों वर्षों से हमारे यहां ज्ञात थे तथा अनेक ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

महाभारत के शांतिपर्व के १८४वें अध्याय में महर्षि भारद्वाज व भृगु का संवाद है। उसमें महर्षि भारद्वाज पूछते हैं कि वृक्ष चूंकि न देखते हैं, न सुनते हैं, न गन्ध व रस का अनुभव करते हैं, न ही उन्हें स्पर्श का ज्ञान होता है, फिर वे पंच भौतिक व चेतन कैसे हैं? इसका उत्तर देते हुए महर्षि भृगु कहते हैं- हे मुने, यद्यपि वृक्ष ठोस जान पड़ते हैं तो भी उनमें आकाश है, इसमें संशय नहीं है, इसी से इनमें नित्य प्रति फल-फूल आदि की उत्पत्ति संभव है।

वृक्षों में जो ऊष्मा या गर्मी है, उसी से उनके पत्ते, छाल, फल, फूल कुम्हलाते हैं, मुरझाकर झड़ जाते हैं। इससे उनमें स्पर्श ज्ञान का होना भी सिद्ध है।

यह भी देखा जाता है कि वायु, अग्नि, बिजली की कड़क आदि होने पर वृक्षों के फल-फूल झड़कर गिर जाते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे सुनते भी हैं।

लता वृक्ष को चारों ओर से लपेट लेती है और उसके ऊपरी भाग तक चढ़ जाती है। बिना देखे किसी को अपना मार्ग नहीं मिल सकता। अत: इससे सिद्ध है कि वृक्ष देखते भी हैं।

पवित्र और अपवित्र गन्ध से तथा नाना प्रकार के धूपों की गंध से वृक्ष निरोग होकर फूलने लगते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वृक्ष सूंघते हैं।

वृक्ष अपनी जड़ से जल पीते हैं और कोई रोग होने पर जड़ में औषधि डालकर उनकी चिकित्सा भी की जाती है। इससे सिद्ध होता है कि वृक्ष में रसनेन्द्रिय भी हैं।

जैसे मनुष्य कमल की नाल मुंह में लगाकर उसके द्वारा ऊपर को जल खींचता है, उसी प्रकार वायु की सहायता से वृक्ष जड़ों द्वारा ऊपर की ओर पानी खींचते हैं। 

सुखदु:खयोश्च ग्रहणाच्छिन्नस्य च विरोहणात्‌।
जीवं पश्यामि वृक्षाणां चैतन्यं न विद्यते॥ 

वृक्ष कट जाने पर उनमें नया अंकुर उत्पन्न हो जाता है और वे सुख, दु:ख को ग्रहण करते हैं। इससे मैं देखता हूं कि कि वृक्षों में भी जीवन है। वे अचेतन नहीं हैं।

वृक्ष अपनी जड़ से जो जल खींचता है, उसे उसके अंदर रहने वाली वायु और अग्नि पचाती है। आहार का परिपाक होने से वृक्ष में स्निग्धता आती है और वे बढ़ते हैं।

इसके अतिरिक्त महर्षि चरक तथा उदयन आचार्य ने भी वृक्षों में चेतना तथा चेतन होने वाली अनुभूतियों के संदर्भ में वर्णन किया है। 

महर्षि चरक कहते हैं- ‘तच्येतनावद्‌ चेतनञ्च‘
अर्थात्‌-प्राणियों की भांति उनमें (वृक्षों में) भी चेतना होती है।
आगे कहते हैं ‘अत्र सेंद्रियत्वेन वृक्षादीनामपि चेतनत्वम्‌ बोद्धव्यम्‌‘ 

अर्थात्‌-वृक्षों की भी इन्द्रिय है, अत: इनमें चेतना है। इसको जानना चाहिए। उसी प्रकार उदयन कहते हैं- 

‘वृक्षादय: प्रतिनियतभोक्त्रयधिष्ठिता: जीवनमरणस्वप्नजागरणरोगभेषज
प्रयोगबीजजातीयानुबन्धनुकूलोपगम प्रतिकूलापगमादिभ्य: प्रसिद्ध शरीरवत्‌।‘
(उदयन-पृथ्वीनिरुपणम्‌।) 

अर्थात्‌-वृक्षों की भी मानव शरीर के समान निम्न अनुभव निश्चित होते हैं- जीवन, मरण, स्वप्न, जागरण, रोग, औषधि प्रयोग, बीज, सजातीय अनुबन्ध, अनुकूल वस्तु स्वीकार व प्रतिकूल वस्तु का अस्वीकार।

एक अद्भुत ग्रंथ-पाराशर वृक्ष आयुर्वेद
बंगाल के प्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री डा. गिरिजा प्रसन्न मजूमदार ने ‘हिस्ट्री ऑफ साइंस इन इंडिया‘ में वनस्पति शास्त्र से संबंधित अध्याय में महामुनि पाराशर द्वारा रचित ग्रंथ ‘वृक्ष आयुर्वेद‘ का वर्णन किया है। बंगाल के एन.एन. सरकार के पिता, जो आयुर्वेद के प्रसिद्ध विद्वान थे, ने इसकी पांडुलिपि खोजी थी। मजूमदार महोदय ने जब इस प्राचीन ग्रंथ को पढ़ा तो वे आश्चर्यचकित हो गए, क्योंकि उसमें बीज से वृक्ष बनने तक का इतना वैज्ञानिक विश्लेषण था कि वह किसी भी पाठक को अभिभूत करता था। उन्होंने इस ग्रंथ का सार अंग्रेजी में अनूदित किया। यह ग्रंथ हजारों वर्ष पूर्व की भारतीय प्रज्ञा की गौरवमयी गाथा कहता है। इसका विश्लेषण जबलपुर में १९९२ में स्वदेशी प्राण विज्ञान पर संपन्न राष्ट्रीय संगोष्ठी में पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी ने किया। वे कहते हैं ‘मैं एक पुस्तक का उल्लेख करना चाहता हूं, वह है वृक्ष आयुर्वेद। उसके लेखक थे महामुनि पाराशर। इस ग्रंथ में जो वैज्ञानिक विवेचन है, वह विस्मयकारी है। इस पुस्तक के ६ भाग हैं- (१) बीजोत्पत्ति काण्ड (२) वानस्पत्य काण्ड (३) गुल्म काण्ड (४)वनस्पति काण्ड (५) विरुध वल्ली काण्ड (६) चिकित्सा काण्ड।

इस ग्रंथ के प्रथम भाग बीजोत्पत्ति काण्ड में आठ अध्याय हैं जिनमें बीज के वृक्ष बनने तक की गाथा का वैज्ञानिक पद्धति से विवेचन किया गया है। इसका प्रथम अध्याय है बीजोत्पत्ति सूत्राध्याय, इसमें महर्षि पाराशर कहते हैं- 

आपोहि कललं भुत्वा यत्‌ पिण्डस्थानुकं भवेत्‌।
तदेवं व्यूहमानत्वात्‌ बीजत्वमघि गच्छति॥ 

पहले पानी जेली जैसे पदार्थ को ग्रहण कर न्यूक्लियस बनता है और फिर वह धीरे-धीरे पृथ्वी से ऊर्जा और पोषक तत्व ग्रहण करता है। फिर उसका आदि बीज के रूप में विकास होता है और आगे चलकर कठोर बनकर वृक्ष का रूप धारण करता है। आदि बीज यानी प्रोटोप्लाज्म के बनने की प्रक्रिया है जिसकी अभिव्यक्ति बीजत्व अधिकरण में की गई है।

दूसरे अध्याय भूमि वर्गाध्याय में पृथ्वी का उल्लेख है। इसमें मिट्टी के प्रकार, गुण आदि का विस्तृत वर्णन है।

तीसरा अध्याय वन वर्गाध्याय का है। इसमें १४ प्रकार के वनों का उल्लेख है। चौथा अध्याय वृक्षांग सूत्राध्याय (फिजियॉलाजी) का है। इसमें प्रकाश संश्लेषण यानी फोटो सिंथेसिस की क्रिया के लिए कहा है- 

‘पत्राणि तु वातातपरञ्जकानि अभिगृहन्ति।‘
वात-क्दृ२ आतप , रंजक क्लोरोफिल। यह स्पष्ट है कि वात कार्बन डाय आक्साइड अ सूर्य प्रकाश अ क्लोरोफिल से अपना भोजन वृक्ष बनाते हैं। इसका स्पष्ट वर्णन इस ग्रंथ में है।

पांचवा पुष्पांग सूत्राध्याय है। इसमें कितने प्रकार के फूल होते हैं, उनके कितने भाग होते हैं, उनका उस आधार पर वर्गीकरण किया गया है। उनमें पराग कहां होता है, पुष्पों के हिस्से क्या हैं आदि का उल्लेख है।

फलांग सूत्राध्याय में फलों के प्रकार, फलों के गुण और रोग का वर्गीकरण किया गया है। सातवें वृक्षांग सूत्राध्याय में वृक्ष के अंगों का वर्णन करते हुए पाराशर कहते है- पत्रं (पत्ते) पुष्प (फूल) मूलं (जड़) त्वक्‌ (शिराओं सहित त्वचा) काण्डम्‌ (स्टिम्‌) सारं (कठोर तना) सारसं र्नियासा बीजं (बीज) प्ररोहम्‌ -इन सभी अंगों का परस्पर सम्बन्ध होता है। आठवें अध्याय में बीज से पेड़ के विकास का वर्णन किया गया है। बीज के बारे में जो कहा गया है, वह बहुत महत्वपूर्ण है। बीज और पत्रों की प्रक्रिया में वे कितनी गहराई में गए, यह तय करना आज के वनस्पति शास्त्र के विद्वानों का दायित्व है। पाराशर कहते हैं- 

‘बीज मातृका तु बीजस्यम्‌ बीज पत्रन्तुबीजमातृकायामध्यस्थमादि‘
पत्रञ्च मातृकाछदस्तु तनुपत्रकवत्‌ मातृकाछादनञ्च कञ्चुकमित्याचक्षते॥ 

बीजन्तु प्रकृत्या द्विविधं भवति एकमातृकं द्विमातृकञ्च। तत्रैकपत्रप्ररोहानां वृक्षाणां बीजमेकमातृकं भवति। द्वि पत्र प्ररोहानान्तु द्विमातृकञ्च।

यानी मोनोकॉटिलिडेन और डायकॉटिलिडेन। यानी एकबीजपत्री और द्विबीजपत्री बीजों का वर्णन है। किस प्रकार बीज धीरे-धीरे रस ग्रहण करके बढ़ते हैं और वृक्ष का रूपधारण करते हैं। कौन- सा बीज कैसे उगता है, इसका वर्गीकरण के साथ उसमें स्पष्ट वर्णन है।

यह भी वर्णन है कि बीज के विभिन्न अंगों के कार्य अंकुरण (जर्मिनेशन) के समय कैसे होते हैं- 

अंकुरनिर्विते बीजमात्रकाया रस:
संप्लवते प्ररोहांगेषु। 

यदा प्ररोह: स्वातन्त्रेन भूम्या: पार्थिवरसं गृहणाति तदा बीज मातृका प्रशोषमा पद्यमे। (वृक्ष आयुर्वेद-द्विगणीयाध्याय) 

वृक्ष के विकास की गाथा
वृक्ष रस ग्रहण करता है, बढ़ता है। आगे कहा गया है कि जड़ बन जाने के बाद बीज मात्रिका यानी बीज पत्रों की आवश्यकता नहीं रहती, वह समाप्त हो जाती है। फिर पत्तों और फलों की संरचना के बारे में कहा है कि वृक्ष का भोजन पत्तों से बनता है। पार्थिव रस जड़ में से स्यंदिनी नामक वाहिकाओं के द्वारा ऊपर आता है, यह मानो

आज के ‘एसेण्ट ऑफ सैप‘ का वर्णन है। यह रस पत्तों में पहुंच जाता है। जहां पतली-पतली शिराएं जाल की तरह फैली रहती हैं। ये शिरायें दो प्रकार की हैं- ‘उपसर्प‘ और ‘अपसर्प‘। वे रस प्रवाह को ऊपर भी ले जाती हैं और नीचे भी ले जाती हैं। दोनों रास्ते अलग-अलग हैं। गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध भी वे रस ऊपर कैसे ले जाती हैं इसके बारे में आज के विज्ञान में पूरा ज्ञान नहीं है। जब तक कैपिलरी एक्शन का ज्ञान न हो तब तक यह बताना संभव नहीं है और यह ज्ञान बहुत समय तक पश्चिमी देशों को नहीं था। कैपिलरी मोशन संबंधी भौतिकी के सिद्धांत का ज्ञान बॉटनी के ज्ञान के साथ आवश्यक है। जब पत्तों में रस प्रवाहित होता है, तब क्या होता है इसे स्पष्ट करके ग्रंथ में कहा गया है-

‘रंजकेन पश्च्यमानात‘ किसी रंग देने वाली प्रक्रिया से यह पचता है-यानी फोटो सिंथेसिस। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। इसके पश्चात्‌ वह कहते हैं कि ‘उत्पादं- विसर्जयन्ति‘ हम सब आज जानते हैं कि पत्तियां फोटो सिंथेसिस से दिन में आक्सीजन निकालती हैं और रात में कार्बन डाय अक्साइड। दिन में कार्बन डाय आक्साइड लेकर भोजन बनाती हैं। अतिरिक्त वाष्प का विसर्जन करती हैं, जिसे ट्रांसपिरेशन कहते हैं। इस सबका वर्णन इसमें है।

आगे कहा कि जब उसमें से वाष्प का विसर्जन होता है तब उसमें ऊर्जा उत्पन्न होती है, यानी श्वसन की क्रिया का वर्णन है। संक्षेप में यह वर्णन बताता है कि किस प्रकार रस का ऊपर चढ़ना, पंक्तियों में जाना, भोजन बनाना, फिर श्वसन द्वारा ऊर्जा उत्पन्न करना होता है। इस सारी क्रमिक क्रिया से पेड़ बनता है। इसके अतिरिक्त आज भी कोई दूसरी प्रक्रिया वृक्षों के बढ़ने की ज्ञात नहीं है। 

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सन्‌ १६६५ में राबर्ट हुक ने माइक्रोस्कोप के द्वारा जो वर्णन किया उससे विस्तृत वर्णन महर्षि पाराशर हजारों वर्ष पूर्व करते हैं। वे कहते हैं, कोष की रचना निम्न प्रकार है-

(१) कलावेष्टन 

(२)रंजकयुक्त रसाश्रय 

(३) सूक्ष्मपत्रक 

(४) अण्वश्च 

अब यह सेल का वर्णन तो बिना माइक्रोस्कोप के संभव नहीं है। यानी वृक्ष आयुर्वेद के लेखक को हजारों साल पहले माईक्रोस्कोप का ज्ञान रहा होगा। तब पश्चिम में इसे कोई नहीं जनता था। यह वृक्ष आयुर्वेद की वैज्ञानिक दृष्टि थी। विचार करने की विषय यह है कि अनुसंधान की परम्परा चलते रहने और अंत में इतनी गहन वैज्ञानिक दृष्टि को पाने में कितने वर्ष लगे होंगे। क्योंकि किसी और देश में वनस्पति शास्त्र का इतना प्राचीन और गहन अध्ययन नहीं हुआ है जितना कि भारत में। परन्तु हमारे वनस्पति शास्त्र के विद्वान इन सन्दभों को पाठ्य पुस्तकों में नहीं रखते, क्योंकि वे संस्कृत नहीं जानते। वे संस्कृत स्वयं पढ़ें या न पढ़ें, परन्तु यदि विज्ञान के विद्यार्थी के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य कर दें तो इस देश के ज्ञान-विज्ञान का मार्ग स्वत: प्रशस्त हो जाएगा। जिसको संस्कृत का ज्ञान नहीं है उसे वृक्ष आयुर्वेद का ज्ञान कहां से होगा?

 वर्गीकरण, जो चरक, सुश्रुत, महर्षि पाराशर आदि ने किया है, उसका वर्णन है। वह भी वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में भारत की प्रगति को दर्शाता है। 

चरक का वर्गीकरण
चरक अपनी ‘चरक संहिता‘ में वनस्पतियों का चार प्रकार से वर्गीकरण करते हैं:-

(१) जिनमें फूल के बिना ही फलों की उत्पत्ति होती है जैसे गूलर, कटहल आदि।

(२) वानस्पत्य- जिनमें फूल के बाद फल लगते हैं जैसे आम, अमरूद आदि।

(३) औषधि-जो फल पकने के बाद स्वयं सूखकर गिर पड़ें, उन्हें औषधि कहते हैं। जैसे गेंहू, जौ, चना आदि।

(४) वीरुध- जिनके तन्तु निकलते हैं, उन्हें वीरुध कहते हैं, जैसे लताएं, बेल, गुल्म आदि।

इसी प्रकार वनस्पति के प्रयोग के अनुसार भी कुछ वर्गीकरण हैं-

(अ) मूलिनी-जिसका मूल अन्य अंगों की अपेक्षा प्रायोगिक दृष्टि से विशेष महत्वपूर्ण है। इनकी सोलह संख्या बताई है।

(ब) फलनी- जिनका फल प्रयोग की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इसमें उन्नीस प्रकार के पौधे बताये हैं। चरक ऋषि ने मानव के आहार योग्य वनस्पतियों को सात भागों में बांटा है।

(१) शूक धान्य- जिन पर शूक (बाल) निकलते हैं जैसे गेहूं, जौ आदि

(२) शिम्बी धान्य-फली की जाति वाले, जिन पर छिलका रहता है। जैसे सेम, मटर, मूंग, उड़द, अरहर आदि।

(३) शाक वर्ग- पालक, मेथी, बथुआ आदि।

(४) फल वर्ग-विभिन्न प्रकार के फल।

(५) हरित वर्ग- विभिन्न प्रकार की तरकारी, लौकी, तोरई आदि।

(६) आहार योनि वर्ग-तिल, मसाले आदि जिनका आहार में उपयोग होता है।

(७) इक्षु वर्ग- गन्ना और उसकी जातियां।

सुश्रुत का वर्गीकरण: सुश्रुत ने शाकों को दस वर्गों में बांटा है।

(१) मूल- मूली आदि। (२) पत्र- जिनके पत्तों का उपयोग होता है। (३) करीर - जिनके अंकुर का उपयोग होता है, जैसे बास। (४) अग्र-बेंत आदि। (५) फल - सभी फलदार पौधे। (६) काण्ड - कृष्माण्ड आदि। (७) अधिरुढ़-लता आदि। (८) त्वक्‌-मातुलुंग आदि। (९) पुष्प-कचनार आदि। (१०) कवक

महर्षि पाराशर का वर्गीकरण

महर्षि पराशर ने सपुष्प वनस्पतियों को विविध परिवारों में बांटा है। जैसे शमीगणीय (फलियों वाले पौधे), पिपीलिका गणीय, स्वास्तिक गणीय, त्रिपुण्डक्‌ गणीय, मल्लिका गणीय और कूर्च गणीय। आश्चर्य की बात यह है कि जो विभाजन महर्षि पाराशर ने किया है, आधुनिक वनस्पति विज्ञान का विभाजन भी इससे मिलता-जुलता है।

उदाहरण के लिए- शमीगणीय विभाजन देखें- 

सभी तु तुण्दमण्डला विषमविदलास्मृता।
पञ्चमुक्तदलैश्चैव युक्तजालकरुर्णितै:॥
दशभि: केशरैर्विद्यात्‌ समि पुष्पस्य लक्षणम्‌।
सभी सिम्बिफला ज्ञेया पार्श्च बीजा भवेत्‌ सा॥
वक्रं विकर्णिकं पुष्पं शुकाख्य पुष्पमेव च
एतैश्च पुष्पभेदैस्तु भिद्यन्ते समिजातय:॥
वृक्षायुर्वेद-पुष्पांगसूत्राध्याय 

पराशर के अनुसार

तृण मंडल-

विषम विदल-

पंच मुक्तदल -

युक्त जालिका - 

दश प्रिकेसर - 

इसी प्रकार अन्य विभाजन भी हैं। संस्कृत भाषा में इन नामों की उपयुक्तता और अभिव्यक्ति के कारण सर विलियम जोन्स ने कहा था ‘यदि लिनियस (आधुनिक वर्गीकरण विज्ञान का जनक) ने संस्कृत सीख ली होती तो उसके द्वारा वह अपनी नामकरण पद्धति का और अधिक विकास कर पाता।‘

मूल से जल का पीना-वृक्षों द्वारा द्रव आहार लेने का ज्ञान भारतीयों को था। अत: उनका नाम पादप, जो मूल से पानी पीता है, रखा गया था। महाभारत के शांतिपर्व में वर्णन आता है। 

वक्त्रेणोत्पलनालेन यथोर्ध्वं जलमाददेत।
तथा पवनसंयुक्त: पादै: पिबति पादप:॥ जैसे कमल नाल को मुख में रखकर अवचूषण करने से पानी पिया जा सकता है, ठीक वैसे ही पौधे वायु की सहायता से मूलों के द्वारा पानी पीते हैं।

वनस्पतियों के रोग-वराह मिहिर की ‘बृहत्संहिता‘ में चार प्रकार के वनस्पतियों के रोगों का वर्णन है, आधुनिक विवरण भी उसकी पुष्टि करते हैं।

बृहत्‌ संहिता आधुनिक

(१) पाण्डु पत्रता - पर्णों की पाण्डुता

(२) प्रवाल अवृद्धि - कलियों का पतन

(३) शाखा शोष - डालियों का सूखना

(४) रस स्रुति - रस नि:स्राव

आनुवंशिकता- मेंडल से पहले ही चरक और सुश्रुत ने विवरण दिया है कि ‘फूल के फलित अंड में वनस्पति के सभी अंग सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहते हैं, जो बाद में एक-एक करके प्रकट होते हैं।‘ 

जगदीश चन्द्र बसु का योगदान-
अर्वाचीन काल में भी वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में जिनका अप्रतिम योगदान रहा, उन महान विज्ञानी जगदीश चन्द्र बसु के बारे में देश कितना जानता है? वर्तमान काल में जगदीश चन्द्र बसु ने सिद्ध किया कि चेतना केवल मनुष्यों और पशुओं तक ही सीमित नहीं है, अपितु वह वृक्षों और जिन्हें निर्जीव पदार्थ माना जाता है, उनके अंदर भी समाहित है। इस प्रकार उन्होंने आधुनिक जगत के सामने जीवन के एकत्व को प्रकट किया। उन्होंने कहा कि निर्जीव व सजीव दोनों निरपेक्ष नहीं, अपितु सापेक्ष हैं। उनमें अंतर केवल इतना ही है कि धातुएं थोड़ी कम संवेदनशील होती हैं, वृक्ष कुछ अधिक संवेदनशील होते हैं, पशु कुछ और अधिक तथा मनुष्य सर्वाधिक संवेदनशील होते हैं। इनमें डिग्री का अंतर है, परन्तु चेतना सभी के अंदर है।

सन्‌ १८९५ के आस-पास जगदीश चन्द्र बसु वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने धात्विक डिटेक्टर में तरंगे भेजीं। उसके परिणामस्वरूप डिटेक्टर पर कुछ संकेत चित्र आए। यह प्रयोग बार-बार करने पर एक अंतर उनके ध्यान में आया कि संकेत चित्र प्रारंभ में जितने स्पष्ट आ रहे थे, बार-बार प्रयोग दोहराने पर वे थोड़ा मंद होने लगे। यह देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ क्योंकि जो निर्जीव हैं, उनमें प्रतिसाद कम-ज्यादा नहीं होना चाहिए, वह तो यांत्रिक होने के कारण एक जैसा होना चाहिए। प्रतिसाद का कम-ज्यादा होना तो पेशियों का स्वभाव है। उनमें जब थकान आती है तो प्रतिसाद कम होता है तथा कुछ समय आराम मिला तो प्रतिसाद अधिक होता है। अत: डिटेक्टर में प्रतिसाद कम- अधिक देखकर उन्हें शंका हुई और उन्होंने डिटेक्टर को कुछ समय आराम देकर प्रयोग को पुन: दोहराया और वे आश्चर्यचकित हो गए। क्योंकि आराम मिलने के बाद संकेत चित्र पुन: वैसे ही आने लगे। वे सोचने लगे, यह क्यों है? अपने प्रयोग को कई बार दोहराकर उन्होंने जांचा-परखा तथा यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि निर्जीव के अंदर भी संवेदनशीलता है। अंतर केवल इतना है कि वह निश्चेष्ट (इनर्ट) है।

जगदीश चन्द्र बसु ने जब यह सिद्ध किया, उस समय पश्चिम के वैज्ञानिकों की क्या हालत थी, इसका अनुभव निम्न प्रसंग से किया जा सकता है। रायल साइंटिफिक सोसायटी में जगदीश चन्द्र बसु का भाषण होने वाला था तो इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध बायोलाजिस्ट हारटांग को हॉब्ज नामक विद्वान ने कहा, आज जगदीश चन्द्र बसु का भाषण होने वाला है जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि वनस्पतियों और निर्जीवों में भी जीवन रहता है। आप भाषण सुनने चलेंगे? हारटांग की प्रथम प्रतिक्रिया थी ‘मैं अभी होश में हूं, मैंने पी नहीं रखी है। आपने कैसे समझ लिया कि मैं ऐसी वाहियात बातों पर विश्वास करूंगा।‘ फिर भी मजा देखने की मानसिकता से वे भाषण

सुनने आए। और भी लोग हंसी उड़ाने की मानसिकता से वहां आए। जगदीशचन्द्र बसु ने केवल मौखिक भाषण ही नहीं दिया अपितु यंत्रों के सहारे प्रत्यक्ष प्रयोगों का प्रदर्शन करते हुए जब अपनी बात सिद्ध करना प्रारंभ किया, तो हॉल में बैठे सभी विद्वान्‌ जो प्रारंभ में उपेक्षा की नजर से देख रहे थे, १५ मिनट बीतते-बीतते तालियां बजाने लगे। सारा हाल उनकी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। भाषण व प्रयोगों के अंत में जब सभा के अध्यक्ष ने पूछा कि किसी को कोई शंका, कोई प्रश्न हो तो वक्ता से पूछ सकते हैं। तीन बार दोहराने पर भी जब कोई नहीं बोला, तब प्रो. हॉब्ज खड़े हुए और उन्होंने कहा कि कुछ भी पूछने लायक नहीं है। बसु महोदय ने अत्यंत प्रामाणिकता से अपनी बात सिद्ध की है। उनके भाषण व प्रयोग को देखकर मन में शंका उठती थी, परन्तु अगले ही क्षण दूसरे प्रयोग को देखकर उस शंका का निरसन हो जाता था। रॉयल सोसायटी के अध्यक्ष ने भी जगदीशचन्द्र बसु के जीवन के एकीकरण को सिद्ध करने की दिशा के सफल प्रयत्न के प्रति विश्वास प्रकट किया।

आगे चलकर बसु महोदय ने वृक्षों के ऊपर बहुत गहराई से प्रयोग किए। अपने साथ पौधों को लेकर दुनिया की यात्रा की। अनेक संवेदनशील यंत्र बनाये जिनमें वृक्षों के अन्दर होने वाले सूक्ष्मतम परिवर्तन प्रत्यक्ष देखे जा सकते थे। उन्होंने क्रेस्कोग्राफ नामक यंत्र बनाया, जो संवेदनाओं को एक करोड़ गुना अधिक बड़ा कर बताता था। जब पौधों को वे यंत्र लगा दिए जाते थे, तो पौधे दिन भर में क्या-क्या अनुभूतियां उन्हें हो रही हैं, इसकी कहानी मानों वे स्वयं कहने लगते थे। इस प्रकार उन्होंने अपने प्रयोगों और अनुभवों को अपनी लेखों में अभिव्यक्त किया तथा वनस्पति में, पशुओं में, पक्षियों में, कीड़े-मकोड़ों और सारी सृष्टि में चेतना है, इस प्राचीन अवधारणा को आधुनिक युग में सिद्ध किया।

अग्निहोत्र विज्ञान पर जैविक जीवन शैली विज्ञान मिशन की अवधारणा


अग्निहोत्र विज्ञान पर जैविक जीवन शैली विज्ञान मिशन की अवधारणा

🌴⛳अग्निहोत्र ⛳🌴
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🙇सप्त ऊर्जा का प्रस्फुटन और पंचमहाभूतो का सृजन🙇

अग्निहोत्र हजारों वर्ष पुरानी हमारे ऋषि परम्परा द्वारा अविष्कृत एक पूर्ण वैज्ञानिक विधा है,मान्यता के अनुसार इस विज्ञान को भगवान महर्षि परसुराम ने खोजा है जो मध्यकाल के समय विलुप्त हो गया था जिसे सन्त स्वामी गजानन महाराज  की प्रेरणा से भोपाल के माधव स्वामी पोतदार जी ने महाशिवरात्रि के दिन 1967 ईस्वी को पुनः पुर्नजीवित किया है।

अग्निहोत्र के सशक्त प्रमाण हमारे वेदशास्त्रो,रामायण, महाभारत और श्रीमद्भागवत गीता में तो है,आधुनिक विज्ञान व इंटरनेट पर भी बहुत से वेबसाइस में भी उपलब्ध है,अब यह विश्व के हर देश में दिनोंदिन फैलती जा रही है।

अपना जैविक जीवन शैली विज्ञान की स्पष्ट मान्यता है कि
पदार्थ का सूक्ष्म स्वरूप रूप,रंग,गन्ध,स्वर और स्पर्श पंचमहाभूतो की सूक्ष्म ऊर्जा है।
ये ही पांचों सूक्ष्म ऊर्जा प्रकृति के हर कण(अणु-जीवाणु) का निर्माण करती है।

अग्निहोत्र के भस्म में प्रकृति को बनाने वाले सभी 108 अणु विधमान है,अपने जांच रिपोर्ट बहुत से अणु मिल चुके है और आज का विज्ञान जैसे जैसे विकसित होता जाएगा बाकी के अणु-परमाणु भी मिलते चले जायेंगे।

इसके भस्म से बहुत सी औषधी भी बना रहे है जिनके बनाने का  वर्णन "अग्निहोत्र : स्वास्थ्य क्रांति" पुस्तक में है।

मिशन की स्पष्ट मान्यता है कि अग्निहोत्र में अग्निहोत्र की आहुति डालते ही पात्र की अंदर के अलाव (धधकती आग) में परमाणु विखंडन की एक सूक्ष्म क्रिया होती है,परमाणुओं के टूटने से प्रकृति को बनाने वाली सात ऊर्जा क्रमशः शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी,चन्द्रघण्टा,कुष्मांडा,
स्कन्द माता,कात्यायनी, कालरात्रि  प्रकट होती है जो पंचमहाभूतो का  सृजन करती है और इन्ही पंचमहाभूतो के गुण क्रमशः रूप,रंग,गन्ध,स्वर,स्पर्श की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। मन आनंद से भर जाता है,बुद्धि की कुशाग्रता बढ़ती है। नित्य अग्निहोत्र से क्रोध,लोभ,मोह,मद,अहंकार समाप्त होने लगती है,व्यशन छूटने लगते है।
 कई कई बार अग्निहोत्र से सात रंग निकलते देखा गया है, दिखने वाले सात रंग इस ब्रम्हांड में केवल सूर्य से निकलता है दुसरा केवल अग्निहोत्र से निकलता है।
आधुनिक रंग चिकित्सा विज्ञान भी मानता है कि मनुष्य सात रंगों से बना है,वनस्पति भी सात रंगों से बना है अर्थात अग्निहोत्र के इन सात रंगों को हमारे शरीर ने स्वीकार(एक्सेप्ट) कर लिया तो हम स्वस्थ हो जायेगे,शरीर मे जिस रंग की कमी होगी उसकी पूर्ति हो जाएगी। 

अग्निहोत्र मंत्रो में 7 स्वर है,अग्निहोत्र के पश्चात निकला हुआ गन्ध "सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम" को स्थापित करता है।
अग्निहोत्र करने में मात्र एक रुपया खर्च होता है और मात्र 2-3 मिनट का समय लगता है । इसे कोई भी कर सकता है । 5 साल का बच्चा या महिला,पुरुष सब कर सकते है इसके लिए नहाना भी जरूरी नहीं है।

अग्निहोत्र के केवल 5 नियम है
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पहला : समय,दूसरा : देशी गाय के गोबर से बने साफ-सुथरे कंडे, तीसरा : देशी गाय का बिलोने वाला घी,चौथा : अक्षत चावल,पाँचवा : निश्चित आकार का पिरामिड पात्र

सूर्योदय(सरकेडियम रिदम)-सूर्यास्त(इंफ्रारेडियम रिदम) के समय पर ही अग्निहोत्र करना है क्योंकि इस समय सूर्य की 3 लाख किलोमीटर प्रति सेकंड की स्पीड से गति र्कर रही किरणे पृथ्वी से टकराती है तो पंचमहाभूतो में एक कम्पन  (सरकेडियम रिदम-इंफ्रारेडियम रिदम) होता है। इसी समय हमारे नाक की दोनो नथुनो से स्वांस की प्रक्रिया शुरू हो जाती है अन्यथा हम तो एक समय मे एक ही नाक से स्वांस लेते है,प्राचीन विज्ञान इसे सुषुम्ना नाड़ी का सक्रीय होना भी कहता है जो मानव के सातों चक्रों को सीधे सक्रिय करता है।

ऐसे करे अग्निहोत्र :-
       अग्निहोत्र करने के लिये कुछ चीजो की आवश्यकता होती है वो इस प्रकार है :--
1.निश्चित आकार व नाप का अग्निहोत्र पात्र ताम्बे या मिट्टी का
2.स्थानीय समयानुसार सूर्योदय और सूर्यास्त   की समयसारीणी 
3.गोवन्श  के गोबर के साफ से कंडे 
4. गो घृत 
5. कच्चा साबुत चावल 
6.सूर्योदय और सूर्यास्त के दो मंत्र 
7. माचिस
8. कुन्दुरुनु गोद / कर्पुर या गो घृत मे भिगी रुई की बत्ती
9.अग्निहोत्र स्टैंड और चमीटा
10.आग में हवा करने वाला पंखा। 

     उपरोक्त सामग्री एकत्र करके सर्वप्रथम अग्निहोत्र समय सारिनी देखकर या गूगल प्ले स्टोर से अग्निहोत्र मित्र (Agnihotra buddy) एप डाउनलोड करके अपने घर या खेत के अग्निहोत्र स्थान का लोकेशन निकाल लें।
 मान लिजिये आज शाम के अग्निहोत्र का समय  06:48 है तो इसके 15 मिनट पूर्व हाथ -पैर धोकर बैठ जावे।

सर्वप्रथम अग्निहोत्र पात्र के पेंदे मे गाय के गोबर के कंडे का एक चोकोर टुकडा  रखे। उसके उपर कर्पुर या कुन्दूरुनू गोद का टुकडा  या गाय के घी मे भिगी रुई की बत्ती रख उसे माचिस से 7-8 मिनट पूर्व जला देवे। इसके पूर्व  गो वंश के कंडे के पतले व लंबे टुकडे (आयताकार)तोड कर रखे।  चारो साईडो मे छोटे-छोटे टुकडे जमा देवे,फिर कन्डो को इस प्रकार जमावे की अग्नि को जलने के लिये हवा आने  की जग़ह बचे और मध्य मे आहुति डालने  के लिये स्थान रिक्त रखे और रिक्त रखे स्थान को  कंडे के छोटे से टुकडे से ढक देवे ताकि  सारे कंडे जल सके।अब दो चुटकी चावल बाये हाथ की हथेली पर लेकर उसमे दो बुंद गो घृत मिलाकर तैयार रखे। इन चावलो के दो बराबर भाग कर लेवे और अग्निहोत्र के समय की प्रतीक्षा करे। जैसे ही अग्निहोत्र का समय हो आपको दो मंत्र बोलकर आहुति अग्नि मे अर्पित करनी है।

मंत्र इस प्रकार है :-
*सूर्यास्त के मंत्र.*
===========
!! अग्नये स्वाहा,अग्नये इदं न मम !! 
 (स्वाहा पर पहली आहुति छोडे)
!! प्रजापतये स्वाहा lप्रजापतये इदं न मम !!
(स्वाहा पर दूसरी आहुति छोडे)
*सूर्योदय  के मंत्र*
===========
!! सुर्याय स्वाहा,सुर्याय इदं न मम !!
!! प्रजापतये स्वाहा प्रजापतये इदं न मम !!
प्रातःकालीन अग्निहोत्र :अपनी आंखें घडी के कांटें पर रखें, जैसे ही सूर्योदय का समय होता है, पहला मंत्र बोलना प्रारंभ करें सूर्याय स्वाहा..स्वाहा कहने के साथ ही अक्षत का पहला भाग अग्नि को आहुति दें और "सूर्याय इदं न मम"का उच्चारण करते हुए मंत्र के प्रथम पंक्ति को पूर्ण करें। अक्षत को दाहिने हाथ का अंगूठा, मध्यमा तथा अनामिका से (हथेली ऊपर की दिशा में रखकर)अग्नि में आहुति दें तथा बांए हाथ को अपनी छाती के पास रखें। मंत्र की दूसरी पंक्ति का उच्चारण करते हुए अक्षत का दूसरा भाग "प्रजापतये स्वाहा" कहने के उपरांत अग्नि में दूसरी आहुति दें तथा मंत्र को "प्रजापतये इदं न मम" कहते हुए पूर्ण करें,जब तक हवन सामग्री पूर्णतः जल न जाए, बैठकर अग्नि पर ध्यान एकाग्र करें। प्रातःकाल का अग्निहोत्र यहीं समाप्त होता है।आहुति देने के बाद कमर सीधी रखे हुऐ अग्नि या धुऐ पर ध्यान केन्द्रित करे l जब तक आहुति जल रही है तब तक शांत चित्त बैठे रहे, अग्निहोत्र पात्र को शाम तक वहीं रहने दें।

  *अग्निहोत्र* छूट जाने या नागा होने से कोई नुकसान हर्जा नहीं होता है ।

अग्निहोत्र : कृषि क्रांति
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10 एकड़ क्रषि भूमि के लिए 1 जगह का अग्निहोत्र पर्याप्त माना गया है,अपने जैविक जीवन शैली विज्ञान मिशन ने कृषि भूमि की मिट्टी को सकारात्मक ऊर्जा में बदलने के उपयोग को प्रमुखता से  अपनाया है।
आज की यूरिया,डीएपी जैसी रसायनिक खाद केमिकल के साथ साथ नकारात्मक ऊर्जा उत्सर्जित करती है,कच्चे सूखे गोबर का ढेर,मुर्गी की खाद,प्रेसमड ये सब परंपरागत स्रोत भी भयंकर नकारात्मक होते है और नकारात्मक जीवो का पारिस्थतिक तंत्र(इकोलॉजी) का निर्माण करते है,अर्थात मिट्टी में फंगस,वायरस,कीटो को बढ़ाते है।
इस इकोलॉजी की जड़ नकारात्मक ऊर्जा है जिसे एक ग्राम अग्निहोत्र भस्म प्रति लीटर पानी मे मिलाकर स्प्रे करने से बदला जा सकता है।
स्प्रे करते ही ऊर्जा चक्र तो तुरन्त ही बदल जाता है और धीरे धीरे 1,2 वर्ष की अवधि में इकोलॉजी भी बदल जाती है।
यह भस्म मिट्टी में पड़े पूर्व के विषाक्त तत्वों को भी नष्ट करता है। जब भी पौधों की ऊर्जा कम दिखती हो इसी तरह से भस्म का पौधों पर भी स्प्रे करते रहे।
अधिक जानकारी के लिए जैविक जीवन शैली विज्ञान  मिशन की केंद्रीय टीम से या अपने राज्य  संयोजक से सम्पर्क कर प्राप्त करें।

मिताली बेलजी
8349324032
प्रधान सचिव,भोपाल

डॉ ऋषि सागर
8889973113
राष्ट्रीय संगठन सचिव
केंद्र-जबलपुर 

श्रीमति अंजलि काले
7776005097
राष्ट्रीय संगठन सह-सचिव
केंद्र - पुणे 
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।।नित्य सूर्योदय सूर्यास्त अग्निहोत्र करें व अपने परिवार को सुख,स्वास्थ्य,सन्मति दें।।
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 ।।नित्य रहना है निरोग तो नित्य करें रहे अग्निहोत्र ।।
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 ।।आपका अग्निहोत्र आचरण  पर्यावरण का संरक्षण  है।।
🙏

खुद को ढूँढे बाकी सब कुछ गूगल पर है


#सुखद_जीवन की #अनुभूति...
😊😊

अंबानी हर रोज की तरह सुबह अपने बंगले में gold coated मार्बल की डाइनिंग टेबल पर बैठे होते हैं। सामने चांदी की प्लेट व बाउल में, अनसाल्टेड स्प्राउटस्, बिना शक्कर की चाय पी रहे थे.

फिर कुछ देर बाद......... अनसाल्टेड ओकरा (भिंडी) की एक सब्जी और बिना घी तेल की दो रोटी और गर्म खनिज पानी था।

7,000 करोड़ रुपये का घर, दस नौकरों को नाश्ता मिल रहा था, पचासों एसी चल रहे थे, गारेगर हवा दे रहे थे।
इमारतों के नीचे से प्रदूषण का धुआं निकल रहा था।

ऐसे माहौल में नाश्ता कर रहे थे अंबानी...
😊😊😊

वहीं दूर #खलिहान में दूर कुएं की मेढ़ पर एक खेतिहर #मजदूर बैठा था। वो छोले की तरी वाली सब्जी के साथ रोटी, हल्दी-मसाले में पकी भिंडी व साथ में अचार भी खा रहा था। मीठे में गुड़ और पीने के लिए बर्तन में ठंडा पानी था।

सामने हरे भरे खेत, शुद्ध हवा में लहराती फसलें, ठंडी हवाएं, चिड़ियों की चहचहाहट।

तथा वह #आराम से खा कर रहा था।

#500 रुपए कमाने वाला एक #खेतिहर मजदूर वह खा रहा था जो 7 अरब रुपए का मालिक नही खा पा रहा था।

अब बताओ इन दोनों में क्या अंतर था? 🤔

अंबानी पचास साल के थे और मजदूर भी पचास साल के थे।

नाश्ते के बाद अंबानी मधुमेह और बीपी की गोली ले रहे थे और एक खेतिहर मजदूर चूने के साथ पान खा रहा था।

🌼 कोई हीन नहीं,कोई महान नहीं।

इसलिय #खुशी की तलाश मत करो
#सुख महसूस करो
🌼"अतुलनीय आनंद" उत्पादन पर जीएसटी *0%*

🌼#खुद को ढूँढे बाकी सब कुछ गूगल पर है !!

मानसरोवर स्कीम में निशुल्क आयुर्वेदिक शिविर संपन्न

हमारे संवाददाता के अनुसार आज
दिनांक 1 अगस्त 2021 रविवार को पाल बाईपास स्थित डीपीएस स्कूल के सामने स्थित मानसरोवर स्कीम कॉलोनी के शिव मंदिर प्रांगण में  सुबह 9:00 बजे निशुल्क आयुर्वेदिक जांच शिविर का शुभारंभ प्रथम पूज्य भगवान गणपति जी की गणेश वंदना द्वारा स्तुति कर किया गया 
जिसमे कॉलोनी के निवासियों के अलावा जोधपुर के अन्य क्षेत्रों से भी बहुत से रोगियों ने अत्याधुनिक मशीन द्वारा अपनी रोग जांच करवाई
शिविर में पाली जिले से आए हुए प्रसिद्ध आयुर्वेदिक डॉ. एस एस शर्मा जी ने रोगियों को निशुल्क परामर्श दिया 
शिविर में आइएमसी के सभी सदस्यों ने अपना अपना अमूल्य समय और सहयोग प्रदान किया 
शिविर के मुख्य संयोजक श्री अभिषेक शर्मा ने शिविर के बारे जानकारी देते हुए बताया कि यह निशुल्क आयुर्वेदिक शिविर आईएमसी द्वारा बालाजी आयुर्वेदिक सेंटर के तत्वावधान में आइएमसी के पूर्व में चलाए जा रहे एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम जिसमे कोरोना महामारी से प्रभावित आम जनता को बीमारी एवं बेरोजगारी जैसी मुख्य समस्या के निदान हेतु चलाए जा रहे  कार्य की कड़ी है जो आगे भी जारी रहेगा 
कार्यक्रम के दौरान  जोधपुर के विशाल जी संखवाया , ओम प्रकाश लखारा, राजा लखारा, जेपी  खींची, बालाजी आयुर्वैदिक सेंटर के श्री अभिषेक शर्मा, बंदना शर्मा , सोमाराम , कनिष्क शर्मा, राहुल शर्मा, सुमन शर्मा,  ममता शर्मा, दीप्ति जोशी, कचरे से सोना बनाओ अभियान के संस्थापक केवल कोठारी, सांवरिया के कैलाशचंद्र लढा, पुलिस पब्लिक प्रेस के हेमंत वाजपेई, वास्तुविद एवं योगाचार्य शिवलाल मालवीय आदि द्वारा मंदिर प्रांगण में वृक्षारोपण का कार्यक्रम भी रखा गया 

शाम 6 बजे तक संपन्न हुए शिविर में कई रोगियों ने निशुल्क शिविर का लाभ लिया 
कॉलोनी वासियों एवं आइएमसी टीम के सभी कार्यकर्ताओं के सफल प्रयास से आज का यह आयुर्वेदिक शिविर सफल रहा..

इसके साथ साथ विभिन्न समुदाय और संस्थाओं ने अपना सहयोग दिया जिसमें सर्वप्रथम मानसरोवर सेवा मंडली संस्था, सांवरिया संस्था, सौमित्रे सुंदरकांड मंडली, द्वारा सहयोग प्राप्त हुआ... अंत में अभिषेक शर्मा ने सभी कार्यकर्ताओं एवं डॉक्टर साहब का आभार व्यक्त किया और भविष्य जोधपुर के कई क्षेत्र में इस तरह के आयुर्वेदिक शिविर लगवाने का भरोसा दिलाया 

गुरुवार, 29 जुलाई 2021

विष्णु के दस अवतार - मानव के विकास का विज्ञान


*💐💐दशावतार और विज्ञान💐💐* 




       एक माँ अपने पूजा-पाठ से फुर्सत पाकर अपने विदेश में रहने वाले बेटे से विडियो चैट करते वक्त पूछ बैठीं..

*"बेटा! कुछ पूजा-पाठ भी करते हो या नहीं?"*

बेटा बोला-

"माँ, मैं एक जीव वैज्ञानिक हूँ । मैं अमेरिका में मानव के विकास पर काम कर रहा हूँ। विकास का सिद्धांत, चार्ल्स डार्विन.. क्या आपने उसके बारे में सुना भी है?"

उसकी माँ मुस्कुरा कर बोली-
"मैं डार्विन के बारे में जानती हूँ बेटा.. उसने जो भी खोज की, वह वास्तव में सनातन-धर्म के लिए बहुत पुरानी खबर है।"
“हो सकता है माँ!” बेटे ने भी व्यंग्यपूर्वक कहा।
“यदि तुम कुछ होशियार हो, तो इसे सुनो..” उसकी माँ ने प्रतिकार किया। “क्या तुमने दशावतार के बारे में सुना है? विष्णु के दस अवतार?”
बेटे ने सहमति में कहा-
"हाँ! पर दशावतार का मेरी रिसर्च से क्या लेना-देना?"
माँ फिर बोली-
"लेना-देना है.. मैं तुम्हें बताती हूँ कि तुम और मि. डार्विन क्या नहीं जानते हैं?"
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“पहला अवतार था 'मत्स्य', यानि मछली। ऐसा इसलिए कि जीवन पानी में आरम्भ हुआ। यह बात सही है या नहीं?”
बेटा अब ध्यानपूर्वक सुनने लगा..
“उसके बाद आया दूसरा अवतार 'कूर्म', अर्थात् कछुआ। क्योंकि जीवन पानी से जमीन की ओर चला गया.. 'उभयचर (Amphibian)', तो कछुए ने समुद्र से जमीन की ओर के विकास को दर्शाया।”
“तीसरा था 'वराह' अवतार, यानी सूअर। जिसका मतलब वे जंगली जानवर, जिनमें अधिक बुद्धि नहीं होती है। तुम उन्हें डायनासोर कहते हो।”
बेटे ने आंखें फैलाते हुए सहमति जताई..

“चौथा अवतार था 'नृसिंह', आधा मानव, आधा पशु। जिसने दर्शाया जंगली जानवरों से बुद्धिमान जीवों का विकास।”
“पांचवें 'वामन' हुए, बौना जो वास्तव में लंबा बढ़ सकता था। क्या तुम जानते हो ऐसा क्यों है? क्योंकि मनुष्य दो प्रकार के होते थे- होमो इरेक्टस(नरवानर) और होमो सेपिअंस (मानव), और होमो सेपिअंस ने विकास की लड़ाई जीत ली।”
बेटा दशावतार की प्रासंगिकता सुन के स्तब्ध रह गया..

माँ ने बोलना जारी रखा-
“छठा अवतार था 'परशुराम', जिनके पास शस्त्र (कुल्हाड़ी) की ताकत थी। वे दर्शाते हैं उस मानव को, जो गुफा और वन में रहा.. गुस्सैल और असामाजिक।”
“सातवां अवतार थे 'मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम', सोच युक्त प्रथम सामाजिक व्यक्ति। जिन्होंने समाज के नियम बनाए और समस्त रिश्तों का आधार।”
“आठवां अवतार थे 'भगवान श्री कृष्ण', राजनेता, राजनीतिज्ञ, प्रेमी। जिन्होंने समाज के नियमों का आनन्द लेते हुए यह सिखाया कि सामाजिक ढांचे में रहकर कैसे फला-फूला जा सकता है।”
बेटा सुनता रहा, चकित और विस्मित..

माँ ने ज्ञान की गंगा प्रवाहित रखी -
“नवां अवतार थे 'महात्मा बुद्ध', वे व्यक्ति जिन्होंने नृसिंह से उठे मानव के सही स्वभाव को खोजा। उन्होंने मानव द्वारा ज्ञान की अंतिम खोज की पहचान की।”
“..और अंत में दसवां अवतार 'कल्कि' आएगा। वह मानव जिस पर तुम काम कर रहे हो.. वह मानव, जो आनुवंशिक रूप से श्रेष्ठतम होगा।”
बेटा अपनी माँ को अवाक् होकर देखता रह गया..

अंत में वह बोल पड़ा-
“यह अद्भुत है माँ.. हिंदू दर्शन वास्तव में अर्थपूर्ण है!”

मित्रों..
वेद, पुराण, ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि सब अर्थपूर्ण हैं। सिर्फ आपका देखने का दृष्टिकोण सही होना चाहिए, और उनका सही अर्थ बताने के लिए एक योग्य मार्गदर्शक जो कथाओं के मूल को आपके अन्तःस्थल में स्थापित कर सके..
*सदैव प्रसन्न रहिये।*

मंगलवार, 27 जुलाई 2021

बरसात के मौसम में जोधपुर में कहीं बिजली के तार आदि खुले पडे हो, कहीं करंट आ रहा हो तो जोधपुर के समस्त बिजलीघर के फोन नं. नीचे दिये गये हैं...

*सूचना*
बरसात के मौसम में यदि जोधपुर में आपके आस पास कहीं बिजली के तार आदि खुले पडे हो, कहीं करंट आ रहा हो तो तुरंत आपके एरिया से सम्बधित बिजलीघर में इसकी सुचना देवें... जोधपुर के समस्त बिजलीघर के फोन नं. नीचे दिये गये हैं...

BJS 0291-2530325
Banar Road 0291-2511060
Barkattulla Khan Stadium Masuriya 0291-2651258
Basni 1st Phase 0291-2721173
Basni 2nd Phase 0291-2742235
Bhadwasiya Frout Mandi 0291-2574857
Chopasani Housing Board 0291-2757818
Circuit House 0291-2517881
Collectorate-AEM 0291-2556237
Eiectric (Head Office) 0291-2651200,0291-2651201
Emergency0291-1912,0291-2516960
Engineering College 9214020010
Fort (Sub-Station) 0291-2651231
Ghantaghar Dhan Mandi 0291-2556230
Industrial Area (New Power House) 0291-2651375
Jalori Gate 0291-2651354
Jhalamand 09413359246
Kamla Nehru Nagar 0291-2757817
Kuchehri (Court) HTM IIIrd 0291-2556233
Kudi Bhagtasni 9214020089
Lal Sagar 0291-2574854
MGH 0291-2651309
Medical College 0291-2651230
Milk Man Colony 9214020110
Nagori Gate 0291-2556232
New Power House0291-2651375
Old Power House Sojati Gate 0291-2517882
Pal Village 0291-2766358,0291-2742258
Pratap Nagar 0291-2651222
Riico Mandore 0291-2009344,0291-2517893
Riktiya Bheru Ji 0291-2671144
Sardarpura 0291-2651284
Shastri  Nagar 0291-2651230
Soorsagar 0291-2757819
Umaid Hospital 0291-2651396

सोमवार, 26 जुलाई 2021

माहेश्वरियों में श्रावण (सावन) माह का बहुत महत्त्व है


श्रावण मास का महत्व -
परम पुरुष (शिव) और प्रकृति (भवानी) का प्रणय ही श्रावण की आध्यात्मिक आर्द्रता है. भगवान महेश और जगतजननी पार्वती के प्रणय (प्रेम) का महीना है श्रावण. तो जिस श्रावण मास में भगवान महेशजी (शिव) का सर्वत्र पूजन हो, उसमें उनकी शक्ति पार्वती की उपेक्षा कैसे की जा सकती है? इसलिए श्रावण माह सदा से ही महेश-पार्वती की आराधना का पर्वकाल रहा है. श्रावण महेश-पार्वती के प्रणय का माह होने के कारन इस माह में भगवान महेशजी और जगतजननी पार्वती की एकत्रित पूजा-अर्चना का महत्व है. शिव के साकार स्वरुप की आराधना का महत्व है. वस्तुतः शिवलिंग/शिवपिंड भगवान शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है और मूर्ति साकार स्वरुप का प्रतिक है इसलिए श्रावण में महेश-पार्वती की प्रतिमा (मूर्ति) अथवा तसबीर की पूजा का महत्व है.

श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार को महेशजी की और प्रत्येक मंगलवार को देवी पार्वती की पूजा का महत्व बताया गया है. इसीलिए श्रावण के प्रत्येक मंगलवार को मंगलागौरी की विशेष पूजा होती है. श्रावण में ही आदिशक्ति पार्वती को समर्पित हरितालिका तीज का पर्व भी मनाया जाता है. सुहागन महिलाएं अपने पति के लम्बी उम्र के लिए और कुमारिकाएं सुयोग्य वर (पति) पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती है. इस माह में महेश-पार्वती के पूजन मात्र से सम्‍पूर्ण महेश परिवार (शिव परिवार) की प्रसन्‍नता-आशीर्वाद प्राप्‍त होता है.

माहेश्वरियों में श्रावण (सावन) माह का बहुत महत्त्व है. जैसे जैनों में चातुर्मास का महत्त्व है, जैसे मुस्लिमों में रमजान के महीने का महत्त्व होता है उसी तरह माहेश्वरियों में श्रावण माह का महत्त्व है. माहेश्वरी अपने आप को भगवान महेश-पार्बती की संतान मानते है ; श्रावण महिना भगवान महेश-पार्बती के आराधना का पर्व है. इस महीने में प्रतिदिन नित्य प्रार्थना, मंगलाचरण, महेश मानस पूजा, ओंकार (ॐ) का जप और अन्नदान किया जाता है. श्रावण माह (महीने) में की गयी आराधना से स्वास्थ्य-धन-धान्य-सम्पदा आदि ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है, पति-पत्नी में प्रेम प्रगाढ़ (गहरा) होता है, दाम्पत्य जीवन सुखी होता है, परिवार में आपसी प्यार बढ़ता है. राजस्थानी समाज में खासकर माहेश्वरी समाज में परंपरा के अनुसार श्रावण के महीने में हास्य-व्यंग कवि सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है.

शमीपत्र चढाने का महत्व -
माहेश्वरीयों में महेशजी को 'समीपत्र' चढाने की परंपरा रही है. मान्यता है की महेश-पार्वती को शमीपत्र चढाने से धन-धान्य-समृद्धि की प्राप्ति होती है. पति-पत्नी मिलकर एकसाथ महेश-पार्वती को शमीपत्र चढाने से उनका आपसी प्रेम बढ़ता है. भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र चढ़ाते हैं लेकिन माहेश्वरीयों में महेशजी को समीपत्र (शमीपत्र) चढाने की परंपरा रही है. इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं. ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र (शमीपत्र) का महत्व होता है.

श्रावण के सोमवार की सरल व्रत विधि के अनुसार भगवान महेशजी के साथ माता पार्वती, गणेशजी, और नंदी जी की पूजा होती है। विधि‍विधान एवं पवित्र तन-मन से किए इन श्रावण सोमवार व्रतों से व्रती पुरुष का दुर्भाग्‍य भी सौभाग्‍य में परिवर्तित हो जाता है. यह व्रत मनो:वांछित धन, धान्‍य, स्‍त्री, पुत्र, बंधु-बांधव एवं स्‍थाई संपत्ति प्रदान करने वाला है. श्रावण मास के व्रत से महेश-पार्वती की कृपा व अभीष्‍ट सिद्धि-बुद्धि की प्राप्ति होती है.

क्या आपके पूजा में (पूजाघर में) महेश परिवार (भगवान महेशजी, सर्वकुलमाता आदिशक्ति माँ भवानी एवं सुखकर्ता-दुखहर्ता गणेशजी) बिराजमान है?
.....यदि नही है तो सावन (श्रावण) माह के पावनपर्व पर सोमवार के दिन "महेश परिवार" को विधिपूर्वक अपने पूजा में स्थापित करें. प्रतिदिन (खासकर सोमवार के दिन) सपरिवार भगवान महेशजी की आरती करें. आपकी एवं आपके घर-परिवार की सुख-समृद्धि दिन ब दिन बढ़ती जाएगी. पौराणिक मान्यता है की जिस घर-परिवार में 'महेश परिवार' की फोटो या मूर्ति श्रध्दापूर्वक बिराजमान होती है वहां पूरा परिवार बड़े प्यार से मिल-जुलकर रहता है; साथ ही सुख-समृद्धि-सम्पदा की दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती है.

जय भवानी....... जय महेश !

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