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गुरुवार, 19 अगस्त 2021

कपालभाति के कई विशेष लाभ भी हैं


कपालभाती यह केवल एक प्राणायाम ही नही, बल्कि एक शुद्धी क्रिया भी है, 


*कपालभाती को बीमारी दूर करनेवाले प्राणायाम के रूप में देखा जाता है। मैने ऐसे पेशंट्स को देखा है जो बिना बैसाखी के चल नही पाते थे लेकिन नियमित कपालभाती करने के बाद उनकी बैसाखी छूट गई और वे ना सिर्फ चलने, बल्कि दौड़ने भी लगे.....!*

*1* -  _कपालभाती करने वाला साधक आत्मनिर्भर और स्वयंपूर्ण हो जाता है, कपालभाती से हार्ट के ब्लॉकेजेस् पहले ही दिन से खुलने लगते हैं और 15 दिन में बिना किसी दवाई के वे पूरी तरह खुल जाते है !_

*2* -  _कपालभाती करने वालों के हृदय की कार्यक्षमता बढ़ती है, जबकि हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाने वाली कोई भी दवा उपलब्ध नही है !_

*3* -  _कपालभाती करने वालों का हृदय कभी भी अचानक काम करना बंद नही करता, जबकि आजकल बड़ी संख्या में लोग अचानक हृदय बंद होने से मर जाते हैं !_
     
*4* -  _कपालभाती करने से  शरीरांतर्गत और शरीर के ऊपर की किसी भी तरह की गाँठ गल जाती है, क्योंकि कपालभाती से शरीर में जबर्दस्त उर्जा निर्माण होती है जो गाँठ को गला देती है, फिर वह गाँठ चाहे ब्रेस्ट की हो अथवा अन्य कही की। ब्रेन ट्यूमर हो अथवा ओव्हरी की सिस्ट हो या यूटेरस के अंदर फाइब्रॉईड हो, क्योंकि सबके नाम भले ही अलग हो लेकिन गाँठ बनने की प्रक्रिया एक ही होती है  !_

*5* -  _कपालभाती से बढा हुआ कोलेस्टेरोल कम होता है। खास बात यह है कि मैं कपालभाती शुरू करने के प्रथम दिन से ही मरीज की कोलेस्टेरॉल की गोली बंद करवाता हूँ !_
    
*6* -  _कपालभाती से बढा हुआ इएसआर, युरिक एसिड, एसजीओ, एसजीपीटी, क्रिएटिनाईन, टीएसएच, हार्मोन्स, प्रोलेक्टीन आदि सामान्य स्तर पर आ जाते है !_

*7* -  _कपालभाती करने से हिमोग्लोबिन एक महीने में 12 तक पहुँच जाता है, जबकि हिमोग्लोबिन की एलोपॅथीक गोलियाँ खाकर कभी भी किसी का हिमोग्लोबिन इतना बढ़ नही पाता है। कपालभाती से हीमोग्लोबिन एक वर्ष में 16 से 18 तक हो जाता है। महिलाओं में हिमोग्लोबिन 16 और पुरुषों में 18 होना उत्तम माना जाता है !_

*8* -  _कपालभाती से महिलाओं के मासिक धर्म की सभी शिकायतें एक महीने में सामान्य हो जाती है  !_

*9* -  _कपालभाती से थायरॉईड की बीमारी एक महीने में ठीक हो जाती है, इसकी गोलियाँ भी पहले दिन से बंद की जा सकती है !_

*10* -  _इतना ही नही बल्कि कपालभाती करने वाला साधक 5 मिनिट में मन के परे पहुँच जाता है। गुड़ हार्मोन्स का सीक्रेशन होने लगता है। स्ट्रेस हार्मोन्स गायब हो जाते है, मानसिक व शारीरिक थकान नष्ट हो जाती है। इससे मन की एकाग्रता भी आती है  !_

    *_कपालभाति के कई विशेष लाभ भी हैं ।_* 

*(A)*  -  _कपालभाती से खून में प्लेटलेट्स बढ़ते हैं। व्हाइट ब्लड सेल्स या रेड ब्लड सेल्स यदि कम या अधिक हुए हो तो वे निर्धारित मात्रा में आकर संतुलित हो जाते हैं। कपालभाती से सभी कुछ संतुलित हो जाता है, ना तो कोई अंडरवेट रहता है, ना ही कोई ओव्हरवेट रहता है। अंडरवेट या ओव्हरवेट होना दोनों ही बीमारियाँ है !_
     
*(B)*  -  _कपालभाती से कोलायटीस, अल्सरीटिव्ह कोलायटीस, अपच, मंदाग्नी, संग्रहणी, जीर्ण संग्रहणी, आँव जैसी बीमारियाँ ठीक होती है। काँस्टीपेशन, गैसेस, एसिडिटी भी ठीक हो जाती है। पेट की समस्त बीमारियाँ ठीक हो जाती है !_

*(C)*  -  _कपालभाती से सफेद दाग, सोरायसिस, एक्झिमा, ल्युकोडर्मा, स्कियोडर्मा जैसे त्वचारोग ठीक होते हैं। स्कियोडर्मा पर कोई दवाई उपलब्ध नही है लेकिन यह कपालभाती से ठीक हो जाता है। अधिकतर त्वचा रोग पेट की खराबी से होते है, जैसे जैसे पेट ठीक होता है ये रोग भी ठीक होने लगते हैं !_

*(D)*  -  _कपालभाती से छोटी आँत को शक्ति प्राप्त होती है जिससे पाचन क्रिया सुधर जाती है। पाचन ठीक होने से शरीर को कैल्शियम, मैग्नेशियम, फॉस्फरस, प्रोटीन्स इत्यादि उपलब्ध होने से कुशन्स, लिगैमेंट्स, हड्डियाँ ठीक होने लगती हैं और 3 से 9 महिनों में अर्थ्राइटीस, एस्ट्रो अर्थ्राइटीस, एस्ट्रो पोरोसिस जैसे हड्डियों के रोग हमेशा के लिए ठीक हो जाते हैं !_

*ध्यान रखिये की कैल्शियम, प्रोटीन्स, हिमोग्लोबिन, व्हिटैमिन्स आदि को शरीर बिना पचाए बाहर निकाल देता है क्योंकि केमिकल्स से बनाई हुई इस प्रकार की औषधियों को शरीर द्वारा सोखे जाने की प्रक्रिया हमारे शरीर के प्रकृति में ही नही है !*

_हमारे शरीर में रोज 10 % बोनमास चेंज होता रहता है, यह प्रक्रिया जन्म से मृत्यु तक निरंतर चलती रहती है अगर किसी कारणवश यह बंद हुई, तो हड्डियों के विकार हो जाते हैं.... कपालभाती इस प्रक्रिया को निरंतर चालू रखती है इसीलिए कपालभाती नियमित रूप से करना आवश्यक है !_

*सोचिए, यह सिर्फ एक क्रिया कितनी लाभकारी है इसीलिए नियमित रूप से कपालभाति करना एक उत्तम व्यायाम प्रक्रिया है !!*




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कुदरती खेती के लिए कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ


कुदरती खेती के लिए कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ 

1. खेत के बांध पर खाली जगह पर तथा एक एकड भुमी  में  आम, कटहल, इमली,रामफल ,सिताफल ,जांबूण,बैर, चीकू, नारियल, पपीता, केला व पिपल, बरगद,उंबर सागौन आदि ऐसे पेड़ जो खेत की उर्वरता बढ़ाने में मदद करते हैं, को अवश्य लगाने चाहिए।मधुमख्यिया इनपर छत्ता बनाकर परागिकरन करती है। इन वृक्षों पर बैठने वाले पंछी कीटों को खाकर फसलों को बचाने का काम करते हैं साथ ही खेत में खाद भी देते हैं। पंछी अनाज कम व फसल को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों को अधिक खाते हैं। एक चिड़िया दिन में लगभग 250 सूंडी खा लेती है। पेड़ों से 10-20 साल में किसानों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ मिलता है। जाटी आदि से पशुओं को आहार्। रसोई के लिए लकड़ी तथा परिवार के लिए फल मिलते हैं। पेड़ों के साथ गिलोय व काली मिर्च आदि लगाकर और अcधिक आर्थिक लाभ कमा सकते हैं।

2. एक ग्राम मिट्टी में लगभग 3 करोड़ सूक्ष्म जीव होते हैं। खेत के पत्तों, धान व अन्य प्रकार के चारे में आग लगाने एवं जहरीली खाद व कीटनाशकों को डालने, ट्रैक्टर से खेत जोतने पर ये सूक्ष्म जीव मरते हैं और धरती धीरे-धीरे बंजर बन जाती है।

3. अधिक पानी जमीन का शत्रु, नई जमीन का मित्र तथा फसलों व गोभी आदि सब्जियों का कचरा भूमि माता के वस्त्रों का काम करते हैं, जो जमीन को सर्दी गर्मी से बचाते हैं, तापमान को नियन्त्रित रखते हैं तथा जमीन की नमी को भी बरकरार रखते हैं। अत: भूमि की मल्चिंग के लिए फसलों का कचरा खेत के लिए खतरा नहीं उसकी ताकत है।

4. लगभग एक एकड़ भूमि में 90 हजार केंचुएँ होते हैं। एक केंचुवा खेत में हजारों किलोमीटर खुदाई करने की क्षमता रखता है। जो भूमि जैविक कृषि द्वारा पोषित होती है और जहाँ केचुँए संरक्षित किये जाते हैं उस भूमि की कीचड़ वर्षों में –
(क) 5 गुणा नाईट्रोजन की ताकत बढ़ जाती है।
(ख) 7 गुणा फास्फोरस की ताकत बढ़ जाती है।
(ग) 11 गुणा पोटास की ताकत बढ़ जाती है।
(घ) 2.5 गुणा मैग्नीशियम की ताकत बढ़ जाती है।
अत: प्राकृतिक खेती में कृत्रिम रासायनिक खाद, यूरिया, व डी.ए.पी. की जरूरत नहीं पड़ती है। गोबर, गोमूत्र व पेड़ के पत्तों से भूमि को ये पोषण तत्व स्वयं ही मिलते रहते हैं।

बुधवार, 18 अगस्त 2021

अफगानिस्तान में टाइम वेल में फंसा मिला महाभारत कालीन विमान ?


जल्दी गूगल करो
अफगानिस्तान में टाइम वेल में फंसा मिला महाभारत कालीन विमान ?महाभारत कल्पना नहीं, एक हकीकत लंबे समय से रामायण, महाभारत काल को केवल एक काल्पनिक गाथा के रुप में माना जा रहा था। परंतु यह सत्य नहीं है। जो लोग इस काल को काल्पनिक मान रहे हैं, उन्हें अब यह स्वीकार करना होगा कि महाभारत और रामायण काल भारत का गौरवमयी इतिहास था। जिसे कोरी कल्पना मानना एक भूल थी। अफगानिस्तान की विशाल गुफा में टाइम वेल में 5000 साल पुरान महाभारत कालीन विमान के फंसे होने की पुष्टि हुई है। इस विमान के मिलने का खुलासा वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में किया गया है।
अफगानिस्तान में सदियों पहले था आर्यों का राज
मौजूदा अफगानिस्तानन में हिंदू कुश नाम का एक पहाड़ी क्षेत्र है ।जिसके उस पार कजाकिस्तान, रूस और चीन देश हैं। ईसा के 700 साल पूर्व तक यहां पर आर्यों का साम्राज्य था। इसके उत्तरी क्षेत्र में गांधार महाजनपद था। जिसके बारे में महाभारत के अलावा कई अन्य ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। अफगानिस्तान की सबसे बड़ी होटलों की श्रृंखला का नाम आर्याना था। इतना ही नहीं हवाई कंपनी भी आर्याना के नाम से जानी जाती थी। इस्लाम धर्म से पहले मौजूदा अफगानिस्तान को आर्याना, आर्यानुम्र वीजू, पख्तिया, खुरासान, पश्तूनख्वाह और रोह नामों से पुकारा जाता था। वहीं पारसी मत के प्रवर्तक जरथ्रुष्ट द्वारा रचित ग्रंथ जिंदावेस्ता में इस भूखंड को ऐरीन-वीजो या आर्यानुम्र वीजो कहा गया है। सबसे खास बात यह है कि मौजूदा अफगानिस्तान के गांवों में बच्चों के नाम कनिष्क, आर्यन, वेद हैं। जो इस बात को प्रमाणित करता है कि यहां पर कभी आर्यों का राज था

अफगानिस्तान की गुफा में मौजूद है 5000 साल पुराना विमान
मौजूदा अफगानिस्तान में 5000 साल पुराने महाभारत कालीन एक विमान मिला है। यह विमान महाभारत काल का माना जा रहा है। इसका खुलासा वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में किया गया है। अफगानिस्तान की एक प्राचीन गुफा में महाभारत काल का यह विमान टाइम वेल में फंसा हुआ है। इसी कारण यह आज तक सुरक्षित बना हुआ है। जो विमान मिला है, इसके आकार प्रकार का पूर्ण विवरण महाभारत व अन्य प्राचीन ग्रंथों में मौजूद है। वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में किए गए खुलासे अनुसार प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने इस विमान को बाहर निकालने की सभी कोशिशें नकाम हो चुकी है। अमेरिका नेवी के आठ कमांडो इस विमान के पास पहुंचने में कामयाब भी हुए। परंतु टाइम वेल सक्रिय होने पर यह सभी गायब हो गए। अमेरिकी, रुस राष्ट्रपति सहित ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के राष्ट्राध्यक्षों के साथ मिलकर इस साइट का अतिगोपनीय दौरा भी किया जा चुका है।
क्या होता है टाइम वेल
टाइम वेल इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्स से सुरक्षित क्षेत्र होता है। इस कारण इस क्षेत्र में मौजूद सामान सुरक्षित रहता है। यही कारण है कि इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता ह

विमान की क्या है खासियत
रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज की रिपोर्ट अनुसार इस 5000 साल पुराने विमान का जब इंजन शुरू होता है। जिसमें से बहुत तेज रोशनी ‍निकलती है। इस विमान के चार पहिए है। इसमें कई तरह के हथियार भी लगे हुए हैं। यह सभी हथियार प्रज्जवलन शील है। इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पाकार है। इसके संपर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इस सर्पाकार टाइम वेल की थ्योरी समझने के लिए वैज्ञानित प्रयासरत हैं। फिलहाल तक इस टाइम वेल का समाधान नहीं निकाला जा सका है।

मंगलवार, 17 अगस्त 2021

साईं शब्द की उत्पत्ति फ़ारसी से है, जिसका अर्थ फ़कीर होता है।


साईं शब्द की उत्पत्ति फ़ारसी से है, जिसका अर्थ फ़कीर होता है।

साईं के पिता का नाम बहरुद्दीन था, जो कि अफगान का एक पिंडारी मुसलमान था। पिंडारियों का काम भारत में लूटपाट करना, और राहगीरों को धोखे से ठग कर उनकी निर्मम हत्या कर देना था। इन्हीं पिंडारियों के महिमा वर्णन का काम सलमान खान एंड गैंग ने फिल्म 'वीर' में किया था। जिनको पिंडारियों की असलियत न पता हो, वे अंग्रेजों द्वारा इनके समूलनाश की हठ ठानने वाले इतिहास को पढ़ें, जिसको कि मैं अंग्रेजों द्वारा कुछेक अच्छे कार्यों जैसे कि रेल, टेलीफोन आदि में योगदान है मानता हूँ।
           हिन्दुओं इतिहास की पुस्तकें उठाओ और उन्हें पढ़ो, सब अंकित है वहाँ।

स्वामी शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती (सोचिये कि हिन्दुओं के इतने बड़े शंकराचार्य) ने साईं के बारे बताया है कि उसका पिता अहमदनगर में एक वेश्या के पास जाता था, उसी वेश्या से चाँद मियाँ पैदा हुआ। इसको इसके पिता ने दस वर्ष की उम्र में पहले हिन्दू मुहल्लों में हरी चादर घुमा कर पैसा कमाने का काम सौंपा, जिससे यह आसानी से धनी घरों की रेकी कर उन्हें चिन्हित कर लेता था, तथा बाद में उसका पिता अपने लुटेरे साथियों के साथ लूट कर उन घरों के निवासियों को क्रूरता से मार देता था।

अंग्रेजों ने चाँद मियाँ को गिरफ्तार कर लिया और वह 8-10 साल तक जेल में रहा। उसको छुड़ाने की जब सारी कोशिशें बेकार हो गयीं तो थक हार कर बहरुद्दीन अंग्रेजों के साथ मिल गया और अंग्रेजों के लिए जासूसी करना स्वीकार कर लिया। अंग्रेजों ने उसको कहा कि, "हमें झाँसी चाहिए"। तो वो अपने सिपाहियों सहित जाकर किसी तरह झाँसी की सेना में शामिल हो गया। अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए झाँसी को भी सेना चाहिए ही थी, इसलिए यह धोखा देना कतिपय आसान रहा। फिर जब अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई पर आक्रमण किया तब इन पिंडारियों ने रात में चुपके से किले का द्वार खोल दिया, जिससे अंग्रेजी सेना आसानी से किले में घुस गई और रानी को किला छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। बाद में अंग्रेजों द्वारा पीछा करने में 5 पिंडारी सैनिक भी अंग्रेजों के साथ थे।

उसके बाद बहरुद्दीन मर गया। कैसे और कब मरा यह मुझे ज्ञात नहीं है। 

लेकिन फिर चाँद मियाँ को अंग्रेजों ने बालगंगाधर तिलक के स्वराज अभियान में शामिल होकर जासूसी करने को कहा। तिलक पहचान गए उसको, और वहीं बम्बई की सड़कों पर इसको पटक पटक कर अपने जूतों से पीटा था। उसके बाद वह वहाँ से भागा और शिरडी गाँव पहुँच गया। वह संत ज्ञानेश्वर की पवित्र भूमि थी, जनता बहुत भोली तथा धार्मिक थी। वहाँ इसने फ़कीर का चोला पहना और साईं बन गया।

आगे की कहानी, खुद साईं ट्रस्ट द्वारा लिखी हुई "साईं सच्चरित" नामक पुस्तक से, ( इन्टरनेट में उपलब्ध है-)

-साईं ने यह कभी नहीं कहा कि "सबका मालिक एक"। साईं सच्चरित्र के अध्याय 4, 5, 7 में इस बात का उल्लेख है कि वो जीवनभर सिर्फ "अल्लाह मालिक है" यही बोलता रहा। कुछ लोगों ने उसको हिन्दू संत बनाने के लिए यह झूठ प्रचारित किया कि वे "सबका मालिक एक है" भी बोलते थे।

-कोई हिन्दू संत सिर पर कफन जैसा नहीं बांधता, ऐसा सिर्फ मुस्लिम फकीर ही बांधते हैं। जो पहनावा साईं का था, वह एक मुस्लिम फकीर का ही हो सकता है। हिन्दू धर्म में सिर पर सफेद कफन जैसा बांधना वर्जित है या तो पगड़ी या जटा रखी जाती है या किसी भी प्रकार से सिर पर बाल नहीं होते।

-साईं बाबा ने रहने के लिए मस्जिद का ही चयन क्यों किया? वहाँ और भी स्थान थे, लेकिन वह जिंदगी भर मस्जिद में ही रहा।

-मस्जिद से बर्तन मंगवाकर वह मौलवी से फातिहा पढ़ने के लिए कहता था। इसके बाद ही भोजन की शुरुआत होती थी।

-साईं का जन्म 1830 में हुआ, पर इसने आजादी की लड़ाई में भारतीयों की मदद करना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि यह भारतीय था ही नहीं।                                                                                                1918 में मरा अगर यह देशभक्त होता तो 1811 में बंग भंग आंदोलन मे सम्मिलित होता जो बांग्लादेश 1947 मैं अलग हुआ उसे अंग्रेजों के समय में 1911 में ही अलग करने की मुहिम चल रही थी इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ से देश के बड़े से बड़े क्रांतिकारी लोग भाग लिए थे जिसमें लोकमान्य तिलक वीर सावरकर आदि                                                                         साईं उर्फ चांद मोहम्मद मरने से पहले उसके हाथ में मार चोट लगने पर हाथ टूट गया तो लकड़ी की पट्टी के द्वारा हाथ पर प्लास्टर लगा था साईं सच्चरित्र बुक में इसका जिक्र है इतना बड़ा तांत्रिक विद्या इसके पास थी तो ठीक क्यों नहीं कर लिया

-"साईं भक्त साठे ने शिवरात्रि के अवसर पर बाबा से पूछा कि वे बाबा की पूजा महादेव या शिव की तरह कर सकते हैं? तो बाबा ने साफ इंकार कर दिया, क्योंकि वे मस्जिद में किसी भी तरह के हिन्दू तौर-तरीके का विरोध करते थे। फिर भी साठे साहेब और मेघा रात में फूल, बेलपत्र, चंदन लेकर मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठकर चुपचाप पूजा करने लगे। तब तात्या पाटिल ने उन्हें देखा तो पूजा करने के लिए मना किया। उसी वक्त साईं की नींद खुल गई और उन्होंने जोर-जोर से चिल्लाना और गालियां देना शुरू कर दिया।" फिर भी  मूर्ख हिन्दू उसके पहनावे से भ्रमित होते रहे।

-वह बाजार से खाद्य सामग्री में आटा, दाल, चावल, मिर्च, मसाला, मटन आदि सब मंगाता था। भिक्षा मांगना तो उसका ढोंग था। इसके पास घोड़ा भी था। शिर्डी के अमीर हिन्दुओं ने उसके लिए सभी तरह की सुविधाएं जुटा दी थीं।

-साईं अपने शिष्य मेघा की ओर देखकर कहने लगा, 'तुम तो एक उच्च कुलीन ब्राह्मण हो और मैं बस निम्न जाति का यवन (मुसलमान) इसलिए तुम्हारी जाति भ्रष्ट हो जाएगी इसलिए तुम यहां से बाहर निकलो। -साई सच्चरित्र।-(अध्याय 28)

-एक एकादशी को उसने पैसे देकर केलकर (ब्राह्मण) को मांस खरीद लाने को कहा और उस साईं ने उसी भक्त तथा ब्राह्मण केलकर को बलपूर्वक बिरयानी चखने को कहा।। -साईं सच्चरित्र (अध्याय 38)

-साईं सच्चरित्र अनुसार साईं जब गुस्से में आता था तब अपने ही भक्तों को गन्दी गन्दी गालियाँ बकता था। ज्यादा क्रोधित होने पर वह अपने भक्तों को पीट भी देता था। कभी पत्‍थर और कभी गालियां। -पढ़ें 6, 10, 23 और 41 साईं सच्चरित्र अध्याय।

-इसने स्वयं कभी उपवास नहीं किया और न ही किसी को करने दिया। साईं सच्चरित्र (अध्याय 32)

"मुझे इस झंझट से दूर ही रहने दो। मैं तो एक फकीर हूं, मुझे गंगाजल से क्या प्रयोजन?"- साई सच्चरित्र (अध्याय 28)
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साईं को भगवान् बनाने का यह सारा प्रपंच शुरू होता है 1971 के पहले खुर्द क़ब्र मज़ार होता था उसे पक्का करके समाधि बनाया गया मार्केटिंग शुरू किया 1977 में आई महानालायक की फिल्म "अमर अकबर एंथोनी" के गाने "शिरडी वाले साईं बाबा" से। जरा सोचिये कि फिल्म के केवल एक गीत ने पूरे भारत की मानसिकता पर क्या असर डाला! उसके पहले कहीं किसी पुस्तक, धर्म, शास्त्र आदि में इसका कहीं भी विवरण आया? हाँ, पर्चे में विवरण अवश्य आया कि साईं के नाम का 100 पर्चा छपवाओ, नहीं तो बहुत नुकसान होगा, और कुछ डरपोक हिन्दुओं ने छपवा डाला।

"मार्केट में कोई नया भगवान नहीं आया है बहुत समय से" क्या आपको फिल्म OMG का वह डायलॉग याद है?

हम आप "बस एक मनोरंजक फिल्म ही तो है" कहकर हँस देते हैं, लेकिन देखिये कि हमारी जड़ों में मट्ठा किस तरह चुपके से डाल दिया जाता है। आप में थोड़ी बहुत अभी चेतना बाकी है, तो आप बच जायेंगे लेकिन आपकी जो नई पीढ़ी आ रही है, उसको कैसे बचायेंगे?

जरा सोचिये, कि जिस साईं को हिन्दू मुसलमान एकता के नाम पर प्रायोजित किया जाता है, उस ट्रस्ट में सबसे ज्यादा पैसा किसका जा रहा है..? 99 प्रतिशत हिन्दुओं का। दुनिया भर के हिन्दू संस्थानों ने राम मंदिर के लिए चंदा दिया, लेकिन भारत के सर्वाधिक अमीर ट्रस्टों में शुमार इस शिरडी संस्थान ने " राम मंदिर" के लिए एक फूटी कौड़ी भी देने से इनकार कर दिया है। और आप इसको साईं राम, साईं कृष्ण, साईं शिव बनाकर पूज रहे हैं? इसको आरम्भ में प्रायोजित करने का सारा फंड इंडोनेशिया मुस्लिम जैसे देशों से आया है। अब जब इसकी चाँदी ही चाँदी है तो सोचिये कि सारा पैसा कहाँ जा रहा है और किसलिए खर्च किया जा रहा होगा।

आज कुछ लालची पुजारियों को खरीद कर हिन्दू मंदिरों में अन्य देवी देवताओं के साथ साईं की मूर्ति भी बिठवा दी जा रही है। शुरुआत होती है कोने में छोटी मूर्ति बिठाने से, और फिर धीरे धीरे यह मूर्ति बड़ी होती जाती है तथा हमारे आराध्य हनुमान जी इस मूर्ति के चरणों में हाथ जोड़े बिठा दिए जाते हैं।

क्या आपने किसी भी जैन, बौद्ध सिख आदि के मठों में इसकी मूर्ति देखी? आपने गिरजाघरों या मस्जिदों में इसका एक कैलेंडर तक टंगे देखा? कोई मुसलमान यदि साईं नाम का उपयोग भी करता है, तो वह बस हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर चंदे के रूप में ठगने के लिए।

"साईं को मानने वालों में सर्वाधिक प्रतिशत पढ़े लिखे लोगों का है, जो अपने आपको तार्किक और आधुनिक समझते हैं। ये वही धिम्मी, कायर, तथा मूर्ख हिन्दू हैं जो मक्कारों के बहकावे "सबका मालिक एक है" में आकर अपने ही देवी-देवताओं, त्यौहारों, प्रतीकों का तो उपहास उड़ाते हैं, उसमें इन्हें जड़ता तथा अन्धविश्वास की बू आती है, लेकिन इस मांसाहारी व्यभिचारी साईं के लिए इनका सर श्रद्धा से झुक जाता है। मन्दिरों की दान पेटिका में एक सिक्का डालने पर भी इनका कलेजा धधकने लगता है और सारे पुजारी धन के लोभी लगने लगते हैं। लेकिन साईं ट्रस्ट के लिए हज़ारों रुपये की चैरिटी करने में इन्हें रत्ती भर भी परेशानी नहीं होती।

वैसे लाख आप साईं को दोषी मान लें, इसे भारत में प्रतिष्ठित कराने में बाहरी षड़यन्त्रकारियों को गरिया लें, लेकिन इन सबसे भी अधिक घृणा के पात्र यही "दोहरे, कायर,  हिन्दू" हैं, जिन्होंने अपनी मूर्खता  से अपने ही धर्म की जड़ें खोदने का दुस्साहस किया है।" मांसाहारी, व्यभिचारी, मदिरापान करने वाला इनका भगवान्! "ऐसे म्लेच्छ को अपने देवालयों में स्थापित करने का महापाप किया है इन मूर्ख हिन्दुओं ने, जिसका प्रायश्चित शायद ही हो पाएगा।

चलते चलते,... गीता के नवें अध्याय के 25वें श्लोक में प्रभु कृष्ण कहतें हैं....

यान्ति देवव्रता देवान्, पितृन्यान्ति पितृव्रता:।
भूतानि यान्ति भूतेज्या, यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।

(देवताओं को पूजने वाले देवताओ को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं, और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिये मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता।)
 "जय हिंद..!!"

सोमवार, 16 अगस्त 2021

मछ मणि किसे और कब धारण करनी चाहिए




मछ मणि किसे और कब धारण करनी चाहिए, और इसके क्या लाभ व नुकसान हो सकते हैं?




मित्रों मच्छमनी अत्यंत दुर्लभ मणि है और यह बहुत कम मात्रा में लोगों द्वारा पाई जाती है लोगों का यह मानना है की यह श्री लंका के समुद्र में एकदम नीचे तल में रहने वाली मछलियों के पेट से पाई जाती है ।

पूर्णिमा के रात को यह मछली समुद्र के तट पर तैरती है, इस समय वहां के मछुआरे वहां की मछलियों को पकड़ लेते हैं और अपने जानकारी के अनुसार जिन मछली में उन्हें ऐसा लगता है की इनमें मछमनी मिल जाएगी उसे पकड़ कर उसके पेट को दबाते हैं पेट को दबाते ही मच्छमनी बाहर निकाल जाती है और उसके बाद मछुआरे उन मछलियों को समुद्र में वापस छोड़ देते हैं ।


ज्योतिषों की माने तो यदि आप राहु ग्रह से परेशान हैं तो आपको मच्छमनी धारण करना चाहिए इससे अच्छा दूसरा कोई उपाय उपलब्ध नहीं है।

मछमणि किसे और कब धारण करना चाहिए ?

राहु मकर राशि का स्वामी है इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि मच्छमणि मकर राशि वालों के लिए अत्यंत लाभदायक है इसके अलावा तुला, मिथुन, वृष या कुंभ राशि वालों के लिए भी मच्छमणि अत्यंत लाभकारी है। यदि राहु दूसरे, तीसरे, नौवें या ग्यारहवें भाव में हो तो मच्छमनी धारण करना जातक के लिए लाभकारी है इसके अलावा राहु यदि केंद्र में एक, चार, सात या दसवें भाव में हो तो मच्छमनी पहनना उसके लिए अत्यंत लाभकारी है। इस मणि को धारण करने से पूर्व ॐ रां राहवे नम: का 1 माला (108 बार) जाप करना चाहिए ।


मच्छमणि धारण करने के चमत्कारी फायदे ?

मित्रों मच्छमणि एक दुर्लभ व चमत्कारी रत्न है इसलिए इसे धारण करने के भी अत्यंत लाभकारी फायदे हैं —
यदि आप पर राहु की महादशा या अंतर्दशा चल रही है और आप उसकी पीड़ा से बचाव हेतु यदि कुछ धारण करना चाहते हैं तो आपको मच्छमनी ही धारण करना चाहिए इससे अच्छा दूसरा कोई विकल्प नहीं हैं ।
वे लोग जो राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं या ऐसे लोग जो सफल होना चाहते हैं उन लोगों के लिए मच्छमणि अत्यधिक लाभकारी है।
ऐसे लोग जो अपने जीवन को ऐश्वर्य के साथ जीना चाहते हैं जो ये सोचते हैं की उन्हें बिलकुल भी धन की कमी न हो लेकिन धन की कमी होने के कारण आपके सपने अधूरे रह जाते हैं तो ऐसी स्तिथि में आपको मच्छमणि अवस्य धारण करना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति काल सर्प दोष से परेशान है जीवन में अनेकों परेशानियां हैं, मानसिक और आर्थिक परेशानियां लगातार सता रहीं है और यदि आप काल सर्प दोष के कष्टों का निवारण चाहते हैं तो आपको मच्छमनी अवश्य धारण करना चाहिए ।
मच्छमणि शत्रुओं से हमें बचाता है और हमारे मनोबल में वृद्धि करता है यदि किसी व्यक्ति को या बच्चे को अपने घर में या किसी कोने में अनजान छाया दिखाई दे तो उसे मच्छमणि धारण करना चाहिए ।
शरीर में थकावट, नजरदोष, ऊपरी बाधा, गुरु चांडाल दोष, व्यापार में बाधा आदि दूर करने हेतु मच्छमणि धारण अवश्य धारण करना चाहिए।


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हैमरहेड कीड़ा है सबसे क्रूर


यह हैमरहेड कीड़ा है, एक पतला, साँप के आकार का कीड़ा।

देखिये यह कीड़ा कैसे चलता है:

ये कीड़े एक आक्रामक प्रजाति हैं। वे केंचुआ खाते हैं। केंचुआ खाने के लिए वे अपने शरीर को केंचुए के ऊपर लपेट देते हैं। अंत में वे केंचुए के बेजान शरीर से सब कुछ चूस लेते हैं। अब यह कीड़े अमेरिका और यूरोप में बढ़ते जा रहे हैं।

हैमरहेड कीड़ा खुद को दो हिस्सों में काटकर प्रजनन करता है। कभी-कभी वे खुद के शरीर को भी खाते हैं। वैसे तो एशिया में यह नहीं है, फिर भी अगर आपको कभी यह कीड़ा दिखाई दे तो उसे मारने के लिए उस पर नमक डालें। ध्यान रहे, इसे काटें नहीं! क्योंकि इसे काटने का अर्थ है एक कीड़े से दो कीड़े बनाना!

भगवान शिव के गण नंदी का रहस्य


शिव की घोर तपस्या के बाद शिलाद ऋषि ने नंदी को पुत्र रूप में पाया था। शिलाद ऋषि ने अपने पुत्र नंदी को संपूर्ण वेदों का ज्ञान प्रदान किया। एक दिन शिलाद ऋषि के आश्रम में मित्र और वरुण नाम के दो दिव्य ऋषि पधारे। नंदी ने अपने पिता की आज्ञा से उन ऋषियों की उन्होंने अच्छे से सेवा की। जब ऋषि जाने लगे तो उन्होंने शिलाद ऋषि को तो लंबी उम्र और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद दिया लेकिन नंदी को नहीं।

तब शिलाद ऋषि ने उनसे पूछा कि उन्होंने नंदी को आशीर्वाद क्यों नहीं दिया? इस पर ऋषियों ने कहा कि नंदी अल्पायु है। यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंतित हो गए। पिता की चिंता को नंदी ने जानकर पूछा क्या बात है पिताजी। तब पिता ने कहा कि तुम्हारी अल्पायु के बारे में ऋषि कह गए हैं इसीलिए मैं चिंतित हूं। यह सुनकर नंदी हंसने लगा और कहने लगा कि आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से पाया है तो मेरी उम्र की रक्षा भी वहीं करेंगे आप क्यों नाहक चिंता करते हैं।

इतना कहते ही नंदी भुवन नदी के किनारे शिव की तपस्या करने के लिए चले गए। कठोर तप के बाद शिवजी प्रकट हुए और कहा वरदान मांगों वत्स। तब नंदी के कहा कि मैं उम्रभर आपके सानिध्य में रहना चाहता हूं। नंदी के समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी को पहले अपने गले लगाया और उन्हें बैल का चेहरा देकर उन्हें अपने वाहन, अपना दोस्त, अपने गणों में सर्वोत्तम के रूप में स्वीकार कर लिया।

सुमेरियन, बेबीलोनिया, असीरिया और सिंधु घाटी की खुदाई में भी बैल की मूर्ति पाई गई है। इससे प्राचीनकल से ही बैल को महत्व दिया जाता रहा है। भारत में बैल खेती के लिए हल में जोते जाने वाला एक महत्वपूर्ण पशु रहा है। बैल को महिष भी कहते हैं जिसके चलते भगवान शंकर का नाम महेष भी है ।

जिस तरह गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है उसी तरह बैलों में नंदी श्रेष्ठ है। आमतौर पर खामोश रहने वाले बैल का चरित्र उत्तम और समर्पण भाव वाला बताया गया है। इसके अलावा वह बल और शक्ति का भी प्रतीक है। बैल को मोह-माया और भौतिक इच्छाओं से परे रहने वाला प्राणी भी माना जाता है। यह सीधा-साधा प्राणी जब क्रोधित होता है तो सिंह से भी भिड़ लेता है। यही सभी कारण रहे हैं जिसके कारण भगवान शिव ने बैल को अपना वाहन बनाया। शिवजी का चरित्र भी बैल समान ही माना गया है।

भगवान कृष्ण और जांबवती के पुत्र साम्ब




क्या भगवान कृष्ण का पुत्र साम्ब ?


वह बिल्कुल भी दुष्ट नहीं था। वह पहले से तय किसी बड़ी चीज का हिस्सा था।

साम्ब, भगवान कृष्ण और जांबवती के पुत्र थे।

कृष्ण की अन्य सभी पत्नियों ने कई बच्चों को जन्म दिया था, जबकि दूसरी ओर, जांबवती ने किसी भी बच्चे को जन्म नहीं दिया था। कृष्ण की तीसरी पत्नी, जाम्बवती, बिना किसी बच्चे के थी। वह कृष्ण के पास पहुंची और उनसे एक बेटा देने का अनुरोध किया।

कृष्ण ऋषि उपमन्यु के आश्रम में गए और उनकी सलाह के अनुसार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या करने लगे। छह महीने के बाद, शिव प्रसन्न हुए और कृष्ण के सामने अपने अर्धनारीश्वर रूप (अर्ध-पुरुष, अर्ध-महिला) में प्रकट हुए। कृष्ण ने पुत्र प्राप्ति की कामना की और मनोकामना मांगी।


कृष्ण चाहते थे कि उनका पुत्र साम्ब बिल्कुल शिव जैसा हो और जैसा कि हम सभी जानते हैं कि शिव का मुख्य कार्य विनाश करना है। जल्द ही, जांबवती को एक बेटा पैदा हुआ। क्योंकि शिव के अर्धनारीश्वर रूप को साम्ब भी कहा जाता है, इसलिए जाम्बवती के पुत्र का नाम साम्ब रखा गया।


साम्ब को पूरे यादव जाति के विनाश का कारण बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि कृष्ण सर्वोच्च शक्ति थे, पहले से ही जानते थे कि क्या आ रहा है और अच्छी तरह से जानते हैं कि यादव वंश शक्तिशाली हैं और किसी को भी हराया नहीं जा सकता है। कृष्ण जानते थे कि यह युग का अंत होने का समय है और इसलिए, वह अपने पुत्र साम्ब को इस संसार में ले आए, ताकि इस कबीले को नष्ट किया जा सके।

लक्ष्मणा के साथ साम्ब का विवाह।

साम्ब बड़ा होकर एक बहुत ही सुंदर राजकुमार बन गया। इस बीच, दुर्योधन की खूबसूरत बेटी, लक्ष्मणा, की शादी होने की उम्र आ गई। वहाँ एक स्वयंबर आयोजित किया गया था, जहां उसे अपने भविष्य के पति को चुनने की स्वतंत्रता थी, समारोह में कई महान राजाओं और राजकुमारों ने भाग लिया। साम्ब भी समारोह में उपस्थित थे। हालांकि, यह देखने के लिए इंतजार करने के बजाय कि वह किसे चुनती है, उसने जबरदस्ती उसे अगवा कर लिया और उसे दूर ले गया, ठीक भीड़ के सामने। दुर्योधन का परिवार नाराज और शर्मिंदा था। वे सभी अपने-अपने रथों में सवार हो गए और साम्ब का पीछा किया। उसे आखिरकार कौरवों के राज्य में पकड़ लिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया।

साम्ब को जेल में रखा गया था, जहाँ उसके साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जाता था और हर तरह से अपमानित किया जाता था। कैद की खबर अंततः कृष्ण के कानों तक पहुंची। अपने बेटे के जघन्य अपराध और इस तथ्य को देखते हुए कि कौरव उनके सबसे बुरे दुश्मन थे, उन्होंने साम्ब को नहीं बचाने का फैसला किया।

कृष्ण के भाई, बलराम, अपने भतीजे के बेहद करीब थे। उन्होंने उसे कौरवों के राज्य से वापस लाने का फैसला किया। उन्होंने दुर्योधन से संपर्क किया और उनसे अनुरोध किया, लेकिन दुर्योधन ने राजकुमार को रिहा करने से इनकार कर दिया। जेल की दीवारों को तोड़ने के लिए बलराम ने अपने हथियार, हल का इस्तेमाल किया। उन्होंने उन सभी सैनिकों को नष्ट कर दिया जिन्होंने उन्हें उनके मार्ग पर रोकने की कोशिश की थी। बलराम की शक्तियाँ देखकर कौरव घबरा गए और उन्होंने साम्ब को तुरंत रिहा कर दिया।


अपने भतीजे की रिहाई से संतुष्ट नहीं होने पर, बलराम ने मांग की, कि लक्ष्मणा को साम्ब को सौंप दिया जाए। बलराम की शक्ति के डर से दुर्योधन ने अपनी बेटी को बलराम के साथ जाने दिया। बलराम पहले से ही जानते थे कि लक्ष्मणा गुप्त रूप से साम्ब से प्यार करने लगी थी और यह देख वे अपने प्रिय भतीजे के लिए खुश था।


वे फिर साम्ब और लक्ष्मण के साथ, द्वारका, कृष्ण के राज्य में लौट आए। कृष्ण, पांडव, और कौरव मूल रूप से क्षत्रिय थे - वे योद्धा जाति के थे। इस समाज में, दुल्हन का अपहरण करना स्वीकार्य था, हालांकि यह आम तौर पर केवल सभी पक्षों की आपसी सहमति से किया जाता था। लक्ष्मणा घटनाओं में बदलाव देख खुश थी, क्योंकि वह बहुत लंबे समय से साम्ब से प्यार करती थी, और इसके बारे में किसी को बताने में असमर्थ थी। जल्द ही, वे दोनों सुखी वैवाहिक जीवन में बस गए।

ऋषियों द्वारा साम्ब को अभिशाप।

एक बार, तीन महान संतों ने द्वारका में कृष्ण के महल का दौरा करने का फैसला किया। कृष्ण, जो उस समय आराम कर रहे थे, ने अपने परिचारकों से कहा कि वे शीघ्र ही वहाँ पहुँचेंगे। साम्ब ने जैसे ही संतों के आगमन के बारे में सुना, उसने महल में मौजूद कुछ अन्य युवा रिश्तेदारों के साथ, ऋषियों पर एक प्रैंक खेलने का फैसला किया। उन्होंने साम्ब को एक गर्भवती महिला के रूप में तैयार किया और ऋषियों से संपर्क किया। युवकों ने ऋषियों से कहा, “यह महिला एक बच्चे के साथ है। कृपया, क्या आप हमें बता सकते हैं कि वह लड़के को जन्म देगी या लड़की को?


क्योंकि ऋषियों के पास एक मनोगत दृष्टि थी, उन्होंने तुरंत देखा कि युवक उनका मजाक उड़ा रहे थे। वे उग्र हो गए। क्रोधित होकर, उन्होंने साम्ब को बताया कि वे उसकी पहचान से अच्छी तरह परिचित थे और उसे अभिशाप दिया कि वह एक लोहे की गांठ को जन्म देगा, जिससे कृष्ण का पूरा वंश नष्ट हो जाएगा।

कुछ समय बाद, साम्ब ने एक विशाल लोहे के बोल्ट को जन्म दिया। जल्द ही उसे एहसास हुआ कि अभिशाप काम कर रहा था और उनका अंत संभवतः निकट था, साम्ब और उसके युवा रिश्तेदार कृष्ण के पास गए और उन्हें बचाने के लिए उनसे भीख मांगी। कृष्ण ने कुछ समय के लिए सोचा, साम्ब को उसके अशिष्ट और गैरजिम्मेदार व्यवहार के लिए डांटा, और उसे राजा उग्रसेन से मिलने की सलाह दी, जो उसको एक समाधान दे सकते थे। राजा ने उस लोहे के बोल्ट का पाउडर बनाने को कहा और फिर इस पाउडर को प्रभास सागर में फेंकने के लिए कहा। साम्ब और उसके युवा दोस्तों ने गदा को पीसना शुरू कर दिया, इसे बहुत कठिन काम मानते हुए, इसे पूरी तरह पीसे बिना, समुद्र में फेंक दिया। कुछ समय बाद यह चूर्ण एरका घास के रूप में समुद्र के किनारे विकसित हुआ। इसी लोहे का एक टुकड़ा समुद्र में गिर गया और उसे एक मछली निगल गई। इस मछली को जारा नामक एक शिकारी ने पकड़ा था।

कृष्ण इस नश्वर पृथ्वी से विदा होते हैं।


जारा ने अपने तीर की नोक पर लोहे को लगाया और अपनी शिकार यात्रा पर निकल गया। उस समय, कृष्ण जंगल में आराम कर रहे थे। जारा ने कृष्ण के बाएं पैर की नोक को एक हिरण का कान समझा, और उस पर अपना तीर चला दिया, जिससे कृष्ण गंभीर रूप से घायल हो गए। जारा ने अपनी गलती देख पश्चाताप किया, कृष्ण ने उसे सांत्वना दी और कहा कि यह सब एक दिन होना ही था। तब कृष्ण अपने नश्वर शरीर से विदा होकर वापस वैकुंठ चले गए।

निष्कर्ष

साम्ब ने बहुत परेशानियों का सामना किया, हालाँकि वह एक बहुत ही सम्मानित योद्धा था। लेकिन ये सब तो होना ही था। यादव वंश को समाप्त करने के अपने उद्देश्य में साम्ब केवल कृष्ण का एक उपकरण था। शिव स्वयं कृष्ण के घर में साम्ब के रूप में पैदा हुए थे। जैसा कि हम पहले से ही जानते हैं कि शिव की भूमिका है कि, फिर से शुरुआत करने के लिए ब्रह्मांड को नष्ट करना।

मैंने अपनी पूरी कोशिश की, इसे लिखने और प्रस्तुत करने के लिए। लिखने के लिए और भी कई चीजें थीं, लेकिन तब यह बहुत लम्बा हो जाता।


पंचांग क्या है? इसे कैसे देखा जाता है?

समय या काल गणना के लिए ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पांच अवयवो से निर्धारण किया जाता है जिसे पंचाग कहते है अर्थात पांच अंग वाला जिसमे तिथि , वार, नक्षत्र, योग, करण अंग के रूप मे होते है जिसका मुहूर्त निर्धारण एवं जीवन के हर पल विशेष महत्व रहता है ।


● तिथि -

सूर्य एवं चन्द्रमा के मध्य रहने वाली विभिन्न कोणीय दूरी का नाम ही तिथि है यह तिथियाँ चन्द्र मास को मिलाकर 30 होती है जिसमे 15 तिथियां शुक्ल पक्ष मे होती है एवं 15 तिथियां कृष्ण पक्ष की होती है जिस समय सूर्य एवं चन्द्र का भोगांश एक समान हो वह बिन्दु अमावस्या का अंतिम बिन्दु होता है जैसे ही चन्द्र का भोगांश सूर्य से अधिक होता है तो शुक्ल पक्ष प्रति पदा का आरंभ हो जाता है ।

सूर्य की औसत दैनिक गति 1° लगभग होती है एवं चन्द्रमा की औसत दैनिक गति लगभग 13° होती है अतः दोनो के बीच एक दिन मे लगभग 12° का अंतर रहता है एवं कुल चन्द्रमा पृथ्वी का घूर्णन करते हुए 360° के भचक्र मे 30 तिथियो का निर्माण होता है अतः 360° ÷12 = 30 तिथि

अतः एक तिथि का मान 12° होता है ।

या तिथि = चन्द्रमा का भोगांश - सूर्य का भोगांश / 12°

सूर्य तथा चन्द्र के भोगांश मे अंतर द्वारा तिथि निर्माण -



● वार -

सूर्योदय से दूसरे दिन के सूर्य उदय तक के समय को वार कहते है सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय को दिनमान और सूर्यास्त से सूर्योदय तक का समय को रात्रिमान कहते है सूर्य नवग्रह मे सबसे शक्तिमान व प्रभावशाली ग्रह होने के कारण ग्रहाधिपति माना जाता है इसी कारण दिन का आरंभ सूर्योदय से मान्य किया गया है ,

अंग्रेजी पद्धति के अनुसार दूसरा दिन मध्यान्ह रात्रि 12 बजे के पश्चात आरंभ होता है और दूसरा दिन उसी समय रात्रि को समाप्त होता है ।

वार क्रमश रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार होते है ।

● नक्षत्र -

ज्योतिष शास्त्र मे सभी विद्वानो ने भचक्र की सूक्ष्म इकाई तक समझने का प्रयास किया है इस क्रम मे उन्होंने भचक्र को पहले 12 भागो मे राशियो के रूप मे परिर्वतित किया पुनः इसे 27 भागो मे बांटा जिसे नक्षत्र का नाम दिया गया है इस प्रकार विभिन्न 12 राशियो मे 27 नक्षत्रो का वर्गीकरण एवं विभाजन किया गया है तत्पश्चात इस नक्षत्र की सूक्ष्म इकाई तक पहुंचने के लिए पुनः प्रत्येक नक्षत्र को चार- चार भागो मे बाँटा जिसे नक्षत्र पद का नाम दिया गया है ।

भचक्र का मान = 360°

नक्षत्र की संख्या = 27

एक नक्षत्र का मान = 360° ÷ 27 = 13° 20'


एक नक्षत्र का पद का मान = 3° 20' × 4 = 13° 20' एक नक्षत्र



● योग -

योग का निर्माण सूर्य एवं चन्द्रमा का एक दूसरे से स्थिति के अनुसार होता है यह 27 प्रकार के होते है ।

योग = चन्द्र का भोगांश + सूर्य का भोगांश/ 13°20'


इसमे विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, व्याघात, वज्र, व्यतिपात, परिधि, वैधृति योग अशुभ माने जाते हैं ।

● करण -

तिथि के आधे भाग को करण कहा जाता है इस प्रकार प्रत्येक तिथि मे दो करण होते है एवं प्रत्येक चन्द्र मास मे 60 करण होते हैं । वास्तव मे करण 11 होते है इनके अन्तर्गत 4 स्थिर करण एवं 7 चर करण होते हैं -

चर करण-1- वव ,2-बालव,3- कौलव, 4-तैतिल,5- गर ,6-वणिज ,7- वृष्टि

स्थिर करण- 1- शकुनि 2 - चतुष्पद 3 - नाग 4 - किंस्तुध्न

करण = चन्द्र का भोगांश- सूर्य का भोगांश/ 6°



उपरोक्त पंचाग के पाँचो अंगो का निर्धारण वैदिक ज्योतिषीय गणित के माध्यम से किया जाता है जिसका मुहूर्त निर्धारण मे विशेष महत्व होता है ।

● पंचाग देखने की विधि -


किसी भी प्रचलित पंचाग ले और वर्तमान दिनांक देखे निम्नवत प्रकार का चार्ट बना हुआ मिलेगा उदाहरण के लिए मेने विश्व विजय पंचाग का उपयोग किया है ।


लाल रंग से अंकित कालम को देखे प्रथम कालम मे वारो का उल्लेख किया गया है से अगले कालम मे तिथि लिखा है , के आगे तिथि घं मि तक रहेगी साथ ही घटी पल तक रहेगी बताया है ।

इससे आगे नक्षत्र का कालम है के आगे घं मि एवं घटी पल तक स्थिति रहेगी लिखा है ।

से आगे योग कालम है घं मिनट तक स्थिति रहेगी बताया गया है , के आगे करण का उल्लेख है के आगे घं मिनट तक स्थिति लिखी है

से आगे सूर्योदय, सूर्यास्त दिनमान के बाद अंग्रजी तारीख , दिनांक का उल्लेख किया गया है जिससे आसानी से पंचाग के पाँचो अंग तिथि ,वार, नक्षत्र, योग, करण के बारे मे जान सकते हैं ।

आशा है आपकी जिज्ञासा के अनुरूप जानकारी हासिल हुई होगी ज्योतिषीय जिज्ञासा का अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न करने के लिए आपका ह्दय से आभार आपका उत्साह वर्धन नवीन प्रेरणा प्रदान करने वाला मनोबल को बढाने वाला रहेगा जी ।

मूल स्रोत- ज्योतिष के मूल सिद्धांत लेखिका श्रीमती प्रियंम्बदा अग्रवाल
( वरिष्ठ प्राध्यापक भारतीय विद्या भवन नई दिल्ली )

शिव जी की आराधना में कौन सा मन्त्र जप करना चाहिए:

शिव जी की आराधना में कौन सा मन्त्र जप करना चाहिए:

१ —ॐ नमः शिवाय

२—नमः शिवाय


उत्तर

★तो आइए पहले ॐ का मूल अर्थ समझते हैं।

● यह ॐ -अ उ म इन तीन से मिलकर बना है। इस ॐ को प्रणव भी कहते हैं ये तीन अक्षर सृष्टि स्थिति लय के और क्रमशः ब्रह्मा विष्णु महेश के प्रतीक भी हैं। त्रिकाल संध्या में प्रातः मध्याह्न संध्या गायत्री के भी प्रतीक मान सकते हैं।
★ॐ की व्याख्या मुण्डक उपनिषद में की गई है जो संभवतः सबसे छोटा उपनिषद है । इसमें बताया गया है कि यह ॐ अविनाशी परब्रह्म परमात्मा ही है।इस ॐ में चार पद हैं।इसके स्थूल जगत सूक्ष्म जगत और कारण जगत ये तीन पद हैं जो चिन्तन में आते हैं।पर इस प्रणव ओंकार का चौथा पद या रूप भी है जो अ-चिन्तय है। ॐ का यह चौथा रूप है - शान्तं शिवं अद्वैतं चतुर्थं । (मुण्डक छन्द ७) शिव का यहाँ सामान्य अर्थ कल्याणकारी से है शिव शंकर से नहीं है। (शैव दर्शन वाले चाहे तो मान सकते हैं।)

ॐ ओम का अर्थ इस प्रकार परमात्मा ब्रह्म तत्व हुआ। इसलिए अधिकतर मंत्रों की शुरुआत ॐ से होती है पर कई बार बिना ॐ के भी मन्त्र लिखे जाते हैं।

★मन्त्र में वर्णाक्षर सङ्ख्या नियत है फिक्स है । मन्त्र में sound is the lowest form of ,energy—ध्वनि ऊर्जा का सबसे आरम्भिक रूप है—इस सिद्धांत पर कार्य होता है। जैसे हमने ताप गतिक यांत्रिक विद्युत परमाणु आदि विविध ऊर्जा रूपों केफार्मूले बनाए हैं वैसे ही मन्त्र की ऊर्जा के फार्मूले हैं।

इसके वर्णाक्षरों से मन्त्र सृष्टा ऋषियों ने इसकी ऊर्जा तय की हैऔर उद्देश्य भेद से मन्त्र जप व विधि तय की है।मन्त्र को इस प्रकार गणित का या कहें विज्ञान के सूत्रकी तरह समझें।इसे हम बदल नहीं सकते।

इसलिए जब बिना ॐ के मन्त्र दिया वहाँ ॐ नहीं लगाना चाहिए।

जहाँ ॐ लगा है वहां लगाना चाहिए।इसी तरह जहाँ नमः लगा वहाँ एक्स्ट्रा नमः नहीं लगाना चाहिए।(व्हाट्सएप्प पर नारद कृत 12 अक्षर के मन्त्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय इस मंत्र में एक्सट्रा नमः बाद में भी लगा हुआ प्रेषित होता रहता है जो इसे 14 अक्षर का बना देता है। )
अब हम ॐ नमः शिवाय और नमः शिवाय इन दो मंत्रों में क्या अंतर है, इस पर चर्चा करते हैं।

●ॐ नमः शिवाय— में छह अक्षर है यह षड अक्षर है।

●नमः शिवाय —में पाँच अक्षर हैं।यह पंचाक्षर है।

●मंत्रों में हम संख्या की दृष्टि से एक दो तीन चार पांच छह इत्यादि कई अक्षरों वाले मन्त्र देखते हैं।इनके पीछे कुछ उद्देश्य होते हैं जो हमें स्पष्ट रूप से लिखे नहीं मिलते केवल अनुमान लगाना होता है।

★1 ॐ युक्त नमः शिवाय मन्त्र आध्यात्मिक क्षेत्र की साधना की दृष्टि से उत्तम है क्योंकि ॐ परब्रह्म परमात्म स्वरूप है

◆इस ॐ युक्त नमः शिवाय के छह अक्षर वाले मन्त्र को उसे करना चाहिए जो सांसारिक उपलब्धि नहीं चाहता ,आत्म तत्व का अन्वेषण करना चाहता है।


चित्र परिचय: सृष्टि के मूल तत्व की खोज के लिए बनी विश्व की सबसे बड़ी कण भौतिकी प्रयोग शाला CERN ,स्विट्ज़रलैण्ड के प्रवेश द्वार पर नटराज शिव की प्रतिमा स्थापना के 18 जून 2004 समय औपचारिकता पूर्णकरते वैज्ञानिक।इस प्रतिमा के नीचे भौतिकविद फ्रिट्ज़ोफ काप्रा का यह वाक्य लिखा है कि शिव का यह नृत्य आधुनिक पार्टिकल फिजिक्स की दृष्टि से सूक्ष्म कण भौतिकी का ही नृत्य है जो समस्त अस्तित्व का कारण है।

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मुण्डक उपनिषद 2–2–4 में कहा गया है-,

प्रणवो धनुः शरो आत्मा, ब्रह्म तल्लक्ष्यम उच्यते।

अर्थात ओमकार या प्रणव ही धनुष है, आत्मा ही बाण है, ब्रह्म उसका लक्ष्य है ऐसा कहा गया है।

★2 नमः शिवाय यह पाँच अक्षर का मन्त्र भी अलग से है। इतना ही क्यों केवल इन पाँच अक्षरों — न म शि व य में से प्रत्येक अक्षर से छन्द आरम्भ करते हुए बहुश्रुत शिवपञ्चाक्षरस्तोत्र भी है जिसमें शुरू में ॐ नहीं लगाया गया है।यह

-'न' नागेन्द्र हाराय से शुरू होकर 'य' यक्षस्वरूपाय…पर सम्पन्न होता है
पांच अक्षर के इस शिव मन्त्र नमः शिवाय का उद्गम या स्रोत हम शुक्ल यजुर्वेद के अंतर्गत रुद्राष्टाध्यायी में देख सकते हैं जिसमें
नमः शिवाय च शिव तराय च
ऐसा पाठ दिया गया है ।रुद्र चमकम में भी ऐसा पाठ है।
एक महत्व पूर्ण बात◆कल्याण के शिव महापुराण अंक 2017 विशेषांक पूर्वार्ध के अध्याय 10 में शिव पंचाक्षर मन्त्र की महत्ता विस्तृत रूप से दी गई है।
जबकि अध्याय 17 में शिव के ओमकार स्वरूप को सूक्ष्म और पंचाक्षर को स्थूल रूप बताया गया है।
★★ इससे स्पष्ट होता है कि ॐ निराकार शिव का रूप है जबकि पंचाक्षर साकार पञ्च भूतात्मक जगत रूप शिव का रूप है★★
★★।(शाक्त ,वैष्णव गणपति आदि सभी मतों में उनके देव ,ओं कार या प्रणव रूप ही हैं )

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●इससे यह निष्कर्ष निकल सकता है कि जो सांसारिक समस्याओं से शीघ्र त्राण, राहत चाहते हैं उन्हें बिना ॐ लगाए केवल —नमः शिवाय —इस पांच अक्षर के मन्त्र का जप करना चाहिए।

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●और जब कोई सांसारिक संमस्या या इच्छा नहीं रह गई हो तो ॐ नमः शिवाय -इस छह अक्षर मन्त्र का जप करना चाहिए।

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●मेरा तो यही सुझाव वर्षों से रहता आया है।

नौकरी,स्वास्थ्यलाभ, विवाह, इच्छित संतान, दाम्पत्य सुख, पद प्राप्ति आदि की सांसारिक कामना के मामलों में जन्मपत्रिका के अनुसार शिव उपासना के सुझाव व प्रदोष व्रत के सुझाव का पालन करने पर सिद्धि की दृष्टि से शिव उपासना में अन्य स्तोत्र इत्यादि के साथ★ पंचाक्षर जप करने वाले भक्त जन की कामना शीघ्रता से सिद्ध होती देखी गई।यह मेरा अनुभव भी है।★

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●अब कोई कहे कि ॐ सहित और ॐ रहित पंचाक्षर जप वाले में से किसकी कामना जल्दी सिद्ध हुई तो ऐसी कोई वर्कशाप इस श्रद्धा जगत में आयोजित होती नहीं देखी, सम्भव ही नहीं।

●कुछ लोग जिद करते हैं कि ॐ लगाने में क्या कोई बुराई है ? बहुत से मंत्रों में ॐ लगा रहता है।वे ठीक कहते हैं ; पर यह भी तो देखें कि और देव तो वर देने थोड़ी देर भी लगाते हैं पर शिव जी देर नहीं लगाते।इसीलिए तो शिव "आशुतोष" हैं: आशु अर्थात शीघ्र , तोष अर्थात प्रसन्न।

वैसे शिव उपासना में भी ॐ से तो आत्म ज्ञान जैसी सर्वोत्तम भलाई आत्मज्ञान-भी शीघ्र ही है पर वह अभी चाहिए कहाँ?
अति महत्वपूर्ण :श्रीमद्भागवत में भी शुकदेव जी से परीक्षित का प्रश्न है कि विष्णु भक्त सांसारिक कष्ट क्लेश भोगते हुए देखे जाते हैं जबकि शिवभक्त भोग ऐश्वर्य सम्पन्न देखे जाते हैं -ऐसा क्यों ?परन्तु इस पर चर्चा फिर कभी ।

●तो बात ये कि अभी तो परीक्षा में पास होना है, विवाह होना संतान होना प्रमोशन होना बढिया डेपुटेशन होना चुनाव जीतना मांगता अपुन को। तो भैया सांसारिक कामना की शीघ्र पूर्ति के लिए नमः शिवाय ही जपें।

★वैसे भी केवल शिव ही आशुतोष हैं और सांसारिक कामना पूरी करने में देर नहीं करते इसलिए ऐसी स्थिति में शिव को शीघ्र प्रसन्न कर जल्दी कार्य सिद्धि के लिए, शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध इन पंच तन्मात्राओं की सुख की इच्छा वाले साधक को पंचभौतिक जगत के प्रतिनिधि रूप शिव के पाँच अक्षर का मन्त्र ही करना चाहिए :

।।नमः शिवाय।।

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