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बुधवार, 2 मार्च 2022

रूस पर विश्व द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों के चलते आज रूस में एप्पल/गूगल पेमेंट सिस्टम काम नहीं कर रहा है

रूस पर विश्व द्वारा लगाए जा रहे प्रतिबंधों के चलते आज रूस में एप्पल/गूगल पेमेंट सिस्टम काम नहीं कर रहा है, जिसके कारण रूस में लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इससे पता चलता है की अब युद्ध सिर्फ जंग के मैदान में या हथियारों तक सीमित नहीं रह गए हैं। 
रूस पर लग रहे विभिन्न प्रतिबंधों को देखते हुए अब आपको समझ आ रहा होगा की मोदीजी का आत्मनिर्भर भारत अभियान कितनी दूरदर्शी सोच का हिस्सा है। आज नहीं तो कल भारत को दो युद्ध लड़ना है, एक पाकिस्तान से और एक चाइना से। जब युद्ध होगा तो तमाम मोर्चों पर युद्ध होगा। जिसमे से आर्थिक और साइबर मोर्चा काफी अहम होगा। मोदी सरकार भारत को हर मोर्चे पर तेजी से आत्मनिर्भर बनाते हुए शक्तिशाली बना रही है। 

आज भारत के पास:

📌 अपना GPS सिस्टम है।
📌 अपना RuPay कार्ड है।
📌 अपना UPI सिस्टम है।
📌 अपनी Digital कर्रेंसी है।
📌 अपना Social Media प्लेटफार्म है।
📌 अपना Search इंजन है।
📌 अपना '₹' INR पर एक्सचेंज है।
📌 अपना Satelite नेटवर्क है।
📌 अपने Defence इक्विपमेंट्स है।
📌 अपनी Local Data Storage Policy है।
📌 अपना Medical Infrastructure है।
📌 अपना Strategic Crude Oil Reserve है।

🙌 अब भारत अपने ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) पर भी तेजी से काम कर रहा है।

अब आपको समझ आ जाना चाहिए कि आपातकाल में ये "भारत" के लिए कितने ज़रूरी हैं। मोदीजी एक बहुत बड़े दूरदर्शी लक्ष्य पर काम कर रहे हैं जो किसी भी आपातकाल परिस्थिति में विभिन्न मोर्चों पर भारत की सुरक्षा करेंगे। 

#TrustNaMo #ModiMatters

घुटनों के दर्द से परेशान रहते हैं? तो जानिए इस दर्द से निजात पाने के दमदार घरेलू उपचार

 घुटनों के दर्द से परेशान रहते हैं? तो जानिए इस दर्द से निजात पाने के दमदार घरेलू उपचार
 

1 रोज सुबह नियमित खाली पेट 1 चम्मच मेथी पाउडर में 1 ग्राम कलौंजी मिलाकर गुनगुने पानी के साथ पिएं। इस मिश्रण को चाहें तो दोपहर और रात के भोजन के बाद भी आधा-आधा चम्मच ले सकते है। इससे जॉइंट्स मजबूत होने में मदद मिलेगी।
 2 किसी मुलायम कपड़े को गर्म पानी में भिगोएं और निचोड़ें, अब इस कपड़े से घुटनों की सिकाई करें। ऐसा करने से भी घुटनों के दर्द में आराम मिलता है।

 3 खाने में गर्म तासीर वाली चीजें जैसे दालचीनी, जीरा, अदरक और हल्दी आदि का अधिक इस्तेमाल करें। इनके सेवन से घुटनों की सूजन और दर्द कम होने में मदद होती है।

 4 मेथी दाना, सौंठ और हल्दी बराबर मात्रा में मिलाएं। इस मिश्रण को तवे पर अच्छे से भूनें फिर पीसकर पाउडर बना लें। अब इस पाउडर का नियमित सुबह-शाम भोजन के बाद गर्म पानी के साथ सेवन करें।
 5 हो सके तो सुबह खाली पेट लहसुन की एक कली दही के साथ खाएं। इससे भी घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा।
 6 नीम और अरंडी के तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर हल्का गर्म करें, फिर इस तेल से सुबह-शाम जोड़ों पर मालिश करें। इससे भी घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा।

 7 ऐसा माना जाता है कि गेहूं के दाने जितना चूना दही या दूध में मिलाकर दिन में एक बार खाएं। ऐसा नियमित 90 दिनों तक करने से शरीर में कैल्शियम की कमी दूर होती है।

 

शरीर सौष्ठव और स्वास्थ्य के लिए मालिश क्यो जरूरी?

स्वस्थ बने रहने का प्रावधान

शरीर सौष्ठव और स्वास्थ्य के लिए मालिश क्यो जरूरी?

जनिए मालिश के लाभ व विधियां

शरीर के अवयवों को दबाना, उन पर हाथ फेरना तथा मालिश करना हमेशा होता रहता है| शरीर के मर्दन को मालिश या मसाज करना भी कहते हैं। माँ के गर्भ से जन्म लेते ही मालिश व मर्दन का आरंभ सहज रूप से होता है। वह चलता ही रहता है| मां चाहती है कि उसके गर्भ से जन्म लेने वाला शिशु बलवान बने, दृढ़ता प्राप्त करे। दीर्घायु बने। इसीलिए शिशु की वह मालिश करती रहती है। जब तक मनुष्य जिन्दा रहता है, तब तक मालिश आवश्यक है। स्त्री-पुरुष तथा छोटे बड़े सभी सप्ताह में एक बार मर्दन चिकित्सा करा कर, सिर स्नान करें तो कई लाभ होंगे। ये क्रियाएँ लोग स्वयं भी कर सकते हैं।


मालिश के लाभ
मालिश के कारण शरीर में रक्त संचार ठीक तरह से होता है।

शरीर में जमा रहनेवाले व्यर्थ पदार्थ, मल, मूत्र, पसीना और श्वास के रूप में बाहर निकल जाते हैं|


कमजोर और दुबले पतले लोग मर्दन के कारण शक्तिशाली बनते हैं।

शरीर के अवयवों को मालिश से शक्ति मिलती है।

जीर्णकोश, आंतें तथा अन्य ग्रंथियों में चेतना आती है| थकावट दूर होती है।

शरीर में जमा व्यर्थ चरबी पिघल जाती है।

पक्षवात, पोलियो, नसों की कमजोरी, शारीरिक दर्द तथा जोड़ों के दर्द आदि व्याधियों पर मालिश प्रभावशाली काम करती है|


चर्म रंध्र साफ होते हैं। उनके द्वारा शरीर के अंदर का मालिन्य बाहर निकल जाता है।

योगाभ्यास या अन्य व्यायाम करने वाले यदि मालिश करें या करवाएँ तो बड़ा लाभ होगा। कोई व्यायाम न करनेवाले भी मालिश के द्वारा फायदा उठा सकते हैं।

त्वचा में चिकनापन आता है| इससे सुंदरता बढ़ती है।

मालिश की प्रचलित विधियाँ
मालिश की मुख्य 8 विधियाँ हैं।

(1) तेल से मालिश,
(2) क्रीमों से मालिश
(3) शीतलपदार्थों से मालिश
(4) पांव से मालिश
(5) पावडर से मालिश
(6) बिजली के उपकरणों से मालिश
(7) औषधीय पदार्थों से मालिश
(8) चुंवक से मालिश

तिल का तेल, नारियल का तेल, राई का तेल, ऑलिव तेल, घी इन का उपयोग मालिश के लिए कर सकते हैं | शरीर में खराब रक्त नीचे से हृदय में ले जाया जाता है | इसलिए कुछ विशेषज्ञों के कथनानुसार तलुवों से लेकर ऊपर तक मालिश करना उपयोगी है | रोग ग्रस्त अवयवों की मालिश की जाती है। वही सही पद्धति है|


तेल मालिश सब से बढ़िया है। शरीर भर तेल लगा कर मालिश कर हलके गरम पानी से स्नान करना चाहिए। जहाँ दर्द होगा, वहाँ मर्दन करने के बाद इनफ्रारेड लाइट से गरमी पहुँचावें तो दर्द जल्दी कम हो जाएगा।

स्वास्थ्य सुधारने के लिए मर्दन चिकित्सा का उपयोग करना चाहिए। अनुचित पद्धतियों में शारीरिक अवयवों को उत्तेजित करने के लिए मालिश न करवाएँ।


विशेष प्रक्रिया

प्रात: काल सारे शरीर में तेल लगा कर मर्दन कराने के बाद सूर्य किरणों के बीच थोड़ी देर रह कर स्नान करें तो डी विटमिन की प्राप्ति बड़े परिमाण में होती है। चर्म संबंधी रोग पास नहीं फटकते | हफ्ते में एक बार नासिका रंधों में कुन-कुने स्वच्छ घी या तेल की पाँच छ: बूंदें डालनी चाहिए।

मसाज करने के बाद भाप-स्नान करें तो व्यर्थ चरबी घट जाएगी | श्वास संबंधी व्याधियाँ, सिरदर्द, जुकाम तथा नींद की कमी के कारण होने वाली थकावट आदि में कमी होगी। चुस्ती एवं स्फूर्ति बढ़ेगी।


भाप स्नान करने के पहले एक गिलास पानी पीना चाहिए। सिर पर जल से भीगा कपड़ा डाल लेना चाहए। हफ़्ते में एक या दो बार भाप स्नान कर सकते हैं |

मालिश क्रिया में सावधानिया

अधिक रक्तचापवालों, हृदय दर्दवालों तथा बहुत कमजोर लोगों और गर्भिणी स्त्रीयों  को मर्दन चिकित्सा तथा भाप स्नान से दूर रहना चाहिए

शिव बारात में उमड़े भक्त , आकर्षक का केंद्र रही उज्जैन के महाकाल की डोली - महाशिवरात्रि JODHPUR

 ।। नंदी पर होकर सवार दूल्हा बन महादेव चले बिहाने ।।

 शिव बारात में उमड़े भक्त ,
आकर्षक का केंद्र रही उज्जैन के महाकाल की डोली

जोधपुर । महाशिवरात्रि पर्व पर शिव भक्तों की भक्ति परवान पर थी हर तरफ महादेव भक्त माथे पर चंदन के त्रिपुण्ड बनाये भक्ति में लीन थे । विश्व हिन्दू परिषद सरदारपुरा प्रखंड संचालित शिव बारात महोत्सव समिति के तत्वावधान में भव्य शिव बारात सरदारपुरा के सत्संग भवन से गाजे बाजे के साथ निकली।

समिति के महामंत्री रवि गोस्वामी ने बताया कि पूज्य सन्तो के सानिध्य व समिति अध्यक्ष किन्नर समाज की गादीपति सरोज मासी के नेतृत्व में निकलने वाली विराट बारात के शुभारंभ स्थल पर विशाल मंच बना कर सन्तो मेहमानों व समिति के लोगो का विहिप द्वारा स्वागत किया गया ।

यात्रा संत मनमोहन दास महाराज के सानिध्य में व शहर विधायक मनीषा पंवार , उत्तर की महापौर कुंती परिहार व विहिप प्रान्त अध्यक्ष डॉ राम गोयल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघचालक नंदलाल भाटी महोत्सव समिति वरिष्ठ उपाध्यक्ष अंकित पुरोहित , आलोक चौरड़िया मितेश जैन मनीष बागरी शुभम जांगिड़ एडवोकेट एशोसिएशन अध्यक्ष नाथूसिंह राठौड़ पूर्व महापौर घनश्याम ओझा अतुल भंसाली संजय अग्रवाल सहित अन्य लोगो के द्वारा भोलेनाथ की पूजा अर्चना कर प्रारम्भ की गई ।
समिति संयोजक निखिल भाटी ने बताया कि बारात में सजधज कर आये ऊंट घोड़े के साथ नंदी पर दुल्हा बन  विराजे भोलेनाथ लोगो को बहुत भा रहे थे। डीजे पर शिव भजनों पर थिरकते भूत प्रेत राक्षसों की टोली , भस्म रमाती महादेव टोली , अखाड़ों के युवाओ द्वारा आग व अंगारों के साथ हैरतअंगेज प्रदर्शन , बालोतरा की आंगी गेर जो मुख्य स्थानों पर पारम्परिक नृत्य कर देखने वालों को मोहित कर रहे थे ।

ब्रह्मा विष्णु सहित देवी देवताओं की संजीव झांकियों के साथ उज्जैन के बाबा महाकाल की झांकी आकर्षक का केंद्र रही । वही हर कोई बारात के अंत मे दुल्हा बने महादेव व समिति का स्वागत करने को आतुर दिखा । पूरे रास्ते भर में स्वयंसेवी संस्थाओं ने जूस लस्सी के साथ पेय पदार्थ पिला बारात का अभिनंदन कर समिति का साफा माला पहनाकर स्वागत किया गया । बारात बी रोड से गोल बिल्डिंग जालोरी गेट भीतरी शहर के खांडा फलसा आडा बाजार होते हुए कटला बाजार में शहर सबसे पुराने अचलनाथ मन्दिर पर जाकर सम्पन्न हुई जहा मन्दिर ट्रस्ट के लोगो द्वारा अभिनंदन किया गया ।
विहिप के दीपेश भाटी ने बताया कि  प्रांत महानगर सहित प्रखंड के पंकज दुगट , अंकित मालवीय तरुण सोतवाल नवीन मित्तल योगेश खानालिया मंयक सोतवाल रोहित भुवनेश खानालिया सहित सेकड़ो कार्यकर्ता व्यवस्था में लग सहयोग कर रहे थे।



Jodhpur: ढोल नगाड़ों के साथ निकली शिव बारात, आकर्षण का केंद्र रही उज्जैन के महाकाल की डोली, देखें तस्वीरें

मंगलवार, 1 मार्च 2022

187 वर्ष बाद काशी विश्वनाथ मंदिर में मढ़ा गया सोना, 37 किलो सोने से बढ़ी गर्भगृह की चमक

187 वर्ष बाद काशी विश्वनाथ मंदिर में मढ़ा गया सोना,
37 किलो सोने से बढ़ी गर्भगृह की चमक




काशी विश्वनाथ मंदिर के इतिहास में रविवार को एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। 187 वर्ष के लम्बे इंतजार के बाद मंदिर में सोना मढ़ा गया। मंदिर के गर्भगृह के अंदर की दीवारों पर 30 घंटे के अंदर सोने की परत लगाई गई। सोना लगने के बाद गर्भगृह के अंदर की पीली रोशनी हर किसी को सम्मोहित कर रही है। मंदिर प्रशासन के मुताबिक 37 किलो सोना लगाया गया है। बचे अन्य कार्यों में 23 किलो और सोना लगाया जाएगा।
*अद्भुत और अकल्पनीय हो गया बाबा का दरबार*

मंदिर के गर्भ गृह में चल रहे स्वर्ण मंडन के कार्य के पूर्ण होने के बाद पहली बार पूजा करने पहुंचे प्रधानमंत्री ने इस कार्य को देखते हुए कहा कि अद्भुत और अकल्पनीय कार्य हुआ है। स्वर्ण मंडन से विश्व के नाथ का दरबार एक अलग ही छवि प्रदर्शित कर रहा है। 
 प्रधानमंत्री शाम करीब 6 बजे मंदिर परिसर पहुंचे विश्वनाथ द्वार से प्रवेश करने के पश्चात मंदिर परिसर के उत्तरी गेट से गर्भगृह में प्रवेश किए। मंदिर के अर्चक सत्यनारायण चौबे, नीरज पांडे और श्री देव महाराज ने बाबा का षोडशोपचार पूजन कराया। पूजन के पश्चात प्रधानमंत्री ने बाबा श्री काशी विश्वनाथ से जनकल्याण की कामना की। इसके बाद प्रधानमंत्री ने परिसर के अंदर चारों ओर लगे स्वर्ण के कार्य को देखा। उन्होंने कहा कि दीवारों पर उकेरी गई विभिन्न देवताओं की आकृतियां स्वर्णमंडन के बाद और भी स्पष्ट प्रदर्शित हो रही हैं। स्वर्ण मंडन के बाद गर्भ गृह की आभा कई गुना बढ़ गई है।
*1835 में कराया गया था मंदिर के दो शिखरों को स्वर्णमंडित* 

वर्ष 1835 में पंजाब के तत्कालीन महाराजा रणजीत सिंह ने विश्वनाथ मंदिर के दो शिखरों को स्वर्णमंडित कराया था। बताया गया कि साढ़े 22 मन सोना लगा था। उसके बाद कई बार सोना लगाने व उसकी सफाई का कार्य प्रस्तावित हुआ, लेकिन अंजाम तक नहीं पहुंचा। काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण के साथ ही मंदिर के शेष हिस्से व गर्भगृह को स्वर्णजड़ित करने की कार्ययोजना तैयार होने लगी थी। इसी दौरान करीब डेढ़ माह पूर्व बाबा के एक भक्त ने मंदिर के अंदर सोने लगवाने की इच्छा जतायी। मंदिर प्रशासन की अनुमति मिलने के बाद सोना लगाने के लिए माप और सांचा की तैयारी चल रही थी। करीब माहभर तैयारी के बाद शुक्रवार को सोना लगाने का काम शुरू हुआ।
मंदिर की चारों चौखटें भी सोने की होंगी
मंदिर प्रशासन की मानें गर्भगृह के अंदर सोना लगाने का काम पूरा होने के बाद अब चारों चौखट से चांदी हटाकर उसपर भी सोने की परत लगायी जाएगी। इसके बाद मंदिर के शिखर के नीचे के बचे हिस्से में भी सोने की प्लेटें लगाई जानी है।
हर हर महादेव 
जय जय बाबा विश्वनाथ 
🙏🔱🌹🔱🙏

भगवान महेशजी प्रसन्न जिन पर... उनके साथ होती हैं ये 3 बातें


भगवान महेशजी प्रसन्न जिन पर... उनके साथ होती हैं ये 3 बातें
धर्मशास्त्रों में भगवान महेशजी को गुणातीत कहकर भी पुकारा गया है। यानी भगवान महेशजी अनगिनत गुण व शक्तियों के स्वामी है। इन शक्तियों की महिमा भी अपार है। भगवान महेशजी का ऐसा बेजोड़ चरित्र ही भगवान महेशजी को ईश्वरों का ईश्वर (देवों का देव) यानी महेश्वर या महेश बनाता है। शास्त्रों में उजागर भगवान महेशजी के बेजोड़ चरित्र पर सांसारिक और व्यावहारिक नजरिए से गौर करें तो पता चलता है कि भगवान महेशजी के देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने के पीछे कुछ खूबियां खास अहमियत रखती हैं। जानिए, आख़िर भगवान महेशजी की ऐसी ही 3 अहम शक्तियां कौन सी हैं।

दरअसल, इंसानी जीवन की दिशा व दशा तय करने में दो बातों की अहम भूमिका होती हैं - पहली रचना, उत्पत्ति या सृजन और दूसरी आजीविका। ये दोनों ही लक्ष्य पाने और कायम रखने के लिए यहां बताए जा रहे तीन गुण अहम हैं या यूं कहें कि इनके बिना न सृजन करना, न ही जीवन को चलाना संभव है। भगवान महेशजी का चरित्र भी इन तीन बेजोड़ गुणों से संपन्न है। यहीं वजह है कि जिस भी व्यक्ति के जीवन में इन 3 गुणों से यश, धन व सुख नजर आता है, धार्मिक नजरिए से माना गया है कि ऐसा होना भगवान महेशजी की प्रसन्नता के ही संकेत हैं।

(1) पावनता व वैभव -
शुद्धता, पावनता या पवित्रता के अभाव में मानव जन्म हो या किसी वस्तु की रचना दोषपूर्ण हो जाती है। भगवान महेशजी का चरित्र व उनका निराकार स्वरूप शिवलिंग भी सृजन का ही प्रतीक होकर जीवन व व्यवहार में पावनता और संयम का संदेश देता है। भगवान महेशजी का संयम और वैराग्य दोनों ही तन-मन की पवित्रता की सीख है। यही वजह है कि अचानक दरिद्रता, तंगी, रोग या क्लेशों से घिरे महेशजी या किसी देव भक्त को इन परेशानियों से छुटकारा मिलने लगे, तो धार्मिक आस्था से इसे उस व्यक्ति के जीवन पर भगवान महेशजी कृपा का ही बड़ा संकेत माना गया है।

(2) ज्ञान -
ज्ञान या शिक्षा के अभाव में जीवनयापन संघर्ष और संकट भरा हो जाता है। ज्ञान व बुद्धि के मेलजोल से बेहतर आजीविका यानी जीवन के 4 पुरुषार्थों में एक 'अर्थ' प्राप्ति के रास्ते खुल जाते हैं। भगवान महेशजी भी जीवन के लिए जरूरी ज्ञान, कलाओं, गुण और शक्तियों के स्वामी होने से जगतगुरु भी पुकारे जाते हैं, जो धर्मशास्त्र, तंत्र-मंत्र और नृत्य के रूप में जगत को मिले है। कोई भी धर्म व ईश्वर को मानने वाला अगर ज्ञान के जरिए यश व सफलता की बुलंदियों को छूने लगे, तो धार्मिक नजरिए से यह भगवान महेशजी कृपा ही मानी गई है, जिसे कायम रखने के लिए अहंकार से परे रहकर व विवेक के साथ ज्ञान, कला या हुनर को बढ़ाने या तराशने के लिए संकल्पित हो जाना चाहिए।

(3) पुरुषार्थ -
जीवन के लक्ष्यों को पाने के लिए संकल्पों के साथ पूरी तरह डूबकर परिश्रम को अपनाना ही पुरुषार्थ का भाव है। इसे धर्म या अध्यात्म क्षेत्र में साधना या तप के रूप में जाना जाता है तो सांसारिक जगत में कर्म के रूप में भी जाना जाता है। भगवान शिव भी महायोगी, तपस्वी माने गए हैं। भगवान महेशजी का योग व तप जीवन में सुख, सफलता व शांति के लिए पुरुषार्थ की अहमियत बताता है। मन व तन के आलस्य से परे श्रम के जरिए जीवन को साधना ही भगवान महेशजी के बेजोड़ तप और योग का संदेश है।

यही वजह है कि व्यावहारिक तौर पर जब भी किसी इंसान को नौकरी, कारोबार में या जीवनयापन के लिए किसी भी रूप में की गई भरसक कोशिशों के सुफल मिलते या सफलता हाथ लगती है, तो यह धर्म के नजरिए से भगवान महेशजी कृपा ही मानी जाती है।

इस तरह भगवान महेशजी के चरित्र की ये तीन खासियत इंसानी जीवन में गहरी अहमियत रखने से भक्तों के मन में श्रद्धा और आस्था पैदा कर भगवान महेशजी की भक्ति और उपासना को सर्वोपरि बनाती है। साथ ही महादेव के महेश स्वरूप को हृदय में बसाए रखती है।

Ψ जय महेश Ψ

आज महाशिवरात्रि है , आज के दिन रखे जाने वाले व्रत का अपना अलग ही महत्व् है ..

आज महाशिवरात्रि है , आज के दिन रखे जाने वाले व्रत का अपना अलग ही महत्व् है ..
महाशिवरात्रि व्रत कथा:-

महाशिवरात्रि का व्रत फाल्गुन महीने में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को रखा जाता है । शिवरात्रि न केवल व्रत है, बल्कि त्यहार और उत्सव भी है. इस दिन भगवान भोलेनाथ का कालेश्वर रूप प्रकट हुआ था. महाकालेश्वर शिव की वह शक्ति हैं जो सृष्टि के अंत के समय प्रदोष काल में अपनी तीसरी नेत्र की ज्वाला से सृष्टि का अंत करता हैं। महादेव चिता की भष्म लगाते हैं, गले में रूद्राक्ष धारण करते हैं और नंदी बैल की सवारी करते हैं. भूत, प्रेत, पिशाच शिव के अनुचर हैं. ऐसा अमंगल रूप धारण करने पर भी महादेव अत्यंत भोले और कृपालु हैं जिन्हें भक्ति सहित एक बार पुकारा जाय तो वह भक्त की हर संकट को दूर कर देते हैं. महाशिवरात्रि की कथा में शिव के इसी दयालु और कृपालु स्वभाव का परिचय मिलता है.

एक शिकारी था. शिकारी शिकार करके अपना तथा अपने परिवार का भरण पोषण करता था.एक दिन की बात है शिकारी पूरे दिन भूखा प्यासा शिकार की तलाश में भटकता रहा परंतु कोई शिकार हाथ न लगा. शाम होने को आई तो वह एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर बैठ गया. वह जिस पेड़ पर बैठा था उस वृक्ष के नीचे एक शिवलिंग था. रात्रि में व्याधा अपना धनुष वाण लिए शिकार की तलाश में बैठा था और उसे शिकार भी मिला परंतु निरीह जीव की बातें सुनकर वह उन्हें जाने देता. चिंतित अवस्था में वह बेल की पत्तियां तोड़ तोड़ कर नीचे फेंकता जाता. जब सुबह होने को आई तभी शिव जी माता पार्वती के साथ उस शिवलिंग से प्रकट होकर शिकारी से बोले आज शिवरात्रि का व्रत था और तुमने पूरी रात जागकर विल्वपत्र अर्पण करते हुए व्रत का पालन किया है इसलिए आज तक तुमने जो भी शिकार किए हैं और निर्दोष जीवों की हत्या की है मैं उन पापों से तुम्हें मुक्त करता हूं और शिवलोक में तुम्हें स्थान देता हूं. इस तरह भगवान भोले नाथ की कृपा से उस व्याधा का परिवार सहित उद्धार हो गया.

महाशिवरात्रि महात्मय एवं व्रत विधान :-

शिवरात्रि की बड़ी ही अनुपम महिमा है. जो शिवभक्त इस व्रत का पालन करते हैं उन्हें चाहिए कि फाल्गुन कष्ण पक्ष की चतुदर्शी यानी शिवरात्रि के दिन प्रात: उठकर स्नान करें फिर माथे पर भष्म अथवा श्रीखंड चंदन का तिलक लगाएं. हाथ में अक्षत, फूल, मु्द्रा और जल लेकर शिवरात्रि व्रत का संकल्प करें. गले में रूद्राक्ष धारण करके शिवलिंग के समीप ध्यान की मुद्रा में बैठकर भगवान शिव का ध्यान करें। शांतचित्त होकर भोलेनाथ का गंगा जल से जलाभिषेक करें. महादेव को दुग्ध स्नान बहुत ही पसंद है अत: दूध से अभिषेक करें. महादेव को फूल, अक्षत, दुर्वा, धतूरा, बेलपत्र अर्पण करें। शिव जी को उक्त पदार्थ अर्पित करने के बाद हाथ जोड़ कर प्रार्थना करें.

शिवरात्रि के दिन रूद्राष्टक और शिवपुराण का पाठ सुनें और सुनाएं. रात्रि में जागरण करके नीलकंठ कैलशपति का भजन और गुणगान करना चाहिए. अगले दिन भोले शंकर की पूजा करने के बाद पारण कर अन्न जल ग्रहण करना चाहिए. इस प्रकार महाशिवरात्रि का व्रत करने से शिव सानिघ्य प्राप्त होता है.

महाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनाये ।

महाशिवरात्री की हार्दिक शुभकामनाये ।

महाशिवरात्री भगवान शंकर और भगवती पार्वती का महामिलन का महोत्सव है। यह हमें कल्याणकारी कार्य करने की ओर शिवत्व का बोध कराता है। फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन महाशिवरात्रि का पर्व आता है। शैव और वैष्णव, दोनों ही महाशिवरात्रि का व्रत रखते है। वैष्ण्व इस तिथि को शिव चतुर्दशी कहते है। भगवान शिव को वेदों में रुद्र कहा गया है, क्...योंकि दुख को नष्ट कर देते है। इस प्रकार शिव और रुद्र एक परमेश्वर के ही पर्यायवाची शब्द हैं। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि चंद्र-दर्शन की आखिरी तिथि है, क्योंकि इसके बाद अमावस्या की रात्रि में चंद्र लुप्त हो जाता है। अमावस्या को कालरात्रि भी कहा जाता है। धर्मग्रंथों के अनुसार, फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान शंकर और भगवती पार्वती का विवाह हुआ था। शिव और शक्ति के पावन परिणय की तिथि होने के कारण इसे महाशिवरात्री का नाम दिया गया। इस दिन लोग व्रत रखकर शिव-पार्वतीाâा विवाहोत्सव धूमधाम से मनाते है। काशी में महाशिवरात्रि के दिन निकलने वाली शिव-बारात तो विश्वविख्यात है, जिसे देखने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचते है। बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में हर घर शिवरात्रि की उमंग में रंग जाता है।इस तिथि के मध्यरात्रिकालीन महानिशीथकाल में महेश्वर के निराकार ब्रह्म-स्वरूप प्रतीक शिवलिंग का आविर्भाव होने से भी यह तिथि महाशिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध हो गई। शिवपुराण के अनुसार, शिव के दो रूप है- सगुण और निर्गुण। सगुण-रूप मूर्ति में साकार होता है, जबकि शिवलिंग निर्गुण-निराकार ब्रह्म है।
महाशिवरात्रि का यह पावन व्रत सुबह से ही शुरू हो जाता है। इस दिन शिव मंदिरों में जाकर मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर, ऊपर से बेलपत्र, आक-धतूरे के पुष्प, चावल आदि डालकर शिविंलग पर चढ़ाया जाता है. अगर पास में शिवालय न हो, तो शुद्ध गीली मिट्टी से ही शिविंलग बनाकर उसे पूजने का विधान है। इस दिन भगवान शिव की शादी भी हुई थी, इसलिए रात्रि में शिवजी की बारात निकाली जाती है। रात में पूजन कर फलाहार किया जाता है। अगले दिन सवेरे जौ, तिल, खीर और बेलपत्र का हवन करके व्रत समाप्त किया जाता है।

स्कंदपुराण महाशिवरात्रि को व्रतों में सर्वोपरि कहता है। इस व्रत के तीन प्रमुख अंग है- उपवास, शिवार्चन और रात्रि-जागरण। उपवास से तन शुद्ध होता है, अर्चना से मन पवित्र होता है तथा रात्रि-जागरण से आत्म-साक्षात्कार होता है। यही महाशिवरात्रि के व्रत का उद्देश्य है।

सही अर्थो में शिवचतुर्दशी का लक्ष्य है पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेद्रियों तथ मन, अहंकार, और बुद्धि-इन चतुर्दश १४, का समुचित नियंत्रण। यही सच्ची शिव-पूजा है। वस्तुतः इसी से शिवत्व का बोध होता है। यही अनुभूति ही इस पर्व को सार्थक बनाती है और यह पर्व समस्त प्राणियों के लिए कल्याणकारी बन जाता है ।

कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान् शिव हर मंदिर में लिंग रूप में प्रत्यक्ष होते है l भक्तों का मानना है कि उस दिन शिव पूजा एवं लिंगाभेशक करने पर शिव प्रसन्न होंगे l उस दिन उपवास रहकर रात भर जागारण कर पूजा एवं भजन करते है l कहा जाता है कि उस दिन स्वामी को बिल्वपत्र और अभिषेक समर्पित करने से पुनर्जन्म नहीं रहेगा और और मुक्त प्राप्त होगी l इस पर्व दिन पर शिवलिंग ज्योतिर्लिंग के रूप परिवर्तित होगा l कश्मीर में शिवरात्री उत्सव १५ दिनों तक मनाया जाता है l

शिवरात्री का व्रत फाल्गुन कृष्णा त्रयोदशी का होता है l कुछ लोग चतुर्दशी को भी इस व्रत को करते है l ऐसा माना जाता है कि सृष्टि के आदि में इसी दिन भगवान् शंकर का ब्रह्मा से रुद्रा के रूप में ,रात्री के मध्य में अवतरण हुआ था l प्रलय की बेला में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान् शिव ताण्डव करते हुये ब्रह्माण्ड को तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते है l इसी लिए इसे महा शिवरात्री अथवा कालरात्री कहा गया है l

भगवान शिव अपने कर्मों से तो अद्भुत हैं ही; अपने स्वरूप से भी रहस्यमय हैं। भक्त से प्रसन्न हो जाएं तो अपना धाम उसे दे दें और यदि गुस्सा हो जाएं तो उससे उसका धाम छीन लें। शिव अनोखेपन और विचित्रताओं का भंडार हैं। शिव की तीसरी आंख भी ऐसी ही है। धर्म शास्त्रों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं पर शिव की तीन आंखें हैं। 

दरअसल शिव की तीसरी आंख प्रतीकात्मक नेत्र है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में पढऩे वाली मुसीबतों से सावधान करना। जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं; जिन्हें हम अपनी दोनों आंखों से भी नहीं देख पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है।

यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस जरुरत है उसे जगाने की। भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र का स्थान है। यह आज्ञाचक्र ही विवेकबुद्धि का स्रोत है।

| शिव |

1 व्युत्पत्ति और अर्थ:
- शिव शब्द वश् शब्द से तैयार हुआ है। वश् का मतलब है प्रकाश देना, अर्थात जो प्रकाश देते है वह शिव। शिव यह स्वयंसिद्ध, स्वयंप्रकाशी है। वे स्वयं प्रकाशित रहकर विश्व को प्रकाशित करते है।

2 कुछ अन्य नाम...
- शंकर --
"शं करोति इति शंकर:।" 'शं' अर्थात कल्याण और 'करोति' अर्थात कार्य करनेवाला। जो कल्याण करते है वह शंकर।

- महाकालेश्वर --
अखिल ब्रह्माण्ड के अधिष्ठाता देव (क्षेत्रपाल देव)। वह कालपुरुष अर्थात महाकाल (महान् काल) है; अर्थात उन्हें महाकालेश्वर कहते है।

- महादेव --
'विश्वसर्जन' के एवं 'व्यवहार के विचार' के मुलत: तीन विचार होते है - परिपूर्ण पावित्र्य, परिपूर्ण ज्ञान और परिपूर्ण साधना। यह तीन जिनके अन्दर साथ में है, ऐसे देव एवं देवोके देव, अर्थात महादेव।

- भालचंद्र --
भाल के ऊपर अर्थात कपाल के ऊपर, जिन्होंने चन्द्र को धारण किया हुआ है वह भालचंद्र। शिव पुत्र गणपति जी का भी भालचंद्र, यह एक नाम है।

- कर्पूरगौर --
शिव का रंग कर्पूर जैसा (कपूर जैसा) सफ़ेद है; वस्तुत: उन्हें कर्पूरगौर ऐसा भी कहा जाता है।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2022

विज्ञान की कुछ शानदार और मंत्रमुग्ध कर देने वाली घटनाएं क्या हैं?

 

1) मरक्यूरी और अलुमिनियम का आपस में रिएक्ट करना।

2) चुम्बकीय पुट्टी

3) बैक्टेरिया का शिकार करती मानव श्वेत रक्त कौशिका (white blood cell)

4) मोमबत्ती का उसी के धुएं से वापस आग पकड़ना

5) चुम्बकीय फिरकी का हवा में तैरना

6) काँच का टूटना

7) ऑक्टोपस का पानी में रंग ब रूप बदलना

8) ज्वेल वीड का अपना बीज फैलाना

9) पाइन कोन का भीतर बीज फैलाना

10) प्लाज्मा का सूर्य की सतह पर से फूटना

11) चंद्रमा का एक महीने चक्कर लगाना

12) साँप के जहर का इंसानी खून से मिलना

जानकारी स्त्रोत :

[1]

फुटनोट

[1] Rohit Virmani's answer to What are some cool and mesmerizing science phenomena's in pictures? in *˚˚*One World I One Life*˚˚*

रविवार, 27 फ़रवरी 2022

‘नाम’ (भगवान का नाम) और ‘नामी’ (स्वयं भगवान) में श्रेष्ठ कौन है ?’

भगवान श्रीराम का विजय-मन्त्र!!!!!!!


भगवान श्रीराम का विजय-मन्त्र : ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’

भगवान के ‘नाम’ का महत्व भगवान से भी अधिक होता है । भगवान को भी अपने ‘नाम’ के आगे झुकना पड़ता है । यही कारण है कि भक्त ‘नाम’ जप के द्वारा भगवान को वश में कर लेते हैं ।

जब हनुमानजी संकट में थे, तब सबसे पहले ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ मन्त्र नारदजी ने हनुमानजी को दिया था । इसलिए संकट-नाश के लिए इस मन्त्र का जप मनुष्य को अवश्य करना चाहिए । यह मन्त्र ‘मन्त्रराज’ भी कहलाता है क्योंकि—

यह उच्चारण करने में बहुत सरल है।

इसमें देश, काल व पात्र का कोई बंधन नहीं है अर्थात् हर कहीं, हर समय व हर किसी के द्वारा यह मन्त्र जपा जा सकता है ।

इस मन्त्र का नाम विजय-मन्त्र क्यों ?

सत् गुण के रूप में (निष्काम भाव से) इस मन्त्र के जप से साधक अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करता है ।

रजोगुण के रूप में (कामनापूर्ति के लिए) इस महामन्त्र के जप से मनुष्य दरिद्रता, दु:खों और सभी आपत्तियों पर विजयप्राप्त कर लेता है ।

तमोगुण के रूप में (शत्रु बाधा, मुकदमें में जीत आदि के लिए) इस मन्त्र का जप साधक को संसार में विजयी बनाता है और अपने विजय-मन्त्र नाम को सार्थक करता है।

सच्चे साधक (गुणातीत जिसे गीता में स्थितप्रज्ञ कहा गया है) को यह विजय-मन्त्र परब्रह्म परमात्मा का दर्शन कराता है। इसी विजय-मन्त्र के कारण बजरंगबली हनुमान को श्रीराम का सांनिध्य और कृपा मिली । समर्थ गुरु रामदासजी ने इस मन्त्र का तेरह करोड़ जप किया और भगवान श्रीराम ने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए थे ।

इस मन्त्र में तेरह (13) अक्षर हैं और तेरह लाख जप का एक पुरश्चरण माना गया है । इस मन्त्र का जप कर सकते हैं और कीर्तन के रूप में जोर से गा भी सकते हैं।

इस मन्त्र को सच्ची श्रद्धा से जीवन में उतारने पर यह साधक के जीवन का सहारा, रक्षक और सच्चा पथ-प्रदर्शक बन जाता है।

लंका-विजय के बाद एक बार अयोध्या में भगवान श्रीराम देवर्षि नारद, विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषि-मुनियों के साथ बैठे थे । उस समय नारदजी ने ऋषियों से कहा कि यह बताएं—‘नाम’ (भगवान का नाम) और ‘नामी’ (स्वयं भगवान) में श्रेष्ठ कौन है ?’

इस पर सभी ऋषियों में वाद-विवाद होने लगा किन्तु कोई भी इस प्रश्न का सही निर्णय नहीं कर पाया । तब नारदजी ने कहा—‘निश्चय ही ‘भगवान का ‘नाम’ श्रेष्ठ है और इसको सिद्ध भी किया जा सकता है ।’

इस बात को सिद्ध करने के लिए नारदजी ने एक युक्ति निकाली । उन्होंने हनुमानजी से कहा कि तुम दरबार में जाकर सभी ऋषि-मुनियों को प्रणाम करना किन्तु विश्वामित्रजी को प्रणाम मत करना क्योंकि वे राजर्षि (राजा से ऋषि बने) हैं, अत: वे अन्य ऋषियों के समान सम्मान के योग्य नहीं हैं ।’

हनुमानजी ने दरबार में जाकर नारदजी के बताए अनुसार ही किया । विश्वामित्रजी हनुमानजी के इस व्यवहार से रुष्ट हो गए । तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘हनुमान कितना उद्दण्ड और घमण्डी हो गया है, आपको छोड़कर उसने सभी को प्रणाम किया ?’ यह सुन विश्वामित्रजी आगबबूला हो गए और श्रीराम के पास जाकर बोले—‘तुम्हारे सेवक हनुमान ने सभी ऋषियों के सामने मेरा घोर अपमान किया है, अत: कल सूर्यास्त से पहले उसे तुम्हारे हाथों मृत्युदण्ड मिलना चाहिए ।’

विश्वामित्रजी श्रीराम के गुरु थे अत: श्रीराम को उनकी आज्ञा का पालन करना ही था ।‘ श्रीराम हनुमान को कल मृत्युदण्ड देंगे’—यह बात सारे नगर में आग की तरह फैल गई । हनुमानजी नारदजी के पास जाकर बोले—‘देवर्षि ! मेरी रक्षा कीजिए, प्रभु कल मेरा वध कर देंगे । मैंने आपके कहने से ही यह सब किया है ।’

नारदजी ने हनुमानजी से कहा—‘तुम निराश मत होओ, मैं जैसा बताऊं, वैसा ही करो । ब्राह्ममुहुर्त में उठकर सरयू नदी में स्नान करो और फिर नदी-तट पर ही खड़े होकर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’—इस मन्त्र का जप करते रहना । तुम्हें कुछ नहीं होगा।

दूसरे दिन प्रात:काल हनुमानजी की कठिन परीक्षा देखने के लिए अयोध्यावासियों की भीड़ जमा हो गई । हनुमानजी सूर्योदय से पहले ही सरयू में स्नान कर बालुका तट पर हाथ जोड़कर जोर-जोर से ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जप करने लगे।

भगवान श्रीराम हनुमानजी से थोड़ी दूर पर खड़े होकर अपने प्रिय सेवक पर अनिच्छापूर्वक बाणों की बौछार करने लगे। पूरे दिन श्रीराम बाणों की वर्षा करते रहे, पर हनुमानजी का बाल-बांका भी नहीं हुआ। अंत में श्रीराम ने ब्रह्मास्त्र उठाया । हनुमानजी पूर्ण आत्मसमर्पण किए हुए जोर-जोर से मुस्कराते हुए ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ का जप करते रहे । सभी लोग आश्चर्य में डूब गए ।

तब नारदजी विश्वामित्रजी के पास जाकर बोले—‘मुने ! आप अपने क्रोध को समाप्त कीजिए। श्रीराम थक चुके हैं, उन्हें हनुमान के वध की गुरु-आज्ञा से मुक्त कीजिए । आपने श्रीराम के ‘नाम’ की महत्ता को तो प्रत्यक्ष देख ही लिया है । विभिन्न प्रकार के बाण हनुमान का कुछ भी नहीं बिगाड़ सके । अब आप श्रीराम को हनुमान को ब्रह्मास्त्र से न मारने की आज्ञा दें ।’

विश्वामित्रजी ने वैसा ही किया । हनुमानजी आकर श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े। विश्वामित्रजी ने हनुमानजी को आशीर्वाद देकर उनकी श्रीराम के प्रति अनन्य भक्ति की प्रशंसा की।

राम से बड़ा राम का नाम!!!!!!!!!

गोस्वामी तुलसीदासजी का कहना है—‘राम-नाम’ राम से भी बड़ा है । राम ने तो केवल अहिल्या को तारा, किन्तु राम-नाम के जप ने करोड़ों दुर्जनों की बुद्धि सुधार दी । समुद्र पर सेतु बनाने के लिए राम को भालू-वानर इकट्ठे करने पड़े, बहुत परिश्रम करना पड़ा परन्तु राम-नाम से अपार भवसिन्धु ही सूख जाता है ।

कहेउँ नाम बड़ ब्रह्म राम तें ।
राम एक तापस तिय तारी ।
नाम कोटि खल कुमति सुधारी ।।
राम भालु कपि कटकु बटोरा।
सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ।।
नाम लेत भव सिंधु सुखाहीं ।
करहु विचार सुजन मन माहीं ।।

मन्त्र की व्याख्या,इस मन्त्र में—
‘श्रीराम’—यह भगवान राम के प्रति पुकार है ।
‘जय राम’—यह उनकी स्तुति है
‘जय जय राम’—यह उनके प्रति पूर्ण समर्पण है ।

संसार का मूल कारण सत्व, रज और तम—ये त्रिगुण हैं । ये तीनों ही भव-बंधन के कारण हैं । इन तीनों पर विजय पाने और संसार में सब कुछ ‘राम’ मानने की शिक्षा देने के लिए इस मन्त्र में तीन बार ‘राम’ और तीन ही बार ‘जय’ शब्द का प्रयोग हुआ है।

मन्त्र का जप करते समय मन में यह भाव रहे—‘भगवान श्रीराम और सीताजी दोनों मिलकर पूर्ण ब्रह्म हैं । हे राम ! मैं आपकी स्तुति करता हूँ और आपके शरण हूँ ।’

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