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गुरुवार, 25 अगस्त 2022

प्रकाण्ड विद्वान #अष्टावक्र

प्रकाण्ड विद्वान  #अष्टावक्र


#अष्टावक्र  इतने प्रकाण्ड विद्वान थे  कि  माँ के गर्भ से ही अपने पिताजी  "कहोड़" को अशुद्ध वेद पाठ करने के लिये टोंक दिए जिससे क्रुद्ध होकर पिताजी ने आठ जगह से टेड़ें हो जाने का श्राप दे दिया था। 

 पौराणिक_कथा

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अष्टावक्र अद्वैत वेदान्त के महत्वपूर्ण ग्रन्थ अष्टावक्र गीता के ऋषि हैं। अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदान्त का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। 

'अष्टावक्र' का अर्थ 'आठ जगह से टेढा' होता है। 
कहते हैं कि अष्टावक्र का शरीर आठ स्थानों से टेढ़ा था।

उद्दालक ऋषि के पुत्र का नाम श्‍वेतकेतु था। उद्दालक ऋषि के एक शिष्य का नाम कहोड़ था। कहोड़ को सम्पूर्ण वेदों का ज्ञान देने के पश्‍चात् उद्दालक ऋषि ने उसके साथ अपनी रूपवती एवं गुणवती कन्या सुजाता का विवाह कर दिया। कुछ दिनों के बाद सुजाता गर्भवती हो गई। एक दिन कहोड़ वेदपाठ कर रहे थे तो गर्भ के भीतर से बालक ने कहा कि पिताजी! आप वेद का गलत पाठ कर रहे हैं। यह सुनते ही कहोड़ क्रोधित होकर बोले कि तू गर्भ से ही मेरा अपमान कर रहा है इसलिये तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) हो जायेगा।

हठात् एक दिन कहोड़ राजा जनक के दरबार में जा पहुँचे। वहाँ बंदी से शास्त्रार्थ में उनकी हार हो गई। हार हो जाने के फलस्वरूप उन्हें जल में डुबा दिया गया। इस घटना के बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। पिता के न होने के कारण वह अपने नाना उद्दालक को अपना पिता और अपने मामा श्‍वेतकेतु को अपना भाई समझता था। एक दिन जब वह उद्दालक की गोद में बैठा था तो श्‍वेतकेतु ने उसे अपने पिता की गोद से खींचते हुये कहा कि हट जा तू यहाँ से, यह तेरे पिता का गोद नहीं है। अष्टावक्र को यह बात अच्छी नहीं लगी और उन्होंने तत्काल अपनी माता के पास आकर अपने पिता के विषय में पूछताछ की। माता ने अष्टावक्र को सारी बातें सच-सच बता दीं।

अपनी माता की बातें सुनने के पश्‍चात् अष्टावक्र अपने मामा श्‍वेतकेतु के साथ बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिये राजा जनक के यज्ञशाला में पहुँचे। वहाँ द्वारपालों ने उन्हें रोकते हुये कहा कि यज्ञशाला में बच्चों को जाने की आज्ञा नहीं है। इस पर अष्टावक्र बोले कि अरे द्वारपाल! केवल बाल श्वेत हो जाने या अवस्था अधिक हो जाने से कोई बड़ा व्यक्ति नहीं बन जाता। जिसे वेदों का ज्ञान हो और जो बुद्धि में तेज हो वही वास्तव में बड़ा होता है। इतना कहकर वे राजा जनक की सभा में जा पहुँचे और बंदी को शास्त्रार्थ के लिये ललकारा।

राजा जनक ने अष्टावक्र की परीक्षा लेने के लिये पूछा कि वह पुरुष कौन है जो तीस अवयव, बारह अंश, चौबीस पर्व और तीन सौ साठ अक्षरों वाली वस्तु का ज्ञानी है? राजा जनक के प्रश्‍न को सुनते ही अष्टावक्र बोले कि राजन्! चौबीस पक्षों वाला, छः ऋतुओं वाला, बारह महीनों वाला तथा तीन सौ साठ दिनों वाला संवत्सर आपकी रक्षा करे। अष्टावक्र का सही उत्तर सुनकर राजा जनक ने फिर प्रश्‍न किया कि वह कौन है जो सुप्तावस्था में भी अपनी आँख बन्द नहीं रखता? जन्म लेने के उपरान्त भी चलने में कौन असमर्थ रहता है? कौन हृदय विहीन है? और शीघ्रता से बढ़ने वाला कौन है? अष्टावक्र ने उत्तर दिया कि हे जनक! सुप्तावस्था में मछली अपनी आँखें बन्द नहीं रखती। जन्म लेने के उपरान्त भी अंडा चल नहीं सकता। पत्थर हृदयहीन होता है और वेग से बढ़ने वाली नदी होती है।

अष्टावक्र के उत्तरों को सुकर राजा जनक प्रसन्न हो गये और उन्हें बंदी के साथ शास्त्रार्थ की अनुमति प्रदान कर दी। बंदी ने अष्टावक्र से कहा कि एक सूर्य सारे संसार को प्रकाशित करता है, देवराज इन्द्र एक ही वीर हैं तथा यमराज भी एक है। अष्टावक्र बोले कि इन्द्र और अग्निदेव दो देवता हैं। नारद  तथा पर्वत दो देवर्षि हैं, अश्‍वनीकुमार भी दो ही हैं। रथ के दो पहिये होते हैं और पति-पत्नी दो सहचर होते हैं। बंदी ने कहा कि संसार तीन प्रकार से जन्म धारण करता है। कर्मों का प्रतिपादन तीन वेद करते हैं। तीनों काल में यज्ञ होता है तथा तीन लोक और तीन ज्योतियाँ हैं। अष्टावक्र बोले कि आश्रम  चार हैं, वर्ण चार हैं, दिशायें चार हैं और ओंकार, आकार, उकार तथा मकार ये वाणी के प्रकार भी चार हैं। बंदी ने कहा कि यज्ञ पाँच प्रकार के होते हैं, यज्ञ की अग्नि पाँच हैं, ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, पंच दिशाओं की अप्सरायें पाँच हैं, पवित्र नदियाँ पाँच हैं तथा पंक्‍ति छंद में पाँच पद होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दक्षिणा में छः गौएँ देना उत्तम है, ऋतुएँ छः होती हैं, मन सहित इन्द्रयाँ छः हैं, कृतिकाएँ छः होती हैं और साधस्क भी छः ही होते हैं। बंदी ने कहा कि पालतू पशु सात उत्तम होते हैं और वन्य पशु भी सात ही, सात उत्तम छंद हैं, सप्तर्षि  सात हैं और वीणा में तार भी सात ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि आठ वसु हैं तथा यज्ञ के स्तम्भक कोण भी आठ होते हैं। बंदी ने कहा कि पितृ यज्ञ में समिधा नौ छोड़ी जाती है, प्रकृति नौ प्रकार की होती है तथा वृहती छंद में अक्षर भी नौ ही होते हैं। अष्टावक्र बोले कि दिशाएँ दस हैं, तत्वज्ञ दस होते हैं, बच्चा दस माह में होता है और दहाई में भी दस ही होता है।  बंदी ने कहा कि ग्यारह रुद्र हैं, यज्ञ में ग्यारह स्तम्भ होते हैं और पशुओं की ग्यारह इन्द्रियाँ होती हैं। अष्टावक्र बोले कि बारह आदित्य होते हैं बारह दिन का प्रकृति यज्ञ होता है, जगती छंद में बारह अक्षर होते हैं और वर्ष भी बारह मास का ही होता है। बंदी ने कहा कि त्रयोदशी उत्तम होती है, पृथ्वी पर तेरह द्वीप हैं।...... इतना कहते कहते बंदी श्‍लोक की अगली पंक्ति भूल गये और चुप हो गये। इस पर अष्टावक्र ने श्‍लोक को पूरा करते हुये कहा कि वेदों में तेरह अक्षर वाले छंद अति छंद कहलाते हैं और अग्नि, वायु तथा सूर्य तीनों तेरह दिन वाले यज्ञ में व्याप्त होते हैं।

इस प्रकार शास्त्रार्थ में बंदी की हार हो जाने पर अष्टावक्र ने कहा कि राजन्! यह हार गया है, अतएव इसे भी जल में डुबो दिया जाये। तब बंदी बोला कि हे महाराज! मैं वरुण का पुत्र हूँ और मैंने सारे हारे हुये ब्राह्मणों को अपने पिता के पास भेज दिया है। मैं अभी उन सबको आपके समक्ष उपस्थित करता हूँ। बंदी के इतना कहते ही बंदी से शास्त्रार्थ में हार जाने के पश्चात जल में डुबोये गये सार ब्राह्मण जनक की सभा में आ गये जिनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे।

अष्टावक्र ने अपने पिता के चरणस्पर्श किये। तब कहोड़ ने प्रसन्न होकर कहा कि पुत्र! तुम जाकर समंगा नदी में स्नान करो, उसके प्रभाव से तुम मेरे शाप से मुक्त हो जाओगे। तब अष्टावक्र ने इस स्थान में आकर समंगा नदी में स्नान किया और उसके सारे वक्र अंग सीधे हो गये।। 

*धन्य है हमारी सनातन संस्कृति*

इस तस्वीर को देखने और चिंतन करने के बाद आपको गांधियों से नफरत हो जाएगी... और हां ये तस्वीर तब की है जब नेहरू का कपड़ा और जूता विशेष विमान से आता था


इस तस्वीर को देखने और चिंतन करने के बाद आपको गांधियों से नफरत हो जाएगी... और हां ये तस्वीर तब की है जब नेहरू का कपड़ा और जूता विशेष विमान से आता था...
यह एक तस्वीर है 1948 के ओलंपिक की जो लंदन में हुआ था।
हमारी फुटबॉल टीम ने फ्रांस के साथ मैच 1-1 से बराबर किया था।
हमारे खिलाड़ी  इसलिए जीत न सके क्योंकि उनके पास जूते ही नहीं थे । 
और वह नंगे पैर पूरा मैच खेले थे।
जिसके कारण बहुत ही खिलाडियों को दूसरी टीम के खिलाडियों के जूतों से चोट भी लगी थी।
फिर भी मुकाबला बराबरी का रहा।         
इस टीम के कप्तान थे शैलेन्द्र नाथ मन्ना। वो विश्व के बेहतरीन खिलाडियों मैं से एक थे।
सरकार ने जूते क्यों नहीं दिए क्योंकि सरकार के पास इतने पैसे भी नही थे।
 यह वो वक्त था जब नेहरू के कपड़े पेरिस से ड्राइक्लीन हो कर आते थे।और साहब अपने कुत्ते के साथ प्राइवेट जेट मैं घूमते थे।
नतीजा यह हुआ के फीफा ने 1950 वर्ल्डकप मैं इंडिया को बैन कर दिया क्योंकि बिना जूते के कोई भी टीम मैच नही खेल सकती थी।
 फिर कभी भारतीय टीम फीफा वर्ल्ड कप मैं नही गई।                   

परंतु आज देश मैं कई स्टेडियम नेहरू गांधी परिवार के नाम पर 😏

मंगलवार, 23 अगस्त 2022

इस साल अजा एकादशी का व्रत 23 अगस्त 2022 को रखा जाएगा।


 अजा एकादशी आज
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अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल देने वाला है ये व्रत
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एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना गया है। वहीं अजा एकादशी का व्रत भाद्रपद मास में पड़ता है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने और विष्णु जी के पूजन से अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है।

हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर साल 24 एकादशी व्रत पड़ते हैं। ये व्रत भगवान विष्णु को समर्पित हैं। इनमें से एक अजा एकादशी का व्रत भाद्रपद (भादो) मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आता है। इस साल अजा एकादशी का व्रत 23 अगस्त 2022 को रखा जाएगा।
 
अजा एकादशी की तिथि
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भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का प्रारंभ 23 अगस्त 2022 को सुबह 07:02 बजे से होगा और एकादशी तिथि का समापन 24 अगस्त 2022 को सुबह 05:09 बजे होगा।

अजा एकादशी व्रत की पूजा विधि
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अजा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्मों से निपटकर स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत में बाल धोकर नहीं नहाना चाहिए। वहीं इस दिन साबुन और शैंपू के इस्तेमाल की भी मनाही है।

इसके बाद घर के पूजा स्थल की सफाई करके पूर्व दिशा की तरफ एक लकड़ी की चौकी रखें। इस पर एक पीला कपड़ा बिछाएं। इसके पश्चात चौकी पर भगवान विष्णु की या तस्वीर स्थापित करें। विष्णु जी को चंदन का तिलक लगाकर अक्षत, फूल, माला, फल और नैवेद्य आदि अर्पित करें। ध्यान रहे कि विष्णु जी की पूजा में तुलसी दल जरूर चढ़ाएं। पूजन के बाद अजा एकादशी व्रत की कथा पढ़ें और सुनें। माना जाता है कि इस दिन विष्णु चालीसा और विष्णु स्तुति का पाठ करने से जीवन में सुख-समृद्धि का आती है। फिर आखिर में भगवान विष्णु की आरती उतारें।

अजा एकादशी व्रत का महत्व
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पौराणिक कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने समय में अश्वमेध यज्ञ किया था और इसी यज्ञ के फलस्वरूप उन्हें लव कुश से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ था। धार्मिक मान्यता है कि अजा एकादशी के व्रत को करने से मनुष्य के पिछले जन्म के सभी पापों का नाश होता है और उसे अश्वमेध यज्ञ को करने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

अजा एकादशी व्रत कथा
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ऐसा कहा जाता है कि राजा हरिश्चन्द्र अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। जब अगले दिन राजा हरिश्चन्द्र विश्वामित्र को अपना समस्त राज-पाठ को सौंप कर जाने लगे तो विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से दक्षिणा स्वरुप 500 स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। राजा ने उनसे कहा कि पांच सौ क्या, आप जितनी चाहे स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिए। इस पर विश्वामित्र हँसने लगे और राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं की जाती। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दीं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को जहां बेचा था वह श्मशान का चांडाल था। चांडाल ने राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए कर वसूली का काम दे दिया।

एक दिन राजा हरिश्चंद्र ने एकादशी का व्रत रखा हुआ था। आधी रात का समय था और राजा श्मशान के द्वार पर पहरा दे रहे थे। बेहद अंधेरा था, इतने में ही वहां एक लाचार और निर्धन स्त्री बिलखते हुए पहुंची जिसके हाथ में अपने पुत्र का शव था। राजा हरिश्चन्द्र ने अपने धर्म का पालन करते हुए पत्नी से भी पुत्र के दाह संस्कार हेतु कर मांगा। पत्नी के पास कर चुकाने के लिए धन नहीं था इसलिए उसने अपनी साड़ी का आधा हिस्सा फाड़कर राजा का दे दिया। उसी समय भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा, “हे हरिश्चंद्र, इस संसार में तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में अमर रहोगे।” इतने में ही राजा का बेटा रोहिताश जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाट उन्हें वापस लौटा दिया।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2022

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा एवं विधि

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत कथा एवं विधि
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जन्माष्टमी का त्यौहार श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। मथुरा नगरी में असुरराज कंस के कारागृह में देवकी की आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण भाद्रपद कृष्णपक्ष की अष्टमी को पैदा हुए। उनके जन्म के समय अर्धरात्रि (आधी रात) थी, चन्द्रमा उदय हो रहा था और उस समय रोहिणी नक्षत्र भी था। इसलिए इस दिन को प्रतिवर्ष कृष्ण जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत विधि
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1.  इस व्रत में अष्टमी के उपवास से पूजन और नवमी के पारणा से व्रत की पूर्ति होती है।

2.  इस व्रत को करने वाले को चाहिए कि व्रत से एक दिन पूर्व (सप्तमी को) हल्का तथा सात्विक भोजन करें। रात्रि को स्त्री संग से वंचित रहें और सभी ओर से मन और इंद्रियों को काबू में रखें।

3.  उपवास वाले दिन प्रातः स्नानादि से निवृत होकर सभी देवताओं को नमस्कार करके पूर्व या उत्तर को मुख करके बैठें।

4. मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए 'सूतिकागृह' नियत करें। तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो। इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। 

श्रीकृष्ण का जन्म मुहूर्त
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जन्‍माष्‍टमी की तिथि:👉 18 एवं 19 अगस्‍त।

अष्टमी तिथि आरंभ👉 रात 09 बजकर 20 मिनट से (18 अगस्त)

अष्टमी तिथि समाप्त 👉  रात 10 बजकर 59 मिनट तक (19 अगस्त)
 
इस वर्ष जन्म कराने का समय 👉 (18 अगस्त) रात 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 42  मिनट तक रहेगा।

शास्त्र के अनुसार पारण समय
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पारण समय 👉 अगस्त 19 को 10:58 बजे के बाद।

शास्त्र के अनुसार वैकल्पिक पारण समय
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पारण समय 👉 19 अगस्त को प्रातः 05:45 बजे के बाद भी किया जा सकता है।

अर्थात देव पूजा, विसर्जन आदि के बाद अगले दिन सूर्योदय पर पारण किया जा सकता है।

इस वर्ष वैष्णव कृष्ण जन्माष्टमी 19 अगस्त को मनाई जाएगी। 19 तारीख को व्रत रखने वालो के लिए निशिता पूजा का समय रात्रि 11:59 से 12:43 तक रहेगा।
तथा पारण का समय 20 अगस्त को प्रातः 05:45 बजे के बाद होगा।

जन्म कराने की विधि
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जन्म कराने के शुभ समय में भगवान के प्रकट होने की भावना करके रात्रि 11:59 से पहले खीरे के अंदर लड्डूगोपाल की मूर्ति रखकर श्री कृष्ण का जन्म कराएं जन्म के बाद लड्डूगोपाल को स्नान वस्त्रादि कराकर आरती करें। उनकी विधि विधान से पूजा करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, वासुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा, और लक्ष्मी- इन सबका क्रमश: नाम जरूर लेना चाहिए।

अन्त में नीचे दिए गए मंत्र से देवकी को अर्घ्य दें।

 'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामनः।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नमः।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तु ते।'

इसके पश्चात श्रीकृष्ण को इस मंत्र के साथ 'पुष्पाञ्जलि' अर्पण करें।

'धर्माय धर्मेश्वराय धर्मपतये धर्मसम्भवाय गोविन्दाय नमो नम:।'

पुष्पाञ्जलि अर्पित करने के बाद नवजात श्रीकृष्ण के जातकर्म, नालच्छेदन, षष्ठीपूजन और नामकरणादि करके 'सोमाय सोमेश्वराय सोमपतये सोमसम्भवाय सोमाय नमो नम:।' मंत्र से चन्द्रमा का पूजन करें।

 फिर शंख में जल, फल, कुश, कुसुम और गन्ध डालकर दोनों घुटने जमीन में लगाएं और इस मंत्र से चन्द्रमा को अर्घ्य दें।

'क्षीरोदार्णवसंभूत अत्रिनेत्रसमुद्भव।
गृहाणार्घ्यं शशांकेमं रोहिण्या सहितो मम।।

ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिषां पते।
नमस्ते रोहिणीकान्त अर्घ्यं मे प्रतिगृह्यताम्।।'

चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद अंत में पिसे भुने हुए धनिये की पंजीरी का प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन, स्त्रोत-पाठादि करते हुए व्यतीत करें। उसके बाद दूसरे दिन पूर्वाह्न मे पुन: स्नानादि करके जिस तिथि या नक्षत्रादि के योग में व्रत किया हो, उसका अन्त होने पर पारणा करें। यदि अभीष्ट तिथि या नक्षत्रादि के समाप्त होने में विलम्ब हो तो जल पीकर पारणा की पूर्ति करें।

आजकल के प्रचलन के अनुसार यह व्रत रात्रि बारह बजे के बाद ही खोला जाता है। इस व्रत में अनाज का उपयोग नहीं किया जाता। फलहार के रूप में कुट्टू के आटे की पकौड़ी, मावे की बर्फ़ी और सिंघाड़े के आटे का हलवा बनाया जाता है।

व्रत कथा
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इंद्र ने कहा है- हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएँ, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हो तथा हे ब्रह्मन्‌! उस व्रत से प्राणियों को भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए। इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने कहा- त्रेतायुग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दितकर्म को करने वाला कंस नाम का एक अत्यंत पापी दैत्य हुआ। उस दुष्ट व नीच कर्मी दुराचारी कंस की देवकी नाम की एक सुंदर बहन थी। देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा।

नारदजी की बातें सुनकर इंद्र ने कहा- हे महामते! उस दुराचारी कंस की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। क्या यह संभव है कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र अपने मामा कंस की हत्या करेगा। इंद्र की सन्देहभरी बातों को सुनकर नारदजी ने कहा-हे अदितिपुत्र इंद्र! एक समय की बात है। उस दुष्ट कंस ने एक ज्योतिषी से पूछा कि ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिर्विद! मेरी मृत्यु किस प्रकार और किसके द्वारा होगी। ज्योतिषी बोले-हे दानवों में श्रेष्ठ कंस! वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी जो वाक्‌पटु है और आपकी बहन भी है। उसी के गर्भ से उत्पन्न उसका आठवां पुत्र जो कि शत्रुओं को भी पराजित कर इस संसार में 'कृष्ण' के नाम से विख्यात होगा, वही एक समय सूर्योदयकाल में आपका वध करेगा।

ज्योतिषी की बातें सुनकर कंस ने कहा- हे दैवज, बुद्धिमानों में अग्रण्य अब आप यह बताएं कि देवकी का आठवां पुत्र किस मास में किस दिन मेरा वध करेगा। ज्योतिषी बोले- हे महाराज! माघ मास की शुक्ल पक्ष की तिथि को सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण से आपका युद्ध होगा। उसी युद्ध में वे आपका वध करेंगे। इसलिए हे महाराज! आप अपनी रक्षा यत्नपूर्वक करें। इतना बताने के पश्चात नारदजी ने इंद्र से कहा- ज्योतिषी द्वारा बताए गए समय पर हीकंस की मृत्युकृष्ण के हाथ निःसंदेह होगी। तब इंद्र ने कहा- हे मुनि! उस दुराचारी कंस की कथा का वर्णनकीजिए और बताइए कि कृष्ण का जन्म कैसे होगा तथा कंस की मृत्यु कृष्ण द्वारा किस प्रकार होगी।

इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने पुनः कहना प्रारंभ किया- उस दुराचारी कंस ने अपने एक द्वारपाल से कहा- मेरी इस प्राणों से प्रिय बहन की पूर्ण सुरक्षा करना। द्वारपाल ने कहा- ऐसा ही होगा। कंस के जाने के पश्चात उसकी छोटी बहन दुःखित होते हुए जल लेने के बहाने घड़ा लेकर तालाब पर गई। उस तालाब के किनारे एक घनघोर वृक्ष के नीचे बैठकर देवकी रोने लगी। उसी समय एक सुंदर स्त्री जिसका नाम यशोदा था, उसने आकर देवकी से प्रिय वाणी में कहा- हे कान्ते! इस प्रकार तुम क्यों विलाप कर रही हो। अपने रोने का कारण मुझसे बताओ। तब दुःखित देवकी ने यशोदा से कहा- हे बहन! नीच कर्मों में आसक्त दुराचारी मेरा ज्येष्ठ भ्राता कंस है। उस दुष्ट भ्राता ने मेरे कई पुत्रों का वध कर दिया। इस समय मेरे गर्भ में आठवाँ पुत्र है। वह इसका भी वध कर डालेगा। इस बात में किसी प्रकार का संशय या संदेह नहीं है, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ भ्राता को यह भय है कि मेरे अष्टम पुत्र से उसकी मृत्यु अवश्य होगी।

देवकी की बातें सुनकर यशोदा ने कहा- हे बहन! विलाप मत करो। मैं भी गर्भवती हूँ। यदि मुझे कन्या हुई तो तुम अपने पुत्र के बदले उस कन्या को ले लेना। इस प्रकार तुम्हारा पुत्र कंस के हाथों मारा नहीं जाएगा।

तदनन्तर कंस ने अपने द्वारपाल से पूछा- देवकी कहाँ है? इस समय वह दिखाई नहीं दे रही है। तब द्वारपाल ने कंस से नम्रवाणी में कहा- हे महाराज! आपकी बहन जल लेने तालाब पर गई हुई हैं। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो उठा और उसने द्वारपाल को उसी स्थान पर जाने को कहा जहां वह गई हुई है। द्वारपाल की दृष्टि तालाब के पास देवकी पर पड़ी। तब उसने कहा कि आप किस कारण से यहां आई हैं। उसकी बातें सुनकर देवकी ने कहा कि मेरे गृह में जल नहीं था, जिसे लेने मैं जलाशय पर आई हूँ। इसके पश्चात देवकी अपने गृह की ओर चली गई।

कंस ने पुनः द्वारपाल से कहा कि इस गृह में मेरी बहन की तुम पूर्णतः रक्षा करो। अब कंस को इतना भय लगने लगा कि गृह के भीतर दरवाजों में विशाल ताले बंद करवा दिए और दरवाजे के बाहर दैत्यों और राक्षसों को पहरेदारी के लिए नियुक्त कर दिया। कंस हर प्रकार से अपने प्राणों को बचाने के प्रयास कर रहा था। एक समय सिंह राशि के सूर्य में आकाश मंडल में जलाधारी मेघों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। भादौ मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को घनघोर अर्द्धरात्रि थी। उस समय चंद्रमा भी वृष राशि में था, रोहिणी नक्षत्र बुधवार के दिन सौभाग्ययोग से संयुक्त चंद्रमा के आधी रात में उदय होने पर आधी रात के उत्तर एक घड़ी जब हो जाए तो श्रुति-स्मृति पुराणोक्त फल निःसंदेह प्राप्त होता है।

इस प्रकार बताते हुए नारदजी ने इंद्र से कहा- ऐसे विजय नामक शुभ मुहूर्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और श्रीकृष्ण के प्रभाव से ही उसी क्षण बन्दीगृह के दरवाजे स्वयं खुल गए। द्वार पर पहरा देने वाले पहरेदार राक्षस सभी मूर्च्छित हो गए। देवकी ने उसी क्षण अपने पति वसुदेव से कहा- हे स्वामी! आप निद्रा का त्याग करें और मेरे इस अष्टम पुत्र को गोकुल में ले जाएँ, वहाँ इस पुत्र को नंद गोप की धर्मपत्नी यशोदा को दे दें। उस समय यमुनाजी पूर्णरूपसे बाढ़ग्रस्त थीं, किन्तु जब वसुदेवजी बालक कृष्ण को सूप में लेकर यमुनाजी को पार करने के लिए उतरे उसी क्षण बालक के चरणों का स्पर्श होते ही यमुनाजी अपने पूर्व स्थिर रूप में आ गईं। किसी प्रकार वसुदेवजी गोकुल पहुँचे और नंद के गृह में प्रवेश कर उन्होंने अपना पुत्र तत्काल उन्हें दे दिया और उसके बदले में उनकी कन्या ले ली। वे तत्क्षण वहां से वापस आकर कंस के बंदी गृह में पहुँच गए।

प्रातःकाल जब सभी राक्षस पहरेदार निद्रा से जागे तो कंस ने द्वारपाल से पूछा कि अब देवकी के गर्भ से क्या हुआ? इस बात का पता लगाकर मुझे बताओ। द्वारपालों ने महाराज की आज्ञा को मानते हुए कारागार में जाकर देखा तो वहाँ देवकी की गोद में एक कन्या थी। जिसे देखकर द्वारपालों ने कंस को सूचित किया, किन्तु कंस को तो उस कन्या से भय होने लगा। अतः वह स्वयं कारागार में गया और उसने देवकी की गोद से कन्या को झपट लिया और उसे एक पत्थर की चट्टान पर पटक दिया किन्तु वह कन्या विष्णु की माया से आकाश की ओर चली गई और अंतरिक्ष में जाकर विद्युत के रूप में परिणित हो गई।

उसने कंस से कहा कि हे दुष्ट! तुझे मारने वाला गोकुल में नंद के गृह में उत्पन्न हो चुका है और उसी से तेरी मृत्यु सुनिश्चित है। मेरा नाम तो वैष्णवी है, मैं संसार के कर्ता भगवान विष्णु की माया से उत्पन्न हुई हूँ, इतना कहकर वह स्वर्ग की ओर चली गई। उस आकाशवाणी को सुनकर कंस क्रोधित हो उठा। उसने नंदजी के गृह में पूतना राक्षसी को कृष्ण का वध करने के लिए भेजा किन्तु जब वह राक्षसी कृष्ण को स्तनपान कराने लगी तो कृष्ण ने उसके स्तन से उसके प्राणों को खींच लिया और वह राक्षसी कृष्ण-कृष्ण कहते हुए मृत्यु को प्राप्त हुई।

जब कंस को पूतना की मृत्यु का समाचार प्राप्त हुआ तो उसने कृष्ण का वध करने के लिए क्रमशः केशी नामक दैत्य को अश्व के रूप में उसके पश्चात अरिष्ठ नामक दैत्य को बैल के रूप में भेजा, किन्तु ये दोनों भी कृष्ण के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुए। इसके पश्चात कंस ने काल्याख्य नामक दैत्य को कौवे के रूप में भेजा, किन्तु वह भी कृष्ण के हाथों मारा गया। अपने बलवान राक्षसों की मृत्यु के आघात से कंस अत्यधिक भयभीत हो गया। उसने द्वारपालों को आज्ञा दी कि नंद को तत्काल मेरे समक्ष उपस्थित करो। द्वारपाल नंद को लेकर जब उपस्थित हुए तब कंस ने नंदजी से कहा कि यदि तुम्हें अपने प्राणों को बचाना है तो पारिजात के पुष्प ले लाओ। यदि तुम नहीं ला पाए तो तुम्हारा वध निश्चित है।

कंस की बातों को सुनकर नंद ने 'ऐसा हीहोगा' कहा और अपने गृह की ओर चले गए। घर आकर उन्होंने संपूर्ण वृत्तांत अपनी पत्नी यशोदा को सुनाया, जिसे श्रीकृष्ण भी सुन रहे थे। एक दिन श्रीकृष्ण अपने मित्रों के साथ यमुना नदी के किनारे गेंद खेल रहे थे और अचानक स्वयं ने ही गेंद को यमुना में फेंक दिया। यमुना में गेंद फेंकने का मुख्य उद्देश्य यही था कि वे किसी प्रकार पारिजात पुष्पों को ले आएँ। अतः वे कदम्ब के वृक्ष पर चढ़कर यमुना में कूद पड़े।

कृष्ण के यमुना में कूदने का समाचार श्रीधर नामक गोपाल ने यशोदा को सुनाया। यह सुनकर यशोदा भागती हुई यमुना नदी के किनारे आ पहुँचीं और उसने यमुना नदी की प्रार्थना करते हुए कहा- हे यमुना! यदि मैं बालक को देखूँगी तो भाद्रपद मास की रोहिणी युक्त अष्टमी का व्रत अवश्य करूंगी क्योंकि दया, दान, सज्जन प्राणी, ब्राह्मण कुल में जन्म, रोहिणियुक्त अष्टमी, गंगाजल, एकादशी, गया श्राद्ध और रोहिणी व्रत ये सभी दुर्लभ हैं।

हजारों अश्वमेध यज्ञ, सहस्रों राजसूय यज्ञ, दान तीर्थ और व्रत करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सब कृष्णाष्टमी के व्रत को करने से प्राप्त हो जाता है। यह बात नारद ऋषि ने इंद्र से कही। इंद्र ने कहा- हे मुनियों में श्रेष्ठ नारद! यमुना नदी में कूदने के बाद उस बालरूपी कृष्ण ने पाताल में जाकर क्या किया? यह संपूर्ण वृत्तांत भी बताएँ। नारद ने कहा- हे इंद्र! पाताल में उस बालक से नागराज की पत्नी ने कहा कि तुम यहाँ क्या कर रहे हो, कहाँ से आए हो और यहाँ आने का क्या प्रयोजन है?

नागपत्नी बोलीं- हे कृष्ण! क्या तूने द्यूतक्रीड़ा की है, जिसमें अपना समस्त धन हार गया है। यदि यह बात ठीक है तो कंकड़, मुकुट और मणियों का हार लेकर अपने गृह में चले जाओ क्योंकि इस समय मेरे स्वामी शयन कर रहे हैं। यदि वे उठ गए तो वे तुम्हारा भक्षण कर जाएँगे। नागपत्नी की बातें सुनकर कृष्ण ने कहा- 'हे कान्ते! मैं किस प्रयोजन से यहाँ आया हूँ, वह वृत्तांत मैं तुम्हें बताता हूँ। समझ लो मैं कालियानाग के मस्तक को कंस के साथ द्यूत में हार चुका हूं और वही लेने मैं यहाँ आया हूँ। बालक कृष्ण की इस बात को सुनकर नागपत्नी अत्यंत क्रोधित हो उठीं और अपने सोए हुए पति को उठाते हुए उसने कहा- हे स्वामी! आपके घर यह शत्रु आया है। अतः आप इसका हनन कीजिए।

अपनी स्वामिनी की बातों को सुनकर कालियानाग निन्द्रावस्था से जाग पड़ा और बालक कृष्ण से युद्ध करने लगा। इस युद्ध में कृष्ण को मूर्च्छा आ गई, उसी मूर्छा को दूर करने के लिए उन्होंने गरुड़ का स्मरण किया। स्मरण होते ही गरुड़ वहाँ आ गए। श्रीकृष्ण अब गरुड़ पर चढ़कर कालियानाग से युद्ध करने लगे और उन्होंने कालियनाग को युद्ध में पराजित कर दिया।

अब कलियानाग ने भलीभांति जान लिया था कि मैं जिनसे युद्ध कर रहा हूँ, वे भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ही हैं। अतः उन्होंने कृष्ण के चरणों में साष्टांग प्रणाम किया और पारिजात से उत्पन्न बहुत से पुष्पों को मुकुट में रखकर कृष्ण को भेंट किया। जब कृष्ण चलने को हुए तब कालियानाग की पत्नी ने कहा हे स्वामी! मैं कृष्ण को नहीं जान पाई। हे जनार्दन मंत्र रहित, क्रिया रहित, भक्तिभाव रहित मेरी रक्षा कीजिए। हे प्रभु! मेरे स्वामी मुझे वापस दे दें। तब श्रीकृष्ण ने कहा- हे सर्पिणी! दैत्यों में जो सबसे बलवान है, उस कंस के सामने मैं तेरे पति को ले जाकर छोड़ दूँगा अन्यथा तुम अपने गृह को चली जाओ। अब श्रीकृष्ण कालियानाग के फन पर नृत्य करते हुए यमुना के ऊपर आ गए।

तदनन्तर कालिया की फुंकार से तीनों लोक कम्पायमान हो गए। अब कृष्ण कंस की मथुरा नगरी को चल दिए। वहां कमलपुष्पों को देखकर यमुनाके मध्य जलाशय में वह कालिया सर्प भी चला गया।

इधर कंस भी विस्मित हो गया तथा कृष्ण प्रसन्नचित्त होकर गोकुल लौट आए। उनके गोकुल आने पर उनकी माता यशोदा ने विभिन्न प्रकार के उत्सव किए। अब इंद्र ने नारदजी से पूछा- हे महामुने! संसार के प्राणी बालक श्रीकृष्ण के आने पर अत्यधिक आनंदित हुए। आखिर श्रीकृष्ण ने क्या-क्या चरित्र किया? वह सभी आप मुझे बताने की कृपा करें। नारद ने इंद्र से कहा- मन को हरने वाला मथुरा नगर यमुना नदी के दक्षिण भाग में स्थित है। वहां कंस का महाबलशायी भाई चाणूर रहता था। उस चाणूर से श्रीकृष्ण के मल्लयुद्ध की घोषणा की गई। हे इंद्र!

कृष्ण एवं चाणूर का मल्लयुद्ध अत्यंत आश्चर्यजनक था। चाणूर की अपेक्षा कृष्ण बालरूप में थे। भेरी शंख और मृदंग के शब्दों के साथ कंस और केशी इस युद्ध को मथुरा की जनसभा के मध्य में देख रहे थे। श्रीकृष्ण ने अपने पैरों को चाणूर के गले में फँसाकर उसका वध कर दिया। चाणूर की मृत्यु के पश्चात उनका मल्लयुद्ध केशी के साथ हुआ। अंत में केशी भी युद्ध में कृष्ण के द्वारा मारा गया। केशी के मृत्युपरांत मल्लयुद्ध देख रहे सभी प्राणी श्रीकृष्ण की जय-जयकार करने लगे। बालक कृष्ण द्वारा चाणूर और केशी का वध होना कंस के लिए अत्यंत हृदय विदारक था। अतः उसने सैनिकों को बुलाकर उन्हें आज्ञा दी कि तुम सभी अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर कृष्ण से युद्ध करो।

हे इंद्र! उसी क्षण श्रीकृष्ण ने गरुड़, बलराम तथा सुदर्शन चक्र का ध्यान किया, जिसके परिणामस्वरूप बलदेवजी सुदर्शन चक्र लेकर गरुड़ पर आरूढ़ होकर आए। उन्हें आता देख बालक कृष्ण ने सुदर्शन चक्र को उनसे लेकर स्वयं गरुड़ की पीठ पर बैठकर न जाने कितने ही राक्षसों और दैत्यों का वध कर दिया, कितनों के शरीर अंग-भंग कर दिए। इस युद्ध में श्रीकृष्ण और बलदेव ने असंख्य दैत्यों का वध किया। बलरामजी ने अपने आयुध शस्त्र हल से और कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से माघ मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को विशाल दैत्यों के समूह का सर्वनाश किया।

जब अन्त में केवल दुराचारी कंस ही बच गया तो कृष्ण ने कहा- हे दुष्ट, अधर्मी, दुराचारी अब मैं इस महायुद्ध स्थल पर तुझसे युद्ध कर तथा तेरा वध कर इस संसार को तुझसे मुक्त कराऊँगा। यह कहते हुए श्रीकृष्ण ने उसके केशों को पकड़ लिया और कंस को घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, जिससे वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। कंस के मरने पर देवताओं ने शंखघोष व पुष्पवृष्टि की। वहां उपस्थित समुदाय श्रीकृष्ण की जय-जयकार कर रहा था। कंस की मृत्यु पर नंद, देवकी, वसुदेव, यशोदा और इस संसार के सभी प्राणियों ने हर्ष पर्व मनाया।

कृष्ण की 8 पटरानियों की कथा
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श्रीकृष्ण की 16108 रानियां बताई गई हैं। इनमें से 8 प्रमुख थीं, जिन्हें पटरानियां कहा जाता है। रुक्मिणी, जांबवती, सत्यभामा, कालिंदी, मित्रविंदा, सत्या (नाग्नजिती), भद्रा और लक्ष्मणा श्रीकृष्ण की पटरानियां हैं। जानिए इन 8 पटरानियों से जुड़ी खास बातें...

रुक्मिणी
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विदर्भ राज्य का भीष्म नामक एक वीर राजा था। उसकी पुत्री का नाम रुक्मिणी था। वह बहुत ही सुंदर और सभी गुणों वाली थी। नारदजी द्वारा श्रीकृष्ण के गुणों का वर्णन सुनने पर रुक्मिणी श्रीकृष्ण से ही विवाह करना चाहती थी। रुक्मिणी के रूप और गुणों की चर्चा सुनकर भगवान कृष्ण ने भी रुक्मिणी के साथ विवाह करने का निश्चय किया था। रुक्मिणी का एक भाई था, जिसका नाम रुक्मि था। उसने रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से साथ तय कर दिया था। जब ये बात श्रीकृष्ण को मालूम हुई तो वे विवाह से एक दिन पहले ही रुक्मिणी का हरण कर द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने के बाद श्रीकृष्ण और रुक्मिणी का विवाह किया गया।

सत्यभामा
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सत्राजित यादव द्वारिक में रहते थे। उन्हें सूर्यदेव ने स्यमन्तक नाम की मणि दी थी। श्रीकृष्ण ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की थी, लेकिन सत्राजित ने ये मणि अपने भाई प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित को एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों के राजा जाम्बवंत ने उस शेर को मारकर मणि हासिल की और अपनी गुफा में चला गया। जब प्रसेनजित घर नहीं लौटा तो सत्राजित ने सोचा कि श्रीकृष्ण ने ही मणि के लिए उसके भाई का वध कर दिया है। जब ये बात श्रीकृष्ण को मालूम हुई तो वे वन में गए और वहां से वे समझ गए कि प्रसेनजित को शेर ने मार दिया है और शेर का शिकार रीछ ने किया है। इसके बाद वे रीछ के पदचिह्नों के आधार पर गुफा में पहुंचे। गुफा में जाम्बवंत और श्रीकृष्ण के बीच युद्ध हुआ और जाम्बवंत पराजित हो गया। इसके बाद स्यमंतक मणि लेकर श्रीकृष्ण द्वारका पहुंचे। वहां पहुंचकर श्रीकृष्ण ने वह मणि सत्राजित को दी और खुद पर लगाए दोष को गलत साबित किया। श्रीकृष्ण के निर्दोष साबित होने पर सत्राजित खुद को अपमानित महसूस करने लगा। वह श्रीकृष्ण के तेज को जानता था, इसलिए वह बहुत भयभीत हो गया। उसकी मूर्खता की वजह से कहीं श्रीकृष्ण की उससे कोई दुश्मनी न हो जाए, इस डर से सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

जाम्बवती
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जब श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि की खोज में गुफा में पहुंचे। गुफा में जाम्बवंत और उसकी पुत्री जाम्बवती रहती थी। गुफा में मणि के लिए श्रीकृष्ण और जाम्बवंत के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में पराजित होने के बाद जाम्बवंत को श्रीकृष्ण के स्वयं विष्णु अवतार होने की बात मालूम हुई। श्रीकृष्ण का असली स्वरूप जानने के बाद जाम्बवंत ने उनसे क्षमा मांगी और अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।

सत्या (नग्नजिती)
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कौशल राज्य के राजा नग्नजित की एक पुत्री नग्नजिती थी। नग्नजिती को सत्या के नाम से भी जाना जाता है।वह बहुत सुंदर और सभी गुणों वाली थी। अपनी पुत्री के लिए योग्य वर पाने के लिए नग्नजित ने शर्त रखी। शर्त यह थी कि जो भी क्षत्रिय वीर सात बैलों को हरा देगा, उसी के साथ नग्नजिती का विवाह किया जाएगा। एक दिन भगवान कृष्ण को देख नग्नजिती उन पर मोहित हो गई और मन ही मन श्रीकृष्ण से ही विवाह करने का प्रण ले लिया। कृष्ण ये बात जान चुके थे। अपनी भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए कृष्ण ने सातों बैल को अपने वश में करके उन पर विजय प्राप्त की। भगवान का यह पराक्रम देखकर नग्नजित ने अपनी पुत्री का विवाह भगवान श्रीकृष्ण के साथ किया।

कालिन्दी
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एक बार भगवान कृष्ण अपने प्रिय अर्जुन के साथ वन में घूम रहे थे। यात्रा की धकान दूर करने के लिए वे दोनों यमुना नदीं के किनार जाकर बैठ गए। वहां पर श्रीकृष्ण और अर्जुन को एक युवती तपस्या करती हुई दिखाई दी। उस युवती को देखकर अर्जुन ने उसका परिचय पूछा। अर्जुन द्वारा ऐसा पूछने पर उस युवती ने अपना नाम सूर्यपुत्री कालिन्दी बताया। वह यमुना नदी में निवास करते हुए भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। यह बात जान कर भगवान कृष्ण ने कालिन्दी को अपने भगवान विष्णु के अवतार होने की बात बताई और उसे अपने साथ द्वारका ले गए। द्वारका पहुंचने पर भगवान कृष्ण और कालिन्दी का विवाह किया गया।

लक्ष्मणा
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लक्ष्मणा ने देवर्षि नारद से भगवान विष्णु के अवतारों के बारे में कई बातों सुनी थी। उसका मन सदैव भगवान के स्मरण और भक्ति में लगा रहता था। लक्ष्मणा भगवान विष्णु को ही अपने पति रूप में प्राप्त करना चाहती थी। उसके पिता यह बात जानते थे। अपनी पुत्री की इच्छा पूरी करने के लिए उसके पिता ने स्वयंवर का एक ऐसा आयोजन किया, जिसमें लक्ष्य भेद भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण के सिवा कोई दूसरा न कर सके। लक्ष्मणा के पिता ने अपनी पुत्री के विवाह उसी वीर से करने का निश्चय किया, जो की पानी में मछली की परछाई देखकर मछली पर निशाना लगा सके। शिशुपाल, कर्ण, दुर्योधन, अर्जुन कोई भी इस लक्ष्य का भेद न कर सका। तब भगवान कृष्ण ने केवल परछाई देखकर मछली पर निशाना लगाकर स्वयंवर में विजयी हुए और लक्ष्मणा के साथ विवाह किया।

मित्रविंदा
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अवंतिका (वर्तमा उज्जैन) की राजकुमारी मित्रविंदा के विवाह के लिए स्वयंवर का आयोजन किया गया। उस स्वयंवर में भगवान श्रीकृष्ण भी पहुंचे। मित्रविंदा श्रीकृष्ण के साथ ही विवाह करना चाहती था, लेकिन उसका भाई विंद दुर्योधन का मित्र था। इसलिए उसने अपनी बहन को कृष्ण को चुनने से रोक दिया। जब भगवान को मित्रविंदा के मन की बात मालूम हुई तो श्रीकृष्ण ने मित्रविंदा का हरण कर लिया और उसके साथ विवाह किया।

भद्रा
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श्रीकृष्ण की श्रुतकीर्ति नाम की एक भुआ कैकय देश में रहती थी। उनकी एक भद्रा नामक कन्या थी। भद्रा और उसके भाई श्रीकृष्ण के गुणों को जानते थे। इसलिए भद्रा के भाइयों ने उसका विवाह कृष्ण के साथ करने का निर्णय किया। अपनी भुआ और भाइयों के इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण ने पूरे विधि-विधान के साथ भद्रा के साथ विवाह किया।

श्री कृष्ण जी की आरती
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आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।

गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
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नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
ब्रज में आनंद भयो  जय यशोदा लाल की

नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
हे आनंद उमंग भयो जय हो नन्द लाल की
गोकुल में आनंद भयो जय कन्हैया लाल की

जय यशोदा लाल की जय हो नन्द लाल की
हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

जय हो नन्द लाल की जय यशोदा लाल की
हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की

हे आनंद उमंग भयो जय कन्हैया लाल की
हे कोटि ब्रह्माण्ड के अधिपति लाल की

हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की
हे गौऐं चराने आये जय हो पशुपाल की

नन्द के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की
आनंद से बोलो सब जय हो ब्रज लाल की

हाथी, घोड़ा, पालकी जय कन्हैया लाल की
जय हो ब्रज लाल की
पावन प्रतिपाल की
हे नन्द के आनंद भयो
जय हो नन्द लाल की
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गुरुवार, 18 अगस्त 2022

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, सही तिथि मुहूर्त और पूजन विशेष

, :       *🙏श्री गणेशाय नम:🙏*    :

 *श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, सही तिथि मुहूर्त और पूजन विशेष* 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तिथि को लेकर लोगों में असमंजस कि स्थिति बनी हुई है कुछ लोग श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 18 को तो कुछ 19 अगस्त को बता रहे हैं इस बार अष्टमी तिथि दो दिन पड़ने के कारण लोगों में भ्रम की स्थिति है 
भदो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 18 अगस्त, गुरुवार की रात 09:21 से शुरू हो रही है अष्टमी तिथि 19 अगस्त को रात 10:50 बजे समाप्त होगी.

 *खास योग* 
अष्टमी तिथि 18 अगस्त को शाम 9 बजकर 20 मिनट से प्रारंभ होगी और 19 अगस्त को रात 10 बजकर 59 मिनट पर समाप्त होगी निशीथ पूजा 18 अगस्त की रात 12 बजकर तीन मिनट से लेकर 12 बजकर 47 मिनट तक रहेगी निशीथ पूजा की कुल अवधि 44 मिनट की होगी पारण 19 अगस्त को सुबह 5 बजकर 52 मिनट के बाद होगा.

 *जन्माष्टमी शुभ मुहूर्त 2022* 

 *अष्टमी तिथि प्रारम्भ- 18 अगस्त को 09:20* 
 *अष्टमी तिथि समाप्त- 19 अगस्त को 10:59* 
 *रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ- 20 अगस्त को 01:53* 
 *रोहिणी नक्षत्र समाप्त- 21 अगस्त को 04:40* 

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक भगवान कृष्ण का जन्म आधी रात को हुआ था, इस वजह से कुछ लोग 18 अगस्त को जन्माष्टमी का व्रत रखेंगे वहीं, शास्त्रों के अनुसार हिंदू धर्म में उदय तिथि सार्वभौमिक है इसलिए 19 अगस्त को जन्माष्टमी का व्रत और श्री कृष्ण जयंती भी मनाई जाएगी.
गौरतलब है कि जन्माष्टमी का त्योहार अष्टमी तिथि के दिन रात 12 बजे मनाया जाता है ऐसे में 18 अगस्त की रात जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाना चाहिए वहीं कई लोगों का मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अष्टमी तिथि के आठवें मुहूर्त में हुआ था जो कि 19 अगस्त को रहेगा.

 *जन्माष्टमी का व्रत* 
अष्टमी तिथि को सुबह उठकर नित्य कर्म से निवृत होकर साफ वस्त्र धारण करें। इसके बाद शुद्ध आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके बैठें सभी देवी देवताओं को प्रणाम करके हाथ में जल, फल और पुष्प लेकर अष्टमी तिथि को व्रत का संकल्प लें इसके बाद स्वयं के ऊपर काला तिल छिड़क कर माता देवकी के लिए एक प्रसूति घर का निर्माण करें फिर इस प्रसूति गृह में बिस्तर कलश स्थापना करें माता देवकी की स्तनपान कराती प्रतिमा भी रखें.

 *पूजन विधि* 
कृष्ण जन्माष्टमी के दिन पूजा करने से पहले भगवान श्री कृष्ण का पूरा श्रृंगार होता है उन्हें झूले में बैठाया जाता है श्रृंगार करने के बाद उन्हें अक्षत व रोली का तिलक लगाएं कृष्ण भगवान श्री कृष्ण को वैजयंती के फूल अर्पित करना सबसे शुभ माना जाता है श्री कृष्ण को माखन व मिश्री पंचामृत का भोग जरूर लगाएं कृष्ण जन्माष्टमी की पूजा करते वक्त कृष्ण के विशेष मंत्रों का जाप जरूर करें पूजा के बाद भगवान श्री कृष्ण को लगाया गया भोग सभी को प्रसाद के रूप में दें.


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बुधवार, 17 अगस्त 2022

दुनिया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है- सहजन (मुनगा)

#सहजन
   दुनिया का सबसे ताकतवर पोषण पूरक आहार है- सहजन (मुनगा)। इसकी जड़ से लेकर फूल, पत्ती, फल्ली, तना, गोंद हर चीज उपयोगी होती है। 
           आयुर्वेद में सहजन से तीन सौ रोगों का उपचार संभव है। सहजन के पौष्टिक गुणों की तुलना :- 
*विटामिन सी- संतरे से सात गुना अधिक। विटामिन ए- गाजर से चार गुना अधिक। कैलशियम- दूध से चार गुना अधिक। पोटेशियम- केले से तीन गुना अधिक। प्रोटीन- दही की तुलना में तीन गुना अधिक।*
            स्वास्थ्य के हिसाब से इसकी फली, हरी और सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी-काम्प्लेक्स प्रचुर मात्रा में पाई जाते हैं। इनका सेवन कर कई बीमारियों को बढ़ने से रोका जा सकता है, इसका बॉटेनिकल नाम #मोरिगा_ओलिफेरा है। लैटिन में #moringa_ptarygosbeema, गोंडी में #मुंगना, मराठी में #शेवगा, संस्कृत में #शोभांजन, अंग्रेजी में #Drumstic तथा हिंदी में इसे #सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा नाम से भी जानते हैं, जो लोग इसके बारे में जानते हैं, वे इसका सेवन जरूर करते हैं। 

 ★         सहजन का फूल पेट और कफ रोगों में, इसकी फली वात व उदरशूल में, पत्ती नेत्ररोग, मोच, साइटिका, गठिया आदि में उपयोगी है। इसकी छाल का सेवन साइटिका, गठिया, लीवर में लाभकारी होता है। सहजन के छाल में शहद मिलाकर पीने से वात और कफ रोग खत्म हो जाते हैं। 
★          सहजन की पत्ती का काढ़ा बनाकर पीने से गठिया, साइटिका, पक्षाघात, वायु विकार में शीघ्र लाभ पहुंचता है। साइटिका के तीव्र वेग में इसकी जड़ का काढ़ा तीव्र गति से चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। मोच इत्यादि आने पर सहजन की पत्ती की लुगदी बनाकर सरसों तेल डालकर आंच पर पकाएं और मोच के स्थान पर लगाने से जल्दी ही लाभ मिलने लगता है।
 ★           सहजन के फली की सब्जी खाने से पुराने गठिया, जोड़ों के दर्द, वायु संचय, वात रोगों में लाभ होता है। इसके ताजे पत्तों का रस कान में डालने से दर्द ठीक हो जाता है साथ ही इसकी सब्जी खाने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी कटकर निकल जाती है। इसकी जड़ की छाल का काढ़ा सेंधा नमक और हींग डालकर पीने से पित्ताशय की पथरी में लाभ होता है। 
 ★         सहजन के पत्तों का रस बच्चों के पेट के कीड़े निकालता है और उल्टी-दस्त भी रोकता है। ब्लड प्रेशर और मोटापा कम करने में भी कारगर सहजन का रस सुबह-शाम पीने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है। इसकी पत्तियों के रस के सेवन से मोटापा धीरे-धीरे कम होने लगता है। इसकी छाल के काढ़े से कुल्ला करने पर दांतों के कीड़े नष्ट होते हैं और दर्द में आराम मिलता है। 
★            सहजन के कोमल पत्तों का साग खाने से कब्ज दूर होता है, इसके अलावा इसकी जड़ के काढ़े को सेंधा नमक और हींग के साथ पीने से मिर्गी के दौरों में लाभ होता है। इसकी पत्तियों को पीसकर लगाने से घाव और सूजन ठीक होते हैं। 
 ★         सहजन के बीज से पानी को काफी हद तक शुद्ध करके पेयजल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके बीज को चूर्ण के रूप में पीसकर पानी में मिलाया जाता है। पानी में घुल कर यह एक प्रभावी नेचुरल क्लोरीफिकेशन एजेंट बन जाता है। यह न सिर्फ पानी को बैक्टीरिया रहित बनाता है, बल्कि यह पानी की सांद्रता को भी बढ़ाता है।
★            कैंसर तथा शरीर के किसी हिस्से में बनी गांठ, फोड़ा आदि में सहजन की जड़ का अजवाइन, हींग और सौंठ के साथ काढ़ा बनाकर पीने का प्रचलन है। यह काढ़ा साइटिका (पैरों में दर्द), जोड़ों में दर्द, लकवा, दमा, सूजन, पथरी आदि में भी लाभकारी है |
★            सहजन के गोंद को जोड़ों के दर्द तथा दमा आदि रोगों में लाभदायक माना जाता है। आज भी ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि सहजन के प्रयोग से वायरस से होने वाले रोग, जैसे चेचक आदि के होने का खतरा टल जाता है। 
 ★          सहजन में अधिक मात्रा में ओलिक एसिड होता है, जो कि एक प्रकार का मोनोसैच्युरेटेड फैट है और यह शरीर के लिए अति आवश्यक है। सहजन में विटामिन-सी की मात्रा बहुत होती है। यह शरीर के कई रोगों से लड़ता है। यदि सर्दी की वजह से नाक-कान बंद हो चुके हैं तो, सहजन को पानी में उबालकर उस पानी का भाप लें। इससे जकड़न कम होती है। सहजन में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है, जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं। इसका जूस गर्भवती को देने की सलाह दी जाती है, इससे डिलवरी में होने वाली समस्या से राहत मिलती है और डिलवरी के बाद भी मां को तकलीफ कम होती है, गर्भवती महिला को इसकी पत्तियों का रस देने से डिलीवरी में आसानी होती है।
★           सहजन के फली की हरी सब्जी को खाने से बुढ़ापा दूर रहता है इससे आंखों की रोशनी भी अच्छी होती है। सहजन को सूप के रूप में भी पी सकते हैं,  इससे शरीर का खून साफ होता है। 
★            सहजन का सूप पीना सबसे अधिक फायदेमंद होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है। विटामिन सी के अलावा यह बीटा कैरोटीन, प्रोटीन और कई प्रकार के लवणों से भरपूर होता है, यह मैगनीज, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फाइबर से भरपूर होते हैं। यह सभी तत्व शरीर के पूर्ण विकास के लिए बहुत जरूरी हैं। 
       ● कैसे बनाएं सहजन का सूप ? ● 
सहजन की फली को कई छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लेते हैं। दो कप पानी लेकर इसे धीमी आंच पर उबलने के लिए रख देते हैं, जब पानी उबलने लगे तो इसमें कटे हुए सहजन की फली के टुकड़े डाल देते हैं, इसमें सहजन की पत्त‍ियां भी मिलाई जा सकती हैं, जब पानी आधा बचे तो सहजन की फलियों के बीच का गूदा निकालकर ऊपरी हिस्सा अलग कर लेते हैं, इसमें थोड़ा सा नमक और काली मिर्च मिलाकर पीना चाहिए। 
           १. सहजन के सूप के नियमित सेवन से सेक्सुअल हेल्थ बेहतर होती है. सहजन महिला और पुरुष दोनों के लिए समान रूप से फायदेमंद है। 
          २. सहजन में एंटी-बैक्टीरियल 
गुण पाया जाता है जो कई तरह के संक्रमण से सुरक्षित रखने में मददगार है. इसके अलावा इसमें मौजूद विटामिन सी इम्यून सिस्टम को बूस्ट करने का काम करता है। 
          ३. सहजन का सूप पाचन तंत्र को भी मजबूत बनाने का काम करता है, इसमें मौजूद फाइबर्स कब्ज की समस्या नहीं होने देते हैं। 
          ४. अस्थमा की शिकायत होने पर भी सहजन का सूप पीना फायदेमंद होता है. सर्दी-खांसी और बलगम से छुटकारा पाने के लिए इसका इस्तेमाल घरेलू औषधि के रूप में किया जाता है। 
          ५. सहजन का सूप खून की सफाई करने में भी मददगार है, खून साफ होने की वजह से चेहरे पर भी निखार आता है। 
          ६. डायबिटीज कंट्रोल करने के लिए भी सहजन के सेवन की सलाह दी जाती है।
(संकलित)
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2022

हिंदी के तीन बहुत बड़े साहित्यकार थे अभी पिछली पीढ़ी में, जिनके भाषण अद्वितीय होते थे:-

नई पीढ़ी के लगभग सभी लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा ।
हिंदी के तीन बहुत बड़े साहित्यकार थे अभी पिछली पीढ़ी में, जिनके भाषण अद्वितीय होते  थे:-
महादेवी वर्मा ,माखनलाल चतुर्वेदी और हजारी प्रसाद द्विवेदी ।

उनके भाषणों का स्तर इतना ऊंचा होता,भाषा ऐसी धारा प्रवाह प्रांजल ।
अद्भुत प्रभाव छोड़ती भाषा।
तत्सम शब्दों वाली  संस्कृत सी लगती हिन्दी।पर सभी समझते।
राजनीतिज्ञों के अनपढ़ धड़े ने अपनी हीनता और विधर्म परस्ती में आसान हिंदी के नाम पर उर्दू बना डाला है हिन्दी को।अब हर दल के नेता वही भाषा बोलते हैं।
अस्तु;
मुख्य बात यह कि व्याख्यान की भाषा के उस स्तर की आजकी पीढ़ी कल्पना नहीं कर सकती। 
और ऐसे भी वक्ता होते हैं, यह बिना देखे सुने अकल्पनीय है।  
महादेवी जी बोलतीं तो लगता कितना बड़ा दार्शनिक बोल रहा है।
माखनलाल चतुर्वेदी जी बोलते तो मानो कोई ऐसा महापुरुष जिसके वश में हैं शब्द और संकेत से थिरकते नाचते हैं शब्द ।स्वरों में संगीत और विद्वत्ता का अनूठा संगम सा।

हजारी प्रसाद द्विवेदी जी बोलते तो लगता फूल झड़ रहे हैं।
इन्हें सुनना जीवन को धन्य कर देता था।
वह भाषा 1968 के बाद मार डाली गई।
✍️ रामेश्वर मिश्र पंकज

संस्कृत सीखने हेतु दुनिया भर में होगी भाषा क्रान्ति

लेखक:- डॉ. जीतराम भट्ट,
(निदेशक, डॉ. गो.गि.ला.शा. प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान)


कुछ लोगों का कहना है कि संस्कृत केवल पूजा-पाठ की ही भाषा है। किन्तु यह सत्य नहीं है। संस्कृत-साहित्य के केवल पॉच प्रतिशत में धर्म की चर्चा है। बाकी में तो दर्शन, न्याय, विज्ञान, व्याकरण, साहित्य आदि विषयों का प्रतिपादन हुआ है। संस्कृत पूर्ण रूप से समृद्ध भाषा है। ग्रीक और लेटिन दोनों प्राचीन भाषाओं की पुस्तकें एकत्र की जायें तो संस्कृत-साहित्य की तुलना नहीं कर सकती। संस्कृत का वैदिक साहित्य ज्ञान-विज्ञान का खजाना है। ललित कलाओं का मौलिक ज्ञान भी संस्कृत की पुस्तकों से प्राप्त हुआ है। संस्कृत-साहित्य की खोज ने ही तुलनात्मक भाषा-विज्ञान को जन्म दिया। संस्कृत के अध्ययन से भाषा-शास्त्र को पहचान मिली। अध्यात्म और दर्शन तो मूल रूप से संस्कृत भाषा की ही देन हैं। लोकोपयोगी समस्त ज्ञान-विज्ञान के विषय संस्कृत भाषा में उपलब्ध हैं। चिकित्सा, औषधि, गणित, खगोल, भूगोल, भूगर्भ, विमान-शास्त्र, अभियान्त्रिकी, रसायन, भौतिकी, वनस्पतिशास्त्र, कृषि-विज्ञान, ज्योतिष, स्वर-विज्ञान, संगीत, योग, धर्म, इतिहास, व्याकरण, मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान, ललित कलाएं आदि सभी विषय संस्कृत भाषा में उपलब्ध हैं। भारत के तक्षशिला, नालन्दा, ओदान्तपुरी, विक्रमशिला, काशी आदि विश्वविद्यालयों में विश्व के अनेक देशों के विद्यार्थी इन विद्याओं के अध्ययन के लिए आते थे। यह हमारा दुर्भाग्य रहा है कि बाहरी आक्रमणकारियों ने सर्वप्रथम हमारे विश्वविद्यालयों को ध्वस्त किया, बुद्धिजीवियों व आचार्यों पर आक्रमण किये और इनके पुस्तकालयों को जलाया। वर्तमान में संस्कृत भाषा की जो प्राचीन पुस्तकें उपलब्ध हैं, वे कुल साहित्य की दस प्रतिशत हैं। अनेक आचार्यों, गुरुओं, ऋषियों और ब्राह्मणों ने आक्रान्ताओं से किसी तरह बच कर, भूमिगत हो कर अथवा जंगलों में कन्द-मूल खा कर वंश-परम्परा से अथवा गुरु-शिष्य-परम्परा से श्रुति-स्मृति-माध्यम (सुनाना और याद करना)से संस्कृत-शास्त्रों की रक्षा की।

ठ्ठ             पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम जब ग्रीस गये, तब वहाँ के माननीय राष्ट्रपति कार्लोस पाम्पाडलीस ने उनका स्वागत संस्कृत भाषा में ‘राष्ट्रपतिमहाभागा: सुस्वागतम् यवनदेशेÓ कह कर किया था।

ठ्ठ             सेंट स्टीफन कॉलेज के प्रिन्सिपल एक बार विदेश-यात्रा पर थे, उन्हें वहाँ के बुद्धिजीवियों ने संस्कृत में गीता के श्लोक सुनाने के लिए कहा, किन्तु उन्हें वह कंठस्थ नहीं थे। बाद में जब वह गीता पढ़ कर दोबारा वहाँ गये तो उन्होंने गीता के श्लोक सुनाए।

ठ्ठ             प्रतिष्ठित पत्रकार शहीद लाला जगतनारायण रूस गये। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा है कि ‘वे वहाँ एक पुस्तकालय देखने भी गये। वहाँ द्वार पर संस्कृत भाषा में स्वागत और परिचय हुआ। रशियन संस्कृत में पूछते थे और हम अंग्रेजी में उत्तर देते थे। हमें बड़ी शर्म महसूस हुई। ये सभी प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि भारत की पहचान संस्कृत भाषा और उसके साहित्य से है। विदेशों में भारत के विषय में बातचीत होती है तो वेद, गीता, गंगा, पतंजलि, आर्यभट्ट, कालिदास आदि के बारे में उनकी जिज्ञासा होती है।

विश्व की ज्ञात भाषाओं में संस्कृत सबसे पुरानी है। भारत की सभी भाषाएं संस्कृत से ही निकली हैं। भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त फारसी, लैटिन, अंग्रेजी, श्रीलंका की भाषा, नेपाली, अफ्रीका के मूल निवासियों की भाषा, इण्डोनेशिया, मलेशिया एवं सिंगापुर की भाषाओं पर भी संस्कृत का प्रभाव है। उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी भाग मैक्सिको और पनामा राज्य की सीमा पर एक प्रान्त में संस्कृत से मिलती-जुलती भाषा बोली जाती है। इसलिए भाषा-विशेषज्ञों ने उनकी भाषा का नाम ब्रोन-संस्कृत और उन लोगों का नाम ह्वाइट-इण्डियन रखा। बाली द्वीप में संस्कृत मातृभाषा रही है। इससे सिद्ध होता है कि समस्त विश्व में संस्कृत का साम्राज्य था। आक्रमणों के कारण बाद में वह भारत तक ही सिमट कर रह गयी। और, भारत पर भी ई.पू. दूसरी शती से लगातार हुए आक्रमणों, युद्धों, विदेशी शासनों के कारण वह हाशिए पर चली गयी।

संस्कृत साहित्य को सुरक्षित रखने के लिए विद्वानों ने उसे धार्मिक संस्कारों, कर्मकाण्ड आदि में अनिवार्य और कठोर अनुशासन के साथ जोड़ा। शास्त्रों को पढऩे के लिए कडे नियम  बनाये गये, ताकि आक्रान्ताओं और शासकों तक बात पहँँुचाने वालों से बचा जा सके।

सैकड़ों -हजारों वर्षों तक जो भाषा विदेशी आक्रमण-कारियों का दंश झेल चुकी हो। स्वतन्त्रता के तुरन्त बाद उसकी तुलना अंग्रेजी से होने लगी और प्रश्न उठाये जाने लगे कि यदि संस्कृत में ज्ञान-विज्ञान है तो भारत में विज्ञान पश्चिम से क्यों आयातित हो रहा है? संस्कृत के आधार पर विज्ञान के आविष्कार क्यों नहीं हो रहे हैं? संस्कृत-शास्त्रों के द्वारा केवल पूजा-पाठ ही क्यों होती है? स्वतन्त्रता से पहले भारत की मजबूरी थी कि भारत को अंग्रेजों के ही ज्ञान-विज्ञान का अनुकरण करना था। संस्कृत-शास्त्रों पर आधारित ज्ञान-विज्ञान पर शोध और आविष्कार तो आजादी के बाद होना था। किन्तु शोध और आविष्कार कहां से होते? संस्कृत को केवल एक भाषा मान कर उसे अन्य भारतीय भाषाओं के साथ जोड़ दिया गया। इसलिए वर्तमान शिक्षा-पद्धति के कारण भारत में विज्ञान, तकनीक, गणित पढऩे वाले संस्कृत नहीं जानते और संस्कृत पढऩे वाले विज्ञान आदि विषयों को नहीं जानते हैं।

सन् 1783 में अंग्रेजों के शासन में कलकत्ता उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश बन कर सर विलियम्स जोन्स भारत आये। वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से पढ़े थे। उन्होंने ग्रीक, लैटिन, परसियन, अरबी, हिब्रू आदि भाषाओं का अध्ययन किया था। यहां आ कर उन्हें संस्कृत के विषय में ज्ञात हुआ तो उन्होंने बंगाली ब्राह्मण रामलोयन कवि भूषण से संस्कृत को सीखा और संस्कृत में दक्षता प्राप्त की। फिर उन्होंने ‘अभिज्ञानशाकुन्तलम को पढ़ा और अध्ययन के मध्य में ही उन्होंने अपने पिताजी को पत्र लिखा कि ‘मैं दो हजार वर्ष पुराने एक संस्कृत नाटक को पढ़ रहा हूं, इसकी रचना हमारे महान लेखक शेक्सपीयर के इतने समीप है कि लगता है कि शेक्सपीयर ने अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अध्ययन तो नहीं किया था? बाद में उन्होंने शाकुन्तलम् का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। संस्कृत में अन्य पुस्तकें भी लिखीं। बाद में  मैक्समूलर ने सेक्रेड बुक ऑफ ईस्ट नामक पुस्तक में संस्कृत और इसके साहित्य की बड़ी प्रशंसा की। जिससे समस्त यूरोप में संस्कृत-ज्ञान के लिए नई दृष्टि विकसित हुई। सन् 1845 में जर्मन विद्वान् मैक्समूलर ने सर्वप्रथम हितोपदेश कथा-संग्रह का अनुवाद किया। तत्पश्चात् भारतीय ज्ञान-विज्ञान से बहुत प्रभावित हुए और सन् 1846 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सम्पर्क कर ब्रह्मो समाज में सम्मिलित हो कर संस्कृत का अध्ययन प्रारम्भ किया। बाद में उन्होंने ऋग्वेद का जर्मन भाषा और अंग्रेजी में अनुवाद किया। मैक्समूलर ने चाल्र्स डार्विन की जीव-उत्पत्ति की थ्योरी को नहीं स्वीकारा, अपितु भारतीय विचारधारा के आधार पर सृष्टि के रहस्य को माना। मैक्समूलर के अनुवाद के बाद यूरोपवासियों में तो वेदों के प्रति जिज्ञासा बढ़ी। किन्तु,भारत में अंग्रेजी शासन ने संस्कृत को पनपने नहीं दिया।

यह हास्यास्पद है कि संस्कृत को आधुनिक भाषा नहीं माना जाता है और न ही इसे विकास की भाषा माना जाता रहा है। भारत में संस्कृत को पूजा-पाठ की भाषा या कठिन भाषा बताने का एक फैशन सा चल पड़ा है, जिसके कारण युगों-युगों से ऋषियों के द्वारा किये गये त्याग, तप, स्वाध्याय, अनुसन्धान से भारतीय समाज आज भी वंचित  है। अत: मैं पाठकों से निवेदन करता हूं कि संस्कृत-ज्ञान-विज्ञान के विषय में सही जानकारी प्राप्त करें और भारत की इस प्राचीन धरोहर को उपेक्षित होने से बचायें।

इनके अतिरिक्त भी अनेक तथ्य हैं, जो संस्कृत की वैज्ञानिकता को प्रमाणित करते हैं। भारतीय भाषाओं के विकास के लिए संस्कृत का आधार आवश्यक है, क्योंकि सभी भारतीय भाषाओं की तकनीकी शब्दावली संस्कृत की सहायता से ही विकसित की जा सकती है। भारतीय संविधान की धारा 343, धारा 348(2) तथा 351 का सारांश यह है कि ‘देवनागरी लिपि में लिखी मूलत: संस्कृत में अपनी पारिभाषिक शब्दावली को लेने वाली हिन्दी भारत की राजभाषा है। इसी प्रकार अन्य भारतीय भाषाओं के लिए संस्कृत की अनिवार्यता समझी जा सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि संस्कृत पढऩे से गणित, विज्ञान, प्रौद्योगिकी की शिक्षा में आसानी होती है। इसकी वर्णमाला पूरी तरह से वैज्ञानिक होने के कारण उच्चारणसे गले और मॅुंह की पूरी मांसपेशियों की कसरत करवाती है। इससे स्मरण-शक्ति भी बढ़ती है। विदेशों में स्पीच थैरेपी के लिए संस्कृत प्रयोग होने लगा है। वर्तमान में भारतीय शिक्षा-तन्त्र में संस्कृत का अध्ययन केवल भाषा के रूप में होता है और उसके लिए भी योग्य छात्र आगे नहीं आते। संस्कृत के विषय में फैलाये गये मिथ्या भ्रम के कारण विज्ञान और तकनीकी विषयों के छात्र इसको नहीं पढ़ते हैं, जिससे संस्कृत-शास्त्रों में स्थित ज्ञान-विज्ञान के लिए छात्रों में कोई रुचि पैदा नहीं होती है। कुछ लोग अभी भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं। वे संस्कृत को केवल ब्राह्मणों या हिन्दुओं की भाषा के रूप में प्रचारित करने पर आमादा हैं। उन्हें शायद ज्ञात नहीं है कि छटीं शताब्दी में शाह खुसरो नौशे खां ने पंचतन्त्र का फारसी में अनुवाद किया था। रहीम खानखाना स्वयं संस्कृत के विद्वान् थे और मूल संस्कृत में अनेक रचनाएं कीं। सन् 1420-70 में कश्मीर का शासक जैनुल आबदीन संस्कृत बोलता था और संस्कृत ग्रन्थों को पढ़ता था।

‘लेखपद्धतिÓ नामक ग्रन्थ के अनुसार गुजरात का प्राचीन सुल्तान बहुत समय तक राजभाषा के रूप में संस्कृत का ही व्यवहार करता था। भारतवर्ष में अनेक ऐसी मुस्लिम कब्रें भी मिली हैं, जिन पर संस्कृत में शिलालेख उत्कीर्ण हैं। अब्दुल रहमान नामक प्रसिद्ध साहित्यकार संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश का मर्मज्ञ विद्वान् था। सम्राट अकबर संस्कृत के महत्त्व को समझते थे और संस्कृत-विद्वानों को विशेष आदर देते थे। अबुल फजल के भाई फैजी संस्कृत के बहुत अच्छे विद्वान् थे। उन्होंने हिन्दी तथा संस्कृत की सम्मिश्रित भाषा में रहीमकाव्य की रचना की तथा खेटकौतुकम नामक एक ज्योतिष ग्रन्थ की रचना भी की। शाहजहां ने भी संस्कृत की वैज्ञानिकता को स्वीकार किया था। राजकुमार दाराशिकोह संस्कृत का पारंगत विद्वान् था, जिसकी प्रेरणा से उपनिषदों, भगवद्गीता, योगवाशिष्ठ आदि का अनुवाद फारसी में हुआ। मुस्लिम राजपरिवार की विदुषी महिलाएं भी संस्कृत के महत्त्व को समझती थी। शाहजहाँ की बेगम रूपराशि विद्वान् मुनीश्वर, नित्यानन्द और वंशीधर की रचनाओं से अत्यन्त प्रभावित होती थी।

भारत के कई विद्यालयों और महाविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाने वाले ब्राह्मणों और हिन्दुओं से इतर मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन शिक्षक-शिक्षिकाएं भी हैं। गुजरात के सन्तरामपुर में आट्र्स एण्ड कामर्स कालेज में संस्कृत पढ़ाने वाले अध्यापक मुसलमान हैं। इसी कालेज की छात्रा यास्मीन बानो ने सन् 2013 में स्नातक में संस्कृत विषय से सर्वोच्च अंक प्राप्त कर कहा था कि ‘मैं इसी भाषा से मास्टर डिग्री करूगी, क्योंकि  मुझे बचपन से ही संस्कृत पढऩे का शौक था, इसलिए मैंने यह भाषा चुनी। यह समृद्ध भाषा है इसलिए संस्कृत पढऩे से भी अच्छी नौकरी मिल सकती है।Ó वर्तमान में पुणे से श्री गुलाम दस्तगीर जो अपने नाम के आगे पण्डित उपाधि का प्रयोग करते हैं, वे कहते हैं कि संस्कृत पढऩे-पढ़ाने के लिए यदि मुझे पूर संसार से भी लडऩा पड़े तो भी मैं इस भाषा को ही चुनूंगा। पं0गुलाम दस्तगीर संस्कृत में एक मैगजीन भी निकालते हैं। इसी प्रकार मो. इजराइल खान थे, जो कि दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर थे। जाकिर हुसैन कालेज के मो.मारूफ उर रहमान, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के मो.हनीफ शास्त्री आदि मुस्लिम विद्वानों के अतिरिक्त प्रो.हांग बांसग, डॉ,जॉर्ज कार्डोना, थाईलैण्ड की राजकुमारी सिरिन्थोर्न, चाल्र्स विल्किन्स, जार्ज फासटन फॉन बोएथलिंक, डॉ.थीबो, प्रो. कीलर्सन, जेम्स बैलेन्टाइन, डॉ. बॉय, अलब्रख्ते बेबर, डॉ. आइगोर सेरे ब्राइकोन, प्रो. एलेक्स वेमेन, डॉ. ह्वूलर, ब्रेसोएक, प्रो. डब्ल्यू रूबेन, इमर्सन, हेनरी डेविड थारो, वाल्ट ह्विटमन, वारेन हेंस्टिंग्ज आदि ने बिना किसी आग्रह या मजबूरी के संस्कृत भाषा का अध्ययन किया और इसके साहित्य के प्रचार-प्रसार में प्रवृत्त हुए।

भारत में भी सभी वर्णों और वर्गों के छात्र संस्कृत पढ़ते हैं और ब्राह्मणों के अलावा भी अनेक संस्कृत के विद्वान उच्च पदों पर आरूढ़ हुए हैं। किन्तु संस्कृत के विरोधियों द्वारा इसप्रकार के भ्रम शासन-प्रशासन में फिर भी फैलाए जाते हैं। गत दिनों संसद-भवन में हुए शपथ-समारोह में संस्कृत में शपथ लेने वाले सांसदों की अधिक संख्या को देख कर बौखलाए हुए इस प्रकार के लोगों ने अखबारों और  मीडिया में इसी प्रकार के वक्तव्य प्रकाशित किये। यह विडम्बना है कि भारत में ही इस प्रकार की संकीर्ण सोच है, जबकि  विदेशी बुद्धिजीवी संस्कृत का महत्त्व समझ कर इसके उपयोग पर बल दे रहे हैं। इसलिए हालैण्ड, इटली, डेनमार्क, स्वीडन, जर्मनी, फ्र ांस, इंग्लैण्ड, अमेरिका, जापान, रूस, इण्डोनेशिया, श्रीलंका आदि देशों में संस्कृत-शास्त्रों पर वैज्ञानिक दृष्टि से शोध-अनुसन्धान प्रारम्भ हो चुके हैं। भारत में अभी भी संस्कृत-शिक्षा गुलामी की मानसिकता का शिकार है।

संस्कृत के लिए जैसी सोच पराधीन भारत में थी, वैसी ही आज भी है। इसे केवल वर्ग विशेष और कर्म विशेष तक सीमित करके इसमें स्थित ज्ञान-विज्ञान से देश को वंचित रखा जा रहा है, जिससे संस्कृत-शिक्षा को हेय और उपेक्षित दृष्टि से देखा जाता है। अत: भारत की इस सबसे महत्त्वपूर्ण धरोहर को बचाने के लिए हमें लॉर्ड मैकाले की शिक्षानीति के प्रभाव से बाहर आ कर कुछ नया करना होगा।
✍🏻साभार - भारतीय धरोहर

बुधवार, 10 अगस्त 2022

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशीWednesday, 10 August 2022 किंकोडा तेरस, चतुरा नागा के श्रृंगार

व्रज - श्रावण शुक्ल त्रयोदशी
Wednesday, 10 August 2022

किंकोडा तेरस, चतुरा नागा के श्रृंगार
आज किंकोड़ा तेरस है. आज के दिन व्रज में विराजित श्रीजी यवनों के उपद्रव का नाश कर पाड़े (भैंसे) के ऊपर बैठकर रामदासजी, कुम्भनदासजी आदि को साथ लेकर चतुरा नागा नाम के विरक्त योगी को दर्शन देने एवं उक्त पाड़े (भैंसे) का उद्धार करने टॉड का घना नाम के घने वन में पधारे थे. 

चतुरा नागा श्रीजी के दर्शन को लालायित थे परन्तु वे श्री गिरिराजजी पर पैर नहीं रखते थे जिससे श्रीजी के दर्शन से विरक्त थे. 
भक्तवत्सल प्रभु अत्यन्त दयालु हैं एवं अपने सभी भक्तों को मान देते हैं अतः वे स्वयं अपने भक्त को दर्शन देने पधारे. चतुरा नागा की अपार प्रसन्नता का कोई छोर नहीं था. 
वर्षा ऋतु थी सो चतुरा नागा तुरंत वन से किंकोडा के फल तोड़ लाये और उसका शाक सिद्ध किया. रामदासजी साथ में सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) सिद्ध कर के लाये थे सो श्रीजी को सीरा एवं किंकोडा का शाक भोग अरोगाया. 

तब कुम्भनदासजी ने यह पद गाया – 
“भावत है तोहि टॉडको घनो ।
कांटा लगे गोखरू टूटे फाट्यो है सब तन्यो ।।१।।
सिंह कहां लोकड़ा को डर यह कहा बानक बन्यो । 
‘कुम्भनदास’ तुम गोवर्धनधर वह कौन रांड ढेडनीको जन्यो ।।२।।

कुछ देर पश्चात समाचार आये कि यवन लश्कर फिर से बढ़ गया है जिससे तुरंत श्रीजी को पुनः मंदिर में पधराया गया. 

आज भी राजस्थान में भरतपुर के समीप टॉड का घना नमक स्थान पर श्रीजी की चरणचौकी एवं बैठकजी है जो कि अत्यंत रमणीय स्थान है.

आज श्रीजी को मुकुट-काछनी का श्रृंगार धराया जाता है.

उपरोक्त प्रसंग की भावना से ही आज के दिन श्रीजी को गोपीवल्लभ (ग्वाल) भोग में किंकोडा का शाक एवं सीरा (गेहूं के आटे का हलवा) अरोगाया जाता है.

अद्भुत बात यह है कि आज भी प्रभु को उसी लकड़ी की चौकी पर यह भोग रखे जाते हैं जिस पर सैंकड़ों वर्ष पूर्व चतुरा नागा ने प्रभु को अपनी भाव भावित सामग्री अरोगायी थी.

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राजभोग दर्शन – 

कीर्तन – (राग : सारंग)

आज महा मंगल महराने l
पंच शब्द ध्वनि भीर बधाई घर घर बेरखबाने ll 1 ll
ग्वाल भरे कांवरि गोरस की वधु सिंगारत वाने l
गोपी ग्वाल परस्पर छिरकत दधि के माट ढुराने ll 2 ll
नाम करन जब कियो गर्गमुनि नंद देत बहु दाने l
पावन जश गावति ‘कटहरिया’ जाही परमेश्वर माने ll 3 ll

साज – वर्षाऋतु में बादलों की घटा एवं बिजली की चमक के मध्य यमुनाजी के किनारे कुंज में एक ओर श्री ठाकुरजी एवं दूसरी ओर स्वामिनीजी को व्रजभक्त झूला झुला रहे हैं. प्रभु की पीठिका के आसपास सोने के हिंडोलने का सुन्दर भावात्मक चित्रांकन किया है जिसमें ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु स्वर्ण हिंडोलना में झूल रहे हों, ऐसे सुन्दर चित्रांकन से सुशोभित पिछवाई आज श्रीजी में धरायी जाती है. 
गादी और तकिया के ऊपर सफेद बिछावट की जाती है तथा स्वर्ण की रत्नजड़ित चरणचौकी के ऊपर हरी मखमल मढ़ी हुई होती है.

वस्त्र – श्रीजी को आज चौफूली चूंदड़ी की सुनहरी ज़री की तुईलैस की किनारी से सुसज्जित सूथन, काछनी एवं पटका धराया जाता है. ठाड़े वस्त्र सफेद डोरीया के धराये जाते है.

श्रृंगार - प्रभु को आज वनमाला (चरणारविन्द तक) का भारी श्रृंगार धराया जाता है. आभरण हीरा मोती के धराये जाते हैं. श्रीमस्तक पर सलमा सितारा का मुकुट व टोपी एवं बायीं ओर शीशफूल धराया जाता है.
 श्रीकर्ण में मोती के कुंडल धराये जाते हैं. चोटीजी नहीं आती हैं.श्रीकंठ में कली,कस्तूरी आदि की माला आती हैं.पीले पुष्पों के रंग-बिरंगी थाग वाली दो सुन्दर मालाजी एवं कमल के फूल की मालाजी धरायी जाती है. श्रंग-बिरंगे पवित्रा मालाजी के रूप में धराये जाते हैं. 
श्रीहस्त में कमलछड़ी, लहरिया के वेणुजी एवं वेत्रजी ( एक सोना का) धराये जाते हैं.
पट लाल एवं गोटी मीना की धराई जाती हैं.

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