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गुरुवार, 1 दिसंबर 2022

जोड़ो का दर्द ठीक करने का उपाय

जोड़ो का दर्द ठीक करने का उपाय
• यदि घुटने की गद्दी घिस जाना, कैल्शियम कम होना,घुटने के हड्डियों के बीच अंतर कम या ज्यादा हों जाना इत्यादि
• ‎अपथ्य भोजन :- (तीन से 6 माह तक क्या न खायें)
केला,सब खट्टे फल,खट्टे पदार्थ,ठंडे पदार्थ,सब सूखे मेवे, उड़द की दाल । जोड़ो के दर्द में कब्ज की मुख्य भूमिका होती है इसलिये पेट का साफ रहना अतिआवश्यक है।

पथ्य :- दोपहर से पहले चने के दाने के बराबर चुना थोड़े से गुड़ व देशी गाय के घी के साथ खाएं। कम से कम 20 मिंट हल्के कपड़े पहन कर धूप में बैठे।
तेल लगाने हेतु आवश्यक सामग्री व बनाने की विधि :-
1 लीटर सरसो तेल
4 लहसुन की गांठे ( कुचली हुई)
4 बड़े चमच्च मेथी दाना चूर्ण
4 चम्मच सौठ चूर्ण
4 चम्मच अजवायन चूर्ण

1 लीटर सरसो तेल में कुचला हुया लहसुन डालकर भूरे होने तक धीमी आंच पर गर्म करें
उसके बाद सभी चूर्ण डालकर काला होने तक गर्म करें व ठंडा होने पर बिना छाने किसी काँच या स्टेन्स स्टील के बर्तन में सुरक्षित रखें व इसे घुटने या दर्द वाले जोड़ो पर व 2 से 3 इंच ऊपर नीचे तक लगाए । ( मालिश न करें)

घुटने हेतु विशेष व्यायाम :-
• पैर के पंजे व अँगुली में तेल लगाएं व पैर और घुटने के तनाव कम करने हेतु अँगुली को बारी बारी से उल्टा सीधा घुमाए।

• ‎एक पैर के अंगूठे को हाथ से पकड़कर जमीन से 6 इंच ऊपर उठाएं व एक झटका देकर धीरे से जमीन पर रख दे।

• ‎पैरो के दोनों पंजो को जोड़कर ज्यादा से ज्यादा जमीन,मुह,दाएं व बाएं घड़ी के विपरीत दिशा में ले जाएं।

• ‎दोनो पैरो की एड़ियों  एक साथ उठाकर पंजो के बल खड़े हो जाइए व दोनो घुटनो को जांघो की ओर खिंचे परिणामस्वरूप दोनो पैरों की पिंडलियां व जांघे सख्त हो जाएगी।

💐 घुटनों के दर्द को ठीक करने में कब्ज को दूर करना आवश्यक है इसके लिये निम्न उपयो
को करें:-
• सबेरे उठकर दो ग्लास गुनगुना पानी घुट घुट कर पियें
• ‎कब्ज रहने तक छिलके वाली मूंग की दाल खाये
• ‎भोजन चबा चबा कर करें
• ‎एक भोजन पूणतः पचने के बाद ही दूसरा भोजन करें
• ‎भोजन के दौरान पानी न पिएं भोजन के बाद एक या दो घुट ही पानी पिये उसके डेढ़ घण्टे बाद पानी जरूर पियें
• ‎पानी हमेशा बैठकर व घुट घुट भर कर पियें

कब्ज से बचने हेतु निम्न उपयोग कर सकते हैं

• ‎भोजन के पश्चात बेल की कैंडी जरूर खाये
‎या
• ‎2 चम्मच त्रिफला (1:2:3) वाला गर्म दूध या गर्म पानी के साथ
या
• ‎रात्रि भोजन में चुकन्दर की सब्जी जरूर खाएं
या
• ‎रात्रि भोजन के बाद 10 मुनक्के एक गिलास दूध में उबालकर मुनक्के खा ले व दूध पी जाएं
या
• ‎2 अंजीर 10 मुंनके बीज निकालकर रात को पानी मे भिगो दें दोपहर भोजन के बाद एक अंजीर 5 मुंनके खाये बचे एक अंजीर 5 मुंनके शाम
या
• ‎छोटी हरड़ को अरण्ड के तेल में भूनकर मसलकर रख ले सुबह 4 बजे आधा चम्मच इसे सेवन कर एक गिलास पानी पी पुनः सो जाएं
या
• ‎2 चम्मच अरण्ड का तेल गरम पानी या दूध के साथ

3 से 6 माह उपर्योक्त नियम का पालन कर आप अपना स्वास्थ्य व समृद्धि बचा सकते हैं

जब घुटने बदलने की नौबत आये उससे पहले यह प्रयोग जरूर अपनाये विनती है :- हरसिंगार एक पौधा है जिसके सफेद रंग के फूल होते है ये फूल रात को खिलकर सुबह गिर जाते है इस पौधे के 6 से 7 पत्तों को सिल बट्टे पर पीसकर इसकी चटनी बना ले और एक गलास पानी में उबाले। उबलते उबलते जब यह आधा रहा जाये तो इसको गुनगुना करके रात को रख दे सुबह प्रतिदिन खाली पेट पीये। ऐसा करने से जोड़ो के दर्द से आपको मुक्ति मिलेगी। इस औषधि के साथ कोई अन्य दवा नहीं लेनी है। यह उपाय सबसे ज्यादा कारगर और सफल है।

कनेर के पत्तों को उबालकर उसको उसके पत्तों की चटनी बना ले और तिल के तेल में मिलाकर घुटनों पर मालिश करे ऐसा करने से आपको दर्द से मुक्ति मिलेगी।

 आपके घुटनों में दर्द रहता है तो रोज रात को 2 चम्मच मैथी को एक ग्लास पानी में भिगो कर रख दे। और प्रात: काल खाली पेट मेथी को चबा चबा कर खाने से और मेथी का पानी पीने से आपको कभी भी घुटनो का दर्द नही होगा।
एक ग्लास दूध में 4-5 लहसुन की कलियाँ डाल कर अच्छी तरह से उबाले और गुनगुना पीने से भी घुटनों के दर्द में आराम मिलता है।

 हर रोज आधा कच्चा नारियल खाने से बुढ़ापे में भी कभी आपको घुटनों के दर्द का परेशानी नही होगी।

 5 अखरोट प्रतिदिन खाली पेट खाने से आपके घुटने में कभी कष्ट नही होगा।

रोज रात को सोने से पहले एक ग्लास दूध ने हल्दी डाल कर पीने से आपको हड्डियों में दर्द की समस्या से मुक्ति मिलेगी।

एक दाल के दाने के बराबर थोड़ा सा चूना (जो आप पान में लगा कर खाते है) को दही में या पानी में मिला कर पीने से आपको हड्डियों में कभी दर्द नही होगा। चूने के पानी को हमेशा सीधे बैठकर ही पिए इससे आपको जल्दी आराम होगा। यह औषधि सिर्फ 1 महीने पीने से ही शरीर की किसी भी हड्डी में दर्द हो तो वो जल्दी ठीक हो जाएगा।

सुबह और शाम को भद्र आसन करने से आपको लाभ मिलेगा।

  हड्डियों के दर्द से बचने के लिए आप अपने भोजन में 25% फल और सब्जियों को शामिल करेगे तो आपको कभी भी हड्डियों के दर्द का सामना नहीं करना पड़ेगा।

 नारियल, सेब, संतरे, मौसमी, केले, नाशपति, तरबूज और खरबूजे आदि फलों का सेवन हर रोज जरुर करे।

 गोभी, सोयाबीन, हरी पत्तेदार सब्जियों के साथ खीरे, ककड़ी, गाजर, और मेथी को अवश्य शामिल करे।

 दूध और दूध से बनी चीजे भरपूर मात्रा में खाए और कच्चा पनीर भी भोजन में शामिल करे, ऐसा करने से आपके जोड़ों के दर्द में कमी आएगी।

 मोटा अनाज, मकई, बाजरा, चोकर वाले आटे की रोटियों का जरुर उपयोग करे। क्योंकि इनमे वो सभी तत्व होता है जो आपकी हड्डियों और जोड़ो के दर्द से मुक्ति दिलाता है।

 अगर अत्यधिक सर्दी की वजह से  घुटनों में बहुत अधिक पीड़ा है तो सरसों के तेल में लहसुन और अजवायन को पकाये और फिर जब यह तेल गुनगुना हो जाये तो घुटनों पर मालिश करे, उनका दर्द छू मंतर हो जायेगा।

नीचे बताई गयी सामग्री को मिला कर हल्दी का एक दर्द निवारक पेस्ट बना लीजिये :
1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
1 छोटा चम्मच पीसी हुई चीनी, या बूरा या शहद या चीनी
1 चुटकी चूना (जो पान में लगा कर खाया जाता है) और आवश्यकतानुसार पानी।

इन सभी को अच्छी तरह मिला लीजिये। एक लाल रंग का गाढ़ा पेस्ट बन जाएगा। सोने से पहले यह पेस्ट अपने घुटनों पे लगाइए। इसे सारी रात घुटनों पे लगा रहने दीजिये। सुबह साधारण पानी से धो लीजिये। कुछ दिनों तक प्रतिदिन इसका इस्तेमाल करने से सूजन, खिंचाव, चोट आदि के कारण होने वाला घुटनों का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाएगा।

 21 छोटा चम्मच सोंठ का पाउडर लीजिये और इसमें थोडा सरसों का तेल मिलाइए। इसे अच्छी तरह मिला कर गाड़ा पेस्ट बना लीजिये। इसे अपने घुटनों पर मलिए। इसका प्रयोग आप दिन या रात कभी भी कर सकते हैं। कुछ घंटों बाद इसे धो लीजिये। यह प्रयोग करने से आपको घुटनों के दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलेगा।

4-5 बादाम,5 6 काली मिर्च,10 मुनक्का,5 6 अखरोट प्रतिदिन सुबह खाये

खजूर विटामिन ए, बी, सी, आयरन व फोस्फोरस का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है. इसलिए, खजूर घुटनों के दर्द सहित सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द के लिए बहुत असरकारक है.

एक कप पानी में 7-8 खजूर रात भर भिगोयें। सुबह खाली पेट ये खजूर खाएं और जिस पानी में खजूर भिगोये थे, वो पानी भी पीयें। ऐसा करने से घुटनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, और घुटनों के दर्द में बहुत लाभ मिलता है।

नारियल भी घुटनों के दर्द के लिए बहुत अच्छी औषधी है। रोजाना सूखा नारियल खाएं। नारियल का दूध पीयें। घुटनों पर दिन में दो बार नारियल के तेल की मालिश करें इससे घुटनों के दर्द में अद्भुत लाभ होता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आपको इन आसान और कारगर उपायो से लाभ मिले।

होमओपैथी के द्वारा

जोड़ के दर्द दो तरह के होते हैं l छोटे जोड़ों के दर्दो को गठिया कहते हैं, इन जोड़ों का दर्द जब काफी पुराना हो जाता है तब जोड़ विकृत यानि टेढ़े – मेढ़े हो जाते हैं तब इसे पुराना संधि प्रदाह (arthritis deformans) कटे हैं l बड़े जोड़ों तथा पुट्ठे के दर्दो को वात रोग (rheumatism) कहते हैं l वात रोग (gout) में जोड़ों की गांठें सूज जाती है, बुखार हो जाता है, बेहद दर्द और बेचैनी होती है l कारण : ओस या सर्दी लगना, देर तक भीगना, अधिक मांस, खटाई या ठंडी वस्तुएं खाना, शराब का अधिक सेवन करना व विलासिता, आदि l

●  मुख्य दवा l जब पेशाब में यूरिक एसिड व युरेट्स काफी मात्रा में आये – (अर्टिका युरेन्स Q, 10 बूंद दिन में 3 बार)

●  छोटे जोडों में दर्द व सुजन, दर्द कटने या चुभने जैसा; रात में या चलने फिरने से बढ़े – (कोल्चिकम 6 या 30, दिन में 3 बार)

●  जब दर्द एक जोड़ से दुसरे जोड़ में चलता-फिरता रहे – (पल्साटिला 30, दिन में 4 बार)

●  रोग खासकर पैर के अंगूठे में सूजन के साथ l ठण्ड या बर्फ की पट्टी से रोग घटे l दर्द नीचे से ऊपर की ओर जाये – (लीडम पाल 6 या 30, दिन में 4 बार)

●  जब रोग अचानक ठंड के कारण शुरू हो – (एकोनाइट 6 या 30, दिन में 4 बार)

●  जब गठिया रोग चर्म रोगों के साथ शुरू हो – (सल्फर 30, दिन में 3 बार)

● जब रोग ठण्ड से बढ़े l सेकने व चलने फिरने से आराम आये – (रस टक्स 30 या 200, दिन में 3 बार)

●   मौसम बदलने के साथ रोग की पुनरावृत्ति – (कल्केरिया कार्ब 30 या 200, दिन में 3 बार)

●   हाथ पैर के छोटे छोटे जोड़ों में दर्द  व सूजन – (स्टेफिसेगिरिया 30 या 200, दिन में 3 बार)

● शराबियों में जोड़ों का दर्द – (नक्स वोमिका 30 या 200, दिन में 3 बार)

● जब दर्द स्थान बदलता रहे l हिलने डुलने से रोग बढ़े – (स्टैलेरिया मीडिया Q, दिन में 3 बार)

●  अंगुलियों के जोडों का दर्द – (लाइकोपोडियम 30, दिन में 3 बार)

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रविवार, 27 नवंबर 2022

पक्षीराज गरुण भारत की सांस्कृतिक विरासत और हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग हैं 


हर पुराण तथा वेद में कई स्थानों पर न केवल पृथ्वी बल्कि सभी ग्रह, तारा तथा ब्रह्माण्ड (गैलेक्सी) को भी गोल लिखा हुआ है।

सृष्टि वर्णन में पृथ्वी वर्णन भूगोल तथा आकाश का वर्णन भूगोल या खगोल लिखा है।

वेद में सभी को मण्डल लिखा है।

पृथ्वी गोल होने के कारण हर स्थान पर अलग अलग समय सूर्योदय या सूर्यास्त होते हैं – यह उल्लेख भी सैकड़ों स्थानों पर है।

मान्धाता का राज्य पूरे विश्व में फैला था जिनके बारे में यह उक्ति सभी पुराणों में है कि उनके राज्य में हर समय कहीं सूर्योदय, कहीं सूर्यास्त होता रहता था।

इन्द्र की अमरावती पुरी में जब सूर्योदय होता था, उस समय यम की संयमनी पुरी में अर्ध रात्रि, वरुण की सुखा नगरी में मध्याह्न तथा सोम की विभावरी पुरी में सूर्यास्त होता था।

पुराणों में दो प्रकार के द्वीपों का वर्णन है-एक पृथ्वी के महादेश तथा दूसरे सूर्य के चारों तरफ ग्रहों की परिक्रमा से बने हुये क्षेत्र। ये ही वलयाकार या वृत्ताकार हैं (पृथ्वी से देखने पर)। पृथ्वी के व्यास को १००० योजन माना गया है (प्रायः १२.८ किमी. का १ योजन), अतः आकाश में पृथ्वी सहस्र-दल पद्म या सहस्रपाद है। ३ प्रकार की पृथ्वी है और सबमें द्वीपों, पर्वतों नदियों के नाम उसी प्रकार हैं जैसे पृथ्वी ग्रह पर हैं। ३ पृथ्वी हैं-सूर्य-चन्द्र दोनों से प्रकाशित पृथ्वी ग्रह, सूर्य का प्रकाश क्षेत्र (३० धाम तक (ऋक् १०/१९८/३), सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा जहां वह विन्दु मात्र दीखता है (सूर्य सिद्धान्त १२/८२, ऋक् १/२२/२०-विष्णु सूर्य का परमपद)। हर पृथ्वी की तुलना में उसका आकाश उतना ही बड़ा है, जितना मनुष्य की तुलना में पृथ्वी ग्रह।रविचन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते। स समुद्रसरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता॥३॥ यावत् प्रमाणा पृथिवी विस्तारपरिमण्डला। नभस्तावत् प्रमाणं वै व्यासमण्डलतो द्विज॥४॥ (विष्णु पुराण, २/७)
स्पष्टतः १००० योजन व्यास की पृथ्वी पर १६ करोड़ योजन पुष्कर द्वीप नहीं हो सकता है। पृथ्वी के द्वीपों का अनियमित आकार है, वृत्ताकार नहीं है।
कई लोग अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि को छोड़ कर पृथ्वी के ७ द्वीपों का वर्णन करते हैं। किन्तु तुर्की की नौसेना के पास एक पुराना नक्शा था जिसमें अण्टार्कटिका के २ स्थल भाग तथा दोनों अमेरिका का नक्शा था। यह नौसेना प्रमुख ने नाम पर पिरी रीस नक्शा कहा जाता है। इसी के आधार पर कोलम्बस ने अमेरिका यात्रा की योजना बनाई थी। यदि अमेरिका नहीं होता तो उसे योजना की तुलना में भारत पहुंचने के लिये १०-१२ गुणा अधिक जाना पड़ता।
एसिया जम्बू द्वीप, अफ्रीका कुश द्वीप, यूरोप प्लक्ष, उत्तर अमेरिका क्रौञ्च, दक्षिण अमेरिका पुष्कर तथा आस्ट्रेलिया शक (या अग्नि कोण में अग्नि या अंग द्वीप) था। आठवां अण्टार्कटिका अनन्त या यम (जोड़ा) द्वीप था। 
नक्शा बनाने के लिये उत्तर और दक्षिण गोलार्धों को ४-४ भाग में नक्शा बनता था, जिनको भू-पद्म का ४ दल कहा गया है। उत्तर भाग के ४ नक्शे ४ रंग में बनते थे जिनको मेरु के ४ पार्श्वों का रंग कहा है। उज्जैन के दोनों तरफ (पृर्व से पश्चिम) ४५-४५ अंश भारत दल है। विषुव से ध्रुव तक आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोकों का विभाजन है-विन्ध्य तक भू, हिमालय तक भुवः, हिमालय स्वर्ग (त्रिविष्टप्), चीन महः (महान् से हान् जाति), मंगोलिया जनः, साइबेरिया तपस् (स्टेपीज), ध्रुव वृत्त सत्य लोक हैं। भारत के पश्चिम केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व, तथा विपरीत दिशा में कुरु दल हैं।
उत्तर के अन्य ३ दल को ३ तल कहते हैं। भारत के पश्चिम अतल (उसके बाद का समुद्र अतलान्तक), पूर्व में सुतल, उससे पूर्व पाताल हैं। भारत के दक्षिण तल या महातल (दोनों को कुमारिका खण्ड कहते थे, आज भी उसे भारत महासागर कहते हैं), अतल के दक्षिण तलातल, पाताल के दक्षिण रसातल, तथा सुतल के दक्षिण वितल हैं। गोल पृथ्वी का समतल नक्शा बनाने पर ध्रुव प्रदेश में अनन्त माप हो जाती है। उत्तरी ध्रुव जल में होने के कारण (आर्यभट) वहां कोई समस्या नहीं है, पर दक्षिणी ध्रुव स्थल पर है, जिसका अलग से नक्शा बनाना पड़ता है। अनन्त माप होने के कारण यह अनन्त द्वीप है।
स्वायम्भुव मनु के समय के ४ नगर परस्पर ९० अंश पर थे-इन्द्र का अमरावती (भारत का पूर्वी नगर, किष्किन्धा काण्ड के अनुसार ७ द्वीपों वाले यव द्वीप का पूर्व भाग), पश्चिम में यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना आदि), पूर्व में वरुण की सुखा, विपरीत दिशा में सोम की विभावरी। 
वैवस्वत मनु के समय से अन्य ४ सन्दर्भ नगर हुये-लंका या उज्जैन, पूर्व में यमकोटिपत्तन (यम द्वीप अण्टार्कटिका जैसा जोडा द्वीप न्यूजीलैण्ड के दक्षिण पश्चिम, पश्चिम में रोमकपत्तन (मोरक्को के पश्चिम समुद्र तट पर), विपरीत में सिद्धपुर।
उज्जैन या लंका से ६-६ अंशके अन्तर पर ६० कालक्षेत्र थे जो सूर्य क्षेत्र, लंका या मेरु कहे जाते हैं। लंका का समय पृथ्वी का समय था अतः उसके राजा को कुबेर कहते थे (कु = पृथ्वी, बेर = समय) उसी देशान्तर पर उज्जैन में महाकाल हैं। इसके पूर्व पहला कालक्षेत्र पर कालहस्ती है। उसी रेखा पर चिदम्बरम्, केदारनाथ आदि हैं। इससे ठीक १८० अंश पूर्व मेक्सिको का सूर्य पिरामिड है। किष्किन्धाकाण्ड (४०/५४, ६४) के अनुसार पूर्व के अन्त का चिह्न देने के लिये वहां ब्रह्मा ने द्वार बनाया था। उज्जैन से ४२ अंश पूर्व क्योटो (जापान की पुरानी राजधानी), ४२ अंश पश्चिम हेलेस्पौण्ट, ७२ अंश पश्चिम लोर्डेस (फ्रांस पूर्व सीमा), ७८ अंश पश्चिम स्टोनहेन्ज (लंकाशायर) आदि हैं।
✍🏻अरुण उपाध्याय

गरुड़ पुराण पर डॉ श्रीकृष्ण जुगनू जी का दृष्टिकोण - 


एक विश्‍वकोशात्‍मक पुराण का प्रकाशन

भारतीय महापुराणों में गरुडपुराण का स्‍वरूप उसके विश्‍वकोशीय रूप के कारण सबसे ज्‍यादा सम्‍मान के योग्‍य है। पुराणों में अग्निपुराण, वह्निपुराण, नारदपुराण और विष्‍णुधर्मोत्‍तर पुराण ज्ञान-विज्ञान के अध्‍ययन-अनुशीलन के लिहाज से महत्‍वपूर्ण हैं किंतु इस अध्‍ययन की पूर्णता तब तक नहीं हो सकती, जब‍ तक कि गरुडपुराण का अध्‍ययन न हो जाता। इन पुराणों में धार्मिक कहानियों से ज्‍यादा जीवनोपयोगी विषयों का समावेश है।

यों तो प्राचीन पुराणों में विष्‍णुपुराण में आई सूची में 'गरुडपुराण' का नाम भी आता है किंतु उस समय इसका स्‍वरूप क्‍या रहा होगा, कहना कठिन है तथापि 9-10वीं प्रतिहारों, परमारों के काल तक गरुड को राजचिन्‍ह के रूप में स्‍वीकारा जा चुका था, तब तक इस पुराण का वर्तमान संस्‍करण जरूर तैयार हो गया होगा। पुराण के पूर्वार्द्ध में इस काल की घटनाओं के कई संदर्भ खोजे जा सकते हैं किंतु इसमें बहुत सी सामग्री पुरानी है और अन्‍य पुराणों में नहीं मिलती। इसमें मुख्‍य है- रत्‍नशास्‍त्र। 

- बुधगुप्‍त ने जिस रत्‍नपरीक्षा शास्‍त्र का प्रणयन किया, वह इस पुराण में यथारूप उपलब्‍ध है। इसी विषय को बाद में वराहमिहिर आदि अनेक रत्‍नशास्त्रियों ने अपने ढंग से लिखा। 
- 'बार्हस्‍पत्‍य अर्थशास्‍त्र' जिसके बारे में हमें बहुत कम ही जानकारी है, इस पुराण में संक्षिप्‍त रूप से मिलता है।
- पाराशर स्‍मृति और गीता के सार हैं तो याज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति का सारांश भी ज्ञेय है। 
- स्‍मृतियों के सारांश में वह 'विनायक शांति' भी है जिसके करने से तब कन्‍याओं के लिए वर खोजने का मार्ग प्रशस्‍त हो जाता था।
- कुमार व्याकरण का अलभ्य पाठ इसमें बचा हुआ है।
- पुराण का सर्वाधिक महत्‍व इसकी आयुर्वेद विषयक सामग्री है। पुराण का लगभग आधा हिस्‍सा धन्‍वन्‍तरि प्रोक्‍त है और इसमें जीवनचर्या के साथ-साथ आयुर्वेद, औषधियों, कल्‍क, काढ़ा आदि के निर्माण की वे विधियां हैं जिनके लिए हमें अलग से वाग्‍भट्ट, चरक, सुश्रुत आदि  ग्रंथ देखने पड़ते है किंतु पुराण में बहुत उपयोगी रूप में संक्षिप्‍तीकरण किया गया है। गाय, अश्व, हाथी आदि की बीमारियों के उपचार की विधियां भी हैं जैसी कि अग्नि व विष्णु धर्मोत्तर में भी मिलती है।

कहना न होगा कि यह पुराण भारतीय समाज और संस्‍कृति के परिचय के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक महत्‍व का तो है ही आयुर्वेदिक दृष्टि से भी अति महत्‍व का है। उत्‍तरार्ध का प्रेतकल्‍प उसके मूल स्‍वरूप को ही अलग कर देता है। दरअसल इसकी महत्‍ता इस अर्थ में स्‍वीकारी जा सकती है कि यह मृत्‍याेपरांत नहीं, मृत्‍यपूर्व पठनीय ग्रंथ है। यह स्‍वयं सिद्ध करता है कि इस पुराण का स्‍वरूप विश्‍वकोशात्‍मक है और आचारखंड का एक-एक विषय उपयोगी है। हालांकि पुराण के उत्‍तरार्द्ध में प्रेतकल्‍प और ब्रह्मकांड हैं। इस तरह इस पुराण  के विकास के तीन सोपान हैं। इसका परवर्ती स्‍वरूप पांचरात्रादि अनेक ग्रंथों के आधार पर दिखाई देता है मगर, ज्‍यादा क्‍या कहें, पढ़ना ही ठीक होगा। चौखंबा के आदेश पर मैंने तो इसकी विस्‍तार से भूमिका और परिशिष्‍ट में अपनी बात कहने का प्रयास किया है ही।

गरुड : गरुड़ विद्या, गरुड़ास्‍त्र, गरुडव्‍यूह और विष्‍णु-ध्‍वज



भारतीय परम्‍परा में गरुड़ का महत्‍व भगवान् विष्‍णु के वाहन के रूप में है। महाभारत में गरुड की कथाओं काे प्रमुखता से लिखा गया है किंतु गरुड़ का प्रसार विश्‍वव्‍यापी रहा है। भारत में गरुड़तंत्र और गरुडविद्या सहित गरुडास्‍त्र, गरुडव्‍यूह आदि की मान्‍यताओं का प्रसार नया नहीं है। यदि शिव के वाहन नंदी पर नंदिकेश्‍वर, नांदीपुराण रचे गए तो विष्‍ण्‍ाु वाहन गरुड पर भी स्‍वत्रंत पुराण का प्रणयन हुआ। वासुकी पुराण भी मिलता है।

गरुड़ मिथकीय रूप से चलकर एक पात्र और फिर वाहन के रूप में भारतीय आस्‍थाओं के साथ हेलियोडोरस के उस प्रयास के रूप में दिखाई देते हैं जो इस यवनदूत ने विदिशा में किया था। बात पहली सदी ईसापूर्व की है। उसने गरुडध्‍वज का निर्माण करवाया जिसके शीर्ष पर गरुड़ को विराजित किया, ऐसा माना जाता है। दरअसल गरुडध्‍वज विष्‍णु का पर्याय है। पुराणों में वराहध्‍वज स्‍तंभ का विवरण तो है मगर गरुड़ध्‍वज स्‍तंभ का नहीं। गरुड और नाग के वैर के संबंध में कहने की जरूरत नहीं, विष्‍णु शेषनागशायी है। गरुड़ को ऐसे विष्‍णु का सामीप्‍य कैसे मिला। 
यदि गरुडपुराण के तीसर खंड ब्रह्मकांड में शेष के अवतार के प्रसंग को पढ़ें तो यह विदित होता है कि गरुड़ ने शेषशायी विष्‍णु के सान्निध्‍य में रहना स्‍वीकार किया था किंतु पक्षीराज गरुड का कोई अवतार नहीं हुआ, क्‍योंकि ऐसी नारायण की आज्ञा है। गरुड़ के प्रश्‍नों के रूप में पुराण का न केवल प्रणयन हुआ बल्कि एक विश्‍वकोष ही तैयार हो गया जिसमें आख्‍यान और उसका विस्‍तार, व्‍यथा और उसका आयुर्वेदिक उपचार, व्‍याकरण, छंद आदि अध्‍ययन और अध्‍ययन के विषय, राजनीति और बार्हस्‍पत्‍य नीतिसार, स्‍मृति और याज्ञवल्‍क्‍य स्‍मृति का सार, जीविकोपार्जन के लिए रत्‍न व्‍यापार और परीक्षार्थ रत्‍नशास्‍त्र जैसे अनेक उपयोगी विषय इस पुराण में हैं...।

यदि पांचरात्र परंपराओं की मानें तो विष्‍णु मंदिरों पर गरुडांकित पताका फहराने की बहुत लंबी-चौड़ी परंपराएं लिखी गई हैं। नारदीय संहिता, विष्‍णु संहिता, नारद पांचरात्र, प्रश्‍न संहिता, वैखानसागम, परमेश्‍वरसंहिता आदि में आई ऐसी परंपराओं की पुष्टि यामुनाचार्य ने 'आगम प्रामाण्‍य' में भी की है। गारू ड विद्या और उसकी सामाजिक उपयोगिता का जिक्र अबुल फजल ने आईन ए अकबरी में किया है।

इसी तरह गरुड की यात्राओं का वैश्विक परिदृश्‍य समझा जा सकता है क्‍योंकि अनेक सभ्‍यताओं में पक्षीराज कहीं ईगल है तो कहीं गरुड़, श्‍येन, पक्षीराजेंद्र, तार्क्ष, वींद्रा... नामों से स्‍मृत है। सर्वत्र उनकी कथाएं हैं और उनको सौर-संस्‍थापक तत्‍व के रूप में भी स्‍वीकारा गया है, जैसा कि Yelena Kuznetsova ने भी संकेत दिया है-  Eagle, solar foundational element par excellence. Aztec culture. पिछले दिनों गरुड पुराण पर केंद्रित रहा तो बहुत से विचार उपजे। आपके पास भी बहुत से विचार होंगे...। बताइयेगा।
 
गरुड का एक रूप ये भी

वैष्‍णव मंदिरों में गरुड की प्रतिमा स्‍थ‍ापित होती है। विष्‍णु के साथ गरुड का संबंध पुराना है। महाभारत के नारायणीय प्रसंग के साथ ही यह संबंध दिखाई देता है, बाद में जबकि पांचरात्र संहिताओं का प्रणयन हुआ, तो गरुड को विष्‍णु के अनुचर अथवा वाहन के रूप में ख्‍यात किया गया। वैष्‍णव मंदिरों के विकासकाल में यह परंपरा सी बन गई कि विष्‍णु या उनके अवतारों के मंदिरों में अनिवार्यत: गरुड की प्रतिमा सम्‍मुख ही स्‍थापित की जाने लगी। हां, मध्‍यकालीन राम मंदिरों में हनुमान भी विराजित दिखाई देते हैं।

देवता मूर्ति प्रकरणम (रचनाकाल 1450 ई.) में मरकत के वर्ण जैसी कांतिमय, उलूक जैसी नासिका, चार हाथ और गोलाकार नेत्र व मुखाकृति लिए गरुड की प्रतिमा बनाने का निर्देश है। उसको गृध की तरह उरु, जानु व चरण बनाकर दो पंखों से विभूषित करने काे भी कहा गया है। सोने जैसी आभा तथा मोर जैसे नयन बनाना भी स्‍वीकारा गया है। प्रतिमा के एक हाथ में छत्र, दूसरे में कुंभ हों और दो हाथ प्रणाम की मुद्रा में होंगे। (देवता मूर्ति प्रकरणम् : संपादक श्रीकृष्‍ण जुगनू, दिल्‍ली, 2003 ई. अध्‍याय 5, श्‍लोक 64-68)

मित्रवर श्री प्रकाशजी मांजरेकर ने क्षेत्र माहुली सातारा स्थित रामेश्‍वर मंदिर की एक ऐसी प्रतिमा भेजी है, जो इन लक्षणों के अलावा रूप में है। इसमें गरुड स्‍थानक रूप में है, द्विभुजी हैं और करबद्ध रूप में हैं। उनके मुख से नागों को निकलता दिखाया गया है। ये उनके नागपाश हारक रूप का परिचायक है। कोपिनधारी गरुड़ के पांव पक्षी की तरह ही दिखाए गए हैं, उभय पार्श्‍व में नागाकृतियां हैं। अन्‍य वर्णन आपके सोचने के लिए... मगर हमारे इधर गरुड़ की जो प्रतिमाएं हैं, उनसे बिल्‍कुल न्‍यारी और निराली मूर्ति है यह। 

गरुड स्‍तम्‍भ : एक परंपरा 


विष्‍णु को गरुडध्‍वज भी कहा जाता है। भारतीय परंपरा में जिस-जिस देवता का जो-जो वाहन है, उसी से उसके ध्‍वज या चिन्‍ह की पहचान होती है। शिव वृषभध्‍वज है, ब्रह्मा हंसध्‍वज, कामदेव मकरध्‍वज, कार्तिकेय मयूरध्‍वज...। बहुत पहले जबकि पाणि‍नि का काल था, वासुदेव के नाम से ही विष्‍णु वासुदेवकों में उपास्‍य थे। यह श्रीकृष्‍ण के वसुदेव पुत्र होने का नाम था और इनके इसी नाम की उपासना पर जोर था। 

घोसुंडी के शिलालेख में भी यही नाम आया है मगर वहां संकर्षण के बाद में वासुदेव का स्‍मरण है। और, इस मत तथा इसके भागवतीय दर्शन का प्रसार विदेश तक हो चुका था। वहां विष्‍णु को गरुडारूढ के रूप में जाना गया था और उनके अनुयायी भागवतीय कहे जाते थे। जैसा कि हेलियोडोरस के अभिलेख से ज्ञात होता है।

यवनदूत हेलियोडोरस तक्षशिला के विदेशी शासक अंतलिकित का दूत था। उसने लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व में बेसनगर जिला भिलसा, विदिशा में गरुडध्‍वज बनवाकर अपनी आस्‍थाओं का परिचय दिया था। विदेशी वासुदेव के प्रचार क्षेत्रों की यात्रा करना, वहां निर्माण कार्य करवाना और अपनी ओर से स्‍थायी स्‍मृति के रूप में पाषाणबद्ध कार्य करवाना अपना कर्तव्‍य समझने लगे थे, यह परंपरा तब बौद्धों में भी थी। (भारतीय प्रतिमा शास्त्र : परंपरा और प्रवृत्तियां : अनुभूति चौहान)

अभिलेखीय प्रमाणों से विदित होता है कि इस गरुडध्‍वज के बाद वासुदेव, जो विष्‍णु के रूप में ध्‍येय-ज्ञेय हुए, को गरुडवाहन के रूप में इतनी ख्‍याति मिली कि जहां कहीं वैष्‍णव मंदिरों का निर्माण हुआ, उनके साथ गरुड भी विराजित हुए। भागवतों या वासुदेवकों में तब 'जयसंहिता' (मूल महाभारत) के पठन-पाठन की परंपरा थी। उसके उन श्‍लोकों या पदों का प्रचार लिखकर करवाया जाता था जो जीवन में ध्‍येय के रूप में आवश्‍यक थे। 
यथा : त्रीणि अमृत पदानि इह सुअनुष्ठितानि नयन्ति स्‍वर्गं - दम: त्‍याग: अप्रमाद:। (तुलनीय- महाभारत, गीता, धम्‍मपद) यह पंक्ति हेलियाडोर के स्‍तंभ से है।

यद्यपि यह कार्य अशोक के बाद हुआ मगर, इस दृष्टि से मायने रखता है कि इस कार्य को विदेशी लोग भारत में करवाने के इच्‍छुक थे, ग्रीक की कथाओं में तक श्रीकृष्‍ण के आख्‍यान उनके 'जय' नाम से मिलते हैं, यह पर्याय गोपालसहस्रनाम आदि में आया है। जय संहिता से ही श्रीकृष्‍ण के लीला चरितों का पता होता था, यही ग्रंथ गुप्‍तकाल तक भारतीय कथाओं का रूप होकर सामने आया और जैसा कि बाणभट्ट कहता है- उज्‍जैन में इसकी कथा को मंगलसूचक मानकर पढ़ा-पढ़ाया जाने लगा था। आज इतना ही... जय जय।
✍🏻डॉ श्रीकृष्ण जुगनू की पोस्टों से संग्रहित 

#पक्षीराज_गरुण 

वर्तमान दुनिया में सबसे बड़ा व उड़ने वाला पक्षी "केन्डोर" है जो दक्षिण अमेरिका में अवस्थित एंडीज पर्वतमाला की ऊंची व बर्फ़ीली चोटियों पर पाया जाता है ... 

इसकी ऊँचाई लगभग दो मीटर होती है । यह किसी बच्चे या अच्छे खासे जानवर को आसानी से लेकर उड़ सकता है ... 

गरुण को काल्पनिक मानने वाले इस पक्षी को क्या कहेंगे ??  ...


हमारे महाभारत और रामायण में वर्णित पक्षीराज गरुण इससे भी विशाल पक्षी था, ऋग्वेद में भी पक्षीराज गरुण का वर्णन है एक पूरा सूक्त गरुण के लिए समर्पित है .. जिसके साथ परिवर्ती पुराणों में कहानियां जोड़ दी गई और गरुण को मानवीय रूप में चित्रित किया गया ... 

क्योकि सम्भव है कि तब तक यह प्रजाति लुप्त हो चुकी हो .. इसीलिए गरुण को मानवीय व ईश्वरीय रूप देकर हमारी संस्कृति का अंग बना दिया गया  ... 

ऐसा माना जाता है कि गरुण मूल रूप से हिमालय के आस पास ऊंची चोटियों पर पाए जाते थे ... 

भगवान विष्णु की सवारी को गरुड़  के रूप में दिखाया जाता है ...भगवान विष्णु का ये वाहन माना जाता है। जहां भी भगवान विष्णु जाते हैं तो इस विशाल पक्षी पर बैठकर ही यात्रा करते हैं ...  

गरुड़ को विनायक, गरुत्मत्, तार्क्ष्य, वैनतेय, नागान्तक, विष्णुरथ, खगेश्वर, सुपर्ण और पन्नगाशन नाम से भी जाना जाता है ....

गरुड़ हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध धर्म में भी महत्वपूर्ण पक्षी माना गया है ... अर्थात छठी सदी ईसा पूर्व तक कही ना कहीं गरुण पक्षी पाए जाते थे ...

महाभारत में गरूड़ की उत्पत्ति और महान कार्यों का वर्णन है ...  कहा गया है कि घर में गरुण की प्रतिमा या चित्र रखे ...  मंदिर में गरुड़ घंटी और मंदिर के शिखर पर गरुड़ ध्वज होता है। 

गरुण पुराण में, मृत्यु के पहले और बाद की स्थिति के बारे में बताया गया है ... हिन्दू धर्मानुसार जब किसी के घर में किसी की मौत हो जाती है तो गरूड़ पुराण का पाठ रखा जाता है ... 

कुछ विद्वान इसे गरुण पक्षी के विलुप्त होने से उपजे शोक की साहित्यिक अभिव्यक्ति मानते हैं .... 

पक्षीराज गरुण भारत की सांस्कृतिक विरासत और हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग हैं  ..

बड़े- बड़े राजा महाराजा भी अपना प्रतीक चिन्ह गरुड़ ही रखा करते थे ... सर्वप्रथम गुप्तों ने गरुण को राजकीय प्रतीक चिन्ह बनाया ....

गरुड़ इंडोनेशिया, थाईलैंड और मंगोलिया आदि में भी सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में लोकप्रिय है ... इंडोनेशिया का राष्ट्रीय प्रतीक गरुड़ हैं। 

अब शब्दों के अर्थ भी बदल गए और इंसान भी

*कुछ याद है ??*
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जब *Windows मतलब खिड़की था...*

और...

*Applications मतलब कागज पर लिखा आवेदन या अर्जी..*
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जब *Keyboard मतलब पियानो*

और...
..
*Mouse मतलब चूहा ही होता था...*
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जब *File किसी भी कार्यालय की बेहद महत्वपूर्ण चीज होती थी...*
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और...
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*Hard Drive का मतलब राजमार्ग पर किसी वाहन द्वारा कठिन यात्रा होता था...*
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जब *Cut किसी चाकू या धारदार औजार से होता था...*

और ...

*Paste को सुबह की पहली आवश्यकता के रूप में जानते थे या कहीं दीवार पर पोस्टर चिपकाना समझते थे....*
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जब *Web मतलब मकड़ी का जाला होता था...*
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और ...
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*Virus सिर्फ बुखार के समय आता था...*
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जब *Apple और Blackberry सिर्फ फल ही हुआ करते थे.....*
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*उस समय अपने परिवार और दोस्त भाइयों के लिए हमारे पास वक्त ही वक्त होता था...*
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*लेकिन अब शब्दों के अर्थ भी बदल गए और इंसान भी.....*
😊😊

शनिवार, 26 नवंबर 2022

दान और दक्षिणा मे अंतर :-


दान और दक्षिणा मे अंतर :-
अक्सर देखा.गया है कि लोग पूजा करवाने के बाद दक्षिणा देने की बारी आने पर पंडित से बहस और चिक -चिक करने लग जाते है...

लोग तर्क देेने लगते है कि दक्षिणा श्रद्धा से दिया जाता है; 
पंडित को "लोभी हो, लालची हो",इस तरह की कई सारी बाते लोग बोलने लगते है और अनावश्यक ही पंडित को असंतुष्ट कर अपने द्वारा की गई पूजा के पूर्ण फल से वंचित रह जाते है....क्योकि ब्राह्मणों की संतुष्टि महत्वपूर्ण है 
यहाँ एक और बात ब्राह्मणो के लिये भी कहना चाहूंगा कि ब्राह्मणों को संतोषी स्वभाव का होना चाहिये..

अब हम दान और दक्षिणा पर बात करते है..दान श्रद्धानुसार किया जाता है जबकि दक्षिणा शक्ति के अनुसार.

जब हम मन मे किसी के प्रति श्रद्धा या दया के भाव से युक्त होकर बदले मे उस व्यक्ति से कोई सेवा लिये बिना,अपने मन की संतुष्टि के लिये उसे कुछ देते हैं उसे दान कहते है...

जबकि दक्षिणा पंडित को उसके द्वारा पूजा - पाठ करवाने के बाद उसे पारिश्रमिक के तौर पर दिया जाता है,

अर्थात् चूंकि यह पंडित का पारिश्रमिक है अतः उसे पूरा अधिकार है कि वो आपकी दी गई दक्षिणा से संतुष्ट न होने पर और देने की मांग करे,

जैसे आप सब्जी लेते हैं तो आप उसकी कीमत सब्जी वाले के अनुसार चुकाते हैं,बाल कटवाते हैं तो नाई के  द्वारा निर्धारित दर के अनुसार ही पैसे देते हैं..आप बाल कटवाने के बाद ये नही कहते कि इतने पैसे देने की मेरी श्रद्धा नही है,तुम ज्यादा मांग रहे हो, तुम लालची हो...

किसी भी व्यवसाय मे काम की दर पहले से निर्धारित होती है,केवल ब्राह्मण की वृत्ति ही बिना किसी सौदेबाजी के होती है क्योकि पंडित को  हर तरह के(अमीर -गरीब) यजमान मिलते है इसलिये दक्षिणा को शक्ति के अनुसार रखा जाता है..ताकि संतुलन बना रहे और सभी अपने स्तर पर ईश्वर की उपासना का लाभ ले सकें..

क्योकि ईश्वर पर अधिकार गरीब का भी उतना ही है जितना किसी अमीर का है...भगवान की पूजा के लिये किसी की आर्थिक स्तिथि बीच में न आये इसलिये ही दक्षिणा यथाशक्ति देने का विधान है..

इसलिये दक्षिणा शक्ति के अनुसार ही देनी चाहिये क्योकि पंडित को भी इस मंहगाई मे परिवार पालना बहुत ही मुश्किल होता है

मान लीजिये आप लखपति है साल मे कभी एक बार पूजा करवा रहे है और ब्राह्मण को दक्षिणा के नाम पर सौ रूपये पकड़ा रहे है,तो क्या सौ रूपये ही देने लायक शक्ति है क्या आपमे ?

आप ब्राह्मण को तो धोखा दे देंगे लेकिन आप भगवान को धोखा नही दे सकते 
क्योकि भगवान आपको आपके मनोभावों के अनुसार ही आपको पूजा का फल दे देते है ,क्योकि संकल्प ही यथाशक्ति दक्षिणा का करवाया जाता है अर्थात आप अपनी क्षमता से  कम देकर एक तरह का झूठ भगवान के सामने दिखाते है और भगवान आपको तथास्तु कह देते है

इसलिये कोशिश करे कि आपकी दक्षिणा से ब्राह्मण संतुष्ट हो जाये,

हाँ दान ,आप स्वेच्छा सेे करें,
दान के लिये पंडित को अधिकार नही होता कि वो इसे कम-ज्यादा देने कहे

अर्थात दान उसे कहेंगे कि मान लीजिये पंडित आपके घर आये है और आप श्रद्धा से उसे कुछ भेट करे वो दान है 

या आप पंडित से बिना कोई कोई पूजा पाठ करवाये किसी निमित्त उनके यहां पहुचाने जाते है,वो दान है 
तब आज तक आपको किसी पंडित ने नही कहा होगा कि थोड़ा और लाते ||

यदि कोई पंडित इस "दान" पर बोले तो उसे भले लोभी समझे लेकिन दक्षिणा के लिये और मांग करने वाले ब्राह्मन को लालची न कहे न ही समझे.||
  जय श्री राधे कृष्ण ।।राधे राधे ।।

*24 नवंबर 1675 की तारीख गवाह बनी थी, हिन्दू के हिन्दू बने रहने की !!


*24 नवंबर 1675 की तारीख गवाह बनी थी, हिन्दू के हिन्दू बने रहने की !!*
दोपहर का समय और जगह चाँदनी चौक दिल्ली लाल किले के सामने जब मुगलिया हुकूमत की क्रूरता देखने के लिए लोग इकट्ठे हुए पर बिल्कुल शांत बैठे थे !
 लोगो का जमघट !! 
और सबकी सांसे अटकी हुई थी ! शर्त के मुताबिक अगर गुरु तेग बहादुरजी इस्लाम कबूल कर लेते हैं, तो फिर सब हिन्दुओं को मुस्लिम बनना होगा, बिना किसी जोर जबरदस्ती के !
औरंगजेब के लिए भी ये इज्जत का सवाल था 
समस्त हिन्दू समाज की भी सांसे अटकी हुई थी क्या होगा? लेकिन गुरु जी अडिग बैठे रहे। किसी का धर्म खतरे में था धर्म का अस्तित्व खतरे में था तो दूसरी तरफ एक धर्म का सब कुछ दांव पे लगा था ! हाँ या ना पर सब कुछ निर्भर था। खुद चल के आया था औरगजेब, लालकिले से निकल कर सुनहरी मस्जिद के काजी के पास,,,
उसी मस्जिद से कुरान की आयत पढ़ कर यातना देने का फतवा निकलता था ! वो मस्जिद आज भी है !
*गुरुद्वारा शीष गंज, चांदनी चौक, दिल्ली !*  के पास पुरे इस्लाम के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न था ! आखिरकार जब इसलाम कबूलवाने की जिद्द पर इसलाम ना कबूलने का हौसला अडिग रहा तो जल्लाद की तलवार चली  और प्रकाश अपने स्त्रोत में लीन हो गया ।
ये भारत के इतिहास का एक ऐसा मोड़ था जिसने पुरे हिंदुस्तान का भविष्य बदलने से रोक दिया ।  
*हिंदुस्तान में हिन्दुओं के अस्तित्व में रहने का दिन !!*  सिर्फ एक हाँ होती तो यह देश हिन्दुस्तान नहीं होता  !
*गुरु तेग बहादुर जी*  जिन्होंने हिन्द की चादर बनकर तिलक और जनेऊ की रक्षा की  उनका अदम्य साहस  भारतवर्ष कभी  नही भूल सकता । कभी  एकांत में बैठकर सोचिएगा अगर गुरु तेग बहादुर जी अपना बलिदान न देते तो हर मंदिर की जगह एक मस्जिद होती और घंटियों की जगह अज़ान सुनायी दे रही होती।

24 नवम्बर का यह इतिहास सभी को पता होना चाहिए  !
 इतिहास के वो पृष्ठ जो पढ़ाए नहीं गये !
🙏💐🚩🚩🚩🚩 

शुक्रवार, 25 नवंबर 2022

पढिये सबूत के साथ क्या हुआ था उस समय! अछूतों को मन्दिर में न घुसने देने की सच्चाई क्या है?

*हजारों साल से शूद्र दलित मंदिरों मे पूजा करते आ रहे थे पर अचानक 19वी० शताब्दी मे ऐसा क्या हुवा कि दलितों को  मंदिरों मे प्रवेश नकार दिया गया*?

क्या आप सबको इसका सही कारण मालूम है?
या सिर्फ ब्राम्हणों को गाली देकर ही मन को झूठी तसल्ली दे देते हो?

पढिये सबूत के साथ क्या हुआ था उस समय!

अछूतों को मन्दिर में न घुसने देने की सच्चाई क्या है?
ये काम पुजारी करते थे कि मक्कार अंग्रेजो के लूटपाट का षणयंत्र था?

1932 में लोथियन कॉमेटी की रिपोर्ट सौंपते समय डॉ आंबेडकर ने अछूतों को मन्दिर में न घुसने देने का जो उद्धरण पेश किया है वो वही लिस्ट है जो अंग्रेजो ने #कंगाल यानि गरीब लोगों की लिस्ट बनाई थी जो मन्दिर में घुसने देने के लिए अंग्रेजों द्वारा लगाये गए टैक्स को देने में असमर्थ थे!

#षणयंत्र-
मित्रों 1808ई० में ईस्ट इंडिया कंपनी पुरी के जगन्नाथ मंदिर को अपने कब्जे में लेती है और फिर लोगो से कर बसूला जाता है तीर्थ यात्रा के नाम पर!

चार ग्रुप बनाए जाते हैं!
और चौथा ग्रुप जो कंगाल है उनकी एक लिस्ट जारी की जाती है!

1932 ई० में जब डॉ आंबेडकर अछूतों के बारे में लिखते हैं तो वे ईस्ट इंडिया के जगन्नाथ पुरी मंदिर के दस्तावेज की लिस्ट को अछूत बनाकर लिखते हैं!

भगवान जगन्नाथ के मंदिर की यात्रा को यात्रा कर में बदलने से ईस्ट इंडिया कंपनी को बेहद मुनाफ़ा हुआ और यह 1809 से 1840 तक निरंतर चला!

जिससे अरबो रूपये सीधे अंग्रेजो के खजाने में बने और इंग्लैंड पहुंचे!

श्रद्धालु यात्रियों को चार श्रेणियों में विभाजित किया जाता था!

प्रथम श्रेणी = लाल जतरी (उत्तर के धनी यात्री )

द्वितीय श्रेणी = निम्न लाल (दक्षिण के धनी यात्री )

तृतीय श्रेणी = भुरंग ( यात्री जो दो रुपया दे सके )

चतुर्थ श्रेणी = पुंज तीर्थ (कंगाल की श्रेणी जिनके पास दो रूपये भी नही ,तलासी लेने के बाद )

चतुर्थ श्रेणी के नाम इस प्रकार हैं!

1. लोली या कुस्बी!
2. कुलाल या सोनारी!
3.मछुवा!
4.नामसुंदर या चंडाल
5.घोस्की
6.गजुर
7.बागड़ी
8.जोगी 
9.कहार
10. राजबंशी
11.पीरैली
12. चमार
13.डोम
14.पौन 
15.टोर
16.बनमाली
17.हड्डी

प्रथम श्रेणी से 10 रूपये!
द्वितीय श्रेणी से 6 रूपये!
तृतीय श्रेणी से 2 रूपये और चतुर्थ श्रेणी से कुछ नही!

अब जो कंगाल की लिस्ट है जिन्हें हर जगह रोका जाता था और मंदिर में नही घुसने दिया जाता था!

आप यदि उस समय 10 रूपये भर सकते तो आप सबसे अच्छे से ट्रीट किये जाओगे!

डॉ आंबेडकर ने अपनी Lothian Commtee Report में इसी लिस्ट का जिक्र किया है और कहा की कंगाल पिछले 100 साल में कंगाल ही रहे!

पढिये!
"In regard to the depressed classes of Bengal there is an important piece of evidence to which I should like to call attention and which goes to show that the list given in the Bengal Census of 1911 is a correct enumeration of caste which have been traditionally treated as untouchable castes in Bengal. I refer to Section 7 of Regulation IV of 1809 (A regulation for rescinding Regulations IV and V of 1806 ; and for substituting rules in lieu of those enacted in the said regulations for levying duties from the pilgrims resorting to Jagannath, and for the superintendence and management of the affairs of the temple; passed by the Governor-General in Council, on the 28th of April 1809) which gives the following list of castes which were debarred from entering the temple of Jagannath at Puri : (1) Loli or Kashi, (2) Kalal or Sunri, (3) Machhua, (4) Namasudra or Chandal, (5) Ghuski, (6) Gazur, (7) Bagdi, (8) Jogi or Nurbaf, (9) Kahar-Bauri and Dulia, (10) Rajbansi, (II) Pirali, (12) Chamar, (13) Dom, (14) Pan, (15) Tiyar, (16) Bhuinnali, and (17) Hari.

The enumeration agrees with the list of 1911 Census and thus lends support to its correctness. Incidentally it shows that a period of 100 years made no change in the social status of the untouchables of Bengal.

बाद में वही कंगाल हिन्दुओ मे फूट डालने हेतु षणयंत्र के तहत अछूत घोषित किए गए!

*हिन्दुओ के सनातन धर्म में छुआछुत बेसिक रूप से कभी था ही नहीं*।

*यदि ऐसा होता तो सभी हिन्दुओ के श्मशानघाट और चिताए अलग अलग होती!*
*और मंदिर भी जातियों के हिसाब से ही बने होते और हरिद्वार में अस्थि विसर्जन भी जातियों के हिसाब से ही होता*।

ये जातिवाद ईसाई और मुसलमानों में है इन में जातियों और फिरको के हिसाब से अलग अलग चर्च और अलग अलग मस्जिदें और अलग अलग कब्रिस्तान बने हैं!

*हिन्दूऔ में जातिवाद, भाषावाद, प्रान्तवाद, धर्मनिपेक्षवाद, जडंवाद, कुतरकवाद, गुरुवाद, राजनीतिक पार्टीवाद पिछले 1000 वर्षों से मुस्लिम और अग्रेजी शासको ने षणयंत्र से डाला है।*

जिस पर से काग्रेस नाम के राजनीतिक दल ने पिछले 70 वर्षो तक अपनी राजनीति की रोटियां और जूते में दाल खाई!

बाॅलीवुड़ की गंदगी,खत्म किये संस्कार। जालसाज अच्छे लगें, बुरा लगे परिवार


१.बहकों मत ना बेटियों,
कुल को समझों ख़ास।
पैंतीस टुकड़ों में कटा,
श्रद्धा का विश्वास।

2.भरोसा मत ना कीजिए,
सब पर आंखें मींच।
स्वर्ण मृग के भेष में,
आ सकता मारीच।

3.मां बाप के हृदय से,
गर निकलेगी आह।
कभी सफल होगा नहीं,
 ऐसा प्रेम विवाह।

4.आधुनिकता के समर्थकों,
इतना रखना याद।
बिन मर्यादा आचरण,
बिगड़ेगी औलाद

5.जीवन स्वतंत्र आपका,
करिये फैसला आप।
पर ऐसा कुछ न कीजिए,
मुंह छिपाये मां बाप।

6.घर आंगन की गौरैया,
कुल की इज्जत आप
सावधान रहना जरा,
षड्यंत्रों को भांप।

7.बाॅलीवुड़ की गंदगी,खत्म किये संस्कार।
जालसाज अच्छे लगें, बुरा लगे परिवार।
8.जब कभी तन पर चढें,अंधा इश्क खुमार।
इस दरिदंगी को याद तुम,कर लेना इकबार।

9.नारी तुम श्रद्धा रहो,न घर उपयोगी चीज।
 फिर किस की औकात जो,काट रखें तुम्हें फ्रीज।

10.संस्कारों की सराहना,कुकृत्य धिक्कारो आज़।
आने वाली पीढ़ियां, करेंगी तुम पर नाज़।
🎊😥🙏🎊जय जय श्री सीताराम सरकार ॥

बुधवार, 23 नवंबर 2022

कमर दर्द, गठिया और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं तो ठंड में मैथी के लड्डू का करें सेवन, पढ़ें सरल विधि

*कमर दर्द, गठिया और जोड़ों के दर्द से परेशान हैं तो ठंड में मैथी के लड्डू का करें सेवन, पढ़ें सरल विधि* 
 
सामग्री :
500 ग्राम मोटा पिसा गेहूं का आटा, 500 ग्राम मैथी दाना, 100 ग्राम खाने वाला गोंद बारीक किया हुआ, एक किलो गुड़, 250 ग्राम शकर का बूरा (पिसी शकर), 100 ग्राम पिसी छनी बारीक सोंठ, 1 किलो के करीब शुद्ध घी, 100 ग्राम खसखस, 250 ग्राम बारीक कटा मेवा, 10 ग्राम इलायची पावडर।

विधि :

सबसे पहले मैथी दाने को साफ करके दो दिन पानी बदलकर भिगोएं। ताजे पानी से धोकर बारीक पीस लें। मोटे तले की फ्राइंगपेन में एक बड़ा चम्मच घी डालकर धीमी आंच में भूनें। घी की जरूरत लगने पर थोड़ा-थोड़ा डालकर चलाते हुए भूनते रहें। ब्राउन होने और खुशबू आने पर उतार लें। आटे को छानकर घी के साथ अलग से इसी तरह भून लें।

गोंद को घी में फुलाकर हल्का-सा कुचल लें। कम गरम घी में सोंठ और खसखस को डालकर निकाल लें। गुड़ को बारीक करके घी के साथ चलाएं। जब गुड़ घी में अच्छी तरह से मिल जाए तो उतार लें। इसमें तैयार की हुई सारी सामग्री, कटे मेवे, इलायची पावडर मिला दें। आधा बूरा भी मिला दें।
घी कम लगे तो इसमें आवश्यकता नुसार गरम घी मिला लें। अब थोड़ा गरम रहते ही मिश्रण को हथेलियों से रगड़ें और एक साइज के लड्डू बना लें।

सर्दी के दिनों में सुबह नाश्ते में यह लड्डू खाने से कमर दर्द, गठिया तथा जोड़ों का दर्द और वात रोग में लाभ मिलता है तथा स्फूर्ति बनी रहती है। ठंड के दिनों में इन लड्‍डुओं का सेवन करने से आप कई तरह की बीमारियों से बचे रहेंगे।

ऐसे हिन्दू योद्धाओं का संदर्भ हमें हमारे इतिहास में तत्कालीन नेहरू-गाँधी सरकार के शासन काल में कभी नहीं पढ़ाया गया!

*शर्त ये है कि इसको पढ़ कर अपने ग्रुप में फारवर्ड जरूर करें:
 *खोयी हुई, या गायब की हुई इतिहास की एक झलक 

*622 ई से लेकर 634 ई तक मात्र 12 वर्ष में अरब के सभी मूर्तिपूजकों को मुहम्मद ने  तलवार से जबरदस्ती मुसलमान बना दिया! (मक्का में महादेव काबळेश्वर (काबा) को छोड कर!)*

*634 ईस्वी से लेकर 651 तक, यानी मात्र 16 वर्ष में सभी पारसियों को तलवार की नोंक पर जबरदस्ती मुसलमान बना दिया!*

*640 में मिस्र में पहली बार इस्लाम ने पांँव रखे, और देखते ही देखते मात्र 15 वर्ष में, 655 तक इजिप्ट के लगभग सभी लोग जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*

*नार्थ अफ्रीकन देश जैसे अल्जीरिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को आदि देशों को 640 से 711 ई तक पूर्ण रूप से इस्लाम धर्म में जबरदस्ती बदल दिया गया!*

*3 देशों का सम्पूर्ण सुख चैन जबरदस्ती छीन लेने में मुसलमानो ने मात्र 71 वर्ष लगाए!*

*711 ईस्वी में स्पेन पर आक्रमण हुआ, 730 ईस्वी तक स्पेन की 70% आबादी मुसलमान थी!*

*मात्र 19 वर्ष में तुर्क थोड़े से वीर निकले, तुर्कों के विरुद्ध जिहाद 651 ईस्वी में आरंभ हुआ, और 751 ईस्वी तक सारे तुर्क जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*

*इण्डोनेशिया के विरुद्ध जिहाद मात्र 40 वर्ष में पूरा हुआ! सन 1260 में मुसलमानों ने इण्डोनेशिया में मारकाट मचाई, और 1300 ईस्वी तक सारे इण्डोनेशियाई जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*

*फिलिस्तीन, सीरिया, लेबनान, जॉर्डन आदि देशों को 634 से 650 के बीच जबरदस्ती मुसलमान बना दिये गए!*

*सीरिया की कहानी तो और दर्दनाक है! मुसलमानों ने इसाई सैनिकों के आगे अपनी महिलाओ को कर दिया! मुसलमान महिलाये गयीं इसाइयों के पास, कि मुसलमानों से हमारी रक्षा करो! बेचारे मूर्ख इसाइयों ने इन धूर्तो की बातों में आकर उन्हें शरण दे दी! फिर क्या था, सारी "सूर्पनखा" के रूप में आकर, सबने मिलकर रातों रात सभी सैनिकों को हलाल करवा दिया!*

*अब आप भारत की स्थिति देखिये!*

*उसके बाद 700 ईस्वी में भारत के विरुद्ध जिहाद आरंभ हुआ! वह अब तक चल रहा है!*

*जिस समय आक्रमणकारी ईरान तक पहुँचकर अपना बड़ा साम्राज्य स्थापित कर चुके थे, उस समय उनकी हिम्मत नहीं थी कि भारत के राजपूत साम्राज्य की ओर आंँख उठाकर भी देख सकें!*

*636 ईस्वी में खलीफा ने भारत पर पहला हमला बोला! एक भी आक्रान्ता जीवित वापस नहीं जा पाया!*

*कुछ वर्ष तक तो मुस्लिम आक्रान्ताओं की हिम्मत तक नहीं हुई भारत की ओर मुँह करके सोया भी जाए! लेकिन कुछ ही वर्षो में गिद्धों ने अपनी जात दिखा ही दी! दुबारा आक्रमण हुआ! इस समय खलीफा की गद्दी पर उस्मान आ चुका था! उसने हाकिम नाम के सेनापति के साथ विशाल इस्लामी टिड्डिदल भारत भेजा!*

*सेना का पूर्णतः सफाया हो गया, और सेनापति हाकिम बन्दी बना लिया गया! हाकिम को भारतीय राजपूतों ने मार भगाया और बड़ा बुरा हाल करके वापस अरब भेजा, जिससे उनकी सेना की दुर्गति का हाल, उस्मान तक पहुंँच जाए!*

*यह सिलसिला लगभग 700 ईस्वी तक चलता रहा! जितने भी मुसलमानों ने भारत की तरफ मुँह किया, राजपूत शासकों ने उनका सिर कन्धे से नीचे उतार दिया!*

*उसके बाद भी भारत के वीर जवानों ने पराजय नही मानी! जब 7 वीं सदी इस्लाम की आरंभ हुई, जिस समय अरब से लेकर अफ्रीका, ईरान, यूरोप, सीरिया, मोरक्को, ट्यूनीशिया, तुर्की यह बड़े बड़े देश जब मुसलमान बन गए, भारत में महाराणा प्रताप के पूर्वज बप्पा रावल का जन्म हो चुका था!*

*वे अद्भुत योद्धा थे, इस्लाम के पञ्जे में जकड़ कर अफगानिस्तान तक से मुसलमानों को उस वीर ने मार भगाया! केवल यही नहीं, वह लड़ते लड़ते खलीफा की गद्दी तक जा पहुंँचे! जहाँ स्वयं खलीफा को अपनी प्राणों की भिक्षा माँगनी पड़ी!*

*उसके बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं! नागभट्ट प्रतिहार द्वितीय जैसे योद्धा भारत को मिले! जिन्होंने अपने पूरे जीवन में राजपूती धर्म का पालन करते हुए, पूरे भारत की न केवल रक्षा की, बल्कि हमारी शक्ति का डङ्का विश्व में बजाए रखा!*

*पहले बप्पा रावल ने पुरवार किया था, कि अरब अपराजित नहीं है! लेकिन 836 ई के समय भारत में वह हुआ, कि जिससे विश्वविजेता मुसलमान थर्रा गए!*

*सम्राट मिहिरभोज प्रतिहार ने मुसलमानों को केवल 5 गुफाओं तक सीमित कर दिया! यह वही समय था, जिस समय मुसलमान किसी युद्ध में केवल विजय हासिल करते थे, और वहाँ की प्रजा को मुसलमान बना देते!*

*भारत वीर राजपूत मिहिरभोज ने इन आक्रांताओ को अरब तक थर्रा दिया!*

*पृथ्वीराज चौहान तक इस्लाम के उत्कर्ष के 400 वर्ष बाद तक राजपूतों ने इस्लाम नाम की बीमारी भारत को नहीं लगने दी! उस युद्ध काल में भी भारत की अर्थव्यवस्था अपने उत्कृष्ट स्थान पर थी! उसके बाद मुसलमान विजयी भी हुए, लेकिन राजपूतों ने सत्ता गंवाकर भी पराजय नही मानी, एक दिन भी वे चैन से नहीं बैठे!*

*अन्तिम वीर दुर्गादास जी राठौड़ ने दिल्ली को झुकाकर, जोधपुर का किला मुगलों के हाथो ने निकाल कर हिन्दू धर्म की गरिमा, को चार चाँद लगा दिए!*

*किसी भी देश को मुसलमान बनाने में मुसलमानों ने 20 वर्ष नहीं लिए, और भारत में 800 वर्ष राज करने के बाद भी मेवाड़ के शेर महाराणा राजसिंह ने अपने घोड़े पर भी इस्लाम की मुहर नहीं लगने दी!*

*महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौड़, मिहिरभोज, रानी दुर्गावती, अपनी मातृभूमि के लिए जान पर खेल गए!*

*एक समय ऐसा आ गया था, लड़ते लड़ते राजपूत केवल 2% पर आकर ठहर गए! एक बार पूरा विश्व देखें, और आज अपना वर्तमान देखें! जिन मुसलमानों ने 20 वर्ष में विश्व की आधी जनसंख्या को मुसलमान बना दिया, वह भारत में केवल पाकिस्तान बाङ्ग्लादेश तक सिमट कर ही क्यों रह गए?*

*राजा भोज, विक्रमादित्य, नागभट्ट प्रथम और नागभट्ट द्वितीय, चन्द्रगुप्त मौर्य, बिन्दुसार, समुद्रगुप्त, स्कन्द गुप्त, छत्रसाल बुन्देला, आल्हा उदल, राजा भाटी, भूपत भाटी, चाचादेव भाटी, सिद्ध श्री देवराज भाटी, कानड़ देव चौहान, वीरमदेव चौहान, हठी हम्मीर देव चौहान, विग्रह राज चौहान, मालदेव सिंह राठौड़, विजय राव लाँझा भाटी, भोजदेव भाटी, चूहड़ विजयराव भाटी, बलराज भाटी, घड़सी, रतनसिंह, राणा हमीर सिंह और अमर सिंह, अमर सिंह राठौड़, दुर्गादास राठौड़, जसवन्त सिंह राठौड़, मिर्जा राजा जयसिंह, राजा जयचंद, भीमदेव सोलङ्की, सिद्ध श्री राजा जय सिंह सोलङ्की, पुलकेशिन द्वितीय सोलङ्की, रानी दुर्गावती, रानी कर्णावती, राजकुमारी रतनबाई, रानी रुद्रा देवी, हाड़ी रानी, रानी पद्मावती, जैसी अनेको रानियों ने लड़ते-लड़ते अपने राज्य की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर कर दिए!*
*अन्य योद्धा तोगा जी वीरवर कल्लाजी जयमल जी जेता कुपा, गोरा बादल राणा रतन सिंह, पजबन राय जी कच्छावा, मोहन सिंह मँढाड़, राजा पोरस, हर्षवर्धन बेस, सुहेलदेव बेस, राव शेखाजी, राव चन्द्रसेन जी दोड़, राव चन्द्र सिंह जी राठौड़, कृष्ण कुमार सोलङ्की, ललितादित्य मुक्तापीड़, जनरल जोरावर सिंह कालुवारिया, धीर सिंह पुण्डीर, बल्लू जी चम्पावत, भीष्म रावत चुण्डा जी, रामसाह सिंह तोमर और उनका वंश, झाला राजा मान, महाराजा अनङ्गपाल सिंह तोमर, स्वतंत्रता सेनानी राव बख्तावर सिंह, अमझेरा वजीर सिंह पठानिया, राव राजा राम बक्श सिंह, व्हाट ठाकुर कुशाल सिंह, ठाकुर रोशन सिंह, ठाकुर महावीर सिंह, राव बेनी माधव सिंह, डूङ्गजी, भुरजी, बलजी, जवाहर जी, छत्रपति शिवाजी!*

*ऐसे हिन्दू योद्धाओं का संदर्भ हमें हमारे इतिहास में तत्कालीन नेहरू-गाँधी सरकार के शासन काल में कभी नहीं पढ़ाया गया! पढ़ाया ये गया, कि अकबर महान बादशाह था! फिर हुमायूँ, बाबर, औरङ्गजेब, ताजमहल, कुतुब मीनार, चारमीनार आदि के बारे में ही पढ़ाया गया!*

*अगर हिन्दू सङ्गठित नहीं रहते, तो आज ये देश भी पूरी तरह सीरिया और अन्य देशों की तरह पूर्णतया मुस्लिम देश बन चुका होता!*

*ये सुंदर विश्लेषण जानकारी हिंदू समाज तक पहुंचना अनिवार्य है! हर वर्ग और समाज में वीरों की गाथाओं को बताकर उन्हें गर्व की अनुभूति करानी चाहिए!*
  

*कम से कम पांच ग्रुप मैं जरूर भेजे*
*कुछ लोग नही भेजेंगे*
*लेकिन मुझे भरोसा है,  आप जरूर भेजेंगे*🕉️🔱🚩

रविवार, 20 नवंबर 2022

जिनकी शादी कॉन्ट्रैक्ट भर है, वो कॉन्ट्रैक्ट टूटने की खुशियाँ मनाएं। इसे “विवाह-विच्छेद” का उत्सव क्यों बनाना? शादी टूटने का, मैरिज टूटने, तलाक का डाइवोर्स का बनाओ उत्सव

ये पहले ही तय है कि हिन्दुओं के महाकाव्यों के लक्षण क्या होंगे | उसमें चारों पुरुषार्थों का जिक्र होना चाहिए | सिर्फ धर्म की बात नहीं होगी, सिर्फ़ मोक्ष का जिक्र नहीं होगा | वहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों होंगे | इसलिए जब आप रामायण या महाभारत पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं और सिर्फ़ आह-वाह करके भावविभोर हो रहे हैं तो आपने आधा ही पढ़ा है | ये भी एक वजह है कि आपको ऐसे ग्रन्थ बार बार पढ़ने पड़ते हैं | अगर आप महाभारत का आखरी हिस्सा यानि स्वर्गारोहण वाला हिस्सा देखेंगे तो धर्म-मोक्ष से अलग एक ऐसा ही सवाल आपके मन में उठेगा |

यहाँ जब पांचो पांडव और द्रौपदी हस्तिनापुर छोड़कर निकलते हैं तो एक रेगिस्तान जैसे इलाके में से गुजर रहे होते हैं | यहाँ ना कोई पेड़ पौधा है ना कोई जीव जन्तु | एक एक कर के सभी गिरने लगते हैं और अकेले युधिष्ठिर ही आगे एक कुत्ते के साथ बढ़ते रह जाते हैं | सबसे पहले द्रौपदी गिरती है | उसके गिरने पर भी जब सभी आगे बढ़ते रहते हैं तो भीम पूछते हैं कि द्रौपदी क्यों गिरी ? युधिष्ठिर बताते हैं कि द्रौपदी पाँचों भाइयों में अर्जुन से ज्यादा प्रेम करती थी, बाकी सब से कम | इसलिए वो सबसे पहले गिरी |

द्रौपदी गिरी थी, मृत नहीं थी | युधिष्ठिर का जवाब उसने भी सुना होगा | सवाल है कि ये सुनने के बाद द्रौपदी ने क्या सोचा होगा ?

स्वयंवर में उसकी शर्तों को सिर्फ अर्जुन ने पूरा किया था | ऐसे में उसके मन में केवल अर्जुन के लिए ही भाव जागे थे तो गलत क्या था ? आगे जब स्वयंवर के बाद का महाभारत भी देखते हैं तो एक और चीज़ पर ध्यान जाएगा | एक प्रेमिका, एक पत्नी की तरह द्रौपदी को सिर्फ भीम स्थान देते हैं | कभी उसके पसंद के फूल लाने गए भीम राक्षसों और मुश्किलों का सामना कर के फूल लाते हैं | कभी जुए में द्रौपदी को दाँव पर लगाने वाले युधिष्ठिर पर चढ़ बैठते हैं | युधिष्ठिर को कह देते हैं कि ये पासे फेंकने वाले तुम्हारे हाथ जल क्यों नहीं जाते ? बड़ी मुश्किल से अर्जुन पकड़ कर सभा में, भीम को रोकते हैं |

महाभारत में द्रौपदी की स्थिति को पांच पतियों वाली विधवा जैसा दर्शाया गया है | पांच पतियों के होते हुए भी जुए वाली सभा में उसे बचाने उसके पति नहीं आये थे | सिर्फ भीम लड़ने को तैयार थे, जिन्हें बाकी भाइयों ने रोका | आगे वनवास में द्रौपदी पर नजर जमाये जयद्रथ को भी भीम का सामना करना पड़ता है | अज्ञातवास के दौरान जब कीचक की कुदृष्टि द्रौपदी पर थी तब भी उसे भीम ने ही मारा | कैसे देखें इसे, एकतरफा प्रेम जैसा ?

प्रश्न है कि प्रेम या विवाह किया कैसे जाना चाहिए ? जिसे आप पसंद करते हैं उस से, या जो आपको पसंद करता है उस से ? जैसे द्रौपदी को अर्जुन पसंद था वैसे, जैसे भीम को द्रौपदी पसंद थी वैसे, या फिर जैसे अर्जुन ने किया था ? उसने सुभद्रा से शादी की थी, जो उसका हरण कर के ले गई थी | अर्जुन ने उलूपी से शादी की थी वो भी अर्जुन का हरण कर के ले गई थी | अर्जुन ने चित्रांगदा से भी शादी की थी, जिसने उसे अपने घर में ही रख लिया था | संबंधों के मामले में अर्जुन शायद द्रौपदी से ज्यादा सुखी रहा |

हिन्दुओं के महाकाव्यों में प्रश्न अपने आप आते हैं | उत्तर आपको खुद भी पता है, किसी और से सुनने की जरूरत भी नहीं | ज्यादातर बार उत्तर, प्रश्न से पहले ही बता दिए गए होते हैं | बिलकुल आपके स्कूल की किताबों जैसा है | पहले चैप्टर ख़त्म होता है, फिर अंत में एक्सरसाइज और क्वेश्चन होते हैं | प्रश्नों के उत्तर पीछे के अध्याय में ही कहीं हैं, आपको पीछे जाकर ढूंढना होता है |

बाकी ये सूचना क्रांति का युग है | आपकी जानकारी जितनी ज्यादा है आप उतने ज्यादा शक्तिशाली होते हैं | ऐसे में अगर आपका विरोधी आपको किसी किताब की बुराई गिना रहा हो तो याद रखिये कि उसमें ऐसी कोई ना कोई जानकारी है जो आपको विरोधी से ज्यादा जानकार, ज्यादा शक्तिशाली बनाती होगी | आह-वाह करने के बदले ग्रन्थ उठा कर पढ़ लीजिये |

ये कथा है ऋषि शमीक की, जो कहीं से अपने आश्रम की ओर लौटते हुए कुरुक्षेत्र के मार्ग से अपने आश्रम की ओर लौट रहे थे। ये तब की घटना थी जब महाभारत का युद्ध बीते कुछ ही समय हुआ था। ऋषि को वहीँ कहीं से पक्षियों के चहकने की ध्वनि सुनाई दी। उन्होंने इधर उधर देखा, क्योंकि आस पास कोई पेड़ या ऐसा कुछ नहीं था जिसपर घोंसला होने और छोटे पक्षियों के होने की संभावना होती। सामने एक हाथी के गले में टांगने वाला बड़ा सा घंटा धरती में धंसा सा पड़ा था। ऋषि शमीक ने उसे उखाड़ा तो पाया कि उसके अन्दर चार छोटे-छोटे पक्षी के बच्चे हैं और वही चहचहा रहे थे!

वो घंटे के अन्दर कैसे पहुंचे? महाभारत के युद्ध में अर्जुन जब भगदत्त से लड़ रहे थे उसी वक्त एक चिड़िया उधर से उड़कर जा रही थी। अर्जुन का एक बाण चिड़िया का पेट चीरता हुआ निकल गया। चिड़िया तो मारी गयी किन्तु उसके अंडे जमीन पर आ गिरे। हाथियों-रथों से अंडे कुचले जाते, मगर भाग्य से एक हाथी का घंटा किसी प्रहार से टूटा और जब वो गिरा तो अण्डों को ढकता हुआ भूमि में थोड़ा धंस गया। धातु धूप से गर्म होती तो अण्डों को भी गर्मी मिल जाती, इस तरह अंडे फूटे और उसमें से चिड़िया के बच्चे निकल आये थे! ऋषि पक्षी शावकों को साथ ले गए और अपने शिष्यों से उनकी देखभाल करने कहा क्योंकि उनका मानना था कि संसार में दैव का ऐसा अनुकूल होना भी पूर्व जन्म के पुण्यों का फल होगा।

इन पक्षियों के पूर्व जन्म की कथा भी उतनी ही विचित्र है। ये किसी तपस्वी की संतान थे जिनकी परीक्षा लेने इंद्र एक वृद्ध पक्षी का रूप धारण करके आये। उन्होंने तपस्वी से कहा कि उन्हें भूख लगी है। जब तपस्वी ने उन्हें भोजन देना स्वीकार लिया, तब पक्षी ने कहा कि उसे तो मानव मांस प्रिय है! अब तपस्वी ने अपने चारों पुत्रों को बुलाकर अपने मांस से पक्षी को तृप्त करने कहा। जब चारों ऐसे कठिन कार्य के लिए तैयार नहीं हुए तो तपस्वी ने अपने पुत्रों को अगले जन्म में पक्षी होने का शाप दिया और स्वयं अपना मांस देने प्रस्तुत हुआ। तपस्वी के वो चारों पुत्र ही ये पक्षी थे! थोड़े बड़े होते ही पक्षी मनुष्यों की भांति बात करने लगे फिर ऋषि शमीक से आज्ञा लेकर विन्ध्यगिरी पर्वत पर निवास करने चले गए।

ये वो कथा है जिससे मार्कंडेय पुराण की करीब-करीब शुरुआत होती है। करीब-करीब शुरुआत इसलिए क्योंकि इन पक्षियों की कथा मार्कंडेय जी महर्षि जैमिनी को सुना रहे होते हैं। महाभारत से सम्बंधित प्रश्नों के उत्तर लेने के लिए मार्कंडेय जी ने महर्षि जैमिनी को इन्हीं पक्षियों के पास भेजा था। मार्कंडेय पुराण की बात क्यों? ऐसा सोच सकते हैं कि शायद दुर्गा पूजा नजदीक ही है। उस दौरान जिस दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है, वो मार्कंडेय पुराण का हिस्सा है, शायद इसलिए। ये पूरा सच नहीं होगा। ये पुराण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऋतध्वज और उनकी पत्नी मदालसा का आख्यान आता है। मदालसा ने अपने चौथे पुत्र अलर्क को राजनीति, धर्म और अध्यात्म का जो उपदेश दिया था वो अलर्कोपख्यान के नाम से प्रसिद्ध है।

जो पहली लोरी थी, वो भी संभवतः संस्कृत की ही रही होगी। मदालसा का ये भाग “स्त्री को देवी मत बनाओ”, “स्त्री को स्त्री ही रहने दो”, वाले तथाकथित नैरेटिव को भी तोड़ देता है। सामान्य स्थिति में वो कैसे गुरु भी होती है, या कहिये कि पहली गुरु स्त्री ही होगी, इस हिन्दू सत्य को स्थापित करने में ये काम आ सकता है। दुर्गा सप्तशती मार्कंडेय पुराण के सावर्णिक मन्वंतर की कथा के अंतर्गत आती है। यानि मन्वंतरों और 14 मनुओं की बात इस पुराण में होगी, इतना तो समझ में आता है। जब दूसरे मनु औत्तम की बात हो रही होती है तब ये बात होती है पत्नी-त्याग अपराध है। जिस प्रकार पत्नी अपने पति का त्याग नहीं कर सकती उसी प्रकार पति भी पत्नी का त्याग नहीं कर सकता।

आज एक “विवाह-विच्छेद” के आयोजन के पोस्टर पर हंगामा रहा। शुरू में कुछ लोग समर्थन में दिखे, उसके बाद कुछ लोगों ने कहा कि जिनकी शादी कॉन्ट्रैक्ट भर है, वो कॉन्ट्रैक्ट टूटने की खुशियाँ मनाएं। इसे “विवाह-विच्छेद” का उत्सव क्यों बनाना? शादी टूटने का, मैरिज टूटने, तलाक का डाइवोर्स का बनाओ उत्सव। फिर पता चला आयोजक समुदाय विशेष के हैं। अब हो सकता है कि कुछ लोग सवाल करें। कोई धूप में बाल पकाए बैठे कूढ़मगज चीर-युवा जबरन सवाल करे, या कुछ सचमुच के युवा अपनी जिज्ञासा में पूछें कि बताओ कहाँ लिखा है कि हिन्दुओं को पति का या पत्नी का त्याग नहीं करना चाहिए? ऐसी स्थितियों के लिए याद रखियेगा।

जैसे मार्कंडेय पुराण में सावर्णि नाम के मनु की कथा में दुर्गा सप्तशती आती है, वैसे ही औत्तम नाम के मनु की कथा में पति-पत्नी के त्याग को अपराध बताया गया है।
✍🏻आनन्द कुमार जी की पोस्टों से संग्रहित

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