🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂 गोपाष्टमी के आगमन की बधाई- कार्तिक शुक्लपक्ष-७/८- दिनांक- ११-११-२१ 🐂🐂🐂
🐂अपनी पांच वर्ष की छोटी सी आयु में श्रीकॄष्ण ने माता यशोदा और नंदबावा से ह्ठ करके आज्ञा ली कि अब वे अपने ओर सखा ग्वाल बालो के साथ गाय चराने के लिये वन में जाय! कार्तिक शुक्ल- सप्तमि/ अष्टमी के शुभ दिन बहोत आनंद और मंगलगान सहित सारी तैयारीयां के साथ आपने गायों को आगे करके-ग्वाल बालों ओर दाउभैया को संग ले के गाय चराने जाने का प्रारंभ किया
प्रथम गोचारन चले कन्हाई!
🍁 एक व्रजवासी ग्वाला के परिधान में, फेंट में शींग रखे हुये, केश में मयुर पिच्छ धारण किये, ओर भी अधिक सुंदर दिखते थे...सबका मन हरण करते, मधुरी सी मुरली बजाते, अपने नयनो कों इधर उधर नचाते, उछलते कुदते, अपने सखाके कंधे पर अपना हस्त धरके, चित्तहरनी मुस्कान के साथ जब वे व्रजतें वनमें पधारते हते तब सब व्रजवासीयां अपना सब काम जैसे के तैसे छोडके मारग में आकर खडे हो जाते थे...सबको अपनी चंचल चितवन से तनिक आनंदित करते, गायो को हंकारते हुये खेल खेल में ही वन में प्रवेश कर जाते. पूरा दिन अपने आश्रित गायो को, पशुओ को एक वन में से दुसरे वन में, यमुना किनारे, गिरि गोवर्धन पर, तरहटी में ले जाते जहां वे सब कोमल कोमल घास चरते और शीतल मीठा जल पीते.
🐂 शाम को जब घर आने का समय होता तब आप कदंब वृक्ष पर चढ कर सारी गौए को जो तृण के लोभवश श्रीकृष्ण से बहोत दूर चली गई है उनको प्रीति से उनके नाम कभी मुरली में ले कर तो कभी आवाज दे दे कर बुलाते...अरी धोरी, धुमर, कारी, काजर, गांग, पीहर!
🐂 क्वचित आह्वयति प्रीत्या गो गोपाल मनोज्ञया!
🐂 जब श्रीकृष्ण के मुखसे प्रीतिपूर्वक पुकारा हुआ अपना नाम सुनती तब वे सारी की सारी बहोत वेग से, अपना पूंछ उंचा करके मानों दो ही पग हो ऐसे कुदती हुई आ जाती और श्रीकृष्ण के सन्मुख खडी हो कर ऐसे देखती मानों उनका स्वरूपामृत अपने नेत्र रूपी दोनों से भर भरकर पी रही हो! सबके सबकी दृष्टि केवल श्रीकृष्ण के मुखारविंद पर ही गडी रहती!
🐂 बाद में जब उनको बहोत प्रेम से, पुचकारते हुये श्रीकृष्ण व्रज की और ले चलते तबकी शोभा का वर्णन आवनी के बहोत सारे पदो में अष्टछाप आदि भक्त कवियों नें किया है.
🐂आगे गाय, पाछे गाय, इत गाय, उत गाय...
गोविंदा को गायनमें बसिवो ही भावे...
💧गायन सों व्रज छायो, वैकुंठ बिसरायो,
गायन के हेत कर गिरि लै उठावे....
गायन के संग धावे,
गायन में सचु पावे, गायन की खुर रेणु अंग लपटावे...
🐂 छीतस्वामी गिरिधारि, विठ्ठलेश वपुधारी, ग्वारिया को भेख धरे गायन में आवे...🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂
🐂 चारों ओर से गायों से घिरे हुये, गायों के चलने से उडती रज से मुख ओर केशसों भरे हुये, वन की विचित्र धातु से मंडित श्रीअंग और पुष्प-पिच्छों से अपने को सजाये हुये जब श्रीकृष्ण अपने ग्वालबालो के साथ व्रज में प्रवेश करते थे तब व्रज में बहोत लम्बे काल से उनकी प्रतिक्षा करने वाले भक्तो के नेत्रों का उत्सव हो जाता! सबका सन्मान ग्रहण करते और सबको मान देते हुये आप नंदभवन में पधारते जहां श्री यशोदा जी, रोहिणी जी और व्रजभक्त आपके ओवारना लेते. आरती उतारते.
शाम को आप मैया सों कहते है,
🐂"मैया मैं कैसी गाय चराई?
बुझ देख बलभद्र ददासों कैसी मैं टेर बुलाई! "
🐂और 'मैया मैं कलसों गाय चरावन नहिं जाउंगो. और सब ग्वालबाल मुझे ही कहते है, गाय को घेर के वापस लाने के लिये, और मेरे छोटे छोटे पांव एक वन से दुसरे वन में दौडने से बहोत दुःख रहे है, तु बलदाउं भैया से पूछ जो मैं सच न बोलतो हौं तो!"
और ... जब यशोदाजी आपको कुछ रात्रि के भोजन के लिये मनाती है तो आप बहोत थके हुये से माता को बिनती करते है...
🐂 अब मोहि सोवन देरी माय!
गायन के संग फिरत बनबन मेरे पांय पिराय!
आज सांझ ही तें नींद मेरे नयन पेठी आय,
खुलत नांहिन पलक मेरी खायो कछुअ न जाय।
कर कलेउ प्रात जेहों फेर चरावन गाय,
परमानंद प्रभुकी जननी लेत कंठ लपटाय।
🐂 ऐसी प्रभु की विविध लीलामेंसे गौचारण लीला की माधुरी भी अनोखी है...सबको गाय बनने की मन में तीव्र इच्छा जगाने वाले उस गोपाल को कोटी कोटी दंडवत प्रणाम के साथ फिर से सबको बधाई हो!
🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂🐂
जय श्री कृष्णा, ब्लॉग में आपका स्वागत है यह ब्लॉग मैंने अपनी रूची के अनुसार बनाया है इसमें जो भी सामग्री दी जा रही है कहीं न कहीं से ली गई है। अगर किसी के कॉपी राइट का उल्लघन होता है तो मुझे क्षमा करें। मैं हर इंसान के लिए ज्ञान के प्रसार के बारे में सोच कर इस ब्लॉग को बनाए रख रहा हूँ। धन्यवाद, "साँवरिया " #organic #sanwariya #latest #india www.sanwariya.org/
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