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रविवार, 6 नवंबर 2011

भारत की राजभाषा हिन्दी आज भी तीसरी पंक्ति में खडी है - Sharad Harikisanji Panpaliya

भारत में उच्च शिक्षा के सभी संस्थान, पब्लिक स्कूल पहले ही मिशनरियों के संरक्षण में थे। उन संस्थानों के स्नातक आज भारत सरकार के तन्त्र में उच्च पदों पर आसीन हैं। अतः शिक्षा के संस्थान भी अंग्रेजों की पुरानी नीतियों के अनुसार चलते रहै हैं। उन्हों ने अपना स्वार्थ सुदृढ रखने कि लिये अंग्रेजी भाषा, अंग्रेज़ी मानसिक्ता तथा अंग्रेज़ी सोच का प्रभुत्व बनाये रखा है और भारतीय शिक्षा, भाषा तथा बुद्धिजीवियों को पिछली पंक्ति में ही रख छोडा है। उन्हीं कारणों से भारत की राजभाषा हिन्दी आज भी तीसरी पंक्ति में खडी है। भारत के अधिकाँश युवा अंग्रेजी ना जानने के कारण से उच्च शिक्षा तथा पदों से वँचित हो जाते हैं। अंग्रेज़ी मानसिक्ता वाले देशद्रोही बुद्धिजीवियों की सोच इस प्रकार हैः-

अंग्रेजी शिक्षा प्रगतिशील है। भारतीय विचारधारा दकियानूसी हैं। वैदिक विचारों को नकारना ही बुद्धिमता और प्रगतिशीलता की पहचान है। हिन्दू पद्धति से पढे बुद्धिजीवियों को पाश्चात्य व्यवस्थाओं पर टिप्णी करने का कोई अधिकार नहीं।

भारत में बसने वाले सभी अल्पसंख्यक शान्तिप्रिय और उदार वादी हैं। वह हिन्दूओं के कारण त्रास्तियों का शिकार हो रहै हैं। हिन्दू आर्यों की तरह उग्रवादी और महत्वकाँक्षी हैं जो देश को भगवाकरण के मार्ग पर ले जा रहै हैं। अतः देश को सब से बडा खतरा अब हिन्दू विचारधारा वाले संगठनो से है।
- Sharad Harikisanji Panpaliya
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