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शनिवार, 16 मार्च 2013

अनार के औषधीय प्रयोग

अनार के औषधीय प्रयोग

* रोज एक गिलास अनार का जूस पीजिए। अनार का रस पेट पर जमी चर्बी तथा कमर पर टायर की तरह लटकते मांस को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।
* अपच : यदि आपको देर रात की पार्टी से अपच हो
गया है तो पके अनार का रस चम्मच, आधा चम्मच सेंका हुआ जीरा पीसकर तथा गुड़ मिलाकर दिन में तीन बार लें।
* प्लीहा और यकृत की कमजोरी तथा पेटदर्द अनार खाने से ठीक हो जाते हैं।
* दस्त तथा पेचिश में : 15 ग्राम अनार के सूखे छिलके और दो लौंग लें। दोनों को एक गिलास पानी में उबालें। फिर पानी आधा रह जाए तो दिन में तीन बार लें। इससे दस्त तथा पेचिश में आराम होता है।
* अनार कब्ज दूर करता है, मीठा होने पर पाचन शक्ति बढ़ाता है। इसका शर्बत एसिडिटी को दूर करता है।
* अत्यधिक मासिक स्राव में : अनार के सूखे छिलकों का चूर्ण एक चम्मच फाँकी सुबह-शाम पानी के साथ लेने से रक्त स्राव रुक जाता है।
* मुँह में दुर्गंध : मुँह में दुर्गंध आती हो तो अनार का छिलका उबालकर सुबह-शाम कुल्ला करें। इसके छिलकों को जलाकर मंजन करने से दाँत के रोग दूर होते हैं।
* अनार आपका मूड अच्छा करता है और साथ ही याददाश्त बढ़ाता है। तनाव से भी आपको निजात दिलाता है।

* अनार का रस वृद्धावस्था में सठिया जाने के रोग की संभावना भी घटाता है।
* अनार में लोहा की भरपूर मात्रा होती है, जो रक्त में आयरन की कमी को पूरा करता है।
* अनार के जूस को खाली पेट मे पी सकते है और यह सफेद दाग मे यह फायदा करता है
* उच्च रक्
तचाप को घटाता है, सूजन और जलन में राहत पहुँचाता है, गठिया और वात रोग की संभावना घटाता और जोड़ों में दर्द कम करता है, कैंसर की रोकथाम में सहायक बनता है, शरीर के बुढ़ाने की गति धीमी करता है और महिलाओं में मातृत्व की संभावना और पुरुषों में पुंसत्व बढ़ाता है। अनार को त्वचा के कैंसर, स्तन-कैंसर, प्रोस्टेट ग्रंथि के कैंसर और पेट में अल्सर की संभावना घटाने की दृष्टि से भी विशेष उपयोगी पाया गया है।
* बच्चों की खाँसी, अनार के छिलकों का चूर्ण आधा-आधा छोटा चम्मच शहद के साथ सुबह-शाम चटाने से मिट जाती है।
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हानिकारक
सभी प्रकार के अनार शीत प्रकृति वालों के लिये हानिकारक होता है। मीठा अनार बुखार वालों को खट्टा और फीका अनार सर्द मिजाज वालों के लिए हानिकारक हो सकता है

अनन्त-मूल (कृष्णा सारिवा) औषधीय प्रयोग

अनन्त-मूल (कृष्णा सारिवा) औषधीय प्रयोग
विभिन्न भाषाओं के नाम :
हिंदी कालीसर, कालीदूधी, श्यामलता, सारिवा।
संस्कृत कृष्णसारिवा, कृष्णमूली, कालपेशी, चंदन बंगाली सारिवा कालघंटिका, सुभद्रा श्यामलता।
मराठी मोठीकावड़ी, उपरसरी, कालीकावड़ी,
गुजराती काली उपलसरी, धूरीबेल।
बंगला श्यामलता, दूधी, कलघंटी।
पंजाबी अनन्तमूल।
अंग्रेजी इंडियन सारसापरीला (Indian Sasaprila.P.)
लैटिन इकनोकार्पस फ्रटीसंस (Ichnocarpust Frutescens)


गुण: यह वात पित्त, रक्तविकार, प्यास, अरुचि, उल्टी, बुखारनाशक, शीतल, वीर्यवर्द्धक, कफनाशक, मधुर, धातुवर्द्धक, भारी, स्निग्ध, कड़वी, सुगन्धित, स्तनों के दूध को शुद्ध करने वाला, जलन, मंदाग्नि और सांस-खांसी नाशक है।

विभिन्न रोगों में अनन्तमूल से उपचार:

1 सिर दर्द :-*अनन्तमूल की जड़ को पानी में घिसने से बने लेप को गर्म करके मस्तक पर लगाने से पीड़ा दूर होती है।
*लगभग 6 ग्राम अनन्तमूल को 3 ग्राम चोपचीनी के साथ खाने से सिर का दर्द दूर हो जाता है।"

2 बच्चों का सूखा रोग :-अनन्तमूल की जड़ और बायबिडंग का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिलाकर आधे चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम सेवन कराने से बच्चे का स्वास्थ्य सुधर जाता है।

3 पथरी और पेशाब की रुकावट :-अनन्तमूल की जड़ के 1 चम्मच चूर्ण को 1 कप दूध के साथ 2 से 3 बार पीने से पेशाब की रुकावट दूर होकर पथरी रोग में लाभ मिलता है। मूत्राशय (वह स्थान जहां पेशाब एकत्रित होता है) का दर्द भी दूर होता है।

4 रक्तशुद्धि हेतु (खून साफ करने के लिए) :-100 ग्राम अनन्तमूल का चूर्ण, 50 ग्राम सौंफ और 10 ग्राम दालचीनी मिलाकर चाय की तरह उबालें, फिर इसे छानकर 2-3 बार नियमित रूप से पीने से खून साफ होकर अनेक प्रकार के त्वचा रोग दूर होंगे।

5 मुंह के छाले :-शहद के साथ अनन्तमूल की जड़ का महीन चूर्ण मिलाकर छालों पर लगाएं।

6 घाव :-अनन्तमूल का चूर्ण घाव पर बांधते रहने से वह जल्द ही भर जाता है। घाव पर अनन्तमूल पीसकर लेप करने से लाभ होता है।

7 पीलिया (कामला) :-*1 चम्मच अनन्तमूल का चूर्ण और 5 कालीमिर्च के दाने मिलाकर एक कप पानी में उबालें। पानी आधा रह जाए, तब छानकर इसकी एक मात्रा नियमित रूप से एक हफ्ते तक सुबह खाली पेट पिलाने से रोग दूर हो जाएगा।
*अनन्तमूल की जड़ की छाल 2 ग्राम और 11 कालीमिर्च दोनों को 25 मिलीलीटर पानी के साथ पीसकर 7 दिन पिलाने से आंखों एवं शरीर दोनों का पीलापन दूर हो जाता है तथा कामला रोग से पैदा होने वाली अरुचि और बुखार भी नष्ट हो जाता है।"

8 सर्प के विष में :-चावल उबालने के पश्चात उसके पानी को किसी बर्तन में
निकालकर, अनन्तमूल की जड़ का महीन चूर्ण 1 चम्मच मिलाकर दिन में 2 या 3 बार पिलाने से लाभ होगा।

9 गर्भपात की चिकित्सा :-*जिन स्त्रियों को बार-बार गर्भपात होता हो, उन्हें गर्भस्थापना होते ही नियमित रूप से सुबह-शाम 1-1 चम्मच अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण सेवन करते रहना चाहिए। इससे गर्भपात नहीं होगा और शिशु भी स्वस्थ और सुंदर होगा।
*उपदंश या सूजाक के कारण यदि बार-बार गर्भपात हो जाता हो तो अनन्तमूल का काढ़ा 3 से 6 ग्राम की मात्रा में गर्भ के लक्षण प्रकट होते ही सेवन करना करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। इससे गर्भ नष्ट होने का भय नहीं रहता है। इससे कोई भी आनुवांशिक रोग होने वाले बच्चे पर नहीं होता है। "

10 नेत्र रोग (आंखों की बीमारी) :-*अनन्तमूल की जड़ को बासी पानी में घिसकर नेत्रों में अंजन करने से या इसके पत्तों की राख कपड़े में छानकर शहद के साथ आंखों में लगाने से आंख की फूली कट जाती है।
*अनन्तमूल के ताजे मुलायम पत्तों को तोड़ने से जो दूध निकलता है उसमें शहद मिलाकर आंखों में लगाने से नेत्र रोगों में लाभ होता है।
*अनन्तमूल से बने काढ़े को आंखों में डालने से या काढ़े में शहद मिलाकर लगाने से नेत्र रोगों में लाभ होता है।"

11 दमा :-दमे में अनन्तमूल की 4 ग्राम जड़ और 4 ग्राम अडू़से के पत्ते के चूर्ण को दूध के साथ दोनों समय सेवन करने से सभी श्वास व वातजन्य रोगों में लाभ होता है।

12 लंबे बालों के लिए :-अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 2-2 ग्राम की मात्रा में दिन में 3 बार पानी के साथ सेवन करने से सिर का गंजापन दूर होता है।

13 दंत रोग :-अनन्तमूल के पत्तों को पीसकर दांतों के नीचे दबाने से दांतों के रोग दूर होते हैं।

14 स्तनशोधक :-अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 3 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से स्तनों की शुद्धि होती है। यह दूध को बढ़ा देता है। जिन महिलाओं के बच्चे बीमार और कमजोर हो, उन्हें अनन्तमूल की जड़ का सेवन करना चाहिए।

15 पेट के दर्द में :-अनन्तमूल की जड़ को 2-3 ग्राम की मात्रा में लेकर पानी में घोटकर पीने से पेट दर्द नष्ट होता है।

16 मंदाग्नि (अपच) :-अनन्तमूल का चूर्ण 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से पाचन क्रिया बढ़ती है। इससे पाचनशक्ति बढ़ती है तथा रक्तपित्त दोष का नाश होता है।

17 मूत्रविकार (पेशाब की खराबी) :-अनन्तमूल की छोटी जड़ को केले के पत्ते में लपेटकर आग की भूभल में रख दें। जब पत्ता जल जाये तो जड़ को निकालकर भुने हुए जीरे और शक्कर के साथ पीसकर, गाय का घी मिलाकर सुबह-शाम लेने से मूत्र और वीर्य सम्बंधी विकार दूर होते हैं। बारीक पिसी हुई अनन्तमूल की जड़ के चूर्ण का लेप मूत्रेन्द्रिय पर करने से मूत्रेन्द्रिय की जलन मिटती है।

18 अश्मरी (पथरी) में :-अश्मरी एवं मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट होना) में अनन्तमूल की जड़ का 5 ग्राम चूर्ण गाय के दूध के साथ दिन में सुबह और शाम सेवन करने से लाभ होता है।

19 सन्धिवात (जोड़ों का दर्द) :-अनन्तमूल के चूर्ण को 3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ दिन में 3 बार देने से सन्धिवात में लाभ होता है।

20 रक्तविकार :-*अनन्तमूल 30 ग्राम, जौकुट कर 1 लीटर पानी में पकावें, जब यह आठवां भाग शेष बचे तो इसे छानकर उचित मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से खुजली, दाद, कुष्ठ आदि रक्तविकार दूर होते हैं।
*अनन्तमूल 500 ग्राम जौकुट कर 500 मिलीलीटर खौलते हुए पानी में भिगो दें और 2 घण्टे बाद छान लें। 50 ग्राम की मात्रा में दिन में 4-5 बार पिलाने से रक्तविकार और त्वचा के विकार शीघ्र दूर होते हैं।
*पीपल की छाल और अनन्तमूल इन दोनों को चाय के समान फांट (घोल) बनाकर सेवन करने से दाद-खाज, खुजली, फोड़े-फुन्सी तथा गर्मी के विकारों में लाभ होता है।
*सफेद जीरा 1 चम्मच और अनन्तमूल का चूर्ण 1 चम्मच दोनों का काढ़ा बनाकर पिलाने से खून साफ हो जाता है।
*फोड़े-फुन्सी-गंडमाला और उपदंश सम्बंधी रोग मिटाने के लिए अनन्तमूल की जड़ों का 75 से 100 मिलीलीटर तक काढ़ा दिन में 3 बार पिलाना चाहिए।
*अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 1 ग्राम और बायविडंग का चूर्ण 1 ग्राम दोनों को पीसकर देने से अधिक गम्भीर बच्चे भी नवजीवन पा जाते हैं।"

21 दाह (जलन) :-अनन्तमूल चूर्ण को घी में भूनकर लगभग आधा ग्राम से 1 ग्राम तक चूर्ण, 5 ग्राम शक्कर के साथ कुछ दिन तक सेवन करने से चेचक, टायफायड आदि के बाद की शरीर में होने वाली गर्मी की जलन दूर हो जाती है।

22 ज्वर (बुखार) :-अनन्तमूल की जड़, खस, सोंठ, कुटकी व नागरमोथा सबको बराबर लेकर पकायें, जब यह आठवां हिस्सा शेष बचे तो उतारकर ठंडा कर लें। इस काढे़ को पिलाने से सभी प्रकार के बुखार दूर होते हैं।

23 विषम ज्वर (टायफाइड):-अनंनतमूल की जड़ की छाल का 2 ग्राम चूर्ण सिर्फ चूना और कत्था लगे पाने के बीड़े में रखकर खाने से लाभ होता है।

24 वात-कफ ज्वर :-अनन्तमूल, छोटी पीपल, अंगूर, खिरेंटी और शालिपर्णी (सरिवन) को मिलाकर बना काढ़ा गर्म-गर्म पीने से वात का बुखार दूर हो जाता है।

25 बालों का झड़ना (गंजेपन का रोग) :-2 ग्राम अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण रोजाना खाने से सिर के बाल उग आते हैं और सफेद बाल काले होने लगते हैं।

26 खूनी दस्त :-अनन्तमूल का चूर्ण 1 ग्राम, सोंठ, गोंद या अफीम को थोड़ी-सी मात्रा में लेकर दिन में सुबह और शाम सेवन करने से खूनी दस्त बंद हो जाता है।

27 मूत्र के साथ खून का आना :-अनन्तमूल की जड़ का चूर्ण 50 ग्राम से 100 ग्राम को गिलोय और जीरा के साथ लेने से जलन कम होती है और पेशाब के साथ खून आना बंद होता है।

28 कमजोरी :-अनन्तमूल के चूर्ण के घोल को वायविडंग के साथ 20-30 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन करने से कमजोरी मिट जाती है।

29 प्रदर रोग :-50-100 ग्राम अनन्तमूल के चूर्ण को पानी के साथ प्रतिदिन 2 बार सेवन करने से प्रदर में फायदा होता है।

30 उपदंश (सिफिलिस) में :-उपदंश से पैदा होने वाले रोगों में अनन्तमूल का चूर्ण रोज 2 मिलीग्राम से 12 मिलीग्राम तक खाने से लाभ होता है।

31 पेशाब का रंग काला और हरा होना :-अगर पेशाब का रंग बदलने के साथ-साथ गुर्दे में भी सूजन हो रही हो तो 50 से 100 ग्राम अनन्तमूल का चूर्ण गिलोय और जीरे के साथ देने से लाभ होता है।

32 होठों का फटना :-अनन्तमूल की जड़ को पीसकर होठ पर या शरीर के किसी भी भाग पर जहां पर त्वचा के फटने की वजह से खून निकलता हो इसका लेप करने से लाभ होता है।

33 एड्स :-*अनन्तमूल का फांट 40 से 80 मिलीलीटर या काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर प्रतिदिन में 3 बार पीयें।
*अनन्तमूल को कपूरी, सालसा आदि नामों से जाना जाता है। यह अति उत्तम खून शोधक है। अनन्तमूल के चूर्ण के सेवन से पेशाब की मात्रा दुगुनी या चौगुनी बढ़ती है। पेशाब की अधिक मात्रा होने से शरीर को कोई हानि नहीं होती है। यह जीवनी-शक्ति को बढ़ाता है, शक्ति प्रदान करता है। यह मूत्र विरेचन (मूत्र साफ करने वाला), खून साफ करना, त्वचा को साफ करना, स्तन्यशोध (महिला के स्तन को शुद्ध करना), घाव भरना, शक्ति बढ़ाना, जलन खत्म करना आदि गुणों से युक्त है। इसका चूर्ण 50 मिलीग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह शाम खायें। यह सुजाक जैसे रोगों को दूर करता है।"

34 गठिया रोग :-लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अन्तमूल के रोजाना सेवन से गठिया रोग में उत्पन्न भोजन की अरुचि (भोजन की इच्छा न करना) दूर हो जाता है। गठिया रोग में अनन्त की जड़ को फेंटकर 40 मिलीलीटर रोजाना सुबह-शाम रोगी को सेवन कराने से रोग ठीक होता है।

35 गंडमाला (स्क्रोफुला) :-अनन्तमूल और विडंगभेद को पीसकर पानी में मिलाकर काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाने और गांठों पर लगाने से गंडमाला (गले की गांठे) दूर हो जाती हैं।

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