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मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

जरा याद करो कुर्बानी तिरंगे_के_लिए_दी_जान**तारापुर शहीद दिवस 15 फरवरी*

*जरा याद करो कुर्बानी तिरंगे_के_लिए_दी_जान*

*तारापुर शहीद दिवस 15 फरवरी*
 *प्रति वर्ष की भांति बीते 07 फरवरी से लेकर 14 फरवरी तक #पाश्चात्यकरण संस्कृति की अंधी #मैराथन दौड में सम्मिलित हुए "आभासी पटल के दीवाने" को दूर से देखने का अवसर प्राप्त हुआ । इस दौड में सम्मिलित युवाओं ने एक से बढकर एक ने बेहतरीन प्रदर्शन किया जिनका लाईव चित्रण भी कुछ युवाओं ने सोशियल मीडिया पर किया...बेस्ट प्राईज उस तस्वीर को मिला जिसमे कुछ युवा प्रकृति की ओट में पहाड़ियों के मध्य गुफाओं से दौड़ते नजर आए , उनके पीछे पुलिस थी.... आपाधापी की इस दौड़ में उनके ऊंची एड़ी के सैंडिलों ने साथ नही दिया.... इस सप्तदिवसीय इम्तहान का परिणाम आगामी नौ माह के भीतर आज के पाश्चात्य समाज में देखने को मिलने की उम्मीद है .....फिर भी अगर आप चाहे तो इंटरनेट पर गायनोकोलॉजिस्ट से सम्पर्क साध कर ..... भविष्य की मुसीबतों..... माफ कीजियेगा ..….खेर अपने को क्या, इतने सालों से लिख रहा अगले वर्ष फिर लिख दूंगा....*

*बहराल....14 फरवरी की काली रात को बीते समय बीत चुका है एवं आज 15 फरवरी के सूर्योदय के साथ नई प्रभात हुई... आज जब मैने इतिहास के जीवट पन्नों पर जमी रज को अनाच्छादित कर देखा तो इस दिन यानि 15 फरवरी का अर्थ समझ आया....वैसे इस घटना का जिक्र कम ही होता है आज के दौर में..*

*मित्रों, आज ही के दिन यानि 15 फरवरी को एक खुन की होली खेली गई थी .......आप सोच रहे होगें कि 14 फरवरी के अगले दिन खुन की होली कैसी ? यह क्या मजाक है ? खेर , सीधी बात कहने का प्रयास करता हूँ .....*

  *15 फरवरी 1932 की अपरान्ह में सैकड़ों आज़ादी के दीवाने #मुंगेर ज़िला के #तारापुरथाने पर #तिरंगा लहराने निकल पड़े । उन अमर सेनानियों ने अपने हाथों में राष्ट्रीय तिरंगा और होठों पर #वंदे मातरम्', #भारत माता की जय' , का नारा , अंग्रेज भला यह कब सुनते उन्होने तो उन पर ताबडतोड #गोलिया बरसानी शुरू कर दी रैली में मौजुद भारतीयों ने हँसते-हँसते गोलियाँ अपने सीने पर खाई । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यह सबसे बडे गोलीकांड में से एक था । 50 से अधिक भारतीय वीर सपूतों की शहादत के पश्चात स्थानीय थाना भवन पर तिरंगा लहराया गया । उन अंग्रेजो ने हमारे शहीदों के साथ जो बर्बरता की उसे भी आज आपको जानना होगा, “शहीदों के शवो को वाहनों में लाद कर #सुल्तानगंज की गंगा नदी में बहा दिया गया ।“*

*हे मेरे युवाओं, बहुत प्रसन्न होते हो ना तुम पाश्चात्यकरण की अंधी दौड में सम्मिलित होकर । बीते कल यानि 14 फरवरी को कुछ युवाओं ने दुसरो की देखा देखी करते हुए फेस बुक, वाटस एप्प को इतना भर दिया कि मानो हमारा जन्म 14 फरवरी के लिए ही हुआ हो .... हलाकि इनमें से बहुत से अपनो ने पुलवामा के शहीदों को भी याद किया ....*

 *दोस्तो, मैं यह नही कहता कि हमे दुसरे देश की संस्कृति से प्रेम नही करना चाहिए, दुसरे देश की संस्कृति को इज्जत दो परन्तु अपने राष्ट्र की संस्कृति को कभी भूलना भी तो समझदारी नही । खैर कोई बात नही आओ आज ही से हम अपने भारत राष्ट्र की संस्कृति को अपनाने का संकल्प लेते हुए 15 फरवरी 1932 को शहीद हुए भारतीय वीरो को नमन करे .....*.

*जय हिन्द जय भारत वन्देमातरम*

*✒️आनन्द जोशी, जोधपुर*

माघ पूर्णिमा संत रविदास जी की जयंती पर विशेष

*माघ पूर्णिमा संत रविदास जी की जयंती पर विशेष*

*आज संत रविदास जी महाराज की प्रत्येक नगर व शहर में शोभायात्रा निकलेगी हिन्दू समाज की तरफ से उस यात्रा का स्वागत करें और कल जन्म जयंती पर परिवार में बैठकर मंगल चर्चा के निमित्त इस विषय पर चर्चा करनी चाहिए* 

रविदाजी को पंजाब में रविदास कहा जाता है। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में उन्हें रैदास के नाम से ही जाना जाता है। गुजरात और महाराष्ट्र के लोग 'रोहिदास' और बंगाल के लोग उन्हें ‘रुइदास’ कहते हैं। कई पुरानी पांडुलिपियों में उन्हें रायादास, रेदास, रेमदास और रौदास के नाम से भी जाना गया है। माघ मास की पूर्णिमा को जब रविदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। उनका जन्म माघ माह की पूर्णिमा को हुआ था। इस वर्ष 16 फरवरी 2022 को उनकी जयंती मनाई जाएगी।
 
संत शिरोमणि रविदास जी का जन्म माघ पूर्णिमा को 1376 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के गोबर्धनपुर गांव में हुआ था। रविदासजी चर्मकार कुल से होने के कारण वे जूते बनाते थे। ऐसा करने में उन्हें बहुत खुशी मिलती थी और वे पूरी लगन तथा परिश्रम से अपना कार्य करते थे।

उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जब उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में मुगलों का शासन था चारों ओर अत्याचार, गरीबी, भ्रष्टाचार व अशिक्षा का बोलबाला था। उस समय मुस्लिम शासकों द्वारा प्रयास किया जाता था कि अधिकांश हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया जाए। संत रविदास जी की प्रसिद्धि निरन्तर बढ़ रही थी जिसके चलते उनके लाखों भक्त थे जिनमें हर जाति के लोग शामिल थे। यह सब देखकर एक मुस्लिम 'सदना पीर' उनको मुसलमान बनाने आया था। उसका सोचना था कि यदि रविदास मुसलमान बन जाते हैं तो उनके लाखों भक्त भी मुस्लिम हो जाएंगे। ऐसा सोचकर उन पर हर प्रकार से दबाव बनाया गया,उनको लालच दिखाया गया,उनको डराया व धमकाया भी गया लेकिन संत रविदास तो हिन्दू समाज के संत थे उन्हें किसी मुस्लिम से मतलब नहीं था। उन्होंने साफ साफ मना कर दिया
 
संत रविदासजी बहुत ही दयालु और दानवीर थे। संत रविदास जी ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जातिगत भेदभाव को दूर कर सामाजिक एकता पर बल दिया और हिन्दु संस्कृति के जीवन मूल्यों की नींव रखी। रविदासजी ने सीधे-सीधे लिखा कि 
*'रैदास जन्म के कारने होत न कोई नीच, नर कूं नीच कर डारि है, ओछे करम की नीच'*
 यानी कोई भी व्यक्ति सिर्फ अपने कर्म से नीच होता है। जो व्यक्ति गलत काम करता है वो नीच होता है। कोई भी व्यक्ति जन्म के हिसाब से कभी नीच नहीं होता। संत रविदास ने अपनी कविताओं के लिए जनसाधारण की ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। साथ ही इसमें अवधी, राजस्थानी, खड़ी बोली और रेख्ता शब्दों का भी मिश्रण है। रविदासजी के लगभग चालीस पद सिख धर्म के पवित्र धर्मग्रंथ 'गुरुग्रंथ साहब' में भी सम्मिलित किए गए है।

स्वामी रामानंदाचार्य  हिन्दू समाज के उच्च कोटि के महान संत थे। ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ था। संत रविदास उनके शिष्य थे। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं। स्वयं कबीरदास जी ने  *'संतन में रविदास'* कहकर इन्हें मान्यता दी है। राजस्थान के मेड़ता की बेटी और मेवाड़ की बहुरानी व कृष्णभक्त  मीराबाई उनकी शिष्या थीं। यह भी कहा जाता है कि चित्तौड़ के राणा सांगा की पत्नी झाली रानी उनकी शिष्या बनीं थीं। वहीं चित्तौड़ में संत रविदास की छतरी बनी हुई है। वाराणसी में 1540 ईस्वी में उन्होंने देह छोड़ दी थी।
वाराणसी में संत रविदास का भव्य मंदिर और मठ है। जहां सभी जाति के लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। 
संत रामानंद जी महाराज ने तथाकथित ऊंच-नीच की कुरीति को तिलांजलि देकर संत रविदास जी महाराज को दीक्षा देकर अपना शिष्य बनाया और हिन्दू समाज में ऊंच-नीच की व्याप्त बुराई को दूर करने का उपदेश दिया।
इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए संत रविदास जी महाराज ने भी मेवाड़ घराने की बहुरानी मीराबाई को दीक्षित कर हिन्दू समाज को ऊंच-नीच से ऊपर उठाकर गुणपूजा को प्रतिष्ठित करने का संदेश दिया।
*संत रविदास जी महाराज भक्ति आन्दोलन के दैदीप्यमान नक्षत्र थे। हिन्दू समाज उनका चिरकाल तक ऋणी रहेगा*

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