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रविवार, 14 जनवरी 2024

भारतीय मन हर स्थिति में "राम" को साक्षी बनाने का आदी है।

भारतीय मन हर स्थिति में "राम" को साक्षी बनाने का आदी है।
दुःख में --
"हे राम"

पीड़ा में --
"अरे राम"

लज्जा में --
"हाय राम"

अशुभ में --
"अरे राम राम"

अभिवादन में--
"राम राम"

शपथ में--
"राम दुहाई"

अज्ञानता में --
"राम जाने"

अनिश्चितता में --
"राम भरोसे"

अचूकता के लिए--
 "रामबाण"

सुशासन के लिए--
 "रामराज्य"

मृत्यु के लिए --
"राम नाम सत्य" 

जैसी अभिव्यक्तियां 
पग-पग पर "राम" को 
साथ खड़ा करतीं हैं।
"राम" भी इतने सरल हैं कि...
 हर जगह खड़े हो जाते हैं।
 जिसका कोई नहीं...
 उसके लिए "राम" हैं-
 "निर्बल" के बल "राम"।

🙏 _*जय जय श्री राम*_ 🙏

🚩 *राम काज किये बिना मोहें कहा विश्राम*
🙏🏻🚩 *जय श्रीराम* 🙏🏻🚩

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अंत में हम तो जाते अपने गांव... सबको राम राम राम

#जब_राम_गये_ससुराल

#जब_राम_गये_ससुराल
कहते हैं लंका से लौटने के बाद और राज्याभिषेक के बाद माता सुनयना ने जँवाई बेटा को मिथिला आने का सासू माँ का लाड़ भरा आग्रह भेजा। 

राम भला कैसे इनकार करते। 

लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न को भी ससुराल जाने का चाव पूरा हुआ। 

हनुमान उन दिनों वहीं थे सो उनको भी आने का आग्रह हुआ। 

सुग्रीव, अंगद, नल, नील आदि ने प्रभु से शिकायत की कि ये तो सरासर पक्षपात है। 

मंद मंद मुस्कुराते हुए प्रभु ने सबको  स्वीकृति दे दी। 

वानरों से भलीभांति परिचित डिग्निटी पसंद लक्ष्मण की पेशानियों पर बल पड़ गए कि कहीं संभ्रांत आर्य नागर परंपरा से अनभिज्ञ सरल परंतु उजड्ड वानर ससुराल में भैया के साथ साथ पूरे रघुवंश को हमेशा के लिए हंसी का पात्र न बना दें। 

लक्ष्मण इस बात से भली भांति परिचित थे कि औपनिषदिक जनक परंपरा के गंभीर राजाओं की श्रृंखला के बावजूद  मिथिला वाले किसी की टांग खींचकर मजे लेने से कभी बाज नहीं आते हैं और बुरा मानने पर कवित्तों के माध्यम से सदियों तक ताना देने में समर्थ हैं।  

लेकिन भैया का आदेश टाल भी नहीं सकते थे इसलिए उन्होंने सुग्रीव, हनुमान, अंगद, नल नील आदि को नागर परंपराओं की ट्रेनिंग देना शुरू किया और बाकी वानरों से कहा कि वे ठीक वैसा ही करें जैसा उनके यूथपति करें। 

कैसे प्रणाम करना है,
कैसे प्रणाम का उत्तर देना है, 
कैसे बैठना है, उठना है, 

विशेषतः सामूहिक भोज के राजसी नियम कायदे क्या हैं। 

रास्ते भर ये ट्रेनिंग लेते हुए अयोध्या का यह अद्भुत सार्थ मिथिला पहुँचा। 

सुसंस्कृत कर्मकांडी वासिष्ठ आचार्य, अयोध्या के संभ्रांत श्रेष्ठि, पौरजन, श्रृंगवेरपुर के श्यामल निषाद, सौराष्ट्र से आये ऋक्ष और दक्षिण के वानर

शिव बारात का दृश्य पुनः उपस्थित हो गया। 

मिथिला में जवाईयों व उनके मित्रों, सहयोगियों का हार्दिक स्वागत हुआ। 

खाना पीना, नृत्य संगीत उत्सव के बीच श्रीराम के लौटने के आग्रहों को ठुकराते और मैथिलों के मनुहारों के बीच एक महीना कब बीत गया, पता ही नहीं चला।  

अंततः अनासक्त राजर्षि सीरध्वज को भी भाव भरे भारी मन से लौटने की अनुमति देनी पड़ी। 

विदाई पूर्व संध्या पर भव्य सामूहिक भोज का आयोजन हुआ। 

लक्ष्मण बहुत संतुष्ट थे। 
सबकुछ उनकी ट्रेनिंग व प्लान के हिसाब से ही हुआ व सबकुछ ठीक हुआ। 

संध्या को भोज में सब पंक्तियों में विराजे। 

अपनी अपनी रुचि के अनुसार सामिष निरामिष व्यंजनों की लंबी तालिका थी और विशिष्ट व्यंजन के रूप में था- कटहल  

हनुमान जी को कटहल बहुत भाया विशेषतः अलोने स्वाद की उसकी गुठली। 

हनुमान जी ने कटहल की गुठली निकालने को उंगलियों से दवाब डाला और गुठली हवा में उछल गई। 

हनुमान जी के दिमाग में कौंधा,"हो गई बेइज्जती।" 

और इज्जत बचाने की खातिर वे उस गुठली को पकड़ने उछल पड़े। 

अंगद भी उधर देख रहे थे। 

सीनियर की उछाल को इशारा माना और उन्होंने भी कटहल की गुठली उछाली और उछल पड़े। 

फिर क्या था। 

कटहल की गुठलियां हवा में उछलने लगीं और उनके साथ ही वानर भी। 

धीर गंभीर राम हंस पड़े। 

राम को हंसता देख उत्साहित हनुमान ने दूसरी गुठली उचकायी और फिर उछल पड़े।

फिर क्या था! घमासान धमाचौकड़ी मच गई। 

अयोध्या वाले झेंपे जा रहे थे और मिथिला वाले हंस हंस कर मजे लिए जा रहे थे। 

लक्ष्मण सिर पकड़कर बैठ गए और हनुमान जी ने  पूरी मासूमियत से आकर पूछा, "लक्ष्मण भैया, हम सब ठीक -ठाक कर रहे  है न?" 

इस भोले से प्रश्न को सुनकर रोकते रोकते भी लक्ष्मण की हंसी छूट पड़ी। 

इधर  कभी न देखी गई राम की उन्मुक्त हँसी जारी थी। 
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#मेरे_राम_आ_रहे_हैं!

🚩 *राम काज किये बिना मोहें कहा विश्राम*
🙏🏻🚩 *जय श्रीराम* 🙏🏻🚩

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इस समय ना केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व राममय हो चला है, लोगों की कॉलर ट्यून से लेकर रिंगटोन तक, डीपी से लेकर स्टेटस तक सब राममय हो गए हैं, क्या बच्चे, क्या बड़े, गाँव गाँव, शहर शहर प्रभात फेरियाँ निकल रही हैं, लोगों ने अब नमस्कार, हैलो की बजाय 'जय श्रीराम' बोलना आरंभ कर दिया है।

*अगले सोमवार यानि 22 जनवरी 2024 को ना केवल देश बल्कि संपूर्ण विश्व एक ऐसी अद्भुत घटना का साक्षी बनने जा रहा है जिसके लिये हिन्दुओं ने कई शताब्दी संघर्ष किया, बलिदान दिया, अपना तन मन धन सब न्यौछावर कर दिया, अपने ही देश में अपने ही आराध्य के मंदिर के लिये हिन्दुओं को   क्या क्या दुःख, अपमान नहीं झेलना पड़े।*
इस समय ना केवल भारत बल्कि संपूर्ण विश्व राममय हो चला है, लोगों की कॉलर ट्यून से लेकर रिंगटोन तक, डीपी से लेकर स्टेटस तक सब राममय हो गए हैं, क्या बच्चे, क्या बड़े, गाँव गाँव, शहर शहर प्रभात फेरियाँ निकल रही हैं, लोगों ने अब नमस्कार, हैलो की बजाय 'जय श्रीराम' बोलना आरंभ कर दिया है।

*दुकानों पर भगवा पताकाएँ सज गई हैं, लोगों में 22 जनवरी को लेकर अभूतपूर्व उत्साह है, हर कोई बस प्रभु आगमन के दिन गिन रहा है और स्वयं को इस अद्भुत दिन को,क्षणों को अपने नेत्रों में सदैव के सजाने को आतुर है।*

कोई अयोध्याजी से आई अक्षत पाकर ही भावुक हुआ जा रहा है, स्वयं को भाग्यशाली मान रहा है, कोई गायों का शुद्ध देसी घी लेकर जा रहा है, तो कोई विशालकाय ताला बनाकर भेज रहा है, तो कोई विशालकाय अगरबत्ती बनाकर भेज रहा है, तो कोई अकेला ही हज़ारों किलोमीटर पैदल चल पड़ा है अर्थात् जिससे जो बन पा रहा है वो अपना योगदान देने में लगा है।

*राम मंदिर न्यास ने देश विदेश की अनेक हस्तियों को निमंत्रण दिया है, अधिकांश लोग इस निमंत्रण को पाकर स्वयं को धन्य समझ रहे हैं तो कई ऐसे अभागे भी हैं जिन्होंने इस पुनीत आमंत्रण को ठुकरा दिया है।*

ठुकराने वाले लोग वही हैं जिन्होंने वर्षों तक राम जी के मंदिर निर्माण में अड़ंगे लगाए, रामजी को तम्बू में रखा, राम मंदिर पर कभी निर्णय ना आ पाए इसके लिये सारे हथकंडे अपनाये, रामजी को काल्पनिक बताया, रामसेतु को तोड़ने तक की तैयारी कर ली गई थी, इनका उद्देश्य केवल हिन्दुओं को अपमानित करने, रामजी को सदैव तम्बू में रखने और अपने तथाकथित वोटबैंक को खुश रखने के सिवाय कुछ नहीं था।

*भाजपा एकमात्र ऐसा राजनीतिक दल था जिसके घोषणापत्र में राम मंदिर निर्माण का संकल्प था और ये सभी जानते हैं कि जिसके हाथ में सत्ता की चाभी होती है उसी की तूती बोलती है, इसलिये जब तक सत्ता कांग्रेस जैसी देशद्रोही हिन्दू विरोधी पार्टी के पास रही राम मंदिर का निर्णय कभी नहीं आ पाया परंतु सत्ता नरेंद्र मोदी जैसे व्यक्ति के हाथ में आई तो उनके पहले ही कार्यकाल में राम मंदिर का निर्णय हिन्दुओं के पक्ष में आ गया।*

जब भाजपा ने नारा दिया "मंदिर वहीं बनाएंगे" तब आज का सारा विपक्ष और इनके समर्थक भाजपा और उसके समर्थकों पर तंज कसते थे "मंदिर वहीं बनाएँगे, परंतु तारीख़ नहीं बताएँगे" और ये तंज वो कसते थे जो राम मंदिर का निर्णय कभी ना आने पाए इसके लिये सत्ता का दुरूपयोग करने से कभी पीछे नहीं हटे।

*आज विपक्ष इस राम मंदिर के उद्घाटन को भाजपा का कार्यक्रम बताकर इससे दूरी बना रहा है क्योंकि विपक्ष जानता है कि राम मंदिर निर्माण की इस प्रचंड लहर में वो आगामी लोकसभा चुनावों में तिनके की भांति उड़ जाने वाला है।*

विपक्ष का गठबंधन ठीक से बन भी नहीं पाया था कि उसके नेताओं में इतनी फूट पड़ी कि सारा घड़ा ही फूट गया है, विपक्ष लाचार है, बेबस है, यही लाचारी, यही बेबसी हिन्दुओं ने वर्षों तक झेली है जब सत्ता के मद में डूबी कांग्रेस, गाँधी परिवार ने रामजी को तम्बू में रहने को विवश किया जबकि स्वयं अरबों खरबों की संपत्ति अर्जित करते रहे।

*रामजी को भी सही उत्तराधिकारियों के आने की प्रतीक्षा थी इसलिए उन्होंने भी वनवास की तरह तम्बू निवास को स्वीकार किया और जब केंद्र और राज्य में दोनों ही जगह सही उत्तराधिकारियों के हाथों में सत्ता सौंपी तब स्वयं ही सारे मार्ग सुगम करते चले गए।*

आज योगीजी की जगह उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव होते तब भी इतना वृहद आयोजन होना, संपूर्ण अयोध्या को सजाना, विकास कार्यों का इतनी तीव्रता से होना असंभव था, अखिलेश पूरी तरह से केंद्र को असहयोग करते, बाधाएँ उत्पन्न करते परंतु जब रामजी ने स्वयं आना चाहा तो सब कुछ उनके अनुसार ही होता चला गया।

*ये कार्यक्रम राम मंदिर न्यास की तरफ से आयोजित है, प्रधानमंत्री देश के प्रधान होने के कारण आमंत्रित हैं, मुख्य अतिथि हैं, भूमि पूजन में भी वो सम्मिलित रहे थे। उनके स्वयं के चाहने से ये सब होना असंभव था यदि प्रभु की कृपा उन पर नहीं होती या उन्हें प्रभु ने नहीं चुना होता।*

आज विपक्ष चीख रहा है कि भाजपा इसका श्रेय क्यों ले रही है तो विपक्ष से भी यही प्रश्न है कि आपके पास तो कहीं अधिक अवसर और समय था श्रेय लेने का लेकिन आपने तो प्रभु को तम्बू में रखने का निर्णय लिया हुआ था, तंज भी इसी भाजपा पर कसते थे तो आज इसका श्रेय भी भाजपा क्यों ना ले?

*करोड़ों रुपयों के हज हाउस बनाने वाले, करोड़ों रुपयों की बरसों तक हज सब्सिडी देने वाले, वक़्फ़ बोर्ड को देश की बहुत बड़ी संपत्ति उपहार स्वरुप देनेवाले आज कह रहे हैं कि मंदिर की बजाय वहाँ अस्पताल बनाते तो ज़्यादा सही होता।*

अस्पताल तो देश में हज़ारों लाखों हैं, आयुष्मान भारत योजना में करोड़ों ग़रीब परिवारों का इलाज भी हुआ है, हो रहा है लेकिन राम मंदिर देश और हिंदुत्व की दशा और दिशा बदलने वाला है।

*ना केवल देश भर से बल्कि विदेशों से सदियों तक लोग प्रभु श्रीराम, माता जानकी, लक्ष्मण जी और हनुमान जी के दर्शन करने आएँगे, अयोध्या जी और उसके आसपास के इलाके कितने संपन्न और सुखी हो जायेंगे इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है, ये एक मंदिर जानें कितने लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से रोज़गार देगा, अच्छी जीवनशैली, अच्छी शिक्षा देगा।*

कलयुग में इस भव्य राम मंदिर के उद्घाटन का साक्षी बनना जहाँ हमारे भाग्यशाली होने का प्रतीक है वहीं इस पर विलाप करने वाले कितने अभागे हैं ये भी हम देख पा रहे हैं।

*राम को काल्पनिक बताने वाले उन्हें अप्रासंगिक बनाने वाले अब स्वयं ही अप्रासंगिक हो चले हैं, अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, प्रभु के साथ छल कपट के परिणाम तो भुगतने ही होंगे।*

आखिर होई वही जो राम रचि राखा !!

जय श्रीराम 🙏🏻🌹🚩

*मेरी झोपड़ी के भाग अब खुल जाएँगे, राम आएँगे*

एक रामभक्त, हनुमान भक्त 


🚩 *राम काज किये बिना मोहें कहा विश्राम*
🙏🏻🚩 *जय श्रीराम* 🙏🏻🚩

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पौराणिक काल के 24 चर्चित श्रापो की कहानी 🌳*

*🌳 पौराणिक काल के 24 चर्चित श्रापो की कहानी 🌳*

सनातन पौराणिक ग्रंथो में अनेको अनेक श्रापों का वर्णन मिलता है। हर श्राप के पीछे कोई न कोई कहानी जरूर मिलती है। आज हम आपको 24 ऐसे ही प्रसिद्ध श्राप और उनके पीछे की कथा बताएँगे।

1..युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप : –
महाभारत के शांति पर्व के अनुसार युद्ध समाप्त होने के बाद जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि – आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।

2..ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप: –1
महाभारत के अनुसार एक बार राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। उन्होंने वहां हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।

3..माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप: –
महाभारत के अनुसार माण्डव्य नाम के एक ऋषि थे। राजा ने भूलवश उन्हें चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया।
Pतब ऋषि यमराज के पास पहुंचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 12 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा।
तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 12 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण यमराज ने महात्मा विदुर के रूप में जन्म लिया।

4..नंदी का रावण को श्राप: –
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहां उसने नंदीजी को देखकर उनके स्वरूप की हंसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदीजी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।

5..कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप : –
महाभारत के अनुसार ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियां थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है।

कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे।

6..उर्वशी का अर्जुन को श्राप : –
महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहां उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भांति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।

7..तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप : –
शिवपुराण के अनुसार शंखचूड़ नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है।

8..श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप : –
पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहां शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया।

ये देखकर परीक्षित बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने एक मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक नाग राजा परीक्षित को डंस लेगा, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी।

9..राजा अनरण्य का रावण को श्राप : –
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रघुवंश में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरी मृत्यु का कारण बनेगा। इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया।

10..परशुराम का कर्ण को श्राप : –
महाभारत के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के ही अंशावतार थे। सूर्यपुत्र कर्ण उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम को अपना परिचय एक सूतपुत्र के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए, ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया।

नींद से उठने पर जब परशुराम ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण सूतपुत्र नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे।

11..तपस्विनी का रावण को श्राप: –
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, जो भगवान विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी।

12..गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप : –
महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान श्रीकृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुंचे तो अपने पुत्रों का विनाश देखकर गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार पांडव और कौरव आपसी फूट के कारण नष्ट हुए हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने बंधु-बांधवों का वध करोगे। आज से छत्तीसवें वर्ष तुम अपने बंधु-बांधवों व पुत्रों का नाश हो जाने पर एक साधारण कारण से अनाथ की तरह मारे जाओगे। गांधारी के श्राप के कारण ही भगवान श्रीकृष्ण के परिवार का अंत हुआ।

13..महर्षि वशिष्ठ का वसुओं को श्राप: –
महाभारत के अनुसार भीष्म पितामह पूर्व जन्म में अष्ट वसुओं में से एक थे। एक बार इन अष्ट वसुओं ने ऋषि वशिष्ठ की गाय का बलपूर्वक अपहरण कर लिया। जब ऋषि को इस बात का पता चला तो उन्होंने अष्ट वसुओं को श्राप दिया कि तुम आठों वसुओं को मृत्यु लोक में मानव रूप में जन्म लेना होगा और आठवें वसु को राज, स्त्री आदि सुखों की प्राप्ति नहीं होगी। यही आठवें वसु भीष्म पितामह थे।

14..शूर्पणखा का रावण को श्राप: –
वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।

15..ऋषियों का साम्ब को श्राप : –
महाभारत के मौसल पर्व के अनुसार एक बार महर्षि विश्वामित्र, कण्व आदि ऋषि द्वारका गए। तब उन ऋषियों का परिहास करने के उद्देश्य से सारण आदि वीर कृष्ण पुत्र साम्ब को स्त्री वेष में उनके पास ले गए और पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि श्रीकृष्ण का ये पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा समस्त यादव कुल का नाश हो जाएगा।

16..दक्ष का चंद्रमा को श्राप : –
शिवपुराण के अनुसार प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवाया था। उन सभी पत्नियों में रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय थी। यह बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। ये बात उन्होंने अपने पिता दक्ष को बताई तो वे बहुत क्रोधित हुए और चंद्रमा को सभी के प्रति समान भाव रखने को कहा, लेकिन चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया।

17..माया का रावण को श्राप : –
रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहां रावण ने माया को अपनी बातों में फंसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बंदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया।

इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।

18..शुक्राचार्य का राजा ययाति को श्राप : –
महाभारत के एक प्रसंग के अनुसार राजा ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। देवयानी की शर्मिष्ठा नाम की एक दासी थी। एक बार जब ययाति और देवयानी बगीचे में घूम रहे थे, तब उसे पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता भी राजा ययाति ही हैं, तो वह क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें पूरी बात बता दी। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दे दिया था।

19..ब्राह्मण दंपत्ति का राजा दशरथ को श्राप : –
वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार जब राजा दशरथ शिकार करने वन में गए तो गलती से उन्होंने एक ब्राह्मण पुत्र का वध कर दिया। उस ब्राह्मण पुत्र के माता-पिता अंधे थे। जब उन्हें अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के कारण ही होगी।

20..नंदी का ब्राह्मण कुल को श्राप : –
शिवपुराण के अनुसार एक बार जब सभी ऋषिगण, देवता, प्रजापति, महात्मा आदि प्रयाग में एकत्रित हुए तब वहां दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर का तिरस्कार किया। यह देखकर बहुत से ऋषियों ने भी दक्ष का साथ दिया। तब नंदी ने श्राप दिया कि दुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग को ही सबसे श्रेष्ठ मानेंगे तथा क्रोध, मोह, लोभ से युक्त हो निर्लज्ज ब्राह्मण बने रहेंगे। शूद्रों का यज्ञ करवाने वाले व दरिद्र होंगे।

21..नलकुबेर का रावण को श्राप : –
वाल्मीकि रामायण के अनुसार विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूं। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूं।

लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि आज के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बंट जाएगा।

22..श्रीकृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप : –
महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान श्रीकृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुंच गए। तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया। ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा।

महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ये विद्या नहीं जानता था। इसलिए उसने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी।
यह देख भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया कि तुम तीन हजार वर्ष तक इस पृथ्वी पर भटकते रहोगे और किसी भी जगह, किसी पुरुष के साथ तुम्हारी बातचीत नहीं हो सकेगी। तुम्हारे शरीर से पीब और लहू की गंध निकलेगी। इसलिए तुम मनुष्यों के बीच नहीं रह सकोगे। दुर्गम वन में ही पड़े रहोगे।

23..तुलसी का श्रीगणेश को श्राप :-
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक बार तुलसीदेवी गंगा तट से गुजर रही थीं, उस समय वहां श्रीगणेश तप कर रहे थे। श्रीगणेश को देखकर तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी ने श्रीगणेश से कहा कि आप मेरे स्वामी हो जाइए, लेकिन श्रीगणेश ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोधवश तुलसी ने श्रीगणेश को विवाह करने का श्राप दे दिया और श्रीगणेश ने तुलसी को वृक्ष बनने का।

24..नारद का भगवान विष्णु को श्राप : –
शिवपुराण के अनुसार एक बार देवऋषि नारद एक युवती पर मोहित हो गए। उस कन्या के स्वयंवर में वे भगवान विष्णु के रूप में पहुंचे, लेकिन भगवान की माया से उनका मुंह वानर के समान हो गया। भगवान विष्णु भी स्वयंवर में पहुंचे। उन्हें देखकर उस युवती ने भगवान का वरण कर लिया। यह देखकर नारद मुनि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री के लिए व्याकुल किया है। उसी प्रकार तुम भी स्त्री विरह का दु:ख भोगोगे। भगवान विष्णु ने राम अवतार में नारद मुनि के इस श्राप को पूरा किया।

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