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गुरुवार, 11 जून 2026

🏆 विजय उसी की होती है जो परिस्थितियों से नहीं, अपने भय से जीतता है

🏆 विजय उसी की होती है जो परिस्थितियों से नहीं, अपने भय से जीतता है।

*दुनिया के सारे कौवे काले हैं*
 (लघु~कथा)
*प्राचीन समय की बात है*। चेन्नई से जकार्ता (इंडोनेशिया) जा रहा एक विशाल समुद्री जहाज़ हिंद महासागर के बीचों-बीच भयंकर तूफ़ान में फँस गया।
आकाश काली घटाओं से ढक गया था। समुद्र की विकराल लहरें जहाज़ से टकराकर मानो उसे निगल जाने को आतुर थीं। बिजली की चमक और बादलों की गर्जना ने वातावरण को भयावह बना दिया था।
तभी कप्तान ने एक नाविक को आदेश दिया—
"मस्तूल की चोटी पर चढ़कर पाल को व्यवस्थित करो, नहीं तो जहाज़ दिशा खो देगा।"
नाविक साहस जुटाकर ऊपर चढ़ने लगा। आधी ऊँचाई पर पहुँचते ही उसने गलती से नीचे देख लिया।
नीचे उफनता समुद्र था...
विशाल लहरें थीं...
चारों ओर मृत्यु का भयावह दृश्य था...
उसका सिर चकरा गया। हाथ काँपने लगे। उसे लगा कि वह अभी गिर जाएगा।
उसी क्षण कप्तान की गूँजती आवाज़ आई—
*नाविक... ऊपर देखो! केवल ऊपर*..."
*नाविक ने तुरंत अपनी दृष्टि ऊपर कर ली*।
कुछ ही क्षणों में उसका संतुलन लौट आया। भय कम होने लगा। आत्मविश्वास वापस आ गया। वह मस्तूल की चोटी तक पहुँचा, पाल को ठीक किया और जहाज़ फिर सही दिशा में चल पड़ा।
जीवन भी कुछ ऐसा ही है।
जब परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाएँ...
जब समस्याएँ लहरों की तरह सिर पर टूटने लगें...
जब लोगों का साथ छूटने लगे...
जब भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगे...
और जब मन कहने लगे—
*बस अब बहुत हुआ, छोड़ो सब कुछ*..."
*तो उस समय निर्णय मत लीजिए*।
क्योंकि अधिकांश गलत निर्णय भय की अवस्था में लिए जाते हैं, विवेक की अवस्था में नहीं।

मेरे एक परिचित ने पिछले 35 वर्षों में पाँच व्यवसाय बदले। हर बार उसे लगा कि समस्या व्यवसाय में है। वह नया काम शुरू करता, कुछ कठिनाई आती, और वह फिर दिशा बदल देता।
लेकिन हर बार परिणाम वही रहा।
आज भी वह "सही व्यवसाय" की तलाश में है।
उसे यह समझने में पूरी उम्र लग गई कि समस्या हर जगह नहीं थी, समस्या कठिनाइयों से लड़ने की उसकी क्षमता में थी।

*आखिर दुनिया के सारे कौवे एक जैसे ही काले होते हैं*।
समस्याएँ हर जगह हैं।
रिश्तों में भी...
व्यवसाय में भी...
संगठनों में भी...
समाज में भी...
और स्वयं हमारे भीतर भी...
केवल उनके चेहरे बदलते हैं।
आज परिवार टूट रहे हैं।
संगठन बिखर रहे हैं।
दोस्तियाँ समाप्त हो रही हैं।
लोग शहर बदल रहे हैं, नौकरी बदल रहे हैं, व्यवसाय बदल रहे हैं, यहाँ तक कि रिश्ते भी बदल रहे हैं।
लेकिन अक्सर कुछ समय बाद उन्हें पता चलता है कि जिस समस्या से भागे थे, वह किसी नए रूप में फिर सामने खड़ी है।
*क्योंकि स्थान बदलने से जीवन नहीं बदलता*, *दृष्टिकोण बदलने से जीवन बदलता है*।

पर्वतारोहियों का एक नियम है—
शिखर पर पहुँचने से अधिक दुर्घटनाएँ वापसी के निर्णय के समय होती हैं।
क्योंकि उस समय शरीर से पहले मन हारता है।

महान बॉक्सर मोहम्मद अली ने अपने जीवन में बहुत कम मुकाबले हारे। उन्होंने कहा था—
"जब भी रिंग में उतरने से पहले मेरे मन में एक क्षण के लिए यह विचार आया कि मैं हार सकता हूँ, उसी दिन मैं हार गया।"
वास्तव में हार पहले मन में जन्म लेती है, मैदान में नहीं।
जब हम सूरज की ओर देखते हैं तो परछाइयाँ दिखाई नहीं देतीं।
लेकिन जैसे ही हम पीठ फेर लेते हैं, वही परछाइयाँ हमारा पीछा करने लगती हैं।

इसलिए जब दृश्य अच्छा न लगे...
जब रास्ता बंद दिखाई दे...
जब मन हार मानने लगे...
तो थोड़ा रुकिए।
कुछ समय दीजिए।
फिर अपने जीवन के मस्तूल पर चढ़िए।
अपने पाल ठीक कीजिए।
अपने उद्देश्य को याद कीजिए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
ऊपर देखिए।
याद रखिए—
*तूफ़ान जहाज़ों को नहीं डुबोते, नाविकों का भय उन्हें डुबोता है*।
इसलिए मन को स्थिर रखिए, दृष्टि को ऊँचा रखिए और आगे बढ़ते रहिए।
क्योंकि किनारे उन्हीं को मिलते हैं जो बीच समुद्र में लौटने का निर्णय नहीं लेते।
*विजय उन्हीं की होती है, जो तूफ़ानों से नहीं, अपने भय से जीतते हैं*।

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