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बुधवार, 15 मई 2024

पंचमी तिथि का आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय महत्त्व

पंचमी तिथि का आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय महत्त्व
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हिंदू पंचाग की पांचवी तिथि पंचमी है। इस तिथि को श्रीमती और पूर्णा तिथि के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि इस तिथि में शुरू किए गए कार्य का विशेष फल प्राप्त होता है। हिंदू धर्म में पंचमी तिथि को सबसे महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है। पंचमी तिथि का निर्माण शुक्ल पक्ष में तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा का अंतर 49 डिग्री से 60 डिग्री अंश तक होता है। यह तिथि चंद्रमा की पांचवी कला है, इस कला में अमृत का पान वषटरकार करते हैं। वहीं कृष्ण पक्ष में पंचमी तिथि का निर्माण सूर्य और चंद्रमा का अंतर 229 से 240डिग्री अंश तक होता है। पंचमी  तिथि के स्वामी नाग देवता माने गए हैं। जीवन में संकटों को दूर करने के लिए इस तिथि में जन्मे जातकों को नाग देवता और भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। 

पंचमी तिथि का ज्योतिष में महत्त्व
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यदि पंचमी  तिथि शनिवार को पड़ती है तो मृत्युदा योग बनाती है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। इसके अलावा पंचमी तिथि गुरुवार को होती है तो सिद्धा कहलाती है। ऐसे समय कार्य सिद्धि की प्राप्ति होती है। वहीं पौष माह के दोनों पक्षों की पंचमी तिथि शून्य फल देती है। वहीं शुक्ल पक्ष की पंचमी  में भगवान शिव का वास कैलाश पर होता है और कृष्ण पक्ष की पंचमी  में शिव का वास वृषभ पर होता है इसलिए दोनों पक्षों में शिव का पूजन करने से शुभ फल प्राप्त होता है। 

पंचमी  तिथि में जन्मे जातक व्यवहारकुशल और ज्ञानी होते हैं। ये लोग मातृपितृ भक्त होते हैं। इन्हें दान और धार्मिक कार्यों में रुचि होती है। ये जातक हमेशा न्याय के मार्ग पर चलते हैं। इस तिथि में जन्मे लोग कार्यों के प्रति निष्ठावान और सजग होते हैं। इन लोगों को उच्च शिक्षा प्राप्त होती है और विदेश यात्रा भी करते हैं। ये अपने गुणों की वजह से समाज में मान-सम्मान भी प्राप्त करते हैं। 

पंचमी तिथि में किये जाने वाले शुभ कार्य
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कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि में में यात्रा, विवाह, संगीत, विद्या व शिल्प आदि कार्य करना लाभप्रद रहता है। 
वैसे तो पंचमी तिथि सभी प्रवृतियों के लिए यह तिथि उपयुक्त मानी गई है लेकिन इस तिथि में किसी को ऋण देना वर्जित माना गया है और शुक्ल पक्ष की पंचमी में आप शुभ कार्य नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा किसी भी पक्ष की पंचमी तिथि में कटहल, बेला और खटाई का सेवन नहीं करना चाहिए। 

पंचमी तिथि के प्रमुख हिन्दू त्यौहार एवं व्रत व उपवास
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ऋषि पंचमी👉 भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। इस दिन सप्तऋषियों की पूजा अर्चना करने का विधान है। मान्यता है कि यदि कोई भी स्त्री शुद्ध मन से इस व्रत को करें तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और अगले जन्म में उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

रंग पंचमी👉  महाराष्ट्र में खासतौर पर मनाया जाने वाला पर्व रंगपंचमी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन देवी-देवताओं की होली होती है। रंगपंचमी अनिष्टकारी शक्तियों पर विजय प्राप्ति का उत्सव भी है। 

नाग पंचमी  👉 श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा अर्चना की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन पूजा करने से कुंडली में स्थित कालसर्प दोष समाप्त हो जाता है|

विवाह पंचमी 👉 मार्गशीर्ष महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को विवाह पंचमी का पर्व मनाते हैं। इस तिथि में भगवान राम और माता सीता का विवाह हुआ था। इस पावन दिन सभी को राम-सीता की आराधना करते हुए अपने सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए प्रभु से आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।  

बसंत पंचमी 👉 माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को बसंत पंचमी कहा जाता है। इस दिन बुद्धि की देवी मां सरस्वती का प्रादुर्भाव हुआ था। इसलिए इस दिन मां सरस्वती के पूजन का विधान है। गृह प्रवेश से लेकर नए कार्यों की शुरुआत के लिए भी इस तिथि को शुभ माना जाता है।

सौभाग्य पंचमी 👉 कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को सौभाग्य पंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन धन की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। यह दिन व्यापारियों के लिए बेहद शुभ होता है। 

लक्ष्मी पंचमी 👉 चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को लक्ष्मी पंचमी कहते हैं। इस दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस तिथि को व्रत रखने से घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य से भरापूरा रहता है।
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कठिनाइयां" जब आती हैं तो "कष्ट" देती हैं पर जब जाती हैंतो "आत्मबल" का ऐसा उत्तम उपहार दे जाती है,जो उन "कष्टों" "दुःखों" की तुलना में "हजारों" गुना "मूल्यवान" होता है।

कठिनाइयां" जब आती हैं तो "कष्ट" देती हैं  पर जब जाती हैं
तो "आत्मबल" का ऐसा उत्तम उपहार दे जाती है,
जो उन "कष्टों" "दुःखों" की तुलना में "हजारों" गुना "मूल्यवान" होता है।
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जब तक जीव ईश्वर को नहीं प्राप्त कर लेता,तब तक उसके जीवन में समग्रता और पूर्णता नहीं आ पाती। जीव की पूर्णता ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाने में है। यही उसके जीवन का परम लक्ष्य है, परम साध्य है।
       
भगवान्‌ राम का यह दृष्टिकोण है कि वे न्याय उसे मानते हैं, जिससे भरत को राज्य मिले और अपना स्वार्थ-त्याग हो। और भरत भी न्याय उसे मानते हैं, जिससे श्रीराम को राज्य मिले।
     तो, श्रीराम और श्रीभरत दोनों की परिभाषा वह है, जिससे स्वयं के हिस्से में भोग के बदले त्याग पड़े, जिसमें संघर्ष के स्थान पर एक-दूसरे को देने की वृत्ति हो। यही रामराज्य है। जहाँ उचित लेने-देने की वृत्ति है, वह धर्मराज्य है और जहाँ परस्पर देने की वृत्ति है, वह रामराज्य। श्रीराम और श्रीभरत अपने चरित्र के माध्यम से यही दर्शन प्रस्तुत करते हैं। 
       श्रीभरत जब चित्रकूट से लौटकर आए तो उन्होंने 'सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि' -- 
प्रभु की चरण पादुकाओं को निर्विघ्नता पूर्वक सिंहासन पर विराजित करा दिया। अयोध्या के लोग चकित रह गए। यह एक नई बात थी। आज तक सिंहासन पर राजा विराजित होता था, उसको तिलक कराया जाता था, पर यह किसी ने नहीं देखा था कि सिंहासन पर चरण पादुका को, पदत्राण को, जूते को विराजित कराया जाए। इस प्रकार श्रीभरत ने संसार के समक्ष एक नए आदर्श, एक नए दर्शन की स्थापना कर दी। वे कर्त्तव्य से मुँह नहीं मोड़ते, चौदह वर्ष तक राज्य चलाने के लिए तैयार हैं ; केवल वे भगवान्‌ राम से आधार की याचना करते हैं -- 'बिनु आधार मन तोषु न साँती' -- 
क्योंकि बिना किसी आधार के उनके मन में न सन्तोष होगा ; न शान्ति। तब -- 
 प्रभु करि  कृपा  पाँवरी दीन्‍हीं।
 सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।। -- 
प्रभु ने कृपा करके खड़ाऊँ दे दी और भरत ने उन्हें आदर पूर्वक सिर पर धारण कर लिया। यहीं पर भगवान्‌ राम और रावण का अन्तर प्रकट होता है। क्या विभीषण रावण के चरणों को हदय से नहीं लगा सकते थे ? क्या लक्ष्मण भगवान्‌ श्रीराम के चरणों को हृदय से नहीं लगाते हैं ? छोटा भाई जब बड़े भाई के चरणों को दबाता है, तो क्या वह उन चरणों को हृदय के पास नहीं ले जाता है ? तो विभीषण भी रावण के चरणों को हृदय से लगा सकते थे और तब वह श्रद्धा और प्रेम का प्रकट होना होता। पर क्रिया विभीषण की ओर से न होकर रावण की ओर से हो गई, रावण स्वयं अपना चरण, प्रहार करने के उद्देश्य से, विभीषण की छाती पर रख देता है, इसलिए वह अधर्म अन्याय हो गया।
        प्रभु ने भरतजी से संकेत में कहा -- भरत, तुम्हें मैंने पादुकाएँ दीं और तुमने सिर पर धारण कर लिया, यह कैसी बात है ? पादुकाएँ तो पैर में पहनने के लिए होती हैं ? तुमने मुझसे आधार माँगा था, इसीलिए मैंने पादुकाएँ दी। यदि उन्हें पैर में पहनो, तब तो वे आधार हैं, पर यदि सिर पर रखो तो भार है। तो मैंने तो आधार के बदले तुम्हें भार ही दे दिया ! इस पर भरत कहते हैं -- नहीं प्रभो, आपने तो आधार ही दिया है। आपने यह जो दिया है, वह मेरे लिए चौदह वर्ष तक राज्य चलाने के लिए सबसे बड़ा आधार है। भरत का सूक्ष्म संकेत यह है कि महाराज, पादुका आपके पद की है, किसी दूसरे का पद उसके लायक नहीं है। पादुका में तो मानो जीवन होता है। भले ही दो व्यक्तियों के पैर में एक ही नम्बर के जूते हों, पर हर व्यक्ति के पैर में कुछ न कुछ भिन्‍नता अवश्य होती है, इसलिए यदि कोई व्यक्ति दूसरे के जूते में पैर डाले, तो झट जूता बता देता है कि हम आपके पैर के नहीं हैं। 'दोहावली' में गोस्वामीजी लिखते हैं --
बिन आखिन की पनहीं पहिचानत लखि पाय।

     बिना आँख वाली जूती पैर को देखकर पहचान लेती है। यह पैर और जूते का सम्बन्ध है। अब उनकी बात और है, जो जूते की बात न सुनें और पहनकर चले जाएँ ! ऐसे लोग दूसरों के जूते ले जाने के आदी होते हैं तो भरत का संकेत यह है कि प्रभु, आपने पादुका देकर यह बता दिया कि अयोध्या का राज्य सिंहासन आपका है, और जैसे दूसरे की पादुका में अपना पैर नहीं डालना चाहिए, इसी प्रकार मेरे लिए यह कदापि उचित न होगा कि मैं आपकी पादुका में पैर डालूँ, अन्यथा मैं भी चोर की श्रेणी में ही खड़ा किया जाऊँगा। इसीलिए मैंने आपकी पादुकाओं को सिर पर रखा है। यह भरत का दर्शन है। वे यही मानते हैं कि पद एकमात्र ईश्वर का है और पादुकाएँ उन्हें प्रभु के पद का निरन्तर स्मरण दिलाती रहती हैं। इस प्रकार श्रीभरत अपने चरित्र और दर्शन के माध्यम से रामराज्य की भूमिका निर्मित करते हैं।
       दूसरी ओर रावण है, जो युद्ध में विजय तो चाहता है, पर उसे पराजय ही हाथ लगती है, क्योंकि उसके व्यवहार में अन्याय और अधर्म है। जब एक पुत्र या अनुज अपने पिता या अग्रज के चरणों का स्पर्श करता है, तब पुत्र या अनुज के अन्तःकरण में अपने पिता या अग्रज के लिए श्रद्धा होती है। उसी प्रकार, जब पिता या अग्रज अपने पुत्र या अनुज को चरण छूने देता है, हृदय से लगाने देता है, तब उसके अन्तःकरण में वात्सल्य उमड़ता है। अत: चरण और हृदय का मिलन मानो श्रद्धा और वात्सल्य का मिलन है। पर रावण और विभीषण के लिए चरण और हृदय का ऐसा मिलन अपमान और पीड़ा की ही सृष्टि करता है और अन्तत: विभीषण को रावण से पृथक्‌ कर देता है। वास्तव में रावण लड़ाई तभी हार जाता है, जब वह विभीषण का इस प्रकार तिरस्कार कर देता है। इस प्रकार ये दो दर्शन हमारे सामने आते हैं -- एक है भगवान्‌ राम का दर्शन और दूसरा है रावण का दर्शन। अब यह हम पर है कि अपने व्यवहार में हम किस दर्शन का चुनाव करते हैं। यदि हम अपने जीवन में धन्यता लाना चाहते हैं, तो हमें भी रावण को छोड़ राम की ओर उन्मुख होना होगा, जैसाकि विभीषणजी करते हैं। वे जीव का प्रतिनिधित्व करते हैं और विभीषण-शरणागति वस्तुत: जीव का ईश्वर के प्रति समर्पण ही है । जब तक विभीषण श्रीराम से नहीं मिले यानी जब तक जीव ईश्वर को नहीं प्राप्त कर लेता, तब तक उसके जीवन में समग्रता और पूर्णता नहीं आ पाती। जीव की पूर्णता ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाने में है। यही उसके जीवन का परम लक्ष्य है, परम साध्य है।

जय श्री राम।

बगलामुखी साधना किन कार्यों के लिए उपयोगी है...?

बगलामुखी साधना किन कार्यों के लिए उपयोगी है...?
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बगलामुखी साधना में महाविद्याओं तथा उनकी उपासना पद्धतियों के बारे में संहिताओं, पुराणों तथा तंत्र ग्रंथों में बहुत कुछ दिया गया है। बगलामुखी देवी की गणना दस महाविद्याओं में है तथा संयम-नियमपूर्वक बगलामुखी के पाठ-पूजा, मंत्र जाप, अनुष्ठान करने से उपासक को सर्वाभीष्ट की सिद्धि प्राप्त होती है। शत्रु विनाश, मारण-मोहन, उच्चाटन, वशीकरण के लिए बगलामुखी से बढ़ कर कोई साधना नहीं है। मुकद्दमे में इच्छानुसार विजय प्राप्ति कराने में तो यह रामबाण है। बाहरी शत्रुओं की अपेक्षा आंतरिक शत्रु अधिक प्रबल एवं घातक होते हैं। अतः बगलामुखी साधना की, मानव कल्याण, सुख-समृद्धि हेतु, विशेष उपयोगिता दृष्टिगोचर होती है। यथेच्छ धन प्राप्ति, संतान प्राप्ति, रोग शांति, राजा को वश में करने हेतु कारागार (जेल) से मुक्ति, शत्रु पर विजय, आकर्षण ,विद्वेषण , मारण आदि प्रयोगों हेतु अनादी काल से बगलामुखी साधना द्वारा लोगों की इच्छा पूर्ति होती रही है। बगलामुखी के मंदिर वाराणसी (उत्तरप्रदेश) हिमाचलप्रदेश तथा दतिया (मध्यप्रदेश) में हैं, जहां इच्छित मनोकामना हेतु जा कर लोग दर्शन करते हैं, साधना करते हैं। मंत्र महोदधि में बगलामुखी साधना के बारे में विस्तार से दिया हुआ है। इसके प्रयोजन, मंत्र जप, हवन विधि एवं उपयुक्त सामान की जानकारी, सर्वजन हिताय, इस प्रकार है: उद्देश्य: धन लाभ, मनचाहे व्यक्ति से मिलन, इच्छित संतान की प्राप्ति, अनिष्ट ग्रहों की शांति, मुकद्दमे में विजय, आकर्षण, वशीकरण के लिए मंदिर में, अथवा प्राण प्रतिष्ठित बगलामुखी यंत्र के सामने इसके स्तोत्र का पाठ, मंत्र जाप, शीघ्र फल प्रदान करते है। जप स्थान: बगलामुखी मंत्र जाप अनुष्ठान के लिए नदियों का संगम स्थान, पर्वत शिखर, जंगल, घर का कोई भी स्थान, जहां शुद्धता हो, उपयुक्त रहता है। परंतु खुले स्थान (आसमान के नीचे) पर यह साधना नहीं करनी चाहिए। खुला स्थान होने पर ऊपर कपड़ा, चंदोबा तानना चाहिए। वस्त्र: इस साधना के समय केवल एक वस्त्र पहनना निषेध है तथा वस्त्र पीले रंग के होने चाहिएं, जैसे पीली धोती, दुपट्टा, अंगोछा ले कर साधना करनी चाहिए। पुष्प एवं माला: बगलामुखी साधना में सभी वस्तु पीली होनी चाहिएं, यथा पीले पुष्प, जप हेतु हल्दी की गांठ की माला, पीला आसन। भोजन: दूध, फलाहार आदि, केसर की खीर, बेसन, केला, बूंदियां, पूरी-सब्जी आदि। मंत्र एवं जप विधान: साधक अपने कार्य के अनुसार 

ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टाना वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वा किलय बुद्धिविनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ||

मंत्र के सवा लाख, अथवा 10 हजार जाप, 7, 9, 11, या 21 दिन के अंदर पूरे करें। किसी (स्थान पर चौकी पर, अथवा पाटे पर पीला कपड़ा बिछाएं। उसपर पीले चावल से अष्ट दल कमल बनाएं। उसपर मां बगलामुखी का चित्र, या यंत्र स्थापित कर, षोडशी का पूजन कर, न्यासादी के उपरांत जप आरंभ करना चाहिए। ध्यान रहे कि प्रथम दिन जितनी संख्या में जप करें, प्रतिदिन उतने ही जप करने चाहिएं; कम, या अधिक जप नहीं। हवन: जप संख्या का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश मार्जन तथा मार्जन का दशांश् ब्राह्मण भोजन कराना चाहिए। इस प्रकार साधना करने से सिद्धि प्राप्त होती है। यथेच्छ धन प्राप्ति: चावल, तिल एवं दूध मिश्रित खीर से हवन करने पर इच्छा अनुसार धन लाभ होता है। संतान प्राप्ति: अशोक एवं करवीर के पत्रों द्वारा हवन से संतान सुख मिलता है। शत्रु पर विजय: सेमर के फलों के हवन से शत्रु पर विजय प्राप्त होती है। जेल से मुक्ति: गूगल के साथ तिल मिला कर हवन करने से कैदी जेल से छूट जाता है। रोग शांति हेतु: 4 अंगुल की रेडी़ की लकडियां, कुम्हार के चाक की मिट्टी तथा शहद, घी, बूरा (शक्कर) के साथ लाजा (खील) मिला कर हवन करने से सभी प्रकार के रोगों में शांति मिलती है। वशीकरण: सरसों के हवन से वशीकरण होता है। सब वश में हो जाते हैं। आकर्षण: शहद, घी, शक्कर के साथ नमक से हवन करने पर आकर्षण होता है। इस प्रकार, मनोकामना हेतु, श्रद्धा-विश्वास से जप द्वारा कार्य सिद्ध होते हैं।

श्री बगलामुखी तंत्र 
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शत्रु स्तंभन के प्रयोग में बगलामुखी तंत्र से बड़ा कोई तंत्र नहीं है।

मंत्र :- ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टाना वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वा किलय बुद्धिविनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा ||

संकल्प मंत्र :-
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 मम श्री बगलामुखी अमुक मंत्र शिध्य्ठे श्री बगलामुखी प्रसदार्थमअमुक संख्या परिमित जप अहं करिष्ये।

विनियोग :-
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ॐ अस्य श्री बगलामुखी मंत्रस्य नारद ऋषि : ब्रुहतिछंद : बगलामुखी देवता ह्रीं बीजं स्वाहा शक्ति : ममाखिल्वाप्त्ये जपे विनियोग : ||

ऋषियादी न्यास :
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ॐ नारद ऋषिये नमः शिरसी ||१|
ब्रुहतिच्छान्द्से नमः मुखे ||२||
बागला देवताये नमः हृदि ||३||
ह्रीं बीजाय नमः गृह्ये ||४||
स्वाहा शक्तये नमः पादयो : ||५||
विनियोगाय नमः सर्वांगे ||६||

करन्यास :-
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ॐ ह्रीं अंगुष्ठाभ्यां नमः ||१||
बगलामुखी तर्जनीभ्यां नमः ||२||
सर्व दुष्ठाना मध्यमाभ्यां नमः ||३||
वाचं मुखं पदं स्तंभय अनामिकाभ्यां नमः ||४|
जिह्वा किलय कनिष्ठाभ्यान नमः ||५||
बुध्धि विनाशाय ह्रीं ॐ स्वाहा करतलकर प्रष्ठाभ्याम नमः ||६||

हृदयादिन्यास :-
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ॐ ह्रीं ह्द्याय नमः ||१||
बगलामुखी शिरसे स्वाहा ||२||
सर्वदुश्ताना शिखाये वष्ट ||३||
वाचं मुखं पदं स्तंभय कवचाय हूम ||४||
जिह्वा किलय नेत्र त्रयाय वौशत ||५||
बुध्धि विनाशाय ह्रीं ॐ स्वाहा अस्त्र्याय फट ||६||

इसके बाद संकल्प अनुसार मंत्र जप कर सकते है ध्यान रहे यह अनुष्ठान रात्रि के प्रथम प्रहर समाप्त होने पर आरम्भ करना उचित है। 
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माँ बगलामुखी जन्मोत्सव विशेष

माँ बगलामुखी जन्मोत्सव विशेष
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बगलामुखी परिचय एवं साधना नियम
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वैशाख शुक्ल अष्टमी को देवी बगलामुखी का अवतरण दिवस कहा जाता है जिस कारण इसे माँ बगलामुखी जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 2024 में यह जयन्ती 15 मई, को मनाई जाएगी। इस दिन व्रत एवं पूजा उपासना कि जाती है साधक को माता बगलामुखी की निमित्त पूजा अर्चना एवं व्रत करना चाहिए।

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। कई लोग संकट में पड़ गए और संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए। 

इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे तब भगवान शिव ने कहा शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया। 

उस समय रात्रि को देवी बगलामुखी के रूप में प्रकट हुई, त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न हो कर विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रूक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसी लिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। 

माँ बगलामुखी की साधना करने के लिए सबसे पहले एकाक्षरी मंत्र ह्ल्रीं की दीक्षा अपने गुरुदेव के मुख से प्राप्त करें। एकाक्षरी मंत्र के एक लाख दस हजार जप करने के पश्चात क्रमशः चतुराक्षरी, अष्टाक्षरी , उन्नीसाक्षरी, छत्तीसाक्षरी (मूल मंत्र ) आदि मंत्रो की दीक्षा अपने गुरुदेव से प्राप्त करें एवं गुरु आदेशानुसार मंत्रो का जाप संपूर्ण करें।यदि एक बार आपने यह साधना पूर्ण कर ली तो इस संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जिसे आप प्राप्त नहीं कर सकते। यदि आप भोग विलास के पीछे दौड़ेंगे तो आपकी यह दौड़ कभी भी समाप्त नहीं होगी। लेकिन यदि आपका लक्ष्य प्रभु प्राप्ति होगा तो भोग विलास स्वयं ही आपके दास बनकर आपकी सेवा करेंगे। मानव जन्म बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है। इसे व्यर्थ ना गँवाये। हम सभी जानते है कि हम इस संसार से कुछ भी साथ लेकर नहीं जायेगे। यदि आपने यहाँ करोड़ो रुपये भी जोड़ लिए तो भी वो व्यर्थ ही हैं जब तक आप उस परमपिता को प्राप्त नहीं कर लेते। उस परमात्मा कि शरण में जो सुख है वह सुख इस संसार के किसी भी भोग विलास में नहीं है।

 बगलामुखी मां
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मां बगलामुखी जी आठवी महाविद्या हैं। इनका प्रकाट्य स्थल गुजरात के सौरापट क्षेत्र में माना जाता है। हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है। इसलिए, हल्दी का रंग पीला होने से इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव महाकाल हैं।माँ बगलामुखी स्तंभव शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं. माँ बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है इन्हें पीला रंग अति प्रिय है इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है. देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है अत: साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए !देवी बगलामुखी दसमहाविद्या में आठवीं महाविद्या हैं यह स्तम्भन की देवी हैं. संपूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है. इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है. बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन है अत: मां के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है.बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती होती हैं रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं. देवी के भक्त को तीनो लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं. देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें, देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है, बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है.पीताम्बरा की उपासना से मुकदमा में विजयी प्राप्त होती है। शत्रु पराजित होते हैं। रोगों का नाश होता है। साधकों को वाकसिद्धि हो जाती है। इन्हें पीले रंग का फूल, बेसन एवं घी का प्रसाद, केला, रात रानी फूल विशेष प्रिय है। पीताम्बरा का प्रसिद्ध मंदिर मध्यप्रदेश के दतिया और नलखेडा(जिला-शाजापुर) और आसाम के कामाख्या में है।

सामान्य बगलामुखी मंत्र
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ऊँ ह्ली° बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्ली° ओम् स्वाहा।

माँ बगलामुखी की साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है. यह मंत्र विधा अपना कार्य करने में सक्षम हैं. मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो निश्चित रूप से सफलता प्राप्त होती है. बगलामुखी मंत्र के जाप से पूर्व बगलामुखी कवच का पाठ अवश्य करना चाहिए. देवी बगलामुखी पूजा अर्चना सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली तथा मुकदमों में विजय दिलाने वाली होती है।

श्री सिद्ध बगलामुखी देवी महामंत्र 
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ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:

इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे 
1. मधु. शर्करा युक्त तिलों से होम करने पर मनुष्य वश में होते है।
2. मधु. घृत तथा शर्करा युक्त लवण से होम करने पर आकर्षण होता है।
3. तेल युक्त नीम के पत्तों से होम करने पर विद्वेषण होता है।
4. हरिताल, नमक तथा हल्दी से होम करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।

मां बगलामुखी पूजन
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माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए. साधना अकेले में, मंदिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए. पूजा करने के लुए पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें.इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें. इस पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है मंत्र- सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें।

जन्मोत्सव के अवसर पर बगलामुखी को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार पूजन करें
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साधक को माता बगलामुखी की पूजा में पीले वस्त्र धारण करना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर इस प्रकार संकल्प करें-

संकल्प
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ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: अद्य……(अपने गोत्र का नाम) गोत्रोत्पन्नोहं ……(नाम) मम सर्व शत्रु स्तम्भनाय बगलामुखी जप पूजनमहं करिष्ये। तदगंत्वेन अभीष्टनिर्वध्नतया सिद्ध्यर्थं आदौ: गणेशादयानां पूजनं करिष्ये।

माँ बगलामुखी मंत्र विनियोग 
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श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।

इसके पश्चात आवाहन करना चाहिए….

ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
अब देवी का ध्यान करें इस प्रकार…..
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।

इसके बाद भगवान श्रीगणेश का पूजन करें। नीचे लिखे मंत्रों से गौरी आदि षोडशमातृकाओं का पूजन करें👇

गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातर:।।
धृति: पुष्टिस्तथातुष्टिरात्मन: कुलदेवता।
गणेशेनाधिकाह्योता वृद्धौ पूज्याश्च षोडश।।

इसके बाद गंध, चावल व फूल अर्पित करें तथा कलश तथा नवग्रह का पंचोपचार पूजन करें।

तत्पश्चात इस मंत्र का जप करते हुए देवी बगलामुखी का आवाह्न करें👇

नमस्ते बगलादेवी जिह्वा स्तम्भनकारिणीम्।
भजेहं शत्रुनाशार्थं मदिरा सक्त मानसम्।।

आवाह्न के बाद उन्हें एक फूल अर्पित कर आसन प्रदान करें और जल के छींटे देकर स्नान करवाएं व इस प्रकार पूजन करें👇

गंध- ऊँ बगलादेव्यै नम: गंधाक्षत समर्पयामि। का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीला चंदन लगाएं और पीले फूल चड़ाएं।

पुष्प- ऊँ बगलादेव्यै नम: पुष्पाणि समर्पयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले फूल चढ़ाएं।

धूप- ऊँ बगलादेव्यै नम: धूपंआघ्रापयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को धूप दिखाएं।

दीप- ऊँ बगलादेव्यै नम: दीपं दर्शयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को दीपक दिखाएं।

नैवेद्य- ऊँ बगलादेव्यै नम: नैवेद्य निवेदयामि। मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।

अब इस प्रकार प्रार्थना करें👇
जिह्वाग्रमादाय करणे देवीं, वामेन शत्रून परिपीडयन्ताम्।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि।।

श्री बगलामुखी माता की आरती
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जय पीताम्बरधारिणी जय सुखदे वरदे, देवी जय सुखदे वरदे।

भक्तजनानां क्लेशं भक्तजनानां क्लेशं सततं दूर करें।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

असुरैः पीडि़तदेवास्तव शरणं प्राप्ताः, देवीस्तव शरणं प्राप्ताः।

धृत्वा कौर्मशरीरं धृत्वा कौर्मशरीरं दूरीकृतदुःखम् ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

मुनिजनवन्दितचरणे जय विमले बगले, देवी जय विमले बगले।

संसारार्णवभीतिं संसारार्णवभीतिं नित्यं शान्तकरे ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

नारदसनकमुनीन्द्रै ध्यातं पदकमलं देवीध्यातं पदकमलं।

हरिहरद्रुहिणसुरेन्द्रैः हरिहरदु्रुहिणसुरेन्द्रैः सेवितपदयुगलम् ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

कांचनपीठनिविष्टे मुद्गरपाशयुते, देवी मुद्गरपाशयुते।

जिव्हावज्रसुशोभित जिव्हावज्रसुशोभित पीतांशुकलसिते ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

बिन्दु त्रिकोण षडस्त्रै अष्टदलोपरिते, देवी अष्टदलोपरिते।

षोडशदलगतपीठं षोडशदलगतपीठं भूपुरवृŸायुतम् ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

इत्थं साधकवृन्दं चिन्तयते रूपं देवी चिन्तयते रूपं।

शत्रुविनाशकबीजं शत्रुविनाशकबीजं धृत्वा हृत्कमले ।। ऊॅं जय बगलामुखी माता….

अणिमादिकबहसिद्धिं लभते सौख्ययुतां, देवी लभते सौख्ययुतां।

अब क्षमा प्रार्थना करें👇

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि।।
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे।।
अंत में माता बगलामुखी से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं से मुक्ति की प्रार्थना करें।

बगलामुखी साधना की सावधानियां 
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1. बगलामुखी साधना के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यधिक आवश्यक है।

2. इस क्रम में स्त्री का स्पर्श, उसके साथ किसी भी प्रकार की चर्चा या सपने में भी उसका आना पूर्णत: निषेध है। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपकी साधना खण्डित हो जाती है।

3. किसी डरपोक व्यक्ति या बच्चे के साथ यह साधना नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी साधना के दौरान साधक को डराती भी है। साधना के समय विचित्र आवाजें और खौफनाक आभास भी हो सकते हैं इसीलिए जिन्हें काले अंधेरों और पारलौकिक ताकतों से डर लगता है, उन्हें यह साधना नहीं करनी चाहिए।

4. साधना से पहले आपको अपने गुरू का ध्यान जरूर करना चाहिए।

5. मंत्रों का जाप शुक्ल पक्ष में ही करें। बगलामुखी साधना के लिए नवरात्रि सबसे उपयुक्त है।

6. उत्तर की ओर देखते हुए ही साधना आरंभ करें।

7. मंत्र जाप करते समय अगर आपकी आवाज अपने आप तेज हो जाए तो चिंता ना करें।

8. जब तक आप साधना कर रहे हैं तब तक इस बात की चर्चा किसी से भी ना करें।

9. साधना करते समय अपने आसपास घी और तेल के दिये जलाएं।

10. साधना करते समय आपके वस्त्र और आसन पीले रंग का होना चाहिए।

11. मन्त्र ज्ञात ब्राह्मण सज्जन देवी के पूजन में वैदिक मंत्रों का ही प्रयोग करें।

यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। सामनेवाले विरोधियों को शांत करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा। 

मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या किलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है। 

हम यहाँ पर सर्वशक्ति सम्पन्न बनाने वाली सभी शत्रुओं का शमन करने वाली, कोर्ट में विजय दिलाने वाली, अपने विरोधियों का मुँह बंद करने वाली माँ बगलामुखी की आराधना का सही प्रस्तुतीकरण दे रहे हैं। हमारे पाठक इसका प्रयोग कर लाभ उठाने में समर्थ होंगे।

〰️〰️🌸〰️ साभार 〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

वैशाख की कहानियाँ ("विनायक जी की कथा")

वैशाख की कहानियाँ ("विनायक जी की कथा")
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          एक गाँव में माँ-बेटी रहती थीं। एक दिन वह अपनी माँ से कहने लगी कि गाँव के सब लोग गणेश मेला देखने जा रहे हैं, मैं भी मेला देखने जाऊँगी। माँ ने कहा कि वहाँ बहुत भीड़ होगी कहीं गिर जाओगी तो चोट लगेगी। लड़की ने माँ की बात नहीं सुनी और मेला देखने चल पड़ी। माँ ने जाने से पहले बेटी को दो लड्डू दिए और एक घण्टी में पानी दिया। माँ ने कहा कि एक लड्डू तो गणेश जी को खिला देना और थोड़ा पानी पिला देना। दूसरा लड्डू तुम खा लेना और बचा पानी भी पी लेना। लड़की मेले में चली गई। मेला खत्म होने पर सभी गाँववाले वापिस आ गए लेकिन लड़की वापिस नहीं आई।
         
लड़की मेले में गणेश जी के पास बैठ गई और कहने लगी कि एक लड्डू और पानी गणेश जी तुम्हारे लिए और एक लड्डू और बाकी बचा पानी मेरे लिए। इस तरह कहते-कहते सारी रात बीत गई। गणेश जी यह देखकर सोचने लगे कि अगर मैने यह एक लड्डू और पानी नहीं पीया तो यह अपने घर नहीं जाएगी। यह सोचकर गणेश जी एक लड़के के वेश में आए और उससे एक लड्डू लेकर खा लिया और साथ ही थोड़ा पानी भी पी लिया फिर वह कहने लगे कि माँगो तुम क्या माँगती हो ? लड़की मन में सोचने लगी कि क्या माँगू ? अन्न माँगू या धन माँगू या अपने लिए अच्छा वर माँगू या खेत माँगू या महल माँगू ! वह मन में सोच रही थी तो गणेश जी उसके मन की बात को जान गए। वह लड़की से बोले कि तुम अपने घर जाओ और तुमने जो भी मन में सोचा है वह सब तुम्हें मिलेगा।
         
लड़की घर पहुँची तो माँ ने पूछा कि इतनी देर कैसे हो गई ? बेटी ने कहा कि आपने जैसा कहा था मैंने वैसा ही किया है और देखते ही देखते जो भी लड़की ने सोचा था वह सब कुछ हो गया। 
         
हे ! गणेश जी महाराज जैसा आपने उन माँ-बेटी की सुनी है वैसे ही सबकी सुनना।
          

                          "जय जय श्री हरि"
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