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रविवार, 17 अप्रैल 2022

यदि धर्म में आस्था है तो, सनातन धर्म के यह 108 नियम जरूर जानिए!

यदि धर्म में आस्था है तो, सनातन धर्म के यह 108 नियम जरूर जानिए!

हिंदू धर्म का हर व्यक्ति अपने आप को भगवान के प्रति आस्थावान मानता है लेकिन उसे शास्त्रों में धर्म पालन के जो 108 नियम बताए गए हैं वह ज्ञात नहीं है गुरुदेव श्री मनीष साईं जी द्वारा अपने इस आध्यात्मिक लेख में सनातन धर्म के 108 नियमों का उल्लेख किया गया है। यदि आपकी भगवान में आस्था है, आप धार्मिक है, तो इसे जरूर एक बार पढ़ें तथा धर्म के प्रचार प्रसार के लिए अधिक से अधिक लोगों को शेयर करें। आइए जानते हैं वह नियम क्या है।

1. एक ही सिद्धांत, एक ही इष्ट एक ही मंत्र, एक ही माला, एक ही समय, एक ही आसन, एक ही स्थान हो तो जल्दी सिद्धि होती है।

2. विष्णु, शंकर, गणेश, सूर्य और देवी - ये पाँचों एक ही हैं। विष्णु क़ी बुद्धि 'गणेश' है, अहम् 'शंकर', नेत्र 'सूर्य' है और शक्ति 'देवी' है। राम और कृष्ण विष्णु के अंतर्गत ही हैं।

3. कलियुग में कोई अपना उद्दार करना चाहे तो राम तथा कृष्ण क़ी प्रधानता है, और सिद्दियाँ प्राप्त करना चाहे तो शक्ति तथा गणेश क़ी प्रधानता है- 'कलौ चणडीविनायकौ'।

4. औषध से लाभ न तो हो भगवान् को पुकारना चाहिए। एकांत में बैठकर कातर भाव से, रोकर भगवान् से प्रार्थना करें जो काम औषध से नहीं होता, वह प्रार्थना से हो जाता है। मन्त्रों में अनुष्ठान में उतनी शक्ति नहीं है, जितनी शक्ति प्रार्थना में है। प्रार्थना जपसे भी तेज है।

5. भक्तों के नाम से भगवान् राजी होते हैं। शंकर के मन्दिर में घंटाकर्ण आदि का, राम के मन्दिर में हनुमान, शबरी आदि का नाम लो। शंकर के मन्दिर में रामायण का पाठ करो। राम के मन्दिर में शिव्तान्दाव, शिवमहिम्न: आदि का पाठ करो। वे राजी हो जायेंगे। हनुमानजी को प्रसन्न करना हो उन्हें रामायण सुनाओ। रामायण सुनने से वे बड़े राजी होते हैं।

6. अपने कल्याण क़ी इच्छा हो तो 'पंचमुखी या वीर हनुमान' क़ी उपासना न करके 'दास हनुमान' क़ी उपासना करनी चाहिए।

7. शिवजी का मंत्र रुद्राक्ष क़ी माला से जपना चाहिए, तुलसी क़ी माला से नहीं।

8. हनुमानजी और गणेशजी को तुलसी नहीं चढानी चाहिए।

9. गणेशजी बालाक्स्वरूप में हैं। उन्हें लड्डू और लाल वस्त्र अच्छे लगते हैं।

10. दशमी- विद्ध एकादशी त्याज्य होती है, पर गणेशचतुर्थी त्रित्या- विद्धा श्रेष्ठ होती है।

11. किसी कार्यको करें या न करें - इस विषय में निर्णय करना हो तो एक दिन अपने इस्ट का खूब भजन-ध्यान, नामजप, कीर्तन करें। फिर कागज़ क़ी दो पुडिया बनाएं, एक में लिखें 'काम करें' और दूसरी में लिखें 'काम न करें'। फिर किसी बच्चे से कोई एक पुडिया उठ्वायें और उसे खोलकर पढ़ लें।

12. किंकर्तव्यविमूढ होने क़ी दशा में चुप, शांत हो जाएँ और भगवान् को याद करें तो समाधान मिल जाएगा।

13. कोई काम करना हो तो मन से भगवान् को देखो। भगवान् प्रसन्न देखें तो वह काम करो और प्रसन्न न देखें तो वह काम मत करो क़ी भगवान् क़ी आगया नहीं है। एक- दो दिन करोगे तो भान होने लगेगा।

14. विदेशी लोग दवापर जोर देते हैं, पर हम पथ्यपर जोर देते हैं -
पथ्ये सटी गदार्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
पथ्येSसति गदर्त्तस्य किमौषधनिषेवणै:।
'पथ्य से रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध-सेवन से क्या प्रायोजन ? और पथ्य से न रहने पर रोगी व्यक्ति को औषध - सेवन से क्या प्रायोजन ?'

15. जहाँ तक हो सके, किसी भी रोग में आपरेशन नहीं करना चाहिए। दवाओं से चिकित्सा करनी चाहिए। आपरेशन द्वारा कभी न करायें। जो स्त्री चक्की चलाती है, उसे प्रसव के स्ममय पीड़ा नहीं होती और स्वास्थ भी सदा ठीक रहता है।

16. इक ही दावा लम्बे समय तक नहीं लेनी चाहिए। बीच में कुछ दिन उसे छोड़ देना चाहिए। निरंतर लेने से वह दावा आहार (भोजन) क़ी तरह जो जाता है।

17. वास्तव में प्रारब्ध से रोग बहुत कम होते हैं, ज्यादा रोग कुपथ्य से अथवा असंयम से होते हैं, कुपथ्य छोड़ दें तो रोग बहुत कम हो जायेंगे। ऐसे ही प्रारभ दुःख बहुत कम होता है, ज्यादा दुःख मूर्खता से, राग-द्वेष से, खाब स्वभाव से होता है।

18. चिंता से कई रोग होते हैं। कोई रोग हो तो वह चिंता से बढ़ता है। चिंता न करने से रोग जल्दी ठीक होता है। हर दम प्रसन्न रहने से प्राय: रोग नहीं होता, यदी होता भी है तो उसका असर कम पड़ता है।

19. मन्दिर के भीतर स्थित प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ती के दर्शन का जो महात्मय है, वाही महात्मय मन्दिर के शिखर के दर्शन का है।

20. शिवलिंग पर चढ़ा पदार्थ ही मिर्माल्या अर्थात त्याज्य है। जो पदार्थ शिवलिंग पर नहीं चढ़ा वह निर्माल्य नहीं है। द्वादश ज्योतिलिंगों में शिवलिंग पर चढ़ा पदार्थ भी निर्माल्य नहीं है।

21. जिस मूर्ती क़ी प्राणप्रतिष्ठा हुई हो, उसी में सूतक लगता है। अतः उसकी पूजा ब्रह्मण अथवा बहन- बेटी से करानी चाहिए। परन्तु जिस मूर्ती क़ी प्राणप्रतिष्ठा नहीं क़ी गयी हो, उसमें सूतक नहीं लगता। कारण क़ी प्राणप्रतिष्ठा बिना ठाकुरजी गहर के सदस्य क़ी तरह ही है; अतः उनका पूजन सूतक में भी किया जा सकता है।

22. घर में जो मूर्ती हो, उसका चित्र लेकर अपने पास रखें। कभी बहार जाना पड़े तो उस चित्र क़ी पूजा करें। किसी कारणवश मूर्ती खण्डित हो जाए तो उस अवस्था में भी उस चित्र क़ी ही पूजा करें।

23. घर में राखी ठाकुर जी क़ी मूर्ती में प्राणप्रतिष्ठा नहीं करानी चाहिए।

24. किसी स्त्रोत का महात्मय प्रत्येक बार पढने क़ी जरुरत नहीं। आरम्भ और अंत में एक बार पढ़ लेना चाहिए।

25. जहाँ तक शंख और घंटे क़ी आवाज क़ी आवाज जाती है, वहां तक पीरोगता, शांति, धार्मिक भाव फैलते है।

26. कभी मन में अशांति, हलचल हो तो 15-20 मिनट बैठकर राम-नाम का जप करो अथवा 'आगमापायिनोSनित्या:' (गीता 1/14) - इसका जप करो, हलचल मिट जायेगी।

27. कोई आफत आ जाए तो 10-15 मिनट बैठकर नामजप करो और प्रार्थना करो तो रक्षा हो जायेगी। सच्चे हृदय से क़ी गयी प्रार्थना से तत्काल लाभ होता है।

28. घर में बच्चो से प्रतिदिन घंटा-डेढ घण्टा भगवानाम का कीर्तन करवाओ तो उनकी जरूर सदबुद्धि होगी और दुर्बद्धि दूर होगी।

29. 'गोविन्द गोपाल की जय' - इस मंत्र का उच्चारण करने से संकल्प- विकल्प मिट जाते हैं।, आफत मिट जाती है।

30. नाम जप से बहुत रक्षा होती है। गोरखपुर में प्रति बारह वर्ष प्लेग आया करता था। भाई जी श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार ने एक वर्ष तक नामजप कराया तो फिर प्लेग नहीं आया।

31. कोई रात-दिन राम-राम कर्ना शुरु कर दे तो उस्के पास अन्न, जल, वस्त्र आदि की कमी नहीं रहेगी।

32. प्रहलाद की तरह एक नामजप में लग जाय तो कोई जादू-टोना, व्यभिचार, मूठ आदि काम नहीं करता।

33. वास्तव में वशीकरण मन्त्र उसी पर चलता है, जिसके भीतर कामना है। जितनी कामना होगी, उतना असर होगा। अगर कोई कामना न हो तो मन्त्र नहीं चल सकता; जैसे पत्थर पर जोंक नहीं लग सकती।

34. राम्राक्षस्त्रोत, हनुमानचालीसा, सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से अनिष्ट मन्त्रों का (मारण-मोहन आदि तांत्रिक प्रयोगों) असर नहीं होता। परन्तु इसमें बलाबल काम करेगा।

35. भगवान् का जप-कीर्तन करेने से अथवा कर्कोटक, दमयंती, नल और ऋतुपणर्का नाम लेने से कलियुग असर नहीं करता।

36. कलियुग से बचने के लिये हरेक भाई-बहिन को नल-दमयंती क़ी कथा पढनी चाहिए। नल-दमयंती क़ी कथा पढने से कलियुग का असर नहीं होगा, बुद्द्नी शुद्ध होगी।

37. छोटे गरीब बच्चों को मिठाई, खिलौना आदि देकर राजी करने से बहुत लाभ होता है और शोक-चिंता मिटते हैं, दुःख दूर होता है। इसमें इतनी शक्ति है क़ी आपका भाग्य बदल सकता है। जिनका ह्रदय कठोर हो, वे यदी छोटे-छोटे गरीब बच्चों को मिठाई खिलायें और उन्हें खाते हुए देखें तो उनका ह्रदय इतना नरम हो जाएगा क़ी एक दिन वे रो पड़ेंगे!

38. छोटे ब्रह्मण-बालकों को मिठाई, खिलौना आदि मनपसंद वस्तुएं देने से पितर्रदोष मिट जाता है।

39. कन्याओं को भोजन कराने से शक्ति बहुत प्रसन्न होती है।

40. रात्री सोने से पहले अपनी छाया को तीन बार कह दे कि मुझे प्रात: इतने बजे उठा देना तो ठीक उतने बजे नींद खुल जायेगी। उस समय जरुर उठ जाना चाहिए।

41. जो साधक रात्री साढे ग्यारह से साढे बारह बजे तक अथवा ग्यारह से एक बजे तक जागकर भजन-स्मरण, नाम-जप करता है, उसको अंत समय में मूरचा नहीं आती और भगवान् क़ी स्मृति बनी रहती है।

42. सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सोना नहीं चाहिए। सूर्योदय के बाद उठने से बुद्धि कमजोर होती है, और सूर्योदय से पहले उठने से बुद्धि का विकास होता है। अतः सूर्योदय होने से पहले ही उठ जाओ और सूर्य को नमस्कार करो। फिर पीछे भले ही सो जाओ।

43. प्रतिदिन स्नान करते समय 'गंगे-गंगे' उच्चारण करने क़ी आदत बना लेनी चाहिए। गंगा के इन नामों का भी स्नान करते समय उच्चारण करना चाहिए - 'ब्रह्मकमण्डुली, विष्णुपादोदकी, जटाशंकरी, भागीरथी,जाहन्वी' । इससे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश- तीनों का स्मरण हो जाता है।

44. प्रतिदिन प्रातः स्नान के बाद गंगाजल का आचमन लेना चाहिए। गंगाजल लेने वाला नरकों में नहीं जा सकता। गंगाजल को आग्पर गरम नहीं करना चाहिए। यदि गरम करना ही हो तो धुप में रखकर गरम कर सकतें है। सूतक में भी गंगा-स्नान कर सकते हैं।

45. सूर्य को जल देने से त्रिलोकी को जल देने का महात्मय होता है। प्रातः स्नान के बाद एक ताम्बे के लोटे में जल लेकर उसमें लाल पुष्प या कुमकुम दाल दे और 'श्रीसूर्याय नम:' अथवा 'एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाध्य दिवाकर॥' कहते हुए तीन बार सूर्यको जल दे।

46. प्रत्येक कार्य में यह सावधानी रखनी चाहिए क़ी समय और वास्तु कम-से-कम खर्च हों।

47. रोज़ प्रातः बड़ों को नमस्कार करना चाहिए। जो प्रातः बड़ों को नमस्कार करते हैं, वे नमस्कार करने योग्य हैं।

48. प्रत्येक बार लघुशंका करने के बाद इन्द्रिय और मुख को ठण्डे जल से तथा पैरों को गरम जल से धोना चाहिए। इससे आयु बढती है।

49. कोई हमारा चरण - स्पर्श करे तो आशीर्वाद न देकर भगवान् का उच्चारण करना चाहिए।

50. किसी से विरोध हो तो मन से उसकी परिक्रमा करके प्रणाम करो तो उसका विरोध मिटता है, द्वेष-वृत्ति मिटती है। इससे हमारा वैर भी मिटेगा। हमारा वैर मिटने से उसका भी वैर मिटेगा।

51. कोई व्यक्ति हमसे नाराज हो, हमारे प्रति अच्छा भाव न रखता हो तो प्रतिदिन दुबह-शाम मन इ उसकी परिक्रम करके दंडवत प्रणाम करें। ऐसा करने से कुछ ही दिनों में उसका भाव बदल जाएगा। फिर वह व्यक्ति कभी मिलेगा तो उसके भावों में अंतर दीखेगा। भजन-ध्यान करने वाले साधक के मानसिक प्रणाम का दुसरे पर ज्यादा असर पड़ता है।

52. किसी व्यक्ति का स्वभाव खराब हो तो जब वह गहरी नींद में सोया हो, तब उसके श्वासों के सामने अपने मुख करके धीरे से कहिएं क़ी तुम्हारा स्वभाव बड़ा अच्छा है, तुम्हारे में क्रोध नहीं है, आदि। कुछ दिन ऐसा करने से उसका स्वभाव सुधरने लगेगा।

53. अगर बेटे का स्वभाव ठीक नहीं हो तो उसे अपना बेटा न मानकर, उसमें सर्वदा अपनी ममता छोड़कर उसे सच्चे ह्रदय से भगवान् के अर्पण कर दे, उसे भगवान् का ही मान ले तो उसका स्वभाव सुधर जाएगा।

54. गाय की सेवा करने से सब कामनाएं सिद्ध होती है। गाय को सहलाने से, उसकी पीठ आदि पर हाथ फेरने से गाय प्रसन्न होती है। गाय के प्रसन्न होने पर साधारण रोगों क़ी तो बात ही क्या है, बड़े-बड़े असाध्य रोग भी मिट जाते हैं। लगभग बारह महीने तक करके देखना चाहिए।

55. गाय के दूध, घी, गोबर-गोमूत्र आदि में जीवनी-शक्ति रहती है। गाय के घी के दीपक से शांति मिलती है। गाय का घी लेने से विषैले तथा नशीली बस्तु का असर नस्त हो जाता है। परन्तु बूढी अशुद्ध होने से अच्छी चीज भे बुरी लगती है, गाय के घी से भी दुर्गन्ध आती है।

56. बूढी गाय का मूत्र तेज होता है और आँतों में घाव कर देता है। परन्तु दूध पीने वाली बछडी का मूत्र सौम्य होता है; अतः वाही लेना चाहिए।

57. गायों का संकरीकरण नहीं करना चाहिए। यह सिद्धांत है क़ी शुद्ध चीज में अशुद्ध चीज मिलें से अशुद्ध क़ी ही प्रधानता हो जायेगी; जैसे-छाने हुए जल में अन्चाने जल क़ी कुछ बूंदे डालने से सब जल अन्चाना हो जाएगा।

58. कहीं जाते समय रास्ते में गाय आ जाए तो उसे अपनी दाहिनी तरफ करके निकलना चाहिए। दाहिनी तरफ करे से उसकी परिक्रमा हो जाती है।

59. रोगी व्यक्ति को भगवान् का स्मरण कराना सबसे बड़ी और सच्ची सेवा है। अचिक बीमार व्यक्ति को सांसारिक लाभ-हानि क़ी बातें नहीं सुनानी चाहिए। छोटे बच्चों को उसके पासा नहीं ले जाना चाहिए; क्योकि बच्चों में स्नेह अधिक होने से उसकी वृत्ति उनमें चली जायेगे।

60. रोगी व्यक्ति कुछ भी खा- पी लेना सके तो गेहूं आदि को अग्नि में डालर उसका धुंआ देना चाहिए। उस धुंए से रोगी को पुष्टि मिलती है।

61. भगवनाम अशुद्ध अवस्था में भी लेना चाहिए। कारण क़ी बिमारी में प्राय: अशुधि रहती है। यदि नामे लिये बिना मर गए तो क्या दशा होगी? क्या अशुद्ध अवस्था में श्वास नहीं लेते? नामजप तो श्वास से भी अधिक मूल्यवान है।

62. मरणासन्न व्यक्ति के सिरहाने गीताजी रखें। डाह-संस्कार के समय उस गीताजी को गंगाजी में बहा दे, जलायें नहीं।

63. यदि रोगी के मस्तक पर लगाया चन्दन जल्दी सूख जाय तो समझें क़ी ये जल्दी मरने वाला नहीं है। मृत्यु के समीप पहुंचे व्यक्ति उसके मस्तक क़ी गर्मी चली जाती है, मस्तक ठंडा हो जाता है।

64. शव के दाह-संस्कार के समय मृतक के गले में पड़ी तुलसी क़ी माला न निकालें, पर गीताजी हो तो निकाल देनी चाहिए।

65. अस्पताल में मरने वाले क़ी प्राय: सदगति नहीं होती। अतः मरनासन व्यक्ति यदी अस्पताल में हो तो उसे घर ले आना चाहिए।

66. श्राद्ध आदि कर्म भारतीय तिथि के अनुसार करने चाहिए, अंग्रेजी तारीख के अनुसार नहीं। (भारत आजाद हो गया, अपर भीतर से गुलामी नहीं गयी। लोग अंग्रेजी दिनाक तो जानते हैं, पर तिथि जानते ही अन्हीं!)

67. किसी व्यक्ति क़ी विदेश में मृत्यु हो जाय तो उसके श्राद्ध में वहां क़ी तिथि न लेकर भारत क़ी तिथि ही लेनी चाहिए अर्थात उसकी मृत्यु के समय भारत में जो तिथि हो, उसी तिथि में श्राद्धादि करना चाहिए।

68. श्राद्धका अन्न साधुको नहीं देना चाहिए, केवल ब्राहम्ण को ही देना चाहिए।

69. घर में किसी क़ी मृत्यु होने पर सत्संग, मन्दिर और तीर्थ- इन तीनों में शोक नहीं रखना चाहिए अर्थात इन तीनों जगह जरुर जाना चाहिए। इनमें भी सत्संग विशेष है। सत्संग से शोक्का नाश होता है।

70. किसी क़ी मृत्यु से दुःख होता है तो इसके दो कारन हैं- उससे सुख लिया है, और उससे आशा रखी है। मृतात्मा क़ी शांति और अपना शोक दूर करने के लिये तीन उपाय करने चाहिए - 1) मृतात्मा को भगवान् के चरणों में बैठा देखें 2) उसके निमित्त गीता, रामायण, भगवत, विष्णुसहस्त्रनाम आदि का पाठ करवाएं 3) गरीब बालकों को मिठाई बांटें।

71. घर का कोई मृत व्यक्ति बार-बार स्वप्न में आये तो उसके निमित्त गीता-रामायण का पाठ करें, गरीब बालकों को मिठाई खिलायें। किसी अच्छे ब्रह्मण से गया-श्राद्ध करवाएं। उसी मृतात्मा अधिक याद आती है, जिसका हम पर ऋण है। उससे जितना सुख-आराम लिया है, उससे अधिक सुख-आराम उसे न दिया जाय, तब तक उसका ऋण रहता है। जब तक ऋण रहेगा, तब तक उसकी याद आती रहेगी।

72. यह नियम है कि दुखी व्यक्ति ही दुसरे को दुःख देता है। यदी कोई प्रेतात्मा दुःख दे रही है तो समझना चाहिए क़ी वह बहुत दुखी है। अतः उसके हित के लिये गया-श्राद्ध करा देना चाहिए।

73. कन्याएं प्रतिदिन सुबह-शाम सात-सात बार 'सीता माता' और 'कुंती माता' नामों का उच्चारण करें तो वे पतिव्रता होती हैं।

74. विवाह से पहले लड़के-लड़की का मिलना व्यभिचार है। इसे मैं बड़ा पाप मानता हूँ।

75. माताएं-बहनें अशुद्ध अवस्था में भी रामनाम लिख सकती हैं, पर पाठ बिना पुस्तक के करना चाहिए। यदी आवश्यक हो तो उन दिनों के लिये अलग पुस्तक रखनी चाहिए। अशुद्ध अवस्था में हनुमान चालीसा स्वयं पाठ न करके पति से पाता कराना चाहिए।

76. अशुद्ध अवस्था में माताएं तुलसी क़ी माला से जप न करके काठ क़ी माला से जप करें, और गंगाजी में स्नान न करके गंगाजल मंगाकर स्नानघर में स्नान करें। तुलसी क़ी कण्ठीतो हर समय गले में रखनी चाहिए।

77. गर्भपात महापाप है। इससे बढ़कर कोई पाप नहीं है। गर्भ्पाप करनेवाले क़ी अगले जन्म में कोई संतान नहीं होती।

78. स्त्रियों को शिवलिंग, शालग्राम और हनुमानजी का स्पर्श कदापि नहीं करना चाहिए। उनकी पूजा भी नहीं करनी चाहिए। वे शिवलिंग क़ी पूजा न करके शिवमूर्ति क़ी पूजा कर सकती हैं। हाँ, जहाँ प्रेमभाव मुख्य होता है, वहां विधि-निषेध गौण हो जाता है।

79. स्त्रियों को रूद्राक्ष क़ी माला धारण नहीं करनी चाहिए। वे तुलसी क़ी माला धारण करें।

80. भगवान् क़ी जय बोलने अथवा किसी बात का समर्थन करने के समय केवल प्रुर्शों को ही अपने हाथ ऊँचें करने चाहिए, स्त्रियों को नहीं।

81. स्त्री को गायत्री-जप और जनेऊ-धारण करने का अधिकार नहीं है। जनेऊ के बिना ब्रह्मण भी गायत्री-जप नहीं कर सकता है। शरीर मल- मूत्र पैदा करने क़ी मशीन है। उसकी महत्ता को लेकर स्त्रियों को गायत्री-जप का अधिकार देते हैं तो यह अधिकार नहीं, प्रत्युत धिक्कार है। यह कल्याण का रास्ता नहीं है, प्यात्युत केवल अभिमान बढाने के लिये है। कल्याण चाहने वाली स्त्री गायत्री-जप नहीं करेगी। स्त्री के लिये गायत्री-मंत्र का निषेध करके उसका तिरस्कार नहीं किया है, प्रत्युत उसको आफत से चुदाय है। गायत्री-जप से ही कल्याण होता हो- यह बात नहीं है। राम-नाम का जप गायत्री से कम नहीं है। (सबको सामान अधिकार प्राप्त हो जय, सब बराबर हो जाएँ - ऐसी बातें कहने-सुनने में तो बड़ी अच्छी दीखती हैं, पर आचरण में लाकर देखो तो पता लगे! सब गड़बड़ हो जाएगा! मेरी बातें आचरण में ठीक होती है।

82. पति के साधु होने पर पत्नी विधवा नहीं होती। अतः उसे सुहाग के चिन्ह नहीं छोड़ने चाहिए।

83. stri परपुरुष का और पुरुष परस्त्री का स्पर्श न करे तो उनका तेज बढेगा। पुरुष मान के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम करे, पर अन्य सब स्त्रियों को दूर से प्रणाम करे। स्त्री पति के चरण-स्पर्श करे, पर ससुर आदि अन्य पुरुषों को दूर से प्रणाम करे। तात्पर्य है क़ी स्त्री को पति के सिवाय किसी के भी चारण नहीं चूने चाहिए। साधू-संतों को भी दूर से पृथ्वी पर सर टेककर प्रणाम करना चाहिए।

84. दूध पिलाने वाली स्त्री को पति का संग नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से दूध दूषित हो जाता है, जिसे पीने से बच्चा बीमार हो जाता है।

85. कुत्ता अपनी तरफ भौंकता हो तो दोनों हाटों क़ी मुठ्ठी बंद कर लें। कुछ देर में वह चुप हो जाएगा।

86. मुसलमान लोग पेशाब को बहुत ज्यादा अशुद्ध मानते हैं। अतः गोमूत्र पीने अथवा छिड़कने से मुस्लिम तंत्र का प्रभाव कट जाता है।

87. कहीं स्वर्ण पडा हुआ मिल जाय तो उसे कभी उठाना नहीं चाहिए।

88. पान भी एक श्रृंगार है। यह निषिद्ध वास्तु नहीं है, पर ब्रह्मचारी, विधवा और सन्यासी के लिये इसका निषेध है।

89. पुरुष की बायीं आँख ऊपर से फडके तो शुभ होती है, नीचे से फडके तो अशुभ होती है। कान क़ी तरफ वाला आँख का कोना फडके तो अशुभ होता है और नाक क़ी तरफ्वाला आँख का कोना फडके तो शुभ होता है।

90. यदि ज्वर हो तो छींक नहीं आती। छींक आ जाय तो समझो ज्वर गया! छींक आना बीमारी के जाने का शुभ शकुन है।

91. शकुन मंगल अथवा अमंगल - 'कारक' नहीं होते, प्रत्युत मंगल अथवा अमंगल - 'सूचक होते हैं।

92. 'पूर्व' क़ी वायु से रोग बढ़ता है। सर्प आदि का विष भी पूर्व क़ी वायु से बढ़ता है। 'पश्चिम' क़ी वायु नीरोग करने वाली होती है। 'पश्चिम' वरुण का स्थान होने से वारूणी का स्थान भी है। विघुत तरंगे, ज्ञान का प्रवाह 'उत्तर' से आता है। 'दक्षिण' में नरकों का स्थान है। 'आग्नेय' क़ी वायु से गीली जमीन जल्दी सूख जाती है; क्योंकि आगनेय क़ी वायु शुष्क होती है। शुष्क वायु नीरोगता लाती है। 'नैऋत्य' राक्षसों का स्थान है। 'ईशान' कालरहित एवं शंकर का स्थान है। शंकर का अर्थ है - कल्याण करने वाला।

93. बच्चों को तथा बड़ों को भी नजर लग जाती है. नजर किसी-किसी की ही लगती है, सबकी नहीं. कईयों की दृष्टि में जन्मजात दोष होता है और कई जान-बूझकर भी नजर लगा देते हैं. नजर उतरने के लिये ये उपाय हिं- पहला, साबत लालमिर्च और नमक व्यक्ति के सिर पर घुमाकर अग्नि में जला दें. नजर लगी होगी तो गंध नहीं आयेगी. दूसरा, दाहिने हाथ की मध्यमा-अनामिका अँगुलियों की हथेली की तरफ मोड़कर तर्जनी व कनिष्ठा अँगुलियों को परस्पर मिला लें और बालक के सिर से पैर तक झाड दें। ये दो अंगुलियाँ सबकी नहीं मिलती. तीसरा, जिसकी नजर लगी हो, वह उस बालक को थू-थू-थू कर दे, तो भी नजर उतर जाती है।

94. नया मकान बनाते समय जीवहिंसा होती है; विभिन्न जीव-जंतुओं की स्वतन्त्रता में, उनके आवागमन में तथा रहने में बाधा लगती है, जो बड़ा पाप है. अतः नए मकान की प्रतिष्ठा का भोजन नहीं करना चाहिए, अन्यथा दोष लगता है।

95. जहाँ तक हो सके, अपना पहना हुआ वस्त्र दूसरे को नहीं देना चाहिए।

96. देवी की उपासना करने वाले पुरूष को कभी स्त्री पर क्रोध नहीं करना चाहिए।

97. एक-दूसरे की विपरीत दिशा में लिखे गए वाकया अशुभ होते हैं. इन्हें 'जुंझारू वाक्य' कहते हैं।

98. कमीज, कुरते आदि में बायाँ भाग (बटन लगाने का फीता आदि) ऊपर नहीं आना चाहिए. हिन्दू-संस्कृति के अनुसार वस्त्र का दायाँ भाग ऊपर आना चाहिए।

99. मंगल भूमिका पुत्र है; अतः मंगलवार को भूमि नहीं खोदनी चाहिए, अन्यथा अनिष्ट होता है. मंगलवार को वस्त्र नापना, सिलना तथा पहनना भी नहीं चाहिए।

100. नीयत में गड़बड़ी होने से, कामना होने से और विधि में त्रुटी होने से मंत्रोपासक को हानि भी हो सकती है. निष्काम भाव रखने वाले को कभी कोई हानि नहीं हो सकती।

101. हनुमानचालीसा का पाठ करने से प्रेतात्मा पर हनुमान जी की मार पड़ती है।

102. कार्यसिद्धि के लिये अपने उपास्यदेव से प्रार्थना करना तो ठीक है, पर उन पर दबाव डालना, उन्हने शपथ या दोहाई देकर कार्य करने के लिये विवश करना, उनसे हाथ करना सर्वथा अनुचित है. उदाहरणार्थ, 'बजरंगबाण' में हनुमानजी पर ऐसा ही अनुचित दबाव डाला गया है; जैसे- 'इन्हें मारू, तोही सपथ राम की.', 'सत्य होहु हरि सपथ पाई कई.', 'जनकसुता-हरि-दास कहावै. ता की सपथ, विलम्ब न लावे..', 'उठ, उठ, चालू, तोही राम दोहाई'. इस तरह दबाव डालने से उपास्य देव प्रसन्न नहीं होते, उलटे नाराज होते हैं, जिसका पता बाद में लगता है. इसलिए मैं 'बजरंगबाण' के पाठ के लिये मना किया करता हूँ. 'बज्रंग्बान' गोस्वामी तुलसीदासजी की रचना नहीं है. वे ऐसी रचना कर ही नहीं सकते।

103. रामचरितमानस एक प्रासादिक ग्रन्थ है. जिसको केवल वर्णमाला का गया है, वह भी यदि अंगुली रखकर रामायण के एक-दो पाठ कर ले तो उसको पढना आ जायेगा. वह अन्य पुस्तकें भी पढ़ना शुरू कर देगा।

104. रामायण के एक सौ आठ पाठ करने से भगवान के साथ विशेष संबंध जुड़ता है।

105. रामायण का नवाह्न-पारायण आरम्भ होने पर सूआ-सूतक हो जाय तो कोई दोष नहीं लगता।

106. रामायण का पाठ करने से बुद्धि विकसित होती है. रामायण का नावाह्न पाठ करने वाला विद्यार्थी कभी फेल नहीं होता।

107. कमरदर्द आदि के कारण कोई लेटकर रामायण का पाठ चाहे तो कर सकता है. भाव का मूल्य है. भाव पाठ में रहना चाहिए, शरीर चाहे जैसे रहे।

108. पुस्तक उल्टी नहीं रखनी चाहिए. इससे उसका निरादर होता है. सभी वस्तुएँ भगवत्स्वरूप होने से चिन्मय है। अतः किसी की वस्तु का निरादर नहीं करना चाहिए. किसी आदरणीय वस्तु का निरादर करने से वह वस्तु नष्ट हो जाती है,अथवा उसमें विकृति आ जाती है, यह मेरा अनुभव है।

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ?

ब्रह्म मुहूर्त में उठने की परंपरा क्यों ? 
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रात्रि के अंतिम प्रहर को ब्रह्म मुहूर्त कहते हैं। हमारे ऋषि मुनियों ने इस मुहूर्त का विशेष महत्व बताया है। उनके अनुसार यह समय   निद्रा त्याग के लिए सर्वोत्तम है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने से सौंदर्य, बल, विद्या, बुद्धि और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। सूर्योदय से चार घड़ी (लगभग डेढ़ घण्टे) पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में ही जग जाना चाहिये। इस समय सोना शास्त्र निषिद्ध है।

ब्रह्म का मतलब परम तत्व या परमात्मा। मुहूर्त यानी अनुकूल समय। रात्रि का अंतिम प्रहर अर्थात प्रात: 4 से 5.30 बजे का समय ब्रह्म मुहूर्त कहा गया है।

*“ब्रह्ममुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी”।*
(ब्रह्ममुहूर्त की निद्रा पुण्य का नाश करने वाली होती है।)

सिख धर्म में इस समय के लिए बेहद सुन्दर नाम है--*"अमृत वेला"*, जिसके द्वारा इस समय का महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईश्वर भक्ति के लिए यह महत्व स्वयं ही साबित हो जाता है। ईवर भक्ति के लिए यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इस समय उठने से मनुष्य को सौंदर्य, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है। उसका मन शांत और तन पवित्र होता है।

ब्रह्म मुहूर्त में उठना हमारे जीवन के लिए बहुत लाभकारी है। इससे हमारा शरीर स्वस्थ होता है और दिनभर स्फूर्ति बनी रहती है। स्वस्थ रहने और सफल होने का यह ऐसा फार्मूला है जिसमें खर्च कुछ नहीं होता। केवल आलस्य छोड़ने की जरूरत है।

पौराणिक महत्व👉  वाल्मीकि रामायण के मुताबिक माता सीता को ढूंढते हुए श्रीहनुमान ब्रह्ममुहूर्त में ही अशोक वाटिका पहुंचे। जहां उन्होंने वेद व यज्ञ के ज्ञाताओं के मंत्र उच्चारण की आवाज सुनी।

शास्त्रों में भी इसका उल्लेख है--
*वर्णं कीर्तिं मतिं लक्ष्मीं स्वास्थ्यमायुश्च विदन्ति।*
*ब्राह्मे मुहूर्ते संजाग्रच्छि वा पंकज यथा॥*

अर्थात👉  ब्रह्म मुहूर्त में उठने से व्यक्ति को सुंदरता, लक्ष्मी, बुद्धि, स्वास्थ्य, आयु आदि की प्राप्ति होती है। ऐसा करने से शरीर कमल की तरह सुंदर हो जाता हे।

ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति 
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ब्रह्म मुहूर्त और प्रकृति का गहरा नाता है। इस समय में पशु-पक्षी जाग जाते हैं। उनका मधुर कलरव शुरू हो जाता है। कमल का फूल भी खिल उठता है। मुर्गे बांग देने लगते हैं। एक तरह से प्रकृति भी ब्रह्म मुहूर्त में चैतन्य हो जाती है। यह प्रतीक है उठने, जागने का। प्रकृति हमें संदेश देती है ब्रह्म मुहूर्त में उठने के लिए।

इसलिए मिलती है सफलता व समृद्धि
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आयुर्वेद के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त में उठकर टहलने से शरीर में संजीवनी शक्ति का संचार होता है। यही कारण है कि इस समय बहने वाली वायु को अमृततुल्य कहा गया है। इसके अलावा यह समय अध्ययन के लिए भी सर्वोत्तम बताया गया है क्योंकि रात को आराम करने के बाद सुबह जब हम उठते हैं तो शरीर तथा मस्तिष्क में भी स्फूर्ति व ताजगी बनी रहती है। प्रमुख मंदिरों के पट भी ब्रह्म मुहूर्त में खोल दिए जाते हैं तथा भगवान का श्रृंगार व पूजन भी ब्रह्म मुहूर्त में किए जाने का विधान है।

*ब्रह्ममुहूर्त के धार्मिक, पौराणिक व व्यावहारिक पहलुओं और लाभ को जानकर हर रोज इस शुभ घड़ी में जागना शुरू करें तो बेहतर नतीजे मिलेंगे।*

ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाला व्यक्ति सफल, सुखी और समृद्ध होता है, क्यों? क्योंकि जल्दी उठने से दिनभर के कार्यों और योजनाओं को बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। इसलिए न केवल जीवन सफल होता है। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने वाला हर व्यक्ति सुखी और समृद्ध हो सकता है। कारण वह जो काम करता है उसमें उसकी प्रगति होती है। विद्यार्थी परीक्षा में सफल रहता है। जॉब (नौकरी) करने वाले से बॉस खुश रहता है। बिजनेसमैन अच्छी कमाई कर सकता है। बीमार आदमी की आय तो प्रभावित होती ही है, उल्टे खर्च बढऩे लगता है। सफलता उसी के कदम चूमती है जो समय का सदुपयोग करे और स्वस्थ रहे। अत: स्वस्थ और सफल रहना है तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें।

वेदों में भी ब्रह्म मुहूर्त में उठने का महत्व और उससे होने वाले लाभ का उल्लेख किया गया है।
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प्रातारत्नं प्रातरिष्वा दधाति तं चिकित्वा प्रतिगृह्यनिधत्तो।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचेत सुवीर:॥ - ऋग्वेद-1/125/1
अर्थात- सुबह सूर्य उदय होने से पहले उठने वाले व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसीलिए बुद्धिमान लोग इस समय को व्यर्थ नहीं गंवाते। सुबह जल्दी उठने वाला व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, ताकतवाला और दीर्घायु होता है।
यद्य सूर उदितोऽनागा मित्रोऽर्यमा। सुवाति सविता भग:॥ - सामवेद-35
अर्थात- व्यक्ति को सुबह सूर्योदय से पहले शौच व स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद भगवान की पूजा-अर्चना करना चाहिए। इस समय की शुद्ध व निर्मल हवा से स्वास्थ्य और संपत्ति की वृद्धि होती है।
उद्यन्त्सूर्यं इव सुप्तानां द्विषतां वर्च आददे।
अथर्ववेद- 7/16/२
अर्थात- सूरज उगने के बाद भी जो नहीं उठते या जागते उनका तेज खत्म हो जाता है।

👉 व्यावहारिक महत्व - व्यावहारिक रूप से अच्छी सेहत, ताजगी और ऊर्जा पाने के लिए ब्रह्ममुहूर्त बेहतर समय है। क्योंकि रात की नींद के बाद पिछले दिन की शारीरिक और मानसिक थकान उतर जाने पर दिमाग शांत और स्थिर रहता है। वातावरण और हवा भी स्वच्छ होती है। ऐसे में देव उपासना, ध्यान, योग, पूजा तन, मन और बुद्धि को पुष्ट करते हैं।

जैविक घड़ी पर आधारित शरीर की दिनचर्या
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👉 प्रातः 3 से 5 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से फेफड़ों में होती है। थोड़ा गुनगुना पानी पीकर खुली हवा में घूमना एवं प्राणायाम करना । इस समय दीर्घ श्वसन करने से फेफड़ों की कार्यक्षमता खूब विकसित होती है। उन्हें शुद्ध वायु (आक्सीजन) और ऋण आयन विपुल मात्रा में मिलने से शरीर स्वस्थ व स्फूर्तिमान होता है। ब्रह्म मुहूर्त में उठने वाले लोग बुद्धिमान व उत्साही होते है, और सोते रहने वालों का जीवन निस्तेज हो जाता है ।

👉 प्रातः 5 से 7 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आंत में होती है। प्रातः जागरण से लेकर सुबह 7 बजे के बीच मल-त्याग एवं स्नान का लेना चाहिए । सुबह 7 के बाद जो मल-त्याग करते है उनकी आँतें मल में से त्याज्य द्रवांश का शोषण कर मल को सुखा देती हैं। इससे कब्ज तथा कई अन्य रोग उत्पन्न होते हैं।

👉 प्रातः 7 से 9 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से आमाशय में होती है। यह समय भोजन के लिए उपर्युक्त है । इस समय पाचक रस अधिक बनते हैं। भोजन के बीच-बीच में गुनगुना पानी (अनुकूलता अनुसार) घूँट-घूँट पिये।

👉 प्रातः 11 से 1 – इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से हृदय में होती है।

👉 दोपहर 12 बजे के आस–पास मध्याह्न – संध्या (आराम) करने की हमारी संस्कृति में विधान है। इसी लिए भोजन वर्जित है । इस समय तरल पदार्थ ले सकते है। जैसे मट्ठा पी सकते है। दही खा सकते है ।

👉 दोपहर 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से छोटी आंत में होती है। इसका कार्य आहार से मिले पोषक तत्त्वों का अवशोषण व व्यर्थ पदार्थों को बड़ी आँत की ओर धकेलना है। भोजन के बाद प्यास अनुरूप पानी पीना चाहिए । इस समय भोजन करने अथवा सोने से पोषक आहार-रस के शोषण में अवरोध उत्पन्न होता है व शरीर रोगी तथा दुर्बल हो जाता है ।

दोपहर 3 से 5 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मूत्राशय में होती है । 2-4 घंटे पहले पिये पानी से इस समय मूत्र-त्याग की प्रवृति होती है।

शाम 5 से 7 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से गुर्दे में होती है । इस समय हल्का भोजन कर लेना चाहिए । शाम को सूर्यास्त से 40 मिनट पहले भोजन कर लेना उत्तम रहेगा। सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक (संध्याकाल) भोजन न करे। शाम को भोजन के तीन घंटे बाद दूध पी सकते है । देर रात को किया गया भोजन सुस्ती लाता है यह अनुभवगम्य है।

रात्री 7 से 9 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से मस्तिष्क में होती है । इस समय मस्तिष्क विशेष रूप से सक्रिय रहता है । अतः प्रातःकाल के अलावा इस काल में पढ़ा हुआ पाठ जल्दी याद रह जाता है । आधुनिक अन्वेषण से भी इसकी पुष्टी हुई है।

रात्री 9 से 11 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से रीढ़ की हड्डी में स्थित मेरुरज्जु में होती है। इस समय पीठ के बल या बायीं करवट लेकर विश्राम करने से मेरूरज्जु को प्राप्त शक्ति को ग्रहण करने में मदद मिलती है। इस समय की नींद सर्वाधिक विश्रांति प्रदान करती है । इस समय का जागरण शरीर व बुद्धि को थका देता है । यदि इस समय भोजन किया जाय तो वह सुबह तक जठर में पड़ा रहता है, पचता नहीं और उसके सड़ने से हानिकारक द्रव्य पैदा होते हैं जो अम्ल (एसिड) के साथ आँतों में जाने से रोग उत्पन्न करते हैं। इसलिए इस समय भोजन करना खतरनाक है।

रात्री 11 से 1 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से पित्ताशय में होती है । इस समय का जागरण पित्त-विकार, अनिद्रा , नेत्ररोग उत्पन्न करता है व बुढ़ापा जल्दी लाता है । इस समय नई कोशिकाएं बनती है ।

रात्री 1 से 3 -- इस समय जीवनी-शक्ति विशेष रूप से लीवर में होती है । अन्न का सूक्ष्म पाचन करना यह यकृत का कार्य है। इस समय का जागरण यकृत (लीवर) व पाचन-तंत्र को बिगाड़ देता है । इस समय यदि जागते रहे तो शरीर नींद के वशीभूत होने लगता है, दृष्टि मंद होती है और शरीर की प्रतिक्रियाएं मंद होती हैं। अतः इस समय सड़क दुर्घटनाएँ अधिक होती हैं।

नोट :-👉 ऋषियों व आयुर्वेदाचार्यों ने बिना भूख लगे भोजन करना वर्जित बताया है। अतः प्रातः एवं शाम के भोजन की मात्रा ऐसी रखे, जिससे ऊपर बताए भोजन के समय में खुलकर भूख लगे। जमीन पर कुछ बिछाकर सुखासन में बैठकर ही भोजन करें। इस आसन में मूलाधार चक्र सक्रिय होने से जठराग्नि प्रदीप्त रहती है। कुर्सी पर बैठकर भोजन करने में पाचनशक्ति कमजोर तथा खड़े होकर भोजन करने से तो बिल्कुल नहींवत् हो जाती है। इसलिए ʹबुफे डिनरʹ से बचना चाहिए।
पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र का लाभ लेने हेतु सिर पूर्व या दक्षिण दिशा में करके ही सोयें, अन्यथा अनिद्रा जैसी तकलीफें होती हैं।

शरीर की जैविक घड़ी को ठीक ढंग से चलाने हेतु रात्रि को बत्ती बंद करके सोयें। इस संदर्भ में हुए शोध चौंकाने वाले हैं। देर रात तक कार्य या अध्ययन करने से और बत्ती चालू रख के सोने से जैविक घड़ी निष्क्रिय होकर भयंकर स्वास्थ्य-संबंधी हानियाँ होती हैं। अँधेरे में सोने से यह जैविक घड़ी ठीक ढंग से चलती है।

आजकल पाये जाने वाले अधिकांश रोगों का कारण अस्त-व्यस्त दिनचर्या व विपरीत आहार ही है। हम अपनी दिनचर्या शरीर की जैविक घड़ी के अनुरूप बनाये रखें तो शरीर के विभिन्न अंगों की सक्रियता का हमें अनायास ही लाभ।। मिलेगा। इस प्रकार थोड़ी-सी सजगता हमें स्वस्थ जीवन की प्राप्ति करा देगी।

" सब सुखी और निरोगी हों !!
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वैशाखमास महात्म्य – स्कन्द पुराण से

वैशाखमास महात्म्य – स्कन्द पुराण से
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वैशाख मास की श्रेष्ठता
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नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।।
अर्थ – भगवान नारायण, नरश्रेष्ठ नर, देवी सरस्वती तथा महर्षि वेदव्यास को नमस्कार करके भगवान की विजय-कथा से परिपूर्ण इतिहास-पुराण आदि का पाठ करना चाहिए।
 
सूतजी कहते हैं – राजा अम्बरीष ने परमेष्ठी ब्रह्मा के पुत्र देवर्षि नारद से पुण्यमय वैशाख मास का माहात्म्य सुना। उस समय आपने यह कहा था कि सब महीनों में वैशाख मास श्रेष्ठ है। इसलिए यह बताने की कृपा करें कि वैशाख मास क्यों भगवान विष्णु को प्रिय है और उस समय कौन-कौन से धर्म भगवान विष्णु के लिए प्रीतिकारक हैं?

नारद जी ने कहा – वैशाख मास को ब्रह्मा जी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। वह माता की भाँति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है। धर्म, यज्ञ, क्रिया और तपस्या का सार है। संपूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है। जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मन्त्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगाजी, तेजों में सूर्य, अस्त्र-शस्त्रों में चक्र, धातुओं में सुवर्ण, वैष्णवों में शिव तथा रत्नों में कौस्तुभमणि है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाख मास सबसे उत्तम है। संसार में इसके समान भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला दूसरा कोई मास नहीं है। जो वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है, उससे भगवान विष्णु निरन्तर प्रीति करते हैं। पाप तभी तक गर्जते हैं जब तक जीव वैशाख मास में प्रात: काल जल में स्नान नहीं करता।

राजन् ! वैशाख के महीने में सब तीर्थ आदि देवता बाहर के जल में भी सदैव स्थित रहते हैं भगवान विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों का कल्याण करने के लिए वे सूर्योदय से लेकर छ: दण्ड के भीतर तक वहाँ मौजूद रहते हैं। वैशाख के समान कोई मास नहीं है, सतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है और गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं है। जल के समान दान नहीं है, खेती के समान धन नहीं है और जीवन से बढ़कर कोई लाभ नहीं है। उपवास के समान कोई तप नहीं, दान से बढ़कर कोई सुख नहीं, दया के समान धर्म नहीं, धर्म के समान मित्र नहीं, सत्य के समान यश नहीं, आरोग्य के समान उन्नति नहीं, भगवान विष्णु से बढ़कर कोई रक्षक नहीं और वैशाख मास के समान संसार में कोई पवित्र मास नहीं है। ऎसा विद्वान पुरुषों का मत है।

वैशाख श्रेष्ठ मास है और शेषशायी भगवान विष्णु को सदा प्रिय है। सब दानों से जो पुण्य होता है और सब तीर्थों में जो फल होता है, उसी को मनुष्य वैशाख मास में केवल जलदान करके प्राप्त कर लेता है। जो जलदान में असमर्थ है, ऎसे ऎश्वर्य की अभिलाषा रखने वाले पुरुष को उचित है कि वह दूसरे को प्रबोध करे, दूसरे को जलदान का महत्त्व समझावे। यह सब दानों से बढ़कर हितकारी है। जो मनुष्य वैशाख में सड़क पर यात्रियों के लिए प्याऊ लगाता है वह विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।
नृपश्रेष्ठ ! प्रपादान (प्याऊ) देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यन्त प्रीति देने वाला है। जिसने प्याऊ लगाकर रास्ते के थके-माँदे मनुष्यों को सन्तुष्ट किया है, उसने ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओं को सन्तुष्ट कर लिया है। राजन् ! वैशाख मास में जल की इच्छा रखने वाले को जल, छाया चाहने वाले को छाता और पंखे की इच्छा रखने वाले को पंखा देना चाहिए। राजेन्द्र ! जो प्यास से पीड़ित महात्मा पुरुष के लिए शीतल जल प्रदान करता है, वह उतने ही मात्र से दस हजार राजसूय यज्ञों का फल पाता है। धूप और परिश्रम से पीड़ित ब्राह्मण को जो पंखा डुलाकर हवा करता है, वह उतने ही मात्र से निष्पाप होकर भगवान का पार्षद हो जाता है।
जो मार्ग से थके हुए श्रेष्ठ द्विज को वस्त्र से भी हवा करता है, वह उतने से ही मुक्त हो भगवान विष्णु का सायुज्य परप्त कर लेता है। जो शुद्ध चित्त से ताड़ का पंखा देता है वह सब पापों का नाश करके ब्रह्मलोक को जाता है। जो विष्णुप्रिय वैशाख मास में पादुका दान करता है, वह यमदूतों का तिरस्कार करके विष्णुलोक में जाता है। जो मार्ग में अनाथों के ठहरने के लिए विश्रामशाला बनवाता है, उसके पुण्य-फल का वर्णन किया नहीं जा सकता। मध्याह्न में आये हुए ब्राह्मण अतिथि को यदि कोई भोजन दे तो उसके फल का अन्त नहीं है।   
राजन् ! अन्नदान मनुष्यों को तत्काल तृप्त करने वाला है इसलिए संसार में अन्न के समान कोई दान नहीं है। जो मनुष्य मार्ग के थके हुए ब्राह्मण के लिए आश्रय देता है उसके पुण्यफल का वर्णन किया नहीं जा सकता। भूपाल ! जो अन्नदाता है, वह माता-पिता आदि का भी विस्मरण करा देता है इसलिए तीनों लोकों के निवासी अन्नदान की ही प्रशंसा करते हैं। माता और पिता केवल जन्म के हेतु हैं पर जो अन्न देकर पालन करता है, मनीषी पुरुष इस लोक में उसी को पिता कहते हैं।
 
वैशाख स्नान के नियम
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महीरथ नाम का एक राजा था जो सदा कामनाओं में आसक्त और अजितेन्द्रिय था। वह केवल वैशाख स्नान के सुयोग से स्वत: वैकुण्ठधाम को चला गया। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं। अतएव वह सफल मास है। वैशाख मास में भगवान की प्रार्थना का मन्त्र इस प्रकार है –
 
मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ।
प्रात:स्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।।
अर्थ – हे मधुसूदन ! हे देवेश्वर माधव ! मैं मेष राशि में सूर्य के स्थित होने पर वैशाख मास में प्रात: स्नान करुँगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए।
 
तत्पश्चात निम्नांकित मन्त्र से अर्घ्य प्रदान करना चाहिए –
वैशाखे मेषगे भानौ प्रात:स्नानपरायण:।
अर्घ्यं तेSहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।
अर्थ – सूर्य के मेष राशि पर स्थित रहते हुए वैशाख मास में प्रात: स्नान के नियम में संलग्न होकर मैं आपको अर्घ्य देता हूँ। मधुसूदन ! इसे ग्रहण कीजिए।
 
इस प्रकार अर्घ्य समर्पण करके स्नान करें फिर वस्त्रों को पहनकर संध्या तर्पण आदि सब कर्मों को पूरा करके वैशाख मास में विकसित होने वाले पुष्पों से भगवान विष्णु की पूजा करें। उसके बाद वैशाख मास के माहात्म्य को सूचित करने वाली भगवान विष्णु की कथा सुने। ऎसा करने से कोटि जन्मों के पापों से मुक्त होकर मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। यह शरीर अपने अधीन है, जल भी अपने अधीन ही है, साथ ही अपनी जिह्वा भी अपने वश में है। अत: इस स्वाधीन शरीर से स्वाधीन जल में स्नान करके स्वाधीन जिह्वा से “हरि” इन दो अक्षरों का उच्चारण करें। जो वैशाख मास में तुलसीदल से भगवान विष्णु की पूजा करता है, वह विष्णु की सायुज्य मुक्ति को पाता है। अत: अनेक प्रकार के भक्तिमार्ग से तथा भाँति-भाँति के व्रतों द्वारा भगवान विष्णु की सेवा तथा उनके सगुण या निर्गुण स्वरूप का अनन्य चित्त से ध्यान करना चाहिए।
 
वैशाख मास में छत्र दान से हेमन्त का उद्धार
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नारदजी कहते हैं – एक समय विदेहराज जनक के घर दोपहर के समय श्रुतदेव नाम से विख्यात एक श्रेष्ठ मुनि पधारे, जो वेदों के ज्ञाता थे। उन्हें देखकर राजा बड़े उल्लास के साथ उठकर खड़े हो गए और मधुपर्क आदि सामग्रियों से उनकी विधिपूर्वक पूजा करके राजा ने उनके चरणोदक को अपने मस्तक पर धारण किया। इस प्रकार स्वागत-सत्कार के पश्चात जब वे आसन पर विराजमान हुए तब विदेहराज के प्रश्न के अनुसार वैशाख मास के माहात्म्य का वर्णन करते हुए वे इस प्रकार बोले।
श्रुतदेव ने कहा – राजन् ! जो लोग वैशाख मास में धूप से सन्तप्त होने वाला माहात्मा पुरुषों के ऊपर छाता लगाते हैं, उन्हें अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं।
पहले वंग देश में हेमकान्त नाम से विख्यात एक राजा थे। वे कुशकेतु के पुत्र परम बुद्धिमान और शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ थे। एक दिन वे शिकार खेलने में आसक्त होकर एक गहन वन में जा घुसे। वहाँ अनेक प्रकार के मृग और वराह आदि जन्तुओं को मारकर जब वे बहुत थक गए तब दोपहर के समय मुनियों के आश्रम पर आए। उस समय आश्रम पर उत्तम व्रत का पालन करने वाले शतर्चि नाम वाले ऋषि समाधि लगाए बैठे थे, जिन्हें बाहर के कार्यों का कुछ भी ज्ञान नहीं होता था। उन्हें निश्चल बैठे देख राजा को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने उन महात्माओं को मार डालने का निश्चय किया तब उन ऋषियों के दस हजार शिष्यों ने राजा को मना करते हुए कहा – “ओ खोटी बुद्धिवाले नरेश ! हमारे गुरु लोग इस समय समाधि में स्थित हैं, बाहर कहाँ क्या हो रहा है – इसको ये नहीं जानते इसलिए इन पर तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए।”
तब राजा ने क्रोध से विह्वल होकर शिष्य़ों से कहा – द्विजकुमारों ! मैं मार्ग से थका-माँदा यहाँ आया हूँ। अत: तुम्हीं लोग मेरा आतिथ्य करो। राजा के ऎसा कहने पर वे शिष्य बोले – “हम लोग भिक्षा माँगकर खाने वाले हैं। गुरुजनों ने हमें किसी के आतिथ्य के लिए आज्ञा नहीं दी है। हम सर्वथा गुरु के अधीन हैं। अत: तुम्हारा आतिथ्य मैसे कर सकते हैं।” शिष्यों का यह कोरा उत्तर पाकर राजा ने उन्हें मारने के लिए धनुष उठाया और इस प्रकार कहा – “मैंने हिंसक जीवों और लुटेरों के भय आदि से जिनकी अनेकों बार रक्षा की है, जो मेरे दिए हुए दानों पर ही पलते हैं, वे आज मुझे ही सिखलाते चले हैं। ये मुझे नहीं जानते, ये सभी कृतघ्न और बड़े अभिमानी हैं। इन आततायियों को मर डालने पर भी मुझे कोई दोष नहीं लगेगा।” ऎसा कहकर वे कुपित हो धनुष से बाण छोड़ने लगे।
बेचारे शिष्य आश्रम छोड़कर भय से भाग चले। भागने पर भी हेमकान्त ने उनका पीछा किया और तीन सौ शिष्यों को मर गिराया। शिष्यों के भाग जाने पर आश्रम पर जो कुछ सामग्री थी उसे राजा के पापात्मा सैनिकों ने लूट लिया। राजा के अनुमोदन से ही उन्होंने वहाँ इच्छानुसार भोजन किया। तत्पश्चात दिन बीतते-बीतते राजा सेना के साथ अपनी पुरी में आ गए। राजा कुशकेतु ने जब अपने पुत्र का यह अन्यायपूर्ण कार्य सुना तब उसे राज्य करने के अयोग्य जानकर उसकी निन्दा करते हुए उसे देश निकाला दे दिया। पिता के त्याग देने पर हेमकान्त घने वन में चला गया। वहाँ उसने बहुत वर्षों तक निवास किया। ब्रह्महत्या उसका सदा पीछा करती रहती थी इसलिए वह कहीं भी स्थिरतापूर्वक रह नहीं पाता था।
इस प्रकार उस दुष्टात्मा के अठ्ठाईस वर्ष व्यतीत हो गए। एक दिन वैशाख मास में जब दोपहर का समय हो रहा था, महामुनि त्रित तीर्थयात्रा के प्रसंग से उस वन में आए। वे धूप से अत्यन्त संतप्त और तृषा से बहुत पीड़ित थे इसलिए किसी वृक्षहीन प्रदेश में मूर्च्छित होकर गिर पड़े। दैवयोग से हेमकान्त उधर आ निकला, उसने मुनि को प्यास से पीड़ित, मूर्च्छित और थका-माँदा देख उन पर बड़ी दया की। उसने पलाश के पत्तों से छत्र बनाकर उनके ऊपर आती हुई धूप का निवारण किया। वह स्वयं मुनि के मस्तक पर छाता लगाए खड़ा हुआ और तूँबी में रखा हुआ जल उनके मुँह में डाला।
इस उपचार से मुनि को चेत(होश) हो आया और उन्होंने क्षत्रिय के दिए हुए पत्ते के छाते को लेकर अपनी व्याकुलता दूर की। उनकी इन्द्रियों में कुछ शक्ति आई और वे धीरे-धीरे किसी गाँव में पहुँच गए। उस पुण्य के प्रभाव से हेमकान्त की तीन सौ ब्रह्महत्याएँ नष्ट हो गईं। इसी समय यमराज के दूत हेमकान्त को लेने के लिए वन में आए। उन्होंने उसके प्राण लेने के लिए संग्रहणी रोग पैदा किया। उस समय प्राण छूटने की पीड़ा से छटपटाते हुए हेमकान्त ने तीन अत्यन्त भयंकर यमदूतों को देखा जिनके बाल ऊपर की ओर उठे हुए थे। उस समय अपने कर्मों को याद करके वह चुप हो गया। छत्र-दान के प्रभाव से उसको विष्णु भगवान का स्मरण हुआ।
उसके स्मरण करने पर महाविष्णु ने विष्वक् सेन से कहा – “तुम शीघ्र जाओ, यमदूतों को रोकों, हेमकान्त की रक्षा करो। अब यह निष्पाप और मेरा भक्त हो गया है। उसे नगर में ले जाकर उसके पिता को सौंप दो। साथ ही मेरे कहने से कुशकेतु को यह समझाओ कि तुम्हारे पुत्र ने अपराधी होने पर भी वैशाख मास में छत्र-दान करके एक मुनि की रक्षा की है। अत: वह पाररहित हो गया है। इस पुण्य के प्रभाव से वह मन और इन्द्रियों को अपने वश में रखने वाला दीर्घायु, शूरता और उदारता आदि गुणों से युक्त तथा तुम्हारे समान गुणवान हो गया है। इसलिए अपने महाबली पुत्र को तुम राज्य का भार सँभालने के लिए नियुक्त करो। भगवान विष्णु ने तुम्हें ऎसी ही आज्ञा दी है। इस प्रकार राजा को आदेश देकर हेमकान्त को उनके अधीन करके यहाँ लौट आओ।”
भगवान विष्णु का यह आदेश पाकर महाबली विष्वक् सेन ने हेमकान्त के पास आकर यमदूतों को रोका और अपने कल्याणमय हाथों से उसके सब अंगों में स्पर्श किया। भगवद्भक्त के स्पर्श से हेमकान्त की सारी व्याधि क्षण भर में दूर हो गई। तदनन्तर विष्वक् सेन उसके साथ राजा की पुरी में गए। उन्हें देखकर महाराज कुशकेतु ने आश्चर्ययुक्त हो भक्तिपूर्वक मस्तक झुकाकर पृथ्वी पर साष्टांग प्रणाम किया और भगवान के पार्षद का अपने घर में प्रवेश कराया। वहाँ नाना प्रकार के स्तोत्रों से उनकी स्तुति तथा वैभवों से उनका पूजन किया। तत्पश्चात महाबली विष्वक् सेन ने अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा को हेमकान्त के विषय में भगवान विष्णु ने जो संदेश दिया था, वह सब कह सुनाया। उसे सुनकर कुशकेतु ने पुत्र को राज्य पर बिठा दिया और स्वयं विष्वक् सेन की आज्ञा लेकर पत्नी सहित वन को प्रस्थान किया।
तदनन्तर महामना विष्वक् सेन हेमकान्त से पूछकर और उसकी प्रशंसा करके श्वेतद्वीप में भगवान विष्णु के समीप चले गए तब से राजा हेमकान्त वैशाख मास में बताए हुए भगवान की प्रसन्नता को बढ़ाने वाले शुभ धर्मों का प्रति वर्ष पालन करने लगे। वे ब्राह्मणभक्त, धर्मनिष्ठ, शान्त, जितेन्द्रिय, सब प्राणियों के प्रति दयालु और संपूर्ण यज्ञों की दीक्षा में स्थित रहकर सब प्रकार की संपदाओं से संपन्न हो गए। उन्होंने पुत्र-पौत्र आदि के साथ समस्त भोगों का उपभोग करके भगवान विष्णु का लोक प्राप्त किया। वैशाख मास सुख से साध्य, अतिशय पुण्य प्रदान करने वाला है। पापरूपी ईंधन को अग्नि की भाँति जलाने वाला, परम सुलभ तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष – चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।
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