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शनिवार, 30 मार्च 2024

लापता लेडीज़ में चटनी मैन के रूप में नरेंद्र खत्री ने जीता सभी दर्शकों का दिल

 लापता लेडीज़ में चटनी मैन के रूप में नरेंद्र खत्री ने जीता सभी दर्शकों का दिल




हाल ही में रिलीज हुई फिल्म "लापता लेडीज" शहर में चर्चा का विषय बन गई है, और प्रशंसक अभिनेता नरेंद्र खत्री के अच्छे प्रदर्शन, विशेष रूप से प्रिय चटनी मैन के रूप में उनकी भूमिका को देखकर बहुत उत्साहित हैं। उनके द्वारा प्रदर्शित कॉमिक टाइमिंग ने न केवल दर्शकों को हंसाया है, बल्कि उनका दिल भी जीता है

 बता दें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म प्रशंसनीय टिप्पणियों से भर गए हैं, प्रशंसकों ने चटनी मैन चरित्र के लिए अपनी प्रशंसा व्यक्त की है, जिसमें कहा गया है कि "आपने इसे #चटनीमैन चरित्र में चित्रित किया है, इस चरित्र को प्यार करें।" यह स्पष्ट है कि नरेंद्र खत्री के चित्रण ने दर्शकों के दिलों में खुशी और हंसी ला दी है।

इसका श्रेय निर्देशक किरण राव को भी जाता है, जिन्होंने इस हास्य  रोल का मंचन किया है। हास्य और भावनाओं का सहज एकीकरण राव की निर्देशकीय कुशलता को दर्शाता है। फिल्म दर्शकों को एक भावनात्मक रोलरकोस्टर यात्रा पर ले जाती है, जो यह साबित करती है कि "लापता लेडीज" सिर्फ हंसी पैदा करने वाला तमाशा नहीं है, बल्कि एक अच्छी तरह से तैयार की गई कहानी है जो दिल को छू जाती है।

चटनी मैन द्वारा लाई गई जोरदार हंसी के बीच, कोई भी हास्य और वास्तविक भावनाओं के बीच संतुलन की सराहना करने से खुद को रोक नहीं सकता है। नरेंद्र खत्री का प्रदर्शन फिल्म में एक अनूठा स्वाद जोड़ता है, जिससे "लापता लेडीज़" एक आनंददायक सिनेमाई अनुभव चाहने वालों के लिए अवश्य देखी जाने वाली फिल्म बन जाती है। जैसा कि फिल्म दर्शकों को हंसाती रहती है, यह उस जादू के प्रमाण के रूप में खड़ी है जब खत्री जैसा प्रतिभाशाली अभिनेता चटनी मैन जैसे चरित्र में कदम रखता है, जिससे हंसी इस सिनेमाई यात्रा का एक अभिन्न अंग बन जाती है।

@ नरेंद्रखत्री27
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 @narendrakhatri27

 https://rajasthan.ndtv.in/pride-of-rajasthan/won-hearts-by-acting-in-missing-ladies-actor-narendra-khatri-is-from-kota-city-5217141





बुधवार, 20 मार्च 2024

किस तस्वीर से आपका खून खौल उठा?

 

यह देखते हुए कि रक्त कैसे पानी का घोल है, आप अनुमान लगा सकते हैं कि यह उसी तापमान पर उबलेगा, है ना? खैर, हैरान होने के लिए तैयार हो जाइए इन तस्वीरों को देखकर आपका खून कितनी जल्दी उबल जाएगा!

हम ब्राइट साइड में वास्तव में अपना मन नहीं बना सकते हैं अगर ये तस्वीरें दुखद, मजाकिया, या ज्यादातर सिर्फ क्रोधित करने वाली होती हैं। हम आपको तय करने देंगे:

01. चिड़ियाघर में शेरों को समय पर भोजन न दें तो

छवि।

02. थाईलैंड में क्रूर बंदर शिकार

03. सेल्फी विद ए ट्रैप्ड वुल्फ

04। एक कुत्ते को दूसरे कुत्ते के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जा रहा है

05. इस सेल्फी को लेने के बाद उन्होंने इस शेर को बूचड़खाने में मार दिया।

06. शिकार के बाद एक गर्भवती हिरण को उसके गर्भ में मृत पाया गया है।

०७. हेलीकॉप्टर से लोमड़ियों को अमानवीय तरीके से गिराया जा रहा है ७०८ खराब सम्मानित जंगली बिल्ली और स्तनपायी प्रजातियों के साथ खराब व्यवहार किया जाना बेहद दुखद है।

यही कारण है कि पृथ्वी मर रही है और इतनी नकारात्मकता से भरी हुई है। इतने सारे इंसान सिर्फ बीमार हैं।

आश्चर्यजनक जानकारियों के लिए हमें फॉलो कीजिए।

क्रोध में दुर्वासा ऋषि ने भगवान कृष्ण और देवी रुक्मणी को दो श्राप दिए।

 

  • क्रोध में दुर्वासा ऋषि ने भगवान कृष्ण और देवी रुक्मणी को दो श्राप दिए। पहला श्राप था कि भगवान और देवी रुक्मणी का 12 साल का वियोग होगा और दूसरा श्राप दिया कि द्वारका की भूमि का पानी खारा हो जाएगा। इसी वजह से देवी रुक्मणी के भगवान द्वारकाधीश की पटरानी होने के बावजूद भी उनके निवास के लिए अलग से मंदिर बनवाया गया
  • दुर्वासा ऋषि की शर्त पूरी करने के लिए अपने रथ में घोड़ों की जगह खुद जुत गए थे भगवान द्वारकाधीश और देवी रुक्मणी
  • दुर्वासा के श्राप के चलते द्वारकानगरी का महल होने के बावजूद देवी रुक्मणी के निवास के लिए अलग से यह मंदिर बनाना पड़ा था

राजाधिराज द्वारकाधीश के मंदिर के दर्शन के बाद मैंने बेट द्वारका की ओर प्रस्थान किया। इसके लिए मुझे द्वारका से 30 किमी दूर ओखा बंदरगाह पहुंचना था, जहां से बोट से बेट द्वारका पहुंचा जाता है। द्वारका के मुख्य द्वार से बाहर निकलने के बाद लगभग 2 किमी दूर ही भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी देवी रुक्मणी का प्राचीन मंदिर है।

मंदिर में दर्शन करने के बाद जब पुजारी से बात की तो इसकी कहानी मालूम हुई कि किस तरह ऋषि दुर्वासा के श्राप के चलते भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मणी को 12 सालों का वियोग सहना पड़ा और द्वारकानगरी का महल होने के बावजूद भी माता रुक्मणी के निवास के लिए अलग से यह मंदिर बनाना पड़ा था।

सुदीर नाम के ब्राह्मण ने रुक्मणी का पत्र भगवान कृष्ण तक पहुंचाया था


रुक्मणी मंदिर में पिछले 20 साल से पुजारी के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे जयेशभाई दवे बताते हैं कि रुक्मणी माता के पत्र का श्रीमद भागवत के 10वें स्कंध में उल्लेख है। अमरावती की राजकुमारी रुक्मणी के पिता उनकी शादी शिशुपाल से करना चाहते थे, लेकिन रुक्मणी भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना पति मान चुकी थीं।

इसी के चलते उन्होंने सुदीर नाम के एक ब्राह्मण से अपने मन की बात लिखकर एक पत्र भगवान श्रीकृष्ण तक पहुंचाया था। इसी के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मणी का हरण कर चैत्र सूद एकादशी को उनसे विवाह कर लिया था। आज भी भगवान श्रीकृष्ण की शयन आरती में रुक्मणी का लिखा यही पत्र पढ़ा जाता है।

श्राप के चलते द्वारकानगरी का महल होने के बावजूद भी माता रुक्मणी के निवास के लिए यह मंदिर बनाया गया था।

रथ में खुद जुत गए थे भगवान द्वारकाधीश और देवी रुक्मणी


श्रीकृष्ण दुर्वासा ऋषि को अपना कुलगुरु मानते थे। इसीलिए भगवान कृष्ण और देवी रुक्मणी शादी के बाद दुर्वासा ऋषि के आश्रम पहुंचे। उन्होंने ऋषि से महल आकर भोजन ग्रहण करने और आशीर्वाद देने का आग्रह किया। जिसे ऋषि ने स्वीकार तो लिया, लेकिन एक शर्त रख दी की आप जिस रथ से आए हैं, उस रथ को आप दोनों को ही खींचना होगा।

भगवान ने उनकी शर्त मान ली और दोनों घोड़ों को निकालकर उनकी जगह स्वयं श्रीकृष्ण और देवी रुक्मणी रथ में जुत गए। द्वारका से करीब 23 किमी दूर टुकणी नामक गांव के पास देवी रुक्मणी को प्यास लग आई। उनकी प्यास बुझाने के लिए श्रीकृष्ण ने जमीन पर पैर का अंगूठा मारा, जिससे गंगाजल निकलने लगा, जिससे दोनों ने प्यास तो बुझा ली, लेकिन जल के लिए दुर्वासा ऋषि से नहीं पूछा, जिससे वे क्रोधित हो गए।

दुर्वासा ने 2 श्राप दिए, जिसके कोप से भगवान भी नहीं बच सके


क्रोध में दुर्वासा ऋषि ने भगवान कृष्ण और देवी रुक्मणी को दो श्राप दिए। पहला श्राप था कि भगवान और देवी रुक्मणी का 12 साल का वियोग होगा और दूसरा श्राप दिया कि द्वारका की भूमि का पानी खारा हो जाएगा। इसी वजह से देवी रुक्मणी के भगवान द्वारकाधीश की पटरानी होने के बावजूद भी उनके निवास के लिए अलग से मंदिर बनवाया गया। फिर 12 साल की तपस्या के बाद रुक्मणी वापस द्वारका आईं।

दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण यहां जल का दान किया जाता है। मान्यता है कि यहां प्रसाद के रुप में जल दान करने से भक्तों की 71 पीढ़ियों का तर्पण हो जाता है।

रुक्मणी मंदिर के पुजारी जयेशभाई।

रुक्मणी मंदिर के पुजारी कहते हैं, भक्तों के बिना तो भगवान भी उदास हो जाते हैं


रुक्मणी मंदिर के पुजारी जयेशभाई कहते हैं कि पिछले 500 सालों में पहली बार ही हुआ है कि जन्माष्टमी के पर्व पर जगत मंदिर और रुक्मणी मंदिर के पट नहीं खुल रहे हैं। यहां हर साल सप्तमी से जन्माष्टमी के बीच यानी की 4 दिनों में ही करीब 5 लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिनके आगमन से पूरी द्वारकानगरी में उत्साह का संचार हो जाता है, लेकिन इस बार यहां सिर्फ सन्नाटा है। भक्त ही मंदिर की शोभा हैं और भक्तों के बिना तो भगवान भी उदास हो जाते हैं।

कामाख्या मन्दिर का रहस्य

 

तंत्र साधना और अघोरियों के गढ़ माने जाने वाली कामाख्या मंदिर असम की राजधानी दिसपुर से लगभग 7 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर है जहां पर कामाख्या देवी मंदिर स्थित है। इस मंदिर को एक काम शक्ति पीठों में से एक माना जाता है।

चलिए अब बात करते हैं कामाख्या देवी मंदिर के रहस्य के बारे में।

कामाख्या मंदिर तीन हिस्सों में बना हुआ है। पहला हिस्सा सबसे बड़ा है और इसमें हर व्यक्तियों को जाने नहीं दिया जाता है। वही इस मंदिर के दूसरे हिस्से में माता के दर्शन होते हैं जहां पर एक पत्थर से पानी निकलता रहता है। ऐसा माना जाता है कि महीने के 3 दिन माता को रजस्वला वाला होता है और यह तीन दिनों तक मंदिर के पट बंद ही रहते हैं। 3 दिनों के बाद मंदिर के पट बड़ी धूमधाम से खोले जाते हैं।

पूरे भारत में रजस्वला यानी मासिक धर्म को अछूत माना जाता है। लड़कियों को इस दौरान अक्सर अछूत समझा जाता है। लेकिन कामाख्या के मामले में ऐसा नहीं है। यही कारण है कि यहां पर हर साल अंबुबाची मेला लगता है। और इस मेले के दौरान पास में स्थित ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है। पानी का यह लाल रंग कामाख्या देवी के मासिक धर्म के कारण होता है। फिर 3 दिनों के बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर मैं काफी भीड़ उमड़ पड़ती है।

ऐसा कहा जाता है कि जब मां को 3 दिन का राजस्वाला होता है तो सफेद रंग का कपड़ा मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है। जब 3 दिनों के बाद मंदिर का दरवाजा खोला जाता है तो यह सफेद रंग लाल रंग में बदल जाता है। और इसी कपड़ों को अंबुबाची वस्त्र कहते हैं जिसके कारण यहां पर अंबुबाची मेले का आयोजन किया जाता है। और यही वस्त्र को प्रसाद के रूप में भक्तों के बीच बांट दिया जाता है।

यहां पर कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं है जब आप इस मंदिर में प्रवेश करेंगे। तो यहां पर एक समतल चट्टान के बीच बिना विभाजन किए हुए। देवी के योनि को दर्शाता है। एक प्राकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीला रहता है। इस झरने के जल को काफी प्रभावशाली माना जाता है। और शक्तिशाली माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस जलसे नियमित सेवन से आप हर बीमारी से छुटकारा पा सकते हैं।

चित्र स्रोत गूगल

बदलाव के नाम पर गंदी हरकतें!


 

बदलाव के नाम पर गंदी हरकतें!

यह तस्वीर किसी कोठे या डांस बार की नही है, यह सिम्बियासिस इंस्टीट्यूट पुणे की है। पुणे के इस नामचीन कॉलेज में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान वहाँ की लड़कियों ने बॉलीवुड के एक गंदे गाने पर डांस किया। अब गाना गंदा था तो इसमें नृत्य कहा अच्छा हो सकता था तो इन लड़कियों ने वैसा ही कामुख डांस किया जैसा पैसे के लिए कोठे और डांस बार मे लड़किया करती है।

कोठे पर नाचने वाली महिलाओं की मजबूरी हो सकती है मगर इतने महंगे कॉलेज में पढ़ने वाली लड़कियां सम्पन्न परिवार से आती होंगी। इनके सम्पन्न परिवार में कोई समझदार व्यक्ति अपने घर की बेटियों के गंदे कारनामे देखेगा तो उसे जरूर बुरा लगेगा।

रील्स और सोशल मीडिया के नशे में महिलाएं अक्सर ऐसे वीडियो डालती है जिसमे वो कामुक दिखे ताकि उनको ज़्यादा से ज़्यादा लोग देखे और उनकी सोशल मीडिया में लोकप्रियता बढ़ जाये। हालांकि यह बात अलग है कि नासमझ और कामवासना में लिप्त लोग ही ऐसी चीजों को पसंद करते है।

इसमें सबसे बुरी बात यह है कि यह चीजें अब सीधे स्कूल और कॉलेजों में भी आ गयी है। न जाने कैसे स्कूल और कॉलेज ऐसे डांस की परमिशन दे देते है जबकि हमारी संस्कृति में विद्यालयों और महाविद्यालयों को शिक्षा का मंदिर माना जाता है।

जरूरी यह भी है कि महिलाओं और लड़कियों को यह समझाया जाए कि इस तरीके से उन्हें कुछ समय के लिए लोकप्रियता मिल भी सकती है मगर जो लोग ऐसी चीजों को देख उन्हें पसंद करेंगे असल मे वो लोग की सोच निचले स्तर की होती है जिनके लिए महिला का शरीर सिर्फ और सिर्फ भोगने के लिए बना है। यह भी बताना जरूरी है कि ऐसी कामुक चीजे सभ्य महिलाएं नही बल्कि वही महिलाएं करती है जो अपने शरीर का सहारा लेकर नग्नता के निचले स्तर में जा सकती है।

Note - मेरी खड़ी भाषा से किसी को बुरा लगा हो तो कृपया अपनी सोच को सुधारने का प्रयास करे और एक सभ्य समाज निर्माण में अपना योगदान दे।

मोदी आने के बाद..

 

*मोदी के आने के बाद पी चिदंबरम जी अपने बंगले के गमलों में करोड़ों की गोभी क्यों नहीं उगा रहे हैं ??*

*आजकल सुप्रिया सुले अपनी दस एकड़ जमीन में 20 करोड़ की फसल क्यों नहीं उगा पाती है ??*

*हरियाणा में कांग्रेस की सरकार चले जाने के बाद रॉबर्ट वाड्रा ने वहां कोई जमीन क्यों नहीं ली ??*

*यूपी से सरकार चले जाने के बाद अखिलेश यादव ने आज तक सैफई महोत्सव क्यों नहीं मनाया ??*

*बसपा सरकार के जाने के बाद मायावती के जन्मदिन पर उन्हें हीरे, ताज, नोटों से क्यों नहीं तोला गया ??*

*कांग्रेस सरकार जाने के बाद मुंबई में फिर कोई हाजी़ मस्तान, करीम लाला, दाऊद इब्राहिम पैदा क्यों नहीं हुआ ??*

*यूपी में योगी जी के सी.एम. बनने के बाद कोई अब अतीक अहमद, आजम खान, मुख्तार अंसारी जैसा बाहुबली क्यों नहीं है ??*

*यस बैंक के मालिक आदित्य पुरी को ढाई करोड़ की पेंटिंग बेचने के बाद प्रियंका गांधी ने फिर कोई पेंटिंग क्यों नहीं बेची ??*

*ए. के. एंटनी ने अपनी पत्नी के हाथ की पेंटिंग सरकार को 28 करोड़ में बेचने के बाद अपनी पत्नी से फिर से कोई पेंटिंग क्यों नहीं बनवायी ??*

*यू.पी.ए. के दस वर्षीय (2004-14) शासनकाल में सोनिया अपनी "अज्ञात" बीमारी के इलाज के लिये प्रत्येक छ: माह के अन्तराल पर "अज्ञात" देश को नियमित रुप से जाती थी। वह रहती दिल्ली में है पर उसकी उडान हमेशा केरल के एयरपोर्ट से होती थी और उसके लगेज में 4-5 बडे-बडे ट्रक हमेशा हुआ करते थे। किसी प्रकार की सिक्योरिटी -चेक का सवाल ही नहीं था, क्योंकि वह उस समय भारत की "सुपर पीएम" थी। 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद आश्चर्य जनक रुप से सोनिया की "अज्ञात" बीमारी उडन छू कैसे हो गई??*

*एक बार इस बारे में जरूर सोचना, प्रश्न वाकई गंभीर है। ऐसे और अनगिनत सवाल हैं, जिनके बारे में सोचना चाहिए!!*

जय हो,मंगल हो.


क्या आप जानते हैं कि लार्ड डलहौजी की मृत्यु कैसे हुई थी?

 

लार्ड डलहौजी की मृत्यु 19 दिसम्बर 1860 में डलहौजी के खुद के एक किले में हो गई। उसी क़िले में उसकी मृत्यु से ठीक एक साल पहले उसने अपनी बेटी एडिथ का विवाह किया था।

लेकिन डलहौजी की मृत्यु की सच्चाई को ब्रिटेन ने हमेशा दुनिया से छुपाया। बताया गया था कि डलहौजी की मृत्यु पेट की किसी बीमारी से हुई थी लेकिन यह बात सारासर झूठी थी। डलहौजी की मृत्यु कैसे हुई थी यह बात बहुत कम हीं लोगों को पता है।

भारत में अपने 7 वर्ष के कठिन और परिश्रम से भरे कार्यकाल के बाद 6 मार्च 1856 को डलहौजी ने अपने देश वापसी के यात्रा की शुरुआत "बाई दी ट्रिब्यून तो स्पिटहेड" नामक प्रसिद्ध जहाज़ से किया और 2 माह 5 दिन की यात्रा करके 11 मई 1856 को ब्रिटेन पहुँच गया।

कहा जाता है कि उसके वापसी के समय उसे भारत से बहुत सारे उपहार मिले थें। उन्हीं उपहारों में उसे एक गाय की बछिया मिली थी जो की बहुत उत्कृष्ट किस्म की थी। ब्रिटेन पहुंचने के बाद डलहौजी उस बछिया की बहुत अच्छे से देखभाल करवाता था और उसे उस बछिया को उसी किले में रखा गया था जहां बाद में डलहौजी की मृत्यु हुई।

(ब्रिटेन स्थित डलहौजी का किला)

उसकी मृत्यु के दिन उसने अपने क़िले में अपने कुछ दोस्तों को भोज पर बुलाया था। जब उसके दोस्त उसके साथ किले का भ्रमण कर रहे थें तो उनकी नजर उस बछिया, जो की अब एक गाय बन चुकी थी और उसके छोटे से बछड़े पर पड़ी। बछड़ा भी दिखने में बहुत हीं बलिष्ठ और सुंदर था।

जब डलहौजी के दोस्तों ने उन बछड़े को देखा तो उन्होंने खाने में उस बछड़े के मांस को बनाने की बात कही लेकिन डलहौजी ने उस बात के लिए इनकार कर दिया क्योंकि वो खुद उस गाय और बछड़े से बहुत प्रेम करता था। लेकिन उसके दोस्त उस बछड़े के मांस को खाने की बात पर अड़े रहे।

अंततः उसे अपने दोस्तों की बात माननी पड़ी और उसने अपने नौकरों को उस बछड़े को मारने का आदेश दे दिया।

कहा जाता है कि उस बछड़े को उसकी माँ के सामने हीं काटा जा रहा था और यह सब देख कर वह गाय बहुत ज़ोर-ज़ोर से चीख रही थी और उसकी आँखों से आंसू बह रह थें। अंत में उस गाय ने जंजीर को तोड़ दिया और दौड़कर डलहौजी के पेट में अपने सिंग चुभा दिए।

टक्कर इतनी गहरी थी कि उसके सिंग डलहौजी के पेट मे घुस गए थें और डलहौजी का पेट फट गया था। उसी वक़्त उस घाव के चलते डलहौजी की मृत्यु हो गई। इस बात को ब्रिटेन ने कभी बाहर नही आने दिया। लेकिन 1873 में डलहौजी के एक दोस्त ने जब अपनी किताब में इस घटना का जिक्र किया तब दुनिया को डलहौजी के मृत्यु का सही कारण का पता चल पाया।

आप चाहें तो इस लिंक को You Tube पर डाल कर और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

#LordDalhousie

फ़ोटो साभार: गूगल