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शनिवार, 17 जून 2023

झूठ की खेतीझूठ को हज़ार बार बोलें तो झूठ सच लगने लगता है

झूठ की खेती
झूठ को हज़ार बार बोलें तो झूठ सच लगने लगता है।
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आर्यों का बाहर से आक्रमण, यहाँ के मूल निवासियों को युद्ध कर हराना, उनकी स्त्रियों से विवाह करना, उनके पुरुषों को गुलाम बनाना, उन्हें उत्तर भारत से हरा कर सुदूर दक्षिण की ओर खदेड़ देना, अपनी वेद आधारित पूजा पद्धति को उन पर थोंपना आदि अनेक भ्रामक, निराधार बातों का प्रचार जोर-शोर से किया जाता है। 
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वैदिक वांग्मय और इतिहास के विशेषज्ञ स्वामी दयानंद सरस्वती जी का कथन इस विषय में मार्ग दर्शक है। 
स्वामीजी के अनुसार किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा कि आर्य लोग ईरान से आये और यहाँ के जंगलियों से लड़कर, जय पाकर, निकालकर इस देश के राजा हुए
(सन्दर्भ-सत्यार्थप्रकाश 8 सम्मुलास)
जो आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं वैसे ही मैं भी मानता हूँ, आर्यावर्त देश इस भूमि का नाम इसलिए है कि इसमें आदि सृष्टि से आर्य लोग निवास करते हैं इसकी अवधि उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पश्चिम में अटक और पूर्व में ब्रहमपुत्र नदी है इन चारों के बीच में जितना प्रदेश है उसको आर्यावर्त कहते और जो इसमें सदा रहते हैं उनको आर्य कहते हैं। (सन्दर्भ-स्वमंतव्यामंतव्यप्रकाश-स्वामी दयानंद)।
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स्वयं वेद क्या कहता है 
अकर्मा दस्युरभि नो अमन्तुरन्यव्रतो अमानुष: ।
त्वं तस्यामित्रहन् वध: दासस्य दम्भय ।।
ऋग्वेद 10/22/8
ऋग्वेद कहता है -
(1)"अकर्मा दस्यु: "। जो कर्मशील नही है, जो निष्क्रिय है, उदासीन है, जो आनंद प्रमोद में मस्त है, वह अकर्मा है । जिसका अच्छा खाना-पीना और मौज करना ही लक्ष्य है, वह अकर्मा है । जो अन्य के लिए कुछ सोचता नहि, वह अकर्मा है । अच्छे कार्य क्या क्या है, वह जानते हुए भी उसमें जो प्रवृत नहीं होता, वह अकर्मा है । अकर्मा दस्यु है । जो मनुष्य करनेयोग्य कार्य करने मे समर्थ है, फिर भी वह कार्य में परिणित नही होता, वह दस्यु है । दस्यु रहना अपराध है, दंडनीय है । हम अकर्मा नही, सुकर्मा बने । सुकर्मा का जीवन ओजस्वी, दीर्घायु औऱ सभी के लिए अनुकरणीय होता है ।
जो मनुष्य वेदादि शास्त्र पढ़ता है, पढाता भी है, परंतु व्यवहार में शून्य है अथवा तो विपरीत है, वह दस्यु है अर्थात् पृथ्वी पर भार रूप है ।
(2) अमन्तु: दस्यु: - अर्थात् जो मंतव्यहीन है, जिसका जीवन मे कोई खास उद्देश्य नही, जो मर्यादाओ का उल्लंघन करनेवाला है,जो मनमानी करेवाला है, वह दस्यु है , राक्षस है ।
दुराचारी सदा अपनी मनमानी करता है । श्रेष्ठ एवम् शालीन आचरण नही करनेवाला दस्यु है । जिसकी शिष्टाचार, सत्य, न्याय, धर्म , पुनर्जन्म, कर्म , आत्मा, ईश्वर किसी में भी कोई श्रद्धा विश्वास नही, वह दस्यु है, पापी है । जिसमें मननशीलता और समझदारी का अभाव है, वह दस्यु है । बिना सोचे समजे काम करनेवाले अमन्तु है । जोश में होंश खोनेवाला, क्रोधादि के आवेग में संयम न रखनेेवाला दस्यु है । उद्वेगी, असहनशीलता, छिछोरापन, नासमझी दस्युपन है, हेय है, हानिकारक है ।
(3) अन्यव्रत: दस्यु: - अर्थात् जो अन्य व्रती है, विपरीत व्यवहार करनेवाला है , वह निंदनीय है । जो मनुष्य बाहर से तो धार्मिक है, अच्छे सात्विक वस्त्र धारण करते है, सभा सत्संग में सत्य और मधुर वाणी भी प्रगट करते है, किन्तु आचरण बिलकुल उसके विपरीत है, वह दस्यु है । जो अपने निहित स्वार्थ की सिद्धि की लिए सब के सामने व्रत भी ले लेते है, परंतु वर्तन सर्वथा उल्टा करते है, एसे पोंगा पंडितो से बचना चाहिए, क्योकि वह अंदर से दस्यु, दानव होते है ।
(4) अमानुष: दस्यु: - जिस मानव में मानवता नहि, वह अमानुष है, दस्यु है । जिस मनुष्य में मनुष्यता का अभाव है, उसे अमानुष कहते है । पशु और मनुष्य के बीच का अलगावपन धर्म के कारण है । पशु कभी पशुधर्म से च्युत होता नहि, परंतु मनुष्य एक चाय की प्याली के लिए अपना ईमान खो देता है, अपने धर्म से पतित हो जाता है । अपने विचार, आचार-व्यवहार से सभी जीवमात्र का हित करनेवाला मनुष्य है, देव है ।
जिसके विचार, वाणी तथा व्यवहार से मानवजाति में दुश्चरित्रता फैलती है, वह अमानुष दस्यु है, कठोर दंड के भागी है ।
असुरता, दस्युपन, अनार्यता, दानवता प्राणिमात्र के लिए दुःखदायक है, कलंकित है ।ज्यादातर मनुष्य आर्यत्व से दूर जा रहे है । महदअंश में सभी का लक्ष्य 'येन केन प्रकारेण' केवल धन हो गया है । कैसे भी हो, सभी को बहुत जल्दी , बहुत सारा धन चाहिए, पद- प्रतिष्ठा चाहिए, कंचन- कामिनी चाहिए । नेता लोग अपने कुछ स्वार्थ के लिए राष्ट्र को बेचने के तक तैयार हो जाते है । नेताओ को केवल वोट चाहिए । कैसे भी अपना काम होना ही चाहिए । कुछ भी हो जाए, कितनी भी मारपीट करनी पड़े, जरूर हो तो दंगल - फसाद भी किया जाए, किन्तु अपनी गद्दी सलामत रहनी चाहिए । सारा समाज, सभी क्षेत्र, सारे आश्रम, सारी वर्णव्यवस्था नष्ट - भ्रष्ट हो चुकी है । अच्छे व्यक्तिओ की कोई सुनता नही, सज्जन लोग निष्क्रिय हो गए है । थोड़े से गुंडे, थोड़े से देशद्रोही सारे राष्ट्र पर हामी हो गए है । राष्ट्र खतरे में है, मानवजाति खतरे में, हिंदु (आर्य) जाति सिकुड़ चुकी है । क्या होगा मानवजीति का ? क्या होगा धर्म का, वेद का, सत्य ज्ञानविज्ञान का ?
वेद उत्तर देता है (तस्य दासस्य दंभय) उस दस्यु का नाश करो ।
हे परमेश्वर ! आप ऐसे दस्युओं का विनाश करके विभिन्न नारकीय योनियों में डालते हो । हमें भी ऐसी शक्ति, साहस, ओजस्वीता, बल व उत्साह प्रदान करे, जिससे संगठित होकर उसे हम रोक सके और परिवार, समाज, राष्ट्र तथा विश्व की रक्षा कर सके ।
आवश्यकता है सभी सज्जन संगठित हो जाए, एक समान विचारवाले हो जाए, एक समान गतिवाले हो जाए, एक लक्ष्य तथा एक मान्यतावाले हो जाए । समाज तथा राष्ट्र में दस्युओं के विनाश के लिए सर्वस्व की आहुति देने हेतु सुकर्मा संत- महात्मा मानवसमाज को प्रेरित करे और धर्म का सुस्थापन हो ऐसा घोर पुरुषार्थ किया जाय । दुष्टो का हनन और सज्जन की रक्षा होनी चाहिए ।

कार्विका - सिकंदर को हराने वाली कठगणराज्य की राजकुमारी

कार्विका - सिकंदर को हराने वाली कठगणराज्य की राजकुमारी 
राजकुमारी कार्विका सिंधु नदी के उत्तर में कठगणराज्य  की राजकुमारी थी। राजकुमारी कार्विका बहुत ही कुशल योद्धा, रणनीतिकार और दुश्मनों के युद्ध चक्रव्यूह को तोड़ने में पारंगत थी। राजकुमारी कार्विका ने अपने बचपन की सहेलियों के साथ सेना बनाई थी।

जिस उम्र में लड़कियाँ गुड्डे गुड्डी का ब्याह रचाने वाले खेल खेलते थे उस उम्र में कार्विका को शत्रु सेना का दमन कर के देश को मुक्त करवाना, शिकार करना जैसे खेल खेलना पसंद थे। राजकुमारी धनुर्विद्या के सारे कलाओं में निपुण थी। दोनो हाथो से तलवारबाजी करते मां काली का रूप प्रतीत होती थीं।

जब भयंकर तबाही मचाते हुए सिकंदर की सेना नारियों के साथ दुष्कर्म करते हुए और हर राज्य को लूटते हुए कठगणराज्य की ओर आगे बढ़ रही थी तब अपनी महिला सेना जिसका नाम राजकुमारी कार्विका ने चंडी सेना रखी थी जो कि 8000 से 8500 विदुषी नारियों की सेना थी, के साथ युद्ध करने की ठानी।

335 इ.पूर्व में सिकन्दर द्वारा अचानक आक्रमण करने पर राजकुमारी कार्विका ने सिकंदर से युद्ध किया। सिकन्दर की सेना लगभग 150000 थी और कार्विका कि सेना मात्र 8500 वीरांगनाओं की सेना थी जिसमें कोई पुरुष नहीं था। यह तथ्य ऐतिहासिक है।

सिकंदर ने पहले सोचा "सिर्फ नारी की फ़ौज है, मुट्ठीभर सैनिक काफी होंगे”। पहले 25000 की सेना का दस्ता भेजा गया उनमे से एक भी ज़िन्दा वापस नहीं आ पाया।राजकुमारी की सेना में 50 से भी कम वीरांगनाएँ घायल हुई थी पर मृत्यु किसी को छू भी नहीं पायी थी।

दूसरी युद्धनीति के अनुसार सिकंदर ने 4000 का दूसरा दस्ता भेजा। उत्तर, पूर्व और पश्चिम तीनों और से घेराबन्दी कर दी गई परंतु राजकुमारी कार्विका सिकंदर की तरह कायर नहीं थी। वह स्वयं सैन्यसंचालन कर रही थी। उनके निर्देशानुसार सेना ने तीन भागो में बंट कर लड़ाई लदी और सिकंदर की सेना पस्त हो गई।

तीसरी और अंतिम 85000 दस्ताँ का मोर्चा लिए सिकंदर स्वयं आया। नंगी तलवार लिये राजकुमारी कार्विका ने अपनी सेना के साथ सिकंदर को अपनी सेना लेकर सिंध के पार भागने पर मजबूर कर दिया। इतनी भयंकर तवाही से पूरी तरह से डर कर सैन्य बलों के साथ पीछे हटने के लिए सिकंदर मजबूर हो गया।

सिकंदर की 150000 की सेना में से 25000 के लगभग सेना शेष बची थी। हार मान कर प्राणों की भीख मांगते हुए सिकंदर ने कठगणराज्य पर दोबारा आक्रमण नहीं करने का लिखित संधिपत्र पत्र सौंप दिया कार्विका को।

इस महाप्रलयंकारी अंतिम युद्ध में कठगणराज्य के 8500 में से 2750 साहसी वीरांगनाओं ने भारत माता को अपना रक्ताभिषेक चढ़ा कर वीरगति को प्राप्त कर लिया। जिसमे से इतिहास के दस्ताबेजों में गरिण्या, मृदुला, सौरायमिनि, जया यह कुछ नाम मिलते हैं।

नमन है ऐसी वीरांगनाओं को 🙏

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