मंगलवार, 25 सितंबर 2018

संगीतमय सुंदरकांड पाठ का आयोजन - 26-09-2018 जोधाणा वृद्ध आश्रम में


एक शाम वृद्धजनों के नाम-

संगीतमय सुंदरकांड पाठ का आयोजन
शयोमित्रै सुंदरकांड मंडली सांवरिया ग्रुप, पुलिस पब्लिक प्रेस, जिओ क्लब के संयुक्त तत्वाधान में दिनांक 26.9.2018 शाम 7:15 बजे से  जोधाणा वृद्ध आश्रम में
रूपनगर प्रथम गली शिव शक्ति नगर महामंदिर तीसरी पोल के बाहर
जोधपुर शहर के विभिन्न संस्थाओं एनजीओ, समाजसेवी संस्थाओं से, समितियों से आग्रह है कि आप इस कार्यक्रम में ज्यादा से ज्यादा पधार कर इस कार्यक्रम को सफल बनावें,

मुख्य कार्यक्रम सुंदरकांड पाठ प्रस्तुति हमारे बुजुर्गों के लिए श्रद्धा एवं धन्यवाद ही उद्देश्य है,

कार्यक्रम के मुख्य गायक अभिषेक शर्मा होंगे
जितेंद्र गौड़, कैलाशचंद्र लढा  तथा  अशोक गौड़, राजेश माथुर, गोविंद गोयल, मुस्तफा, हेमंत वाजपेई, डॉ. नीलम मूंदड़ा, सुमन शर्मा, राहुल शर्मा व दीपक साउंड व सत्यप्रकाश सोनी, तरुण सोतवाल,अन्य सहयोगी उपस्थित होंगे ।


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बलात्कार का आरंभ~ यौन अपराध किसकी की देन

बलात्कार का आरंभ~
पढ़े यौन अपराध किसकी की देन~

मुझे पता है 90 % लोग बिना पढ़े ही निकल लेंगे
लेकिन मेरा निवेदन है एक बार समय निकाल कर पढ़ियेगा जरूर!!

~~आखिर भारत जैसे देवियों को पूजने वाले देश में बलात्कार की गन्दी मानसिकता कहाँ से आयी।।

~~आखिर क्या बात है कि जब प्राचीन भारत के रामायण, महाभारत आदि लगभग सभी हिन्दू-ग्रंथ के उल्लेखों में अनेकों लड़ाईयाँ लड़ी और जीती गयीं, परन्तु विजेता सेना द्वारा किसी भी स्त्री का बलात्कार होने का जिक्र नहीं है।तब आखिर ऐसा क्या हो गया ?? कि आज के आधुनिक भारत में बलात्कार रोज की सामान्य बात बन कर रह गयी है ??~

श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त की पर न ही उन्होंने और न उनकी सेना ने पराजित लंका की स्त्रियों को हाथ लगाया ।

महाभारत में पांडवों की जीत हुयी लाखों की संख्या में योद्धा मारे गए। पर किसी भी पांडव सैनिक ने किसी भी कौरव सेना की विधवा स्त्रियों को हाथ तक न लगाया ।

अब आते हैं ईसापूर्व इतिहास में~220-175 ईसापूर्व में यूनान के शासक "डेमेट्रियस प्रथम" ने भारत पर आक्रमण किया। 183 ईसापूर्व के लगभग उसने पंजाब को जीतकर साकल को अपनी राजधानी बनाया और पंजाब सहित सिन्ध पर भी राज किया। लेकिन उसके पूरे समयकाल में बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
इसके बाद "युक्रेटीदस" भी भारत की ओर बढ़ा और कुछ भागों को जीतकर उसने "तक्षशिला" को अपनी राजधानी बनाया। बलात्कार का कोई जिक्र नहीं।
"डेमेट्रियस" के वंश के मीनेंडर (ईपू 160-120) ने नौवें बौद्ध शासक "वृहद्रथ" को पराजित कर सिन्धु के पार पंजाब और स्वात घाटी से लेकर मथुरा तक राज किया परन्तु उसके शासनकाल में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं मिलता।
"सिकंदर" ने भारत पर लगभग 326-327 ई .पू आक्रमण किया जिसमें हजारों सैनिक मारे गए । इसमें युद्ध जीतने के बाद भी राजा "पुरु" की बहादुरी से प्रभावित होकर सिकंदर ने जीता हुआ राज्य पुरु को वापस दे दिया और"बेबिलोन" वापस चला गया ।विजेता होने के बाद भी "यूनानियों" (यवनों) की सेनाओं ने किसी भी भारतीय महिला के साथ बलात्कार नहीं किया और न ही "धर्म परिवर्तन" करवाया ।
इसके बाद "शकों" ने भारत पर आक्रमण किया (जिन्होंने ई.78 से शक संवत शुरू किया था)। "सिन्ध" नदी के तट पर स्थित "मीननगर" को उन्होंने अपनी राजधानी बनाकर गुजरात क्षेत्र के सौराष्ट्र , अवंतिका, उज्जयिनी,गंधार,सिन्ध,मथुरा समेत महाराष्ट्र के बहुत बड़े भू भाग पर 130 ईस्वी से 188 ईस्वी तक शासन किया। परन्तु इनके राज्य में भी बलात्कार का कोई उल्लेख नहीं।
इसके बाद तिब्बत के "युइशि" (यूची) कबीले की लड़ाकू प्रजाति "कुषाणों" ने "काबुल" और "कंधार" पर अपना अधिकार कायम कर लिया। जिसमें "कनिष्क प्रथम" (127-140ई.) नाम का सबसे शक्तिशाली सम्राट हुआ। जिसका राज्य "कश्मीर से उत्तरी सिन्ध" तथा "पेशावर से सारनाथ" के आगे तक फैला था। कुषाणों ने भी भारत पर लम्बे समय तक विभिन्न क्षेत्रों में शासन किया। परन्तु इतिहास में कहीं नहीं लिखा कि इन्होंने भारतीय स्त्रियों का बलात्कार किया हो ।
इसके बाद "अफगानिस्तान" से होते हुए भारत तक आये"हूणों" ने 520 AD के समयकाल में भारत पर अधिसंख्य बड़े आक्रमण किए और यहाँ पर राज भी किया। ये क्रूर तो थे परन्तु बलात्कारी होने का कलंक इन पर भी नहीं लगा।
इन सबके अलावा भारतीय इतिहास के हजारों साल के इतिहास में और भी कई आक्रमणकारी आये जिन्होंने भारत में बहुत मार काट मचाई जैसे "नेपालवंशी" "शक्य" आदि। पर बलात्कार शब्द भारत में तब तक शायद ही किसी को पता था।।
अब आते हैं मध्यकालीन भारत में~जहाँ से शुरू होता है इस्लामी आक्रमण
और यहीं से शुरू होता है भारत में बलात्कार का प्रचलन।
सबसे पहले 711 ईस्वी में "मुहम्मद बिन कासिम" ने सिंध पर हमला करके राजा "दाहिर" को हराने के बाद उसकी दोनों "बेटियों" को "यौनदासियों" के रूप में "खलीफा" को तोहफा भेज दिया। तब शायद भारत की स्त्रियों का पहली बार बलात्कार जैसे कुकर्म से सामना हुआ जिसमें "हारे हुए राजा की बेटियों" और "साधारण भारतीय स्त्रियों" का "जीती हुयी इस्लामी सेना" द्वारा बुरी तरह से बलात्कार और अपहरण किया गया ।
फिर आया 1001 इस्वी में "गजनवी"। इसके बारे में ये कहा जाता है कि इसने "इस्लाम को फ़ैलाने" के उद्देश्य से ही आक्रमण किया था।"सोमनाथ के मंदिर" को तोड़ने के बाद इसकी सेना ने हजारों "हिन्दू औरतों" का बलात्कार किया फिर उनको अफगानिस्तान ले जाकर "बाजारों में बोलियाँ" लगाकर"जानवरों" की तरह "बेच" दिया ।
फिर "गौरी" ने 1192 में "पृथ्वीराज चौहान" को हराने के बाद भारत में "इस्लाम का प्रकाश" फैलाने के लिए "हजारों काफिरों" को मौत के घाट उतर दिया और उसकी "फौज" ने "अनगिनत हिन्दू स्त्रियों" के साथ बलात्कार कर उनका "धर्म-परिवर्तन"करवाया।
मुहम्मद बिन कासिम से लेकर सुबुक्तगीन, बख्तियार खिलजी, जूना खाँ उर्फ अलाउद्दीन खिलजी, फिरोजशाह, तैमूरलंग, आरामशाह, इल्तुतमिश, रुकुनुद्दीन फिरोजशाह, मुइजुद्दीन बहरामशाह, अलाउद्दीन मसूद, नसीरुद्दीन महमूद, गयासुद्दीन बलबन, जलालुद्दीन खिलजी, शिहाबुद्दीन उमर खिलजी, कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी, नसरत शाह तुगलक, महमूद तुगलक, खिज्र खां, मुबारक शाह, मुहम्मद शाह, अलाउद्दीन आलम शाह, बहलोल लोदी, सिकंदर शाह लोदी, बाबर, नूरुद्दीन सलीम जहांगीर,~अपने हरम में "8000 रखैलें रखने वाला शाहजहाँ"।
इसके आगे अपने ही दरबारियों और कमजोर मुसलमानों की औरतों से अय्याशी करने के लिए "मीना बाजार" लगवाने वाला "जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर"।
मुहीउद्दीन मुहम्मद से लेकर औरंगजेब तक बलात्कारियों की ये सूची बहुत लम्बी है। जिनकी फौजों ने हारे हुए राज्य की लाखों "हिन्दू महिलाओं" "(माल-ए-गनीमत)"का बेरहमी से बलात्कार किया और "जेहाद के इनाम" के तौर पर कभी वस्तुओं की तरह "सिपहसालारों" में बांटा तो कभी बाजारों में "जानवरों की तरह उनकी कीमत लगायी" गई। ये असहाय और बेबस महिलाएं "हरमों" से लेकर"वेश्यालयों" तक में पहुँची। इनकी संतानें भी हुईं पर वो अपने मूलधर्म में कभी वापस नहीं पहुँच पायीं।
वास्तव में मध्यकालीन भारत में मुगलों द्वारा"पराजित हिन्दू (काफिर) स्त्रियों का बलात्कार" करना एक आम बात थी क्योंकि वो इसे "अपनी जीत" या "जिहाद का इनाम" (माल-ए-गनीमत) मानते थे। केवल यही नहीं इन सुल्तानों द्वारा किये अत्याचारों और असंख्य बलात्कारों के बारे में आज के किसी इतिहासकार ने नहीं लिखा। बल्कि खुद इन्हीं सुल्तानों के साथ रहने वाले लेखकों ने बड़े ही शान से अपनी कलम चलायीं और बड़े घमण्ड से अपने मालिकों द्वारा काफिरों को सबक सिखाने का विस्तृत वर्णन किया। गूगल के कुछ लिंक्स पर क्लिक करके हिन्दुओं और हिन्दू महिलाओं पर हुए "दिल दहला" देने वाले अत्याचारों के बारे में विस्तार से जान पाएँगे। वो भी पूरे सबूतों के साथ। इनके सैकड़ों वर्षों के खूनी शासनकाल में भारत की हिन्दू जनता अपनी महिलाओं का सम्मान बचाने के लिए देश के एक कोने से दूसरे कोने तक भागती और बसती रहीं।
इन मुस्लिम बलात्कारियों से सम्मान-रक्षा के लिए हजारों की संख्या में हिन्दू महिलाओं ने स्वयं को जौहर की ज्वाला में जलाकर भस्म कर लिया। ठीक इसी काल में कभी स्वच्छंद विचरण करने वाली भारतवर्ष की हिन्दू महिलाओं को भी मुस्लिम सैनिकों की दृष्टि से बचाने के लिए पर्दा-प्रथा की शुरूआत हुई।
महिलाओं पर अत्याचार और बलात्कार का इतना घिनौना स्वरूप तो 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से लेकर 1947 तक अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में भी नहीं दिखीं। अंग्रेजों ने भारत को बहुत लूटा परन्तु बलात्कारियों में वे नहीं गिने जाते।
1946 में मुहम्मद अली जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन प्लान, 1947 विभाजन के दंगों से लेकर 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम तक तो लाखों हिन्दू(काफिर) महिलाओं का बलात्कार हुआ या फिर उनका अपहरण हो गया। फिर वो कभी नहीं मिलीं। इस दौरान स्थिती ऐसी हो गयी थी कि "पाकिस्तान समर्थित मुस्लिम बहुल इलाकों" से "बलात्कार" किये बिना एक भी "हिन्दू (काफिर) स्त्री" वहां से वापस नहीं आ सकती थी। विभाजन के समय पाकिस्तान के कई स्थानों में सड़कों पर काफिर स्त्रियों की "नग्न यात्राएं (धिंड) "निकाली गयीं, "बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं"और 10 लाख से ज्यादा की संख्या में उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।~20 लाख से ज्यादा महिलाओं को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया।
इस विभाजन के दौर में हिन्दुओं को मारने वाले सबके सब विदेशी नहीं थे। इन्हें मारने वाले स्थानीय मुस्लिम भी थे। वे समूहों में कत्ल से पहले हिन्दुओं के अंग-भंग करना, आंखें निकालना, नाखुन खींचना, बाल नोचना, जिंदा जलाना, चमड़ी खींचना खासकर महिलाओं का बलात्कार करने के बाद उनके "स्तनों को काटकर" तड़पा-तड़पा कर मारना आम बात थी।
अंत में कश्मीर की बात~~19 जनवरी 1990~~सारे कश्मीरी पंडितों के घर के दरवाजों पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था "या तो मुस्लिम बन जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर कश्मीर छोड़कर भाग जाओ लेकिन अपनी औरतों को यहीं छोड़कर "।  लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पण्डित संजय बहादुर उस मंजर को याद करते हुए आज भी सिहर जाते हैं। वह कहते हैं कि "मस्जिदों के लाउडस्पीकर" लगातार तीन दिन तक यही आवाज दे रहे थे कि यहां क्या चलेगा,"निजाम-ए-मुस्तफा", 'आजादी का मतलब क्या "ला इलाहा इलल्लाह", 'कश्मीर में अगर रहना है, "अल्लाह-ओ-अकबर"कहना है।और 'असि गच्ची पाकिस्तान, बताओ "रोअस ते बतानेव सान" जिसका मतलब था कि हमें यहां अपना पाकिस्तान बनाना है, कश्मीरी पंडितों के बिना मगर कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ। सदियों का भाईचारा कुछ ही समय में समाप्त हो गया जहाँ पंडितों से ही तालीम हासिल किए लोग उनकी ही महिलाओं की अस्मत लूटने को तैयार हो गए थे। सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया की वो हिन्दुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद कश्मीरी मुस्लिम सड़कों पर उतर आये। उन्होंने कश्मीरी पंडितों के घरों को जला दिया, कश्मीर पंडित महिलाओ का बलात्कार करके, फिर उनकी हत्या करके उनके "नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया"। कुछ महिलाओं को बलात्कार कर जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया। कश्मीरी पंडित नर्स जो श्रीनगर के सौर मेडिकल कॉलेजअस्पताल में काम करती थी, का सामूहिक बलात्कार किया गया और मार मार कर उसकी हत्या कर दी गयी। बच्चों को उनकी माँओं के सामने स्टील के तार से गला घोंटकर मार दिया गया। कश्मीरी हिन्दू महिलाएँ पहाड़ों की गहरी घाटियों और भागने का रास्ता न मिलने पर ऊंचे मकानों की छतों से कूद कूद कर जान देने लगी। लेखक राहुल पंडित उस समय 14 वर्ष के थे। बाहर माहौल ख़राब था। मस्जिदों से उनके ख़िलाफ़ नारे लग रहे थे। पीढ़ियों से उनके भाईचारे से रह रहे पड़ोसी ही कह रहे थे, 'मुसलमान बनकर आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो'। राहुल पंडित के परिवार ने तीन महीने इस उम्मीद में काटे कि शायद माहौल सुधर जाए। राहुल आगे कहते हैं,"कुछ लड़के जिनके साथ हम बचपन से क्रिकेट खेला करते थे वही हमारे घर के बाहर पंडितों के ख़ाली घरों को आपस में बांटने की बातें कर रहे थे और हमारी लड़कियों के बारे में गंदी बातें कह रहे थे। ये बातें मेरे ज़हन में अब भी ताज़ा हैं।
1989 में कश्मीर में जिहाद के लिए गठित जमात-ए-इस्लामी संगठन का नारा था- 'हम सब एक, तुम भागो या मरो'। घाटी में कई कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। हालात और बदतर हो गए थे। कुल मिलाकर हजारों की संख्या में हिन्दू(काफिर) महिलाओं का बलात्कार किया गया। आज आप जिस तरह दाँत निकालकर धरती के जन्नत कश्मीर घूमकर मजे लेने जाते हैं और वहाँ के लोगों को रोजगार देने जाते हैं। उसी कश्मीर की हसीन वादियों में आज भी सैकड़ों कश्मीरी हिन्दू बेटियों की बेबस कराहें गूंजती हैं, जिन्हें केवल "हिन्दू(काफिर)" होने की सजा मिली। घर, बाजार, हाट, मैदान से लेकर उन खूबसूरत वादियों में न जाने कितनी जुल्मों की दास्तानें दफन हैं जो आज तक अनकही हैं। घाटी के खाली, जले मकान यह चीख-चीख के बताते हैं कि रातों-रात दुनिया जल जाने का मतलब कोई हमसे पूछे। झेलम का बहता हुआ पानी उन रातों की वहशियत के गवाह हैं जिसने कभी न खत्म होने वाले दाग इंसानियत के दिल पर दिए। लखनऊ में विस्थापित जीवन जी रहे कश्मीरी पंडित रविन्द्र कोत्रू के चेहरे पर अविश्वास की सैकड़ों लकीरें पीड़ा की शक्ल में उभरती हुईं बयान करती हैं कि यदि आतंक के उन दिनों में घाटी की मुस्लिम आबादी ने उनका साथ दिया होता जब उन्हें वहां से खदेड़ा जा रहा था, उनके साथ कत्लेआम हो रहा था तो किसी भी आतंकवादी में ये हिम्मत नहीं होती कि वह किसी कश्मीरी पंडित को चोट पहुंचाने की सोच पाता लेकिन तब उन्होंने हमारा साथ देने के बजाय कट्टरपंथियों के सामने घुटने टेक दिए थे या उनके ही लश्कर में शामिल हो गए थे।अभी हाल में ही आप लोगों ने टीवी पर "अबू बकर अल बगदादी" के जेहादियों को काफिर "यजीदी महिलाओं" को रस्सियों से बाँधकर कौड़ियों के भाव बेचते देखा होगा।
पाकिस्तान में खुलेआम हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर सार्वजनिक रूप से मौलवियों की टीम द्वारा धर्मपरिवर्तन कर निकाह कराते देखा होगा।~बांग्लादेश से भारत भागकर आये हिन्दुओं के मुँह से महिलाओं के बलात्कार की हजारों दुःखद घटनाएँ सुनी होंगी। यहाँ तक कि म्यांमार में भी एक काफिर बौद्ध महिला के बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हिंसा के भीषण दौर को देखा होगा। केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनियाँ में इस सोच ने मोरक्को से ले कर हिन्दुस्तान तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को धर्मान्तरित किया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता का विनाश कर दिया। परन्तु पूरी दुनियाँ में इसकी सबसे ज्यादा सजा महिलाओं को ही भुगतनी पड़ी...बलात्कार के रूप में ।
आज सैकड़ों साल की गुलामी के बाद समय बीतने के साथ धीरे-धीरे ये बलात्कार करने की मानसिक बीमारी भारत के पुरुषों में भी फैलने लगी। जिस देश में कभी नारी जाति शासन करती थीं, सार्वजनिकरूप से शास्त्रार्थ करती थीं, स्वयंवर द्वारा स्वयं अपना वर चुनती थीं, जिन्हें भारत में देवियों के रूप में श्रद्धा से पूजा जाता था आज उसी देश में छोटी-छोटी बच्चियों तक का बलात्कार होने लगा और आज इस मानसिक रोग का ये भयानक रूप देखने को मिल रहा है।

रविवार, 23 सितंबर 2018

देश की पहली स्मार्ट फेंसिंग का हुआ उद्धघाटन

देश की पहली स्मार्ट फेंसिंग का हुआ उद्धघाटन ... !!!

जम्मू में अंतरराष्ट्रीय सीमा के दो हिस्सों में अपनी तरह का यह पहला हाईटेक सर्विलांस सिस्टम तैयार किया गया है। इसकी मदद से जमीन, पानी और हवा में एक अदृश्य इलेक्ट्रानिक बैरियर होगा, जिससे सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को घुसपैठियों को पहचानने और मुश्किल इलाकों में घुसपैठ रोकने में मदद मिलेगी। भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ और अवैध आव्रजन रोकने के लिए यह पहल एक समग्र एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (सीआईबीएमएस) का हिस्सा है। मोदी => सरकार ने दोनों देशों से लगी भारतीय सीमा को पूरी तरह से सील करने के लिए यह फैसला लिया है।

=> कई उपकरणों का इस्तेमाल

स्मार्ट फेंस में सतर्कता, निगरानी, संचार और डाटा स्टोरेज के लिए कई उपकरणों का इस्तेमाल होता है। सेंसर जैसे थर्मल इमेजर, अंडरग्राउंड सेंसर, फाइबर ऑप्टिकल सेंसर, रडार और सोनार आदि उपकरण स्मार्ट फेंस में विभिन्न स्थानों जैसे एयरोस्टैट, टावर और खंभों पर लगे होते हैं। अधिकारियों ने बताया कि इस नई प्रणाली से चौबीसों घंटे सीमा की निगरानी की जा सकती है। मौसम कैसा भी हो, धूल भरी आंधी, धुंध या बरसात निगरानी में कोई दिक्कत नहीं आएगी। भविष्य में स्मार्ट फेंस पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगी 2,400 किमी तक की भारतीय सीमा को पूर्णत: सुरक्षित करने के लिए लगाई जाएगी। लेजर फेंस में अन्य उपकरण जोड़कर एक अदृश्य इलेक्ट्रानिक दीवार बनाई गई है। इस अत्याधुनिक बाड़ के सीसीटीवी फीड तत्काल बीएसएफ की एक चौकी तक पहुंचेंगी। इससे वे घुसपैठ के किसी भी प्रयास को तत्काल नाकाम कर सकेंगे। इन दो स्मार्ट फेंसों में पहली विदेशी है, जबकि दूसरी भारतीय कंपनी की देन है।

=> ऐसे काम करेगी नई फेंस

स्मार्ट फेंस में थर्मल इमेजर, इन्फ्रा-रेड और लेजर बेस्ड इंट्रूडर अलार्म की सुविधा होगी। इससे एक अदृश्य जमीनी बाड़, हवाई निगरानी के लिए एयरशिप, नायाब ग्राउंड सेंसर लगा होगा जो घुसपैठियों की किसी भी हरकत को भांपकर सुरक्षा बलों को सूचित कर देगा।

=> सुरंग से घुसपैठ होगी नाकाम

सुरंग खोदकर भारतीय सीमा में घुसपैठ अब मुमकिन नहीं होगी। सुरंग, रडार और सोनार सिस्टम से सीमा पर नदी के किनारों को सुरक्षित किया जा सकेगा। कमांड और कंट्रोल सिस्टम सभी सर्विलांस उपकरणों से डाटा को रियल टाइम में रिसीव करेंगे।

=> सुरक्षा का नया पैमाना

घुसपैठ की पिछली घटनाओं को देखते हुए जम्मू के दो इलाकों को चुना गया है। इन्फ्रा-रेड और लेजर बेस्ड इंट्रूजन डिटेक्टर्स जमीन और नदी के आस-पास के क्षेत्रों में एक अदृश्य दीवार का काम करेंगे जबकि सोनार सिस्टम नदी के रास्ते घुसपैठ की कोशिशों को पकड़ लेगा। ऐरोस्टेट तकनीक आसमान में किसी भी हरकत पर नजर रखेगी। सुरंग के रास्ते घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम करने के लिए भूमिगत सेंसर लगातार निगरानी करेंगे।

अनंत चतुर्दशी व्रत,पूजन सामग्री-विधि ओर कथा

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*आजअनंत चतुर्दशी व्रत,पूजन सामग्री-विधि ओर कथा*
*(आज 23 सितम्बर,रविवार को)*

 अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान श्री हरि (विष्णु)की पूजा की जाती है । यह व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है । इस व्रत में सूत या रेशम के धागे को लाल कुंकुम से रंग, उसमें चौदह गांठे (14 गांठे भगवान श्री हरि के द्वारा 14 लोकों की प्रतीक मानी गई है ) लगाकर राखी के तरह का अनंत बनाया जाता है । इस अनंत रूपी धागे को पूजा में भगवान पर चढ़ा कर व्रती अपने बाजु में बाँधते हैं । पुरुष दाएं तथा स्त्रियां बाएं हाथ में अनंत बाँधती है । ऐसी मान्यता है कि यह अनंत हम पर आने वाले सब संकटों से रक्षा करता है। यह अनंत डोरा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनंत फल देने वाला माना गया है।यह व्रत धन पुत्रादि की कामना से किया जाता है। इस दिन नए डोरे के अनंत को धारण करके पुराने का विसर्जन किया जाता है ।
अग्नि पुराण के अनुसार व्रत करनेवाले को एक सेर आटे की मालपुआ अथवा पूड़ी बनाकर पूजा करनी चाहिये तथा उसमें से आधी ब्राह्मण को दान दे दें और शेष को प्रसाद के रूप में बंधु-बाँधवों के साथ ग्रहण करें । इस व्रत में नमक का उपयोग निषेध बताया गया है । ऐसी मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति को अनंत रास्ते में पड़ा मिल जाये तो उसे भगवान की इच्छा समझ कर, अनंत व्रत तथा पूजन करना चाहिये । 
यह व्रत पुरुषों और स्त्रियों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला माना गया है । इस व्रत के प्रभाव से ही पाण्डवों ने अपने भाईयों सहित महाभारत का युद्ध जीत अपना खोया हुआ साम्राज्य तथा मान सम्मान पाया । 
*अनंत चतुर्दशी व्रत पूजन सामग्री*
इस पूजा में यमुना (नदी ), शेष (नाग ) तथा अनंत ( श्री हरि ) की पूजा की जाती है । इस में कलश को यमुना के प्रतीक के रूप में, दूर्बा को शेष का प्रतीक तथा 14 गांठों वाले अनंत धागे को भगवान श्री हरि के प्रतीक के रूप में पूजा की जाती है । इस में फूल, पत्ती, नैवैद्य सभी सामग्री को 14 के गुणक के रूप में उपयोग किया जाता है । ऐसा कहा जाता है कि यदि यह व्रत 14 वर्षों तक किया जाए, तो व्रती विष्णु लोक की प्राप्ति करता है।
पत्ते – 14 प्रकार के वृक्षों के
कलश (मिट्टी का )- एक
कलश पात्र (मिट्टी का )- एक 
दूर्बा 
चावल – 250ग्राम
कपूर- एक पैकेट
धूप - एक पैकेट
पुष्पों की माला – चार
फल – सामर्थ्यानुसार
पुष्प (14 प्रकार के)
अंग वस्त्र –एक
नैवैद्य( मालपुआ )
मिष्ठान्न - सामर्थ्यानुसार
अनंत सूत्र ( 14 गाँठों वाले ) – नये
अनंत सूत्र ( 14 गाँठों वाले ) – पुराने
यज्ञोपवीत( जनेऊ) – एक जोड़ा
वस्त्र
तुलसी दल
पान- पाँच
सुपारी- पाँच
लौंग – एक पैकेट
इलायची - एक पैकेट
पंचामृत(दूध,दही,घृत,शहद,शक्कर)
शेषनाग पर लेटे हुए श्री हरि की मूर्ति अथवा तस्वीर 
आसन ( कम्बल )

*पूजन विधि*
पुराणों मे इस व्रत को करने का विधान नदी या सरोवर पर उत्तम माना गया है । परंतु आज के आधुनिक युग में यह सम्भव नहीं है । अत: घर में ही पूजा स्थान पर शुद्धिकरण करके अनंत भगवान की पूजा करें तथा कथा सुने । साधक प्रात: काल स्नानादि कर नित्यकर्मों से निवृत हो जायें । सभी सामग्री को एकत्रित कर लें तथा पूजा स्थान को पवित्र कर लें। पत्नी सहित आसन पर बैठ जायें ।

*अनंत चतुर्दशी कथा*
एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।
एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर 'अंधों की संतान अंधी' कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया।
यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया।
पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा।
तब श्रीकृष्ण ने कहा- 'हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।'

*इसके लिए श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई*

प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई।
पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए।
कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे।
सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिन्य के पास आ गई।
कौंडिन्य ने सुशीला से डोरे के बारे में पूछा तो उसने सारी बात बता दी। उन्होंने डोरे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया, इससे भगवान अनंत जी का अपमान हुआ। परिणामत: ऋषि कौंडिन्य दुखी रहने लगे। उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई। इस दरिद्रता का उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने अनंत भगवान का डोरा जलाने की बात कहीं।
पश्चाताप करते हुए ऋषि कौंडिन्य अनंत डोरे की प्राप्ति के लिए वन में चले गए। वन में कई दिनों तक भटकते-भटकते निराश होकर एक दिन भूमि पर गिर पड़े।
तब अनंत भगवान प्रकट होकर बोले- 'हे कौंडिन्य! तुमने मेरा तिरस्कार किया था, उसी से तुम्हें इतना कष्ट भोगना पड़ा। तुम दुखी हुए। अब तुमने पश्चाताप किया है। मैं तुमसे प्रसन्न हूं। अब तुम घर जाकर विधिपूर्वक अनंत व्रत करो। चौदह वर्षपर्यंत व्रत करने से तुम्हारा दुख दूर हो जाएगा। तुम धन-धान्य से संपन्न हो जाओगे। कौंडिन्य ने वैसा ही किया और उन्हें सारे क्लेशों से मुक्ति मिल गई।'
श्रीकृष्ण की आज्ञा से युधिष्ठिर ने भी अनंत भगवान का व्रत किया जिसके प्रभाव से पांडव महाभारत के युद्ध में विजयी हुए तथा चिरकाल तक राज्य करते रहे।

*🙏जय श्रीराधे कृष्णा🙏*
*🙏श्री अनन्त (विष्णु)भगवान की जय🙏*
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शनिवार, 22 सितंबर 2018

पुलिस बिन एक दिन का आयोजन 22 सितम्बर को जोधपुर सूचना केंद्र में किया गया

जोधपुर|
 समाज मे पुलिस के महत्व ओर आम जनता के प्रति एक दूसरे के कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए  पुलिस पब्लिक प्रेस
द्वारा आयोजित पुलिस पब्लिक रीलेशनशिप  सेमिनार " पुलिस बिन एक दिन" का आयोजन 22 सितम्बर को सूचना केंद्र में किया गया,


 कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पूर्व न्यायाधिपति श्री गोपाल कृष्ण व्यास, महिला आयोग की सदस्या डॉ. नीलम मूँदड़ा की अध्यक्षता मे, एडीशनल एसपी (ग्रामीण) श्री खिंवसिंह जी भाटी, एडीशनल डीसीपी श्रीमती सीमा हिंगोनिया, एडीशनल डीसीपी (यातायात) श्रीमती निर्मला विश्नोई जी, डीएसपी श्री नरेंद्र चौधरी, बार कॉउंसिल के प्रदेश अध्यक्ष श्री रणजीत जी जोशी, समाज सेवी व युवा उद्यमी श्री विनोद सिंघवी जी, पुलिस पब्लिक प्रेस के राष्ट्रीय संपादक श्री पवन भूत जी की उपस्थिति मे दीप प्रवज्वलित करके किया गया|
कार्यक्रम मे राष्ट्रीय संपादक पवन भूत जी ने पुलिस पब्लिक प्रेस की कार्य प्रणाली तथा कार्यक्रम के मुख्य विषय "पुलिस बिन एक दिन " पुलिस और जनता की आपसी सहभागिता ओर कर्तव्यों पर प्रकाश डाला | समाज मे एक दिन के लिए पुलिस का होना कितना ज़रूरी है ओर पुलिस और जनता की आपसी सहभागिता विषय पर विद्यार्थियों द्वारा २ मिनिट मे अपनी बात पुलिस के उच्चाधिकारिओ के सामने प्रस्तुत की जिसका यहा कार्यक्रम मे उपस्थित अधिवक्ताओ, विद्यार्थियों, अभिभावको, अध्यापको, समाजसेवियों, गणमान्य नागरिको द्वारा तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया गया, इसमे आर्मी चिल्ड्रेन अकडमी बनाड आराधना सेन प्रथम, आदर्श विधया मंदिर बासनी की दुर्गा द्वितीय व कॅरियर पॉइंट वर्ल्ड स्कूल झालामांड की जया भाटी तृतीय स्थान पर रही इन विध्यार्थीयों को राष्ट्रपति पदक से सम्मानित पुलिस एडीशनल एसपी खिंवसिंह जी द्वारा अवॉर्ड देकर सम्मानित किया गया| आने वाले सभी प्रतिभागियों को प्रसंशा पत्र व पुलिस पब्लिक प्रेस द्वारा मेडल देकर सम्मानित किया गया| कार्यक्रम मे पधारे हुए समाजसेवी केवल जी कोठारी को "कचरे से सोना बनाना सीखे अभियान" के लिए,  स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया|

कार्यक्रम संयोजक श्री कैलाशचंद्र लढा, पुलिस पब्लिक प्रेस की टीम के जोधपुर के रिपोर्टर हेमंत बाजपेयी, सत्यप्रकाश सोनी अन्य सदस्यों मे अभिषेक शर्मा, अरुण वर्मा, कैलाश सेन, तरुण सोटवाल, परमेश्वर वैष्णव, दीपक सोनी, मनीष गुरिया, अधिवक्ता दीपक परिहार, मंच संचालन करने वाले अधिवक्ता श्री मनीष व्यास, वडोदरा के जितेंद्र पटेल, भीलवाड़ा के क्षितिज सोमानी, लक्ष्मी लक्ष्कार, संजय पूरी, आसोप से संपतलाल सोनी . सूरत से महावीर पारीक, पाली से अमर सिंह आदि को मंचासीन पुलिस अधिकारियों द्वारा स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया|

पुलिस की और से प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए सीमा हिंगोनिया जी ने कहा की सभी को पुलिस को ओर पुलिस के बारे मे जानना चाहिए ताकि समाज को अपराधमुक्त बनाने हेतु आम जनता और पुलिस की सहभागिता मे कार्य किया जा सके| महिला आयोग की डॉ. नीलम जी मूंदड़ा ने पुलिस को उनके कर्तव्य के प्रति जागरूक रहते हुए खिंवसिह जी से मंच पर संवाद किया इस पर जवाब देते हुए एडीशनल एसपी साहब ने बताया की यदि आपको कोई पुलिसकर्मी या किसी अन्य नागरिक के यातायात के नियमो का उलंघन करते दिखाई देता है तो वाट्सअप पर बने हुए पुलिस ग्रूप मे भेजे उस पर संज्ञान लेकर कार्यवाही की जाएगी| नीलम जी ने कार्यक्रम संयोजक कैलाशचंद्र लढा, हेमंत बाजपेयी, और उनकी टीम को उनके राष्ट्रीय संपादक पवन भूत जी द्वारा संचालित पुलिस पब्लिक प्रेस को जोधपुर मे शुभारंभ करने पर धन्यवाद ओर बधाई दी|
कार्यक्रम मे एडीसीपी निर्मला जी विश्नोई ये यातायात पुलिस से संबंधित नियमो की जानकारी सभी को बताते हुए जनता को संबोधित किया, पूर्व न्यायशीश श्री गोपाल कृष्ण व्यास जी ने सम्बोधित करते हुए बताया की पुलिस की वर्दी एक विश्वास है
रात मे अकेले चलते हुए पुलिस का दिखने पर अपने आपको सुरक्षित महसूस करते है और पुलिस की कार्यविधि बताते हुए सभी से जनसहयोग की अपील की |

कार्यक्रम के समापन पर अतिथियो के लिए भोजन की व्यवस्था की गई
जोधपुर मे एक ही मंच पर महिला आयोग, प्रेस, अधिवक्ता, न्यायाधिकारी, पुलिस, पब्लिक को एकट्ठा कर पुलिस पब्लिक प्रेस के संयोजक श्री कैलाशचंद्र लढा, हेमंत बाजपेयी ने बताया की पुलिस पब्लिक प्रेस के एक राष्ट्रीय टोल फ्री नंबर 1800 11 5100 जो पुलिस पब्लिक प्रेस के मध्यम से आम जनता की सहयता हेतु लोकार्पण किया हुआ है जिसमे पुलिस पब्लिक प्रेस के सभी पाठको को प्रेस के मध्यम से संगठित करने हेतु एक कार्ड दिया जाता है जिससे पूरे देश मे कही भी एक दूसरे के सहयोग हेतु प्रेस से जुड़े हुए सभी लोग  पूरे भारत मे एक दूसरे की आपस मे मदद कर सके और आम जनता की सहायता हेतु पुलिस और जनता की सहभागिता देश को अपराध मुक्त बनाने हेतु योगदान कर सके| 

राजस्थान के प्रभारी श्री तमन्ना अहमद व राष्ट्रीय संपादक पवन भूत जी ने बताया की पूरे देश मे पुलिस पब्लिक प्रेस "पुलिस बिन एक दिन", सोशियल मीडीया & यू, ये शान तिरंगा है, माँ-बाप को भूलना नही आदि कई सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम आयोजित करती रहती है एवं आगामी दिसंबर माह मे जोधपुर मे "माँ-बाप को भूलना नही" कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया जाएगा|

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