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रविवार, 23 जून 2024

ये हमारा यह श्री कृष्ण का पहरेदार दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है..!!

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*श्री कृष्ण का पहरेदार दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ*
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मगरमच्छ पानी में रहने वाला एक खतरनाक जानवर जो एक इंसानी शरीर को बिना चबाए आराम से निगल सकता है  और जिसके शरीर के ऊपर की त्वचा इतनी सख्त होती है कि इस पर बंदूक की गोली का भी कोई असर नहीं होता है।

लेकिन आज हम जिस मगरमच्छ के बारे में बात करने वाले हैं वह दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है यह जानकर आपको हैरानी जरूर होगी लेकिन यह एक सच है।

केरल के कासरगोड जिले में स्थित है भगवान विष्णु के अवतार श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का मंदिर है इसी मंदिर के किनारे बनी झील में रहता है यह शाकाहारी मगरमच्छ जिसका नाम है “बबिया”.

बबिया मगरमच्छ खाने में केवल मंदिर का बना प्रसाद ही खाता है इसके अलावा कुछ नहीं खाता इस झील में उसके साथ रहने वाली मछलियाँ उससे बिल्कुल भी भयभीत नहीं होती है बल्कि आराम से उसके पास तैरती है बिना किसी डर के अनंत पदमनाभ स्वामी मंदिर तिरुवंतपुरम में श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का एक बहुत विशाल एवं भव्य मंदिर है लेकिन  स्थानीय लोगों के हिसाब से अनंतपुर में स्थित मंदिर ही श्री अनंत पदमनाभ स्वामी का मूल स्थान है 
अनंतपुर में यह मंदिर करीब 2 एकड़ जितनी जगह में फैला हुआ है इस मंदिर के पास में एक झील भी है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रभु अनंत पद्मनाभस्वामी इसी झील के अंदर स्थित एक गुफा से होकर तिरुवंतपुरम गए थे इसी वजह से दोनों जगहों का नाम एक जैसा ही है।

मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा
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मंदिर में पूजा करने वाले स्थानीय पुजारियों के अनुसार लगभग 3000 साल पहले दिवाकर मुनि विल्व  मंगलम स्वामी  अनंतपुर के इसी मंदिर मे रहा करते थे एवं विष्णु भगवान की पूजा किया करते थे। उनकी पूजा से प्रसन्न होकर एक दिन विष्णु भगवान स्वयं एक छोटे बालक के रूप में उनके सामने प्रकट हुए एवं उनके साथ इसी आश्रम में रहने लगे, धीरे धीरे यह बालक विल्व मंगलम स्वामी के साथ घुल मिल गया एवं वह आश्रम की कार्यों में भी मुनि का हाथ बटाने लगा, समय बीतता गया और एक दिन जब विल्व  मंगलम स्वामी अपने दैनिक पूजा का कार्य कर रहे थे उस समय वह बालक उनके कार्य में विघ्न उत्पन्न कर रहा था। इस बात से परेशान होकर उन्होंने उस बालक को डाँटा और उसे पीछे की ओर धकेल दिया मुनि के इस व्यवहार से आहत होकर वह बालक यह कहते हुए पास स्थित झील मे अदृश्य हो गया कि जब भी विल्व मंगलम स्वामी उनसे मिलना चाहे वे अनंतकट के जंगलों में उसे पाएंगे। 

जब तक मुनि को अपनी भूल का एहसास हुआ कि जिस नन्हे बालक को उन्होंने डांटा है वह स्वयं भगवान विष्णु का रूप है तब तक बहुत देर हो चुकी थी और वह बालक झील मे बनी गुफा मे अद्रश्य चुका था।

झील मे बनी गुफा 
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विल्व मंगलम स्वामी स्वयं से हुई भूल का पश्चाताप करने के लिए एवं बालक से माफी मांगने के लिए उसी गुफा में प्रवेश करते हैं और वे गुफा के दूसरी और समुद्र के पास में निकलते हैं वहां पर वह देखते हैं कि समुद्र में स्वयं भगवान विष्णु विराजमान है उनके चारों और विशाल नाग लिपटे हुए हैं।

बबिया मगरमच्छ के अस्तित्व का इतिहास
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स्थानीय पुजारियों के अनुसार बबिया मगरमच्छ उसी गुफा में रहता है जहां पर भगवान श्री विष्णु के बाल अवतार श्री कृष्ण अदृश्य हुए थे। उनके अनुसार बबिया मगरमच्छ श्री कृष्ण के द्वार की पहरेदारी करता है। बबिया के बारे में सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है मंदिर के पुजारियों द्वारा इसे दिन में दो बार चावल का प्रसाद भोजन के रूप में दिया जाता है।

मंदिर में पूजा करने वाले चंद्र प्रकाश जी के अनुसार वे पिछले 10 सालों से बबिया को भोजन करा रहे हैं वे कहते हैं कि वे प्रतिदिन 1 किलो चावल स्वयं अपने हाथों से बबिया को खिलाते हैं और वह बिना उन पर आक्रमण किए या किसी अन्य मछलियों पर आक्रमण किए प्रसाद का भोजन करता है एवं अपनी गुफा में चला जाता है।

बबिया पिछले 75 सालों से इसी झील में रह रहा है।

बबिया का इतिहास
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स्थानीय लोगों के अनुसार लगभग 75 साल पहले  एक ब्रिटिश सैनिक ने बबिया से पहले इस गुफा की सुरक्षा कर रहे मगरमच्छ को मार दिया था। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही उसे सैनिक की रहस्यमयी तरीके से सांप के काटने के कारण मृत्यु हो गई। स्थानीय लोगों का मानना है कि सर्प देवता ने उसे उसके अपराध की सजा दी है।

पहले वाले मगरमच्छ की मृत्यु हो जाने के बाद बबिया मगरमच्छ उसकी जगह पर उस गुफा की पहरेदारी करने के लिए उपस्थित हो गया। ऐसा हर बार होता है जब भी गुफा की सुरक्षा में लगा हुआ मगरमच्छ मृत्यु को प्राप्त होता है उसकी जगह पर दूसरा मगरमच्छ अपने आप ही उसका स्थान ले लेता है यह कहां से आते हैं कोई नहीं जानता पर यहां पर ऐसी मान्यता है कि अगर आप इस झील में बबिया मगरमच्छ को तैरता हुआ देख लेते हैं तो आपकी किस्मत बदल सकती है बबिया अच्छे भाग्य का प्रतीक माना जाता है।

ये हमारा यह श्री कृष्ण का पहरेदार दुनिया का इकलौता शुद्ध शाकाहारी मगरमच्छ है..!!
    *🙏🏼🙏🏽🙏जय श्री कृष्ण*🙏🏻🙏🏾🙏🏿

बुधवार, 19 जून 2024

क्या आप जानते हैं कि IRCTC आपको सीट चुनने की अनुमति क्यों नहीं देता है? क्या आप विश्वास करेंगे कि इसके पीछे का तकनीकी कारण PHYSICS है।

क्या आप जानते हैं कि IRCTC आपको सीट चुनने की अनुमति क्यों नहीं देता है?  क्या आप विश्वास करेंगे कि इसके पीछे का तकनीकी कारण PHYSICS है।
 ट्रेन में सीट बुक करना किसी थिएटर में सीट बुक करने से कहीं अधिक अलग है।

 थिएटर एक हॉल है, जबकि ट्रेन एक चलती हुई वस्तु है।  इसलिए ट्रेनों में सुरक्षा की चिंता बहुत अधिक है।

 भारतीय रेलवे टिकट बुकिंग सॉफ्टवेयर को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह टिकट इस तरह से बुक करेगा जिससे ट्रेन में समान रूप से लोड वितरित किया जा सके।

 मैं चीजों को और स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण लेता हूं: कल्पना कीजिए कि S1, S2 S3... S10 नंबर वाली ट्रेन में स्लीपर क्लास के कोच हैं और प्रत्येक कोच में 72 सीटें हैं।

 इसलिए जब कोई पहली बार टिकट बुक करता है, तो सॉफ्टवेयर मध्य कोच में एक सीट आवंटित करेगा जैसे कि S5, बीच की सीट 30-40 के बीच की संख्या, और अधिमानतः निचली बर्थ (रेलवे पहले ऊपरी वाले की तुलना में निचली बर्थ को भरता है ताकि कम गुरुत्वाकर्षण केंद्र प्राप्त किया जा सके)

 और सॉफ्टवेयर इस तरह से सीटें बुक करता है कि सभी कोचों में एक समान यात्री वितरण हो और सीटें बीच की सीटों (36) से शुरू होकर गेट के पास की सीटों तक यानी 1-2 या 71-72 से निचली बर्थ से ऊपरी तक भरी जाती हैं।

 रेलवे बस एक उचित संतुलन सुनिश्चित करना चाहता है कि प्रत्येक कोच में समान भार वितरण के लिए होना चाहिए।

 इसीलिए जब आप आखिरी में टिकट बुक करते हैं, तो आपको हमेशा एक ऊपरी बर्थ और एक सीट लगभग 2-3 या 70 के आसपास आवंटित की जाती है, सिवाय इसके कि जब आप किसी ऐसे व्यक्ति की सीट नहीं ले रहे हों जिसने अपनी सीट रद्द कर दी हो।

 क्या होगा अगर रेलवे बेतरतीब ढंग से टिकट बुक करता है?  ट्रेन एक चलती हुई वस्तु है जो रेल पर लगभग 100 किमी / घंटा की गति से चलती है।
 इसलिए ट्रेन में बहुत सारे बल और यांत्रिकी काम कर रहे हैं।

 जरा सोचिए अगर S1, S2, S3 पूरी तरह से भरे हुए हैं और S5, S6 पूरी तरह से खाली हैं और अन्य आंशिक रूप से भरे हुए हैं।  जब ट्रेन एक मोड़ लेती है, तो कुछ डिब्बे अधिकतम अपकेंद्र बल (centrifugal force) का सामना करते हैं और कुछ न्यूनतम, और इससे ट्रेन के पटरी से उतरने की संभावना अधिक होती है।

 यह एक बहुत ही तकनीकी पहलू है, और जब ब्रेक लगाए जाते हैं तो कोच के वजन में भारी अंतर के कारण प्रत्येक कोच में अलग-अलग ब्रेकिंग फोर्स काम करती हैं, इसलिए ट्रेन की स्थिरता फिर से एक मुद्दा बन जाती है।

 मुझे लगा कि यह एक अच्छी जानकारी साझा करने लायक है, क्योंकि अक्सर यात्री रेलवे को उन्हें आवंटित असुविधाजनक सीटों/बर्थों का हवाला देते हुए दोष देते हैं।

✍️🏼 #WhatsApp से साभार !

सोमवार, 17 जून 2024

#जामुनभारत को जम्बू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है और यह नाम जामुन के वजह से है।आश्चर्य की बात तो है कि किसी फल के वजह से किसी देश का नामकरण किया गया

#जामुन

भारत को जम्बू द्वीप के नाम से भी जाना जाता है और यह नाम जामुन के वजह से है।आश्चर्य की बात तो है कि किसी फल के वजह से किसी देश का नामकरण किया गया !
दरअसल जामुन के कई नाम है और उन्हीं में से एक नाम है जम्बू । भारत में जामुन की बहुतायत रही है । हमारे देश में इसकी पेड़ों की संख्या लाखों-करोड़ों में है और शायद इसी कारण से यह फल हमारे देश का पहचान बन गया।

सनातन आस्था के दो प्रमुख केंद्र रामायण और महाभारत में भी यह विशेष पात्र रहा है।भगवान राम ने अपने 14 वर्ष के वनवास में मुख्य रूप से जामुन का ही सेवन किया था वहीं श्री कृष्णा के शरीर के रंग को ही जामुनी कहा गया है। संस्कृत के श्लोकों में अक्सर इस नाम का उच्चारण आता है।

जामुन विशुद्ध रूप से भारतीय फल है।भारत का हर गली - मोहल्ला ईसके स्वाद से परीचित हैं। जामुन एक मौसमी फल है। खाने में स्वादिष्ट होने के साथ ही इसके कई औषधीय गुण भी हैं। जामुन अम्लीय प्रकृति का फल है पर यह स्वाद में मीठा होता है। जामुन में भरपूर मात्रा में ग्लूकोज और फ्रुक्टोज पाया जाता है. जामुन में लगभग वे सभी जरूरी लवण पाए जाते हैं जिनकी शरीर को आवश्यकता होती है।

जामुन खाने के फायदे:
1. पाचन क्रिया के लिए जामुन बहुत फायदेमंद होता है. जामुन खाने से पेट से जुड़ी कई तरह की समस्याएं दूर हो जाती हैं.

2. मधुमेह के रोगियों के लिए जामुन एक रामबाण उपाय है. जामुन के बीज सुखाकर पीस लें. इस पाउडर को खाने से मधुमेह में काफी फायदा होता है.

3. मधुमेह के अलावा इसमें कई ऐसे तत्व पाए जाते हैं जो कैंसर से बचाव में कारगर होते हैं. इसके अलावा पथरी की रोकथाम में भी जामुन खाना फायदेमंद होता है. इसके बीज को बारीक पीसकर पानी या दही के साथ लेना चाहिए.

4. अगर किसी को दस्त हो रहे जामुन को सेंधा नमक के साथ खाना फायदेमंद रहता है. खूनी दस्त होने पर भी जामुन के बीज बहुत फायदेमंद साबित होते हैं.

5. दांत और मसूड़ों से जुड़ी कई समस्याओं के समाधान में जामुन विशेषतौर पर फायदेमंद होता है. इसके बीज को पीस लीजिए. इससे मंजन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं, जामुन मधुमेह के रोगियों के लिए रामबाण है। यह पाचनतंत्र को तंदुरुस्त रखता हैं। साथ ही दांत और मसूड़े के लिए बेहद फायदेमंद है। जामुन में कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और पोटैशियम होता है। आयुर्वेद में जामुन को खाने के बाद खाने की सलाह दी जाती है। 

जामुन के लकड़ी का भी कोई जबाव नहीं है। एक बेहतरीन इमारती लकड़ी होने के साथ ईसके पानी मे टिके रहने की बाकमाल शक्ति है‌। अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल या हरी काई नहीं जमती सो टंकी को लम्बे समय तक साफ़ नहीं करना पड़ता |प्राचीन समय में जल स्रोतों के किनारे जामुन की बहुतायत होने की यही कारण था इसके पत्ते में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो कि पानी को हमेशा साफ रखते हैं। कुए के किनारे अक्सर जामुन के पेड़ लगाए जाते थे।

जामुन की एक खासियत है कि इसकी लकड़ी पानी में काफी समय
तक सड़ता नही है। जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़े पैमाने पर होता है।
जामुन औषधीय गुणों का भण्डार होने के साथ ही किसानो के लिए भी उतना ही अधिक आमदनी देने वाला फल है ।

  नदियों और नहरों के किनारे मिट्टी के क्षरण को रोकने के लिए जामुन का पेड़ काफी उपयोगी है। अभी तक व्यवसायिक तौर पर योजनाबद्ध तरीके से जामुन की खेती बहुत कम देखने को मिलती हैं। देश के अधिकांश हिस्से में अनियोजित तरीके से ही किसान इसकी खेती करते हैं।अधिकतर किसान जामुन के लाभदायक फल और बाजार के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं, शायद इसी कारणवश वो जामुन की व्यवसायिक खेती से दूर हैं।जबकि सच्चाई यह है कि जामुन के फलों को अधिकतर लोग पसंद करते हैं और इसके फल को अच्छी कीमत में बेचा जाता है।

जामुन की खेती में लाभ की असीमित संभावनाएं हैं।इसका प्रयोग दवाओं को तैयार करने में किया जाता है, साथ ही जामुन से जेली, मुरब्बा जैसी खाद्य सामग्री तैयार की जाती है।

सबसे खास बात कि जामुन हम भारतीयों की पहचान रही है अतः इस वृक्ष के संरक्षण और संवर्धन में हम सभी को अपना योगदान देना चाहिए।
साभार 🙏

रविवार, 16 जून 2024

फूल (अस्थियों) का गंगा आदि पवित्र नदियों में विसर्जन क्यों?

फूल (अस्थियों) का गंगा आदि पवित्र नदियों में विसर्जन क्यों? 
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मृतक की अस्थियों (हड्डियों) को धार्मिक दृष्टिकोण से 'फूल' कहते हैं। इसमें अगाध श्रद्धा और आदर प्रकट करने का भाव निहित होता है। जहां संतान फल है, वहीं पूर्वजों की अस्थियां 'फूल' कहलाती हैं।

इन्हें गंगा जैसी पवित्र नदी में विसर्जन करने के दो कारण बताए गए हैं। पहला कूर्मपुराण के मतानुसार

यावदस्वीनि गंगायां तिष्ठन्ति पुरुषस्य तु ।
तावद् वर्ष सहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ॥ 31 ॥ 

तीर्थानां परमं तीर्थ नदीनां परमा नदी। मोक्षदा सर्वभूतानां महापातकीनामपि ॥ 32 ॥ 

सर्वत्र सुलभा गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा । गंगाद्वारे प्रयागे च गंगासागरसंगमे ॥ 33॥ 

सर्वेषामेव भूतानां पापोपहतचेतसाम् ।
गतिमन्वेषमाणानां नास्ति गंगासमा गतिः ॥ 34 ॥

-कूर्मपुराण 35 31-34

अर्थात् जितने वर्ष तक पुरुष की अस्थियां (फूल) गंगा में रहती हैं, उतने हजार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में पूजित होता है। गंगा को सभी तीर्थों में परम तीर्थ और नदियों में श्रेष्ठ नदी माना गया है, वह सभी प्राणियों, यहां तक कि महापातकियों को भी मोक्ष प्रदान करने वाली हैं। गंगा सर्व-साधारण के लिए सर्वत्र सुलभ होने पर भी हरिद्वार, प्रयाग एवं गंगासागर-इन तीनों स्थानों में दुर्लभ होती है। उत्तम गति की इच्छा करने वाले तथा पाप से उपहत चित्त वाले सभी प्राणियों के लिए गंगा के समान और कोई दूसरी गति नहीं है।

मृतक की पंचांग अस्थियों को गंगा में विसर्जित करने के संबंध में शास्त्रकार कहते हैं।

यावदस्थीनि गंगायां तिष्ठिन्ति पुरुषस्य च। तावद्वर्ष सहस्राणि ब्रह्मलोके महीयते ॥

-शंखस्मृति 

अर्थात मृतक की अस्थियां जब तक गंगा में रहती हैं, तब तक मृतात्मा शुभ लोकों में निवास करता हुआ हजारों वर्षों तक आनन्दोपभोग करता है।

धार्मिक लोगों में यह भी मान्यता है कि तब तक मृतात्मा की परलोक यात्रा प्रारंभ नहीं होती, जब तक कि उसके फूल गंगा में विसर्जित नहीं कर दिए जाते।

दूसरा, मृतक की अस्थियों को गंगा आदि पवित्र नदियों में विसर्जन करने की प्रथा के पीछे भी वैज्ञानिक तथ्य छुपा हुआ है। चूंकि गंगा नदी से सैकड़ों वर्ग मील भूमि को सींचकर उपजाऊ बनाया जाता है, जिससे उसके निरंतर प्रवाह के कारण भी उपजाऊ शक्ति घटती रहती है। ऐसे में गंगा में फास्फोरस की उपलब्धता बनी रहे, इसीलिए उसमें अस्थि विसर्जन करने की परंपरा बनाई गई है, ताकि फास्फोरस से युक्त खाद, पानी द्वारा अधिक पैदावार उत्पन्न की जा सके। उल्लेखनीय है कि फास्फोरस भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाए रखने के लिए एक आवश्यक तत्त्व होता है, जो हमारी हड्डियों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है।
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वाल्मीकि रामायण अनुसार ऋषि विश्वामित्र द्वारा कही गई मा गंगा जन्म की कथा

वाल्मीकि रामायण अनुसार ऋषि विश्वामित्र द्वारा कही गई मा गंगा जन्म की कथा
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ऋषि विश्वामित्र ने इस प्रकार कथा सुनाना आरम्भ किया, "पर्वतराज हिमालय की अत्यंत रूपवती, लावण्यमयी एवं सर्वगुण सम्पन्न दो कन्याएँ थीं। सुमेरु पर्वत की पुत्री मैना इन कन्याओं की माता थीं। हिमालय की बड़ी पुत्री का नाम गंगा तथा छोटी पुत्री का नाम उमा था। गंगा अत्यन्त प्रभावशाली और असाधारण दैवी गुणों से सम्पन्न थी। वह किसी बन्धन को स्वीकार न कर मनमाने मार्गों का अनुसरण करती थी। उसकी इस असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर देवता लोग विश्व के क्याण की दृष्टि से उसे हिमालय से माँग कर ले गये। पर्वतराज की दूसरी कन्या उमा बड़ी तपस्विनी थी। उसने कठोर एवं असाधारण तपस्या करके महादेव जी को वर के रूप में प्राप्त किया।"

विश्वामित्र के इतना कहने पर राम ने कहा, "गे भगवन्! जब गंगा को देवता लोग सुरलोक ले गये तो वह पृथ्वी पर कैसे अवतरित हुई और गंगा को त्रिपथगा क्यों कहते हैं?" इस पर ऋषि विश्वामित्र ने बताया, "महादेव जी का विवाह तो उमा के साथ हो गया था किन्तु सौ वर्ष तक भी उनके किसी सन्तान की उत्पत्ति नहीं हुई। एक बार महादेव जी के मन में सन्तान उत्पन्न करने का विचार आया। जब उनके इस विचार की सूचना ब्रह्मा जी सहित देवताओं को मिली तो वे विचार करने लगे कि शिव जी के सन्तान के तेज को कौन सम्भाल सकेगा? उन्होंने अपनी इस शंका को शिव जी के सम्मुख प्रस्तुत किया। उनके कहने पर अग्नि ने यह भार ग्रहण किया और परिणामस्वरूप अग्नि के समान महान तेजस्वी स्वामी कार्तिकेय का जन्म हुआ। देवताओं के इस षड़यंत्र से उमा के सन्तान होने में बाधा पड़ी तो उन्होंने क्रुद्ध होकर देवताओं को शाप दे दिया कि भविष्य में वे कभी पिता नहीं बन सकेंगे। इस बीच सुरलोक में विचरण करती हुई गंगा से उमा की भेंट हुई। गंगा ने उमा से कहा कि मुझे सुरलोक में विचरण करत हुये बहुत दिन हो गये हैं। मेरी इच्छा है कि मैं अपनी मातृभूमि पृथ्वी पर विचरण करूँ। उमा ने गंगा आश्वासन दिया कि वे इसके लिये कोई प्रबन्ध करने का प्रयत्न करेंगी। 

"वत्स राम! तुम्हारी ही अयोध्यापुरी में सगर नाम के एक राजा थे। उनके कोई पुत्र नहीं था। सगर की पटरानी केशिनी विदर्भ प्रान्त के राजा की पुत्री थी। केशिनी सुन्दर, धर्मात्मा और सत्यपरायण थी। सगर की दूसरी रानी का नाम सुमति थी जो राजा अरिष्टनेमि की कन्या थी। दोनों रानियों को लेकर महाराज सगर हिमालय के भृगुप्रस्रवण नामक प्रान्त में जाकर पुत्र प्राप्ति के लिये तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महर्षि भृगु ने उन्हें वर दिया कि तुम्हें बहुत से पुत्रों की प्राप्ति होगी। दोनों रानियों में से एक का केवल एक ही पुत्र होगा जो कि वंश को बढ़ायेगा और दूसरी के साठ हजार पुत्र होंगे। कौन सी रानी कितने पुत्र चाहती है इसका निर्णय वे स्वयं आपस में मिलकर कर लें। केशिनी ने वंश को बढ़ाने वाले एक पुत्र की कामना की और गरुड़ की बहन सुमति ने साठ हजार बलवान पुत्रों की।

उचित समय पर रानी केशिनी ने असमंजस नामक पुत्र को जन्म दिया। रानी सुमति के गर्भ से एक तूंबा निकल जिसे फोड़ने पर छोटे छोटे साठ हजार पुत्र निकले। उन सबका पालन पोषण घी के घड़ों में रखकर किया गया। कालचक्र बीतता गया और सभी राजकुमार युवा हो गये। सगर का ज्येष्ठ पुत्र असमंजस बड़ा दुराचारी था और उसे नगर के बालकों को सरयू नदी में फेंक कर उन्हें डूबते हुये देखने में बड़ा आनन्द आता था। इस दुराचारी पुत्र से दुःखी होकर सगर ने उसे अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। असमंजस के अंशुमान नाम का एक पुत्र था। अंशुमान अत्यंत सदाचारी और पराक्रमी था। एक दिन राजा सगर के मन में अश्वमेघ यज्ञ करवाने का विचार आया। शीघ्र ही उन्होंने अपने इस विचार को कार्यरूप में परिणित कर दिया।

राम ने ऋषि विश्वामित्र से कहा, "गुरुदेव! मेरी रुचि अपने पूर्वज सगर की यज्ञ गाथा को विस्तारपूर्वक सुनने में है। अतः कृपा करके इस वृतान्त को पूरा पूरा सुनाइये।" राम के इस तरह कहने पर ऋषि विश्वामित्र प्रसन्न होकर कहने लगे, " राजा सगर ने हिमालय एवं विन्ध्याचल के बीच की हरी भरी भूमि पर एक विशाल यज्ञ मण्डप का निर्माण करवाया। फिर अश्वमेघ यज्ञ के लिये श्यामकर्ण घोड़ा छोड़कर उसकी रक्षा के लिये पराक्रमी अंशुमान को सेना के साथ उसके पीछे पीछे भेज दिया। यज्ञ की सम्भावित सफलता के परिणाम की आशंका से भयभीत होकर इन्द्र ने एक राक्षस का रूप धारण करके उस घोड़े को चुरा लिया। घोड़े की चोरी की सूचना पाकर सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को आदेश दिया कि घोड़ा चुराने वाले को पकड़कर या मारकर घोड़ा वापस लाओ। पूरी पृथ्वी में खोजने पर भी जब घोड़ा नहीं मिला तो, इस आशंका से कि किसीने घोड़े को तहखाने में न छुपा रखा हो, सगर के पुत्रों ने सम्पूर्ण पृथ्वी को खोदना आरम्भ कर दिया। उनके इस कार्य से असंख्य भूमितल निवासी प्राणी मारे गये। खोदते खोदते वे पाताल तक जा पहुँचे। उनके इस नृशंस कृत्य की देवताओं ने ब्रह्मा जी से शिकायत की तो ब्रह्मा जी ने कहा कि ये राजकुमार क्रोध एवं मद में अन्धे होकर ऐसा कर रहे हैं। पृथ्वी की रक्षा कर दायित्व कपिल पर है इसलिये वे इस विषय में कुछ न कुछ अवश्य करेंगे। पूरी पृथ्वी को खोदने के बाद भी जब घोड़ा और उसको चुराने वाला चोर नहीं मिला तो निराश होकर राजकुमारों ने इसकी सूचना अपने पिता को दी। रुष्ट होकर सगर ने आदेश दिया कि घोड़े को पाताल में जाकर ढूंढो। पाताल में घोड़े को खोजते खोजते वे सनातन वसुदेव कपिल के आश्रम में पहुँच गये। उन्होंने देखा कपिलदेव आँखें बन्द किये बैठे हैं और उन्हीं के पास यज्ञ का वह घोड़ा बँधा हुआ है। उन्होंने कपिल मुनि को घोड़े का चोर समझकर उनके लिये अनेक दुर्वचन कहे और उन्हें मारने के लिये दौड़े। सगर के इन कुकृत्यों से कपिल मुनि की समाधि भंग हो गई। उन्होंने क्रुद्ध होकर सगर के उन सब पुत्रों को भस्म कर दिया। 

"जब महाराज सगर को बहुत दिनों तक अपने पुत्रों की सूचना नहीं मिली तो उन्होंने अपने तेजस्वी पौत्र अंशुमान को अपने पुत्रों तथा घोड़े का पता लगाने के लिये आदेश दिया। वीर अंशुमान शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित होकर उसी मार्ग से पाताल की ओर चल पड़ा जिसे उसके चाचाओं ने बनाया था।

मार्ग में जो भी पूजनीय ऋषि मुनि मिले उनका यथोचित सम्मान करके अपने लक्ष्य के विषय में पूछता हुआ उस स्थान तक पहुँच गया जहाँ पर उसके चाचाओं के भस्मीभूत शरीरों की राख पड़ी थी और पास ही यज्ञ का घोड़ा चर रहा था। अपने चाचाओं के भस्मीभूत शरीरों को देखकर उसे बहुत दुःख हुआ। उसने उनका तर्पण करने के लिये जलाशय की खोज की किन्तु उसे कहीं जलाशय दिखाई नहीं पड़ा। तभी उसकी दृष्टि अपने चाचाओं के मामा गरुड़ पर पड़ी। उन्हें सादर प्रणाम करके अंशुमान ने पूछा कि बाबाजी! मैं इनका तर्पण करना चाहता हूँ। पास में यदि कोई सरोवर हो तो कृपा करके उसका पता बताइये। यदि आप इनकी मृत्यु के विषय में कुछ जानते हैं तो वह भी मुझे बताने की कृपा करें। गरुड़ जी ने बताया कि किस प्रकार उसके चाचाओं ने कपिल मुनि के साथ उद्दण्ड व्यवहार किया था जिसके कारण कपिल मुनि ने उन सबको भस्म कर दिया। इसके पश्चात् गरुड जी ने अंशुमान से कहा कि ये सब अलौकिक शक्ति वाले दिव्य पुरुष के द्वारा भस्म किये गये हैं अतः लौकिक जल से तर्पण करने से इनका उद्धार नहीं होगा, केवल हिमालय की ज्येष्ठ पुत्री गंगा के जल से ही तर्पण करने पर इनका उद्धार सम्भव है। अब तुम घोड़े को लेकर वापस चले जाओ जिससे कि तुम्हारे पितामह का यज्ञ पूर्ण हो सके। गरुड़ जी की आज्ञानुसार अंशुमान वापस अयोध्या पहुँचे और अपने पितामह को सारा वृतान्त सुनाया। महाराज सगर ने दुःखी मन से यज्ञ पूरा किया। वे अपने पुत्रों के उद्धार करने के लिये गंगा को पृथ्वी पर लाना चाहते थे पर ऐसा करने के लिये उन्हें कोई भी युक्ति न सूझी।" 

थोड़ा रुककर ऋषि विश्वामित्र कहा, "महाराज सगर के देहान्त के पश्चात् अंशुमान बड़ी न्यायप्रियता के साथ शासन करने लगे। अंशुमान के परम प्रतापी पुत्र दिलीप हुये। दिलीप के वयस्क हो जाने पर अंशुमान दिलीप को राज्य का भार सौंप कर हिमालय की कन्दराओं में जाकर गंगा को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लगे किन्तु उन्हें सफलता नहीं प्राप्त हो पाई और उनका स्वर्गवास हो गया। इधर जब राजा दिलीप का धर्मनिष्ठ पुत्र भगीरथ बड़ा हुआ तो उसे राज्य का भार सौंपकर दिलीप भी गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिये तपस्या करने चले गये। पर उन्हें भी मनवांछित फल नहीं मिला। भगीरथ बड़े प्रजावत्सल नरेश थे किन्तु उनकी कोई सन्तान नहीं हुई। इस पर वे अपने राज्य का भार मन्त्रियों को सौंपकर स्वयं गंगावतरण के लिये गोकर्ण नामक तीर्थ पर जाकर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी अभूतपूर्व तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें वर माँगने के लिये कहा। भगीरथ ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभो! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे यह वर दीजिये कि सगर के पुत्रों को मेरे प्रयत्नों से गंगा का जल प्राप्त हो जिससे कि उनका उद्धार हो सके। इसके अतिरिक्त मुझे सन्तान प्राप्ति का भी वर दीजिये ताकि इक्ष्वाकु वंश नष्ट न हो। ब्रह्मा जी ने कहा कि सन्तान का तेरा मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा, किन्तु तुम्हारे माँगे गये प्रथम वरदान को देने में कठिनाई यह है कि जब गंगा जी वेग के साथ पृथ्वी पर अवतरित होंगीं तो उनके वेग को पृथ्वी संभाल नहीं सकेगी। गंगा जी के वेग को संभालने की क्षमता महादेव जी के अतिरिक्त किसी में भी नहीं है। इसके लिये तुम्हें महादेव जी को प्रसन्न करना होगा। इतना कह कर ब्रह्मा जी अपने लोक को चले गये।

"भगीरथ ने साहस नहीं छोड़ा। वे एक वर्ष तक पैर के अँगूठे के सहारे खड़े होकर महादेव जी की तपस्या करते रहे। केवल वायु के अतिरिक्त उन्होंने किसी अन्य वस्तु का भक्षण नहीं किया। अन्त में इस महान भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव जी ने भगीरथ को दर्शन देकर कहा कि हे भक्तश्रेष्ठ! हम तेरी मनोकामना पूरी करने के लिये गंगा जी को अपने मस्तक पर धारण करेंगे। इसकी सूचना पाकर विवश होकर गंगा जी को सुरलोक का परित्याग करना पड़ा। उस समय वे सुरलोक से कहीं जाना नहीं चाहती थीं, इसलिये वे यह विचार करके कि मैं अपने प्रचण्ड वेग से शिव जी को बहा कर पाताल लोक ले जाऊँगी वे भयानक वेग से शिव जी के सिर पर अवतरित हुईं। गंगा के इस वेगपूर्ण अवतरण से उनका अहंकार शिव जी से छुपा न रहा। महादेव जी ने गंगा की वेगवती धाराओं को अपने जटाजूट में उलझा लिया। गंगा जी अपने समस्त प्रयत्नों के बाद भी महादेव जी के जटाओं से बाहर न निकल सकीं। गंगा जी को इस प्रकार शिव जी की जटाओं में विलीन होते देख भगीरथ ने फिर शंकर जी की तपस्या की। भगीरथ के इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने गंगा जी को हिमालय पर्वत पर स्थित बिन्दुसर में छोड़ा। छूटते ही गंगा जी सात धाराओं में बँट गईं। गंगा जी की तीन धाराएँ ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व की ओर प्रवाहित हुईं। सुचक्षु, सीता और सिन्धु नाम की तीन धाराएँ पश्चिम की ओर बहीं और सातवीं धारा महाराज भगीरथ के पीछे पीछे चली। जिधर जिधर भगीरथ जाते थे, उधर उधर ही गंगा जी जाती थीं। स्थान स्थान पर देव, यक्ष, किन्नर, ऋषि-मुनि आदि उनके स्वागत के लिये एकत्रित हो रहे थे। जो भी उस जल का स्पर्श करता था, भव-बाधाओं से मुक्त हो जाता था। चलते चलते गंगा जी उस स्थान पर पहुँचीं जहाँ ऋषि जह्नु यज्ञ कर रहे थे। गंगा जी अपने वेग से उनके यज्ञशाला को सम्पूर्ण सामग्री के साथ बहाकर ले जाने लगीं। इससे ऋषि को बहुत क्रोध आया और उन्होंने क्रुद्ध होकर गंगा का सारा जल पी लिया। यह देख कर समस्त ऋषि मुनियों को बड़ा विस्मय हुआ और वे गंगा जी को मुक्त करने के लिये उनकी स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर जह्नु ऋषि ने गंगा जी को अपने कानों से निकाल दिया और उन्हें अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब से गंगा जाह्नवी कहलाने लगीँ। इसके पश्चात् वे भगीरथ के पीछे चलते चलते समुद्र तक पहुँच गईं और वहाँ से सगर के पुत्रों का उद्धार करने के लिये रसातल में चली गईं। उनके जल के स्पर्श से भस्मीभूत हुये सगर के पुत्र निष्पाप होकर स्वर्ग गये। उस दिन से गंगा के तीन नाम हुये, त्रिपथगा, जाह्नवी और भागीरथी। 
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नींबू पानी का उपयोग, लाभ...

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नींबू पानी का उपयोग, लाभ...

◼️नींबू के फलों का इस्तेमाल.....

सामान्य रूप से भारतीय पारंपरिक चिकित्सा में इसके मूल्यवान पोषक और औषधीय गुणों के लिए किया जाता है। जैसा कि नाम से पता चलता है, नींबू पानी, गर्म या ठंडा पानी होता है जिसमें नींबू का जूस या नींबू के स्लाइसेस पड़े होते हैं। 

नींबू अपनी सुबह की चाय में डालें या गर्म दोपहर के लिए ठंडा नींबू पानी बनाएँ; आप इसका इस्तेमाल किसी भी तरह करें, एक नींबू आपकी इम्युनिटी बढ़ाने में मदद कर सकता है। नींबू पानी के फ़ायदों और यह आपको स्वस्थ रहने में कैसे मदद कर सकता है, इसके बारे में अधिक जानने के लिए, आगे पढ़ें।

नींबू में पोषक तत्वों की मात्रा....

नींबू के एक स्लाइस में पोषक तत्वों की मात्रा नीचे दी गई है। नींबू के स्लाइस को पानी में मिलाएं और आपका नींबू पानी तैयार है जिसमें सभी पोषक तत्व होते हैं...

▪️▪️पोषक तत्व मात्रा....

कार्बोहाइड्रेट 0.746 ग्राम प्रोटीन

 0.088 ग्राम शुगर 0.2 ग्राम

फैट 0.024 ग्राम

 फ़ाइबर 0.224 ग्राम

 ऊर्जा 2.32 किलोकैलोरी

 कैल्शियम 2.08 मिलीग्राम 

मैग्नीशियम 0.64 मिलीग्राम

 सोडियम 0.16 मिलीग्राम

 पोटैशियम 11 मिलीग्राम

 आयरन 0.048 मिलीग्राम 

फास्फोरस 1.28 मिलीग्राम

 ज़िंक 0.005 मिलीग्राम

 सेलेनियम 0.032 माइक्रोग्राम 

कॉपर 0.03 मिलीग्राम

 विटामिन C 4.24मिलीग्राम 

विटामिन B1 0.003 मिलीग्राम

विटामिन B2 0.002 मिलीग्राम

विटामिन B3 0.008 मिलीग्राम

विटामिन B9 0.88 माइक्रोग्राम 

विटामिन A 0.08 माइक्रोग्राम

कोलीन 0.408 मिलीग्राम

 कैरोटीन 0.24 माइक्रोग्राम

विटामिन E 0.012 मिलीग्राम

कैरोटीन 0.08 माइक्रोग्राम

नींबू के एक टुकड़े में पोषक तत्व की मात्रा....

▪️▪️नींबू पानी के गुण....

नींबू की जैविक गतिविधियाँ इसके फेनोलिक यौगिकों की उच्च मात्रा के कारण होती हैं।1 नींबू पानी में निम्नलिखित गुण होते हैं...

यह एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम कर सकता है।

इसमें एंटी-इंफ्लामेटरी प्रभाव होता है।

यह रोगाणुओं के संक्रमण को कम करने में मदद कर सकता है।

यह परजीवियों के संक्रमण को कम करने में मदद कर सकता है।

यह एलर्जी से लड़ने में मदद कर सकता है।

यह ब्लड शुगर के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है।

यह वजन कम करने में मदद कर सकता है।1

▪️▪️नींबू पानी के संभावित उपयोग....


◼️1. मोटापे के लिए नींबू पानी के संभावित उपयोग....

 नींबू पानी एक ताज़ा एंटीऑक्सिडेंट पेय हो सकता है जिसमे सिट्रिक एसिड एक महत्वपूर्ण फैट बर्नर होने के कारण वजन घटाने में मदद करता है। गर्म नींबू पानी पीना शरीर के वजन को कम करने का एक प्रभावी तरीका हो सकता है। सुबह नींबू पानी पीने से स्वाभाविक रूप से वजन घटाने में मदद मिल सकती है; यह शरीर के तापमान को भी बढ़ा सकता है, जिससे मेटाबोलिक रेट में वृद्धि होती है।

सैमंडी एट अल 2016 के एक नए अध्ययन में अधिक वज़न वाली महिलाओं को शामिल किया गया जिसमें प्रतिभागियों ने पाया कि गर्म नींबू पानी पीने से कमर पतली होने के साथ वज़न भी कम होता है। यह बॉडी मास इंडेक्स में कमी को भी दर्शाता है।

 ◼️2. पाचन तंत्र के लिए नींबू पानी के संभावित उपयोग....

नींबू पाचन की प्रक्रिया में मदद कर सकता है। नींबू पानी पाचन तंत्र को पाचन रस, पित्त और एसिड बनाने के लिए मदद कर सकता है जो बड़े खाद्य अणुओं को तोड़ने में सहायक होते हैं। यह आंतों में लहरों की तरह मांसपेशियों के संकुचन की श्रृंखला को भी बढ़ा सकता है जो पाचन में सुधार करने में सहायता करती है।

 पाचन तंत्र पर नींबू पानी के पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों के बारे में ठीक से जानने के लिए, मनुष्यों पर अभी और अधिक शोध अध्ययन किए जाने की ज़रूरत है।

◼️3. त्वचा के लिए नींबू पानी के संभावित उपयोग....

नींबू पानी में आवश्यक एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबायोटिक गुण होते हैं। नींबू पानी त्वचा को शाइनी और संक्रमण तथा दुर्गंध से दूर रखकर उसे जीवित करने में मददगार हो सकता है। मृत कोशिकाओं को हटाने के लिए त्वचा पर नींबू के स्लाइस या जूस को स्क्रब किया जा सकता है या इसे छालों और चोटों पर लगाया जा सकता है।

 नींबू के उत्पाद सनबर्न के कारण खराब हुई मुहांसों वाली त्वचा पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। नींबू पानी के एंटीऑक्सीडेंट गुण सौंदर्य प्रसाधनों में उपयोगी हो सकते हैं। यह ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है, और बाहरी रूप से लगाने पर कोलेजन (प्रोटीन) उत्पादन को भी बढ़ा सकता है, जिससे त्वचा चिकनी और अधिक मज़बूत हो जाती है।

 मनुष्यों की त्वचा पर नींबू पानी के प्रभाव की पुष्टि करने के लिए, अभी और अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य की ज़रूरत है।

◼️4. यूरिनरी डिसऑर्डर के लिए नींबू पानी के संभावित उपयोग....

नींबू पानी में विटामिन C, पोटैशियम और फ्लैवोनोइड्स जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व होते हैं। ये पोषक तत्व डिटॉक्सीफाई करने में मदद कर सकते हैं। ये शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटा सकते हैं और यूरिन सिस्टम में यूरिक एसिड को जमा होने से रोक सकते हैं। नींबू पानी के कीटाणु नाशक गुण यूरिनरी ट्रैक्ट से संक्रमण को दूर करने में मदद कर सकते हैं और यूरिनरी ट्रैक्ट में कैल्शियम के जमाव को रोकने में भी मदद कर सकते हैं।

◼️5. नींबू पानी के अन्य संभावित उपयोग.....

नींबू पानी अपने विटामिन C सामग्री के कारण पाचन और उत्सर्जन प्रणाली के घावों और अल्सर को ठीक करने में मदद कर सकता है। यह बवासीर से संबंधित लक्षणों को ठीक करने में भी मदद कर सकता है।

नींबू पानी में विटामिन C होता है जो स्कर्वी, विटामिन C की कमी से हमारे मसूड़ों से खून आने जैसी समस्या में मददगार हो सकता है।
इसके अलावा, इसका एंटीऑक्सीडेंट मैकेनिज्म मुक्त कणों से लड़ता है और आंखों की देखभाल (आई केयर) में मदद कर सकता है।

नींबू पानी पीना मिचली को दूर करने में मददगार साबित हो सकता है।

नींबू पानी हैजा (कॉलेरा), थकान और तेज़ बुखार को ठीक करने में मदद करता है।

नींबू पानी पीना खांसी, जुकाम, गले में खराश में उपयोगी/आरामदायक हो सकता है।

नींबू पानी का इस्तेमाल कैसे करें?
नींबू में ज़ीरो कैलोरी होती है तथा वे सुपर हेल्दी होते हैं।1 नींबू पानी का इस्तेमाल करके, आप अपने दिनों को अधिक जोशपूर्ण तथा भोजन को और मजेदार बनाने के लिए निम्नलिखित तरीके अपना सकते हैं

नींबू पानी एक ऐसा सामग्री है जिसका इस्तेमाल लेमोनेड और अन्य सॉफ्ट ड्रिंक्स बनाने में किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल सलाद ड्रेसिंग और सॉस में भी किया जाता है।1
नींबू पानी का सेवन वैसे ही किया जा सकता है या अतिरिक्त स्वाद के लिए कुछ शहद या अदरक के साथ मिलाया जा सकता है।

◼️नींबू पानी के साइड इफ़ेक्ट्स....

शोध अध्ययनों ने नींबू पानी के कुछ लाभों को साबित किया है, फिर भी शायद ही लोगों को साइड इफ़ेक्ट्स का अनुभव हो। नींबू पानी में एसिड होता है जो दांतों के इनेमल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसके अलावा, कोई भी बड़ा अध्ययन मनुष्यों में नींबू पानी के साइड इफ़ेक्ट्स की रिपोर्ट नहीं करता है।

◼️नींबू पानी के साथ बरतने वाली सावधानियाँ....

नींबू पानी को सीमित मात्रा में लेना सुरक्षित माना जाता है। हालांकि, सामान्य सावधानियों का पालन करना होगा।

गर्भावस्था के दौरान नींबू पानी के सुरक्षित इस्तेमाल के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। 

 यदि असामान्य लक्षण दिखाई देते हैं, तो तुरंत एक आयुर्वेदिक डॉक्टर से परामर्श लें।
कंसन्ट्रेटेड नींबू का जूस दांतों के इनेमल को खराब कर सकता है, इसलिए ऐसी समस्याओं से बचने के लिए सावधानी बरतने की जरूरत है। यह भी सुझाव दिया जाता है कि नींबू के जूस को पहले पानी में मिलाए और फिर इसका इस्तेमाल करें


कोलेस्ट्रॉल कम करने के आयुर्वेदिक उपचार....

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कोलेस्ट्रॉल कम करने के आयुर्वेदिक उपचार....
 
▪️1) आधा चम्मच अलसी के बीज पीसकर उन्हें पानी से खाली पेट लें। यह ट्राइग्लिसराइड कॉलेस्ट्रॉल वाले लोगों के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसके अलावा इन बीजों को रोटी या सब्जी में डालकर भी खाया जा सकता है, या फिर आप इन्हें आटे में भी पिसवा सकते हैं।

 ▪️2) पांच ग्राम अर्जुन छाल का पाउडर 400 मिलीग्राम पानी में डालकर उबालें। एक चौथाई रह जाने पर इस घोल को उतार लें। गुनगुना हो जाने पर इसे खाली पेट पिएं।

 ▪️3) दिन में दो बार खाने से पहले मेदोहर वटी व त्रिफला गुगल वटी की 2 – 2 गोलियां गुनगुने पानी से लें।

 ▪️4) 25 से 50 ग्राम लौकी का जूस लें, इसमें तुलसी और पुदीने की 7 – 8 पत्तियां मिलाकर सुबह-सुबह खाली पेट पिएं।

 ▪️5) सौंठ, मरीच व पीपल का चूर्ण में एक छोटी चम्मच दालचीनी मिला कर एक कप पानी में 10 मिनट के लिए भिगो दें, और छोड़ी देर बाद लें। स्वाद के लिए इसमें छोड़ा शहद मिला सकते हैं। इसे पीने से कफ दूर होता है।
और कॉलेस्ट्रॉल भी नियंत्रित रहता है।

 ▪️6) सुबह के समय एक कप गर्म पानी में एक चम्मच शहद मिलाकर लें। इसमें कुछ बूंदें नीबू के रस की भी डाल लें।

 ▪️7) आधे चम्मच नीबू के रस में आधा चम्मच कुतरा हुआ अदरक और एक कली लहसुन मिलाकर हरबार खाने से पहले लें।

▪️ 8) मेथी के बीज अंकुरित करके रोजा 5 ग्राम सुबह नाश्ते में लें।

 ▪️9) नीम के 10 पत्तों को एक कप पानी में भिगो लें। इन्हें पीसकर छान लें और रोजाना दिन में किसी भी समय पिएं।


गर्दन का दर्द.....

गर्दन का दर्द.........

⚫⚫ परिचय......

 हमारे शरीर में रीढ़ की हड्डी में कुल मिलाकर 33 कशेरुकाएं होती हैं जिसमें 7 कशेरुकाएं गर्दन से सम्बन्धित होती हैं। इन कशेरुकाओं को सरवाइकल वर्टिबा कहते हैं। इन कशेरुकाओं से निकली वातनाड़ियां मस्तिष्क, आंख, नाक, कान, माथा, मुंह, दांत, तालु, जीभ, थाइरायड ग्रंथि तथा कुहनियों का संचालन करती हैं। इसलिए यदि गर्दन में कोई रोग हो जाता है तो इसका प्रभाव शरीर के सभी अंगों पर भी पड़ता है।

⚫⚫ गर्दन में दर्द होने के लक्षण......

इस रोग के हो जाने पर गर्दन में अकड़न व दर्द होना शुरू हो जाता है। कुछ समय बाद गर्दन में धीरे-धीरे दर्द तथा अकड़न बढ़ती जाती है। इस रोग के कारण दर्द कभी कंधे व सिर व दोनों बाजुओं में शुरू हो जाता है। इस रोग के कारण रोगी की एक या दोनों बाजुओं में सुन्नता होने लगती है। जिसके कारण रोगी को सब्जी काटने या लिखने से कठिनाई महसूस होती है, सिर में चक्कर भी आने लगते हैं, हाथ पैरों की पकड़ कमजोर पड़ जाती है तथा गर्दन को इधर-उधर घुमाने में परेशानी होने लगती है। इस रोग के कारण रोगी को बेचैनी जैसी समस्याएं भी होने लगती हैं।

⚫⚫ गर्दन में दर्द होने के कारण......

अपने भोजन में तली-भुनी, ठण्डी-बासी या मसालेदार पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण भी गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।

गर्दन में दर्द गलत तरीके से बैठने या खड़े रहने से भी हो जाता है जैसे-खड़े रहना या कूबड़ निकालकर बैठना।

भोजन में खनिज लवण तथा विटामिनों की कमी रहने के कारण भी गर्दन में दर्द की समस्या हो सकती है।

कब्ज बनने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।

पाचनशक्ति में गड़बड़ी हो जाने के कारण गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।

अधिक चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, शोक या मानसिक तनाव की वजह से भी गर्दन में दर्द हो सकता है।

किसी दुर्घटना आदि में किसी प्रकार से गर्दन पर चोट लग जाने के कारण भी गर्दन में दर्द का रोग हो सकता है।अधिक शारीरिक कार्य करने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।

मोटे गद्दे तथा नर्म गद्दे पर सोने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।

गर्दन का अधिक कार्यो में इस्तेमाल करने के कारण गर्दन में दर्द हो सकता है।

अधिक देर तक झुककर कार्य करने से गर्दन में दर्द हो सकता है।

व्यायाम न करने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।

अधिक दवाइयों का सेवन करने के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।

शारीरिक कार्य न करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

चिंता, क्रोध, मानसिक तनाव, ईर्ष्या तथा शोक आदि के कारण भी गर्दन में दर्द हो सकता है।

किसी दुर्घटना में गर्दन पर चोट लगने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

⚫⚫ गर्दन के दर्द को प्राकृतिक चिकित्सा से ठीक करने के लिए उपचार.....

गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सबसे पहले रोगी के गलत खान-पान के तरीकों को दूर करना चाहिए और फिर रोगी का उपचार करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को हमेशा पौष्टिक भोजन करना चाहिए। रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम का बहुत अधिक प्रयोग करना चाहिए ताकि हडि्डयों का विकास सही तरीके से हो सके और हडि्डयों में कोई रोग पैदा न हो सके।

शरीर में विटामिन `डी` लोहा, फास्फोरस तथा कैल्शियम मात्रा को बनाये रखने के लिए व्यक्ति को अपने भोजन में गाजर, नीबू, आंवला, मेथी, टमाटर, मूली आदि सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए। फलों में रोगी को संतरा, सेब, अंगूर, पपीता, मौसमी तथा चीकू का सेवन अधिक करना चाहिए।

गर्दन में दर्द से पीड़ित व्यक्ति को चोकरयुक्त रोटी व अंकुरित खाना देने से बहुत जल्दी लाभ होता है।

गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के ही एक भाग जल चिकित्सा का सहारा लिया जा सकता है। इस उपचार के द्वारा रोगी को स्टीमबाथ (भापस्नान) कराया जाता है और उसकी गर्दन पर गरम-पट्टी का सेंक करते है तथा इसके बाद रोगी को रीढ़ स्नान कराया जाता है जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार से उपचार करने से रोगी के शरीर में रक्त-संचालन (खून का प्रवाह) बढ़ जाता है और रोमकूपों द्वारा विजातीय पदार्थ बाहर निकल जाते हैं जिसके फलस्वरूप रोगी की गर्दन का दर्द तथा अकड़न होना दूर हो जाती है।

गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए सूर्य किरणों द्वारा बनाए गए लाल व नारंगी जल का उपयोग करने से रोगी को बहुत अधिक फायदा होता है। सूर्य की किरणों में हडि्डयों को मजबूत करने के लिए विटामिन `डी` होता है। सूर्य की किरणों से शरीर में विटामिन `डी` को लेने के लिए रोगी को पेट के बल खुले स्थान पर जहां पर सूर्य की किरणें पड़ रही हो उस स्थान पर लेटना चाहिए। ताकि सूर्य की किरणें सीधी उसकी गर्दन व रीढ़ की हड्डी पर पड़े। इस क्रिया को करते समय सिर पर कोई कपड़ा रख लेना चाहिए ताकि सिर पर छाया रहें।

गर्दन के दर्द को ठीक करने के लिए रोगी की गर्दन पर सरसों या तिल के तेल की मालिश करनी चाहिए। मालिश करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि मालिश हमेशा हल्के हाथों से करनी चाहिए। मालिश यदि सूर्य की रोशनी के सामने करें तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

 योगासन के द्वारा भी गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक किया जा सकता है। योगासन द्वारा गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक करने के लिए सबसे पहले गर्दन को पीछे की ओर ले जाएं और फिर धीरे-धीरे गर्दन को आगे की ओर झुकाएं। फिर ठोड़ी को कंठ कूप से लगाएं। इसके कुछ देर बाद गर्दन को दाएं से बाएं तथा फिर बाएं से दाएं हल्के झटके के साथ घुमाएं।

गर्दन के दर्द तथा अकड़न को दूर करने के लिए भुजंगासन, धनुरासन या फिर सर्पासन करना लाभकारी रहता है।

 गर्दन के दर्द तथा अकड़न को ठीक करने के लिए प्राणायाम व ध्यान का अभ्यास करें।

गर्दन के दर्द तथा अकड़न की समस्या को दूर करने के लिए रोजाना सुबह के समय में खुली ताजी हवा में घूमें।

 गर्दन में दर्द होने पर इसका उपचार करने के लिए सबसे पहले गर्दन में दर्द होने के कारणों को दूर करना चाहिए।

 योगाभ्यास तथा विशेष व्यायाम से गर्दन के दर्द से पूरी तरह छुटकारा मिल सकता है।

गर्दन के दर्द से पीड़ित रोगी को अपने कंधों को ऊपर से नीचे की ओर करना।

 कंधों को सामने तथा पीछे की ओर गतिशील करना चाहिए इससे गर्दन का दर्द ठीक हो जाता है।

कंधों को घड़ी की दिशा में सीधी तथा उल्टी दिशा में घुमाना चाहिए जिससे गर्दन कां दर्द ठीक हो जाता है।

 गर्दन से पीड़ित रोगी को अपनी उंगुलियों को गर्दन के पीछे आपस में फंसाना चाहिए और फिर फंसी उंगुलियों की तरफ दबाव देते हुए अपने कोहनी को आगे से पीछे की ओर गतिशील करना चाहिए जिसके फलस्वरूप गर्दन का दर्द जल्दी ही ठीक हो जाता है।

 गर्दन से पीड़ित रोगी को अपने भोजन में विटामिन `डी लोहा, कैल्शियम, फास्फोरस की अधिकता वाले खाद्य पदार्थों का अधिक उपयोग करना चाहिए।

 संतरा, सेब, मौसमी, अंगूर तथा पपीता व चीकू का उपयोग भोजन में अधिक करना चाहिए।

⚫⚫ गर्दन में दर्द तथा अकड़न से बचने के लिए कुछ सावधानियां......

सोने के लिए व्यक्ति को सख्त तख्त का ही प्रयोग करना चाहिए।

सोते समय गर्दन के नीचे तकिए का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

किसी भी कार्य को करते समय अपनी रीढ़ की हड्डी को तनी हुई और बिल्कुल सीधी रखनी चाहिए।

गर्दन के दर्द तथा अकड़न का उपचार करते समय अधिक सोच-विचार नहीं करना चाहिए।

गर्दन में दर्द तथा अकड़न की समस्या से बचने के लिए वह कार्य नहीं करना चाहिए जिससे गर्दन या आंखों पर अधिक बोझ या तनाव पड़े।

गर्दन में दर्द तथा अकड़न की समस्या से बचने के लिए प्रतिदिन 6 से 8 घण्टे की तनाव रहित नींद लेना बहुत ही जरूरी है।

गर्दन के दर्द तथा अकड़न से बचने के लिए यह ध्यान देना चाहिए कि यदि खड़े है तो तनकर खड़े हो तो अपनी पीठ सीधी रखनी चाहिए।

आगे की ओर झुककर किसी भी कार्य को नहीं करना चाहिए।

नाभि टलना,नाभि का खिसकना......

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नाभि टलना,नाभि का खिसकना......
 

  आम लोगों की भाषा में धरण कहते हैं यह एक ऐसी परेशानी है जिसकी वजह से पेट में दर्द होता है। रोगी को समझ में भी नहीं आता कि ये दर्द किस वजह से हो रहा है, पेट दर्द की दवा लेने के बाद भी यह दर्द खत्म नहीं होता। और केवल दर्द ही नहीं, कई बार नाभि खिसकने से दस्त भी लग जाते हैं।

 योग में नाड़ियों की संख्या बहत्तर हजार से ज्यादा बताई गई है और इसका मूल उदगम स्त्रोत नाभि स्थान है। इसलिए किसी भी नाड़ी के अस्वस्थ होने से इसका कुछ प्रतिशत असर नाभि स्थान पर जरूर होता है।

 ◼️अन्य कारण .....

  कुछ ऐसे कारण हैं जहां ना चाहते हुए भी हम नाभि खिसकने का शिकार हो जाते हैं। जैसे कि खेलते-कूदते समय भी नाभि खिसक जाती है। 

असावधानी से दाएं-बाएं झुकने, दोनों हाथों से या एक हाथ से अचानक भारी बोझ उठाने, तेजी से सीढ़ियां चढ़ने-उतरने, सड़क पर चलते हुए गड्ढे में अचानक पैर चले जाने या अन्य कारणों से किसी एक पैर पर भार पड़ने या झटका लगने से नाभि इधर-उधर हो जाती है।

◼️कैसे पहचानें नाभि का
खिसकना .....

कैसे पहचानें कि नाभि ही अपने स्थान से खिसक गई है। क्योंकि पेट दर्द होना आम बात है, कुछ गलत आहार लेने से या फिर अन्य समस्याओं से भी पेट दर्द हो सकता है। इसके अलावा दस्त लगना भी कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है। किंतु ये कैसे पहचाना जाए कि किसी व्यक्ति विशेष की परेशानी का कारण नाभि खिसकना ही है।

◼️पहला तरीका .....

इसकी पहचान एक लिए कुछ खास तरीके बताए गए हैं। सबसे आसान तरीका है लेटकर नाभि को दबाकर जांच करना।

 रोगी को शवासन यानि कि बिलकुल सपाट लिटाकर, उसकी नाभि को हाथ की चारों अंगुलियों से दबाएं।

 यदि नाभि के ठीक बिलकुल नीचे कोई धड़कन महसूस हो तो इसका मतलब है कि नाभि अपने स्थान पर ही है।

लेकिन यही धड़कन यदि नाभि के नीच ना होकर कहीं आसपास महसूस हो रही हो, तो समझ जाएं कि नाभि अपनी जगह पर नहीं है।

◼️दूसरा तरीका .....

धरण गिरी है या नहीं इसे पहचानने का एक और तरीका है जो काफी प्रचलित भी है।

 इसके लिए रोगी के दोनों हाथों की रेखाएं मिला कर छोटी अंगुली की लम्बाई चेक करें, दोनों अंगुलियों की रेखाएं बिलकुल बराबर रखें।

  यदि मिलाने पर अंत में दोनों अंगुलियों की लंबाई में थोड़ा सा भी अंतर दिखे, तो इसका मतलब है कि धरण गिरी हुई है।

 इन दो तरीकों से आसानी से नाभि खिसकने की पुष्टि की जा सकती है। अब यदि रोगी की परेशानी का कारण जान लेने के बाद, उसका निवारण भी जानना आवश्यक है।

◼️औषधियों से उपचार .....

▪️1. सरसों ..... सरसों के तेल को नाभि पर लगाने से नाभि अपने स्थान पर आ जाती है। रोग के बढ़ने पर रूई का फोया तेल में भिगोकर नाभि पर रखें।

 नाभि के जगह से हट जाने से अक्सर पेट में दर्द, गैस, दस्त, भूख न लगना आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं। नाभि पर कोई भी तेल खासकर सरसों का तेल लगाने से लाभ होता है। तेज दर्द होने पर रूई में तेल लगाकर नाभि पर रखने से नाभि का दर्द समाप्त हो जाता है।

▪️2. सौंफ .... गुड़ और सौंफ 20-20 ग्राम की मात्रा में लेकर प्रतिदिन सुबह खाली पेट खाने से नाभि का टलना ठीक होता है और तेज दर्द में आराम मिलता है।

 2 चम्मच सौंफ को पीसकर गुड में मिलाकर प्रतिदिन लगातार 5 दिनों तक लेने से नाभि का हटना ठीक होता है।

▪️3. दही ...500 ग्राम दही में एक चम्मच पिसी हुई हल्दी को मिलाकर खाने से नाभि अपने स्थान से नहीं हटता है।

▪️4. गुड़ .... थोड़ा सा गुड़ में नमक मिलाकर नाभि बैठाने के बाद खाने से अपने नाभि दर्द में जल्द आराम मिलता है।

▪️▪️अन्य उपाय ....

 नाभि खिसक गई है या नहीं, यह हमारे पांव की मदद से भी जाना जा सकता है। इसके लिए पीठ के बल लेट जाएं, दोनों पैरों को 10 डिग्री एंगल पर जोड़ें। ऐसा करने पर यदि आपको दोनों पैर की लंबाई में अंतर दिखे, यानि कि एक पांव दूसरे से बड़ा है तो यकीनन नाभि टली हुई हैं।

 अब पुष्टि होने पर इसे ठीक करने के लिए छोटे पैर की टांग को धीरे-धीरे ऊपर उठाएं। इसे कुछ-कुछ इंच तक धीरे से ही ऊपर की ओर उठाएं, तकरीबन 9 इंच की ऊंचाई पर आने के बाद फिर धीरे-धीरे नीचे रखकर लंबी सांस लें। यही क्रिया दो बार और करें। इस क्रिया को सुबह शाम ख़ाली पेट करना है, इससे नाभि अपने स्थान पर आ जाती है।

◼️सावधानी .....

यह नाभि यदि अपनी सही जगह पर आने की बजाय कहीं और खिसक गई तो बड़ा रोग हो सकता है। ऊपर की ओर खिसकने से सांस की दिक्कत हो जाती है, लीवर की ओर चले जाने से वह खराब हो जाता है। यदि नाभि पेट के बिलकुल मध्य में आ जाए तो मोटापा हो जाता है। इसलिए इससे अनजाने में छेड़ खानी करने की कभी ना सोचें।

 खास ख्याल रखने की जरूरत है। जब पता चल जाए कि नाभि खिसकने जैसी दिक्कत हो गई है, तो कुछ बातों का परहेज करना चाहिए। जैसे कि गलती से भी भारी वजन ना उठाएं। यदि मजबूरी में उठाना भी पड़े तो उसे झटके से ना उठाएं!

▪️▪️और भी कुछ उपाय है जिंससे ठीक हो जाएगी नाभि खिसकने की परेशानी...


◼️नाभि टलने को परखिये....

आमतौर पर पुरुषों की नाभि बाईं ओर तथा स्त्रियों की नाभि दाईं ओर टला करती हैं 

◼️नाभि टलने पर क्या करे ?....

मरीज को सीधा (चित्त) सुलाकर उसकी नाभि के चारों ओर सूखे आँवले का आटा बनाकर उसमें अदरक का रस मिलाकर बाँध दें एवं उसे दो घण्टे चित्त ही सुलाकर रखें। दिन में दो बार यह प्रयोग करने से नाभि अपने स्थान पर आ जाती है तथा दस्त आदि उपद्रव शांत हो जाते हैं।

नाभि खिसक जाने पर व्यक्ति को मूँग दाल की खिचड़ी के सिवाय कुछ न दें। दिन में एक-दो बार अदरक का 2 से 5 मिलि लीटर रस पिलाने से लाभ होता है।

▪️▪️नाभि कैसे स्थान पर लाये.....

◼️1- ज़मीन पर दरी या कम्बल बिछा ले। अभी बच्चो के खेलने वाली प्लास्टिक की गेंद ले लीजिये। अब उल्टा लेट जाए और इस गेंद को नाभि के मध्य रख लीजिये। पांच मिनट तक ऐसे ही लेटे रहे। खिसकी हुई नाभि (धरण) सही होगी। फिर धीरे से करवट ले कर उठ जाए, और ओकडू बैठ जाए और एक आंवला का मुरब्बा खा लीजिये या फिर 2 आटे के बिस्कुट खा लीजिये। फिर धीरे धीरे खड़े हो जाए।

◼️2- कमर के बल लेट जाएं और पादांगुष्ठनासा स्पर्शासन कर लें। इसके लिए लेटकर बाएं पैर को घुटने से मोड़कर हाथों से पैर को पकड़ लें व पैर को खींचकर मुंह तक लाएं। सिर उठा लें व पैर का अंगूठा नाक से लगाने का प्रयास करें। जैसे छोटा बच्चा अपना पैर का अंगूठा मुंह में डालता है। कुछ देर इस आसन में रुकें फिर दूसरे पैर से भी यही करें। फिर दोनों पैरों से एक साथ यही अभ्यास कर लें। 3-3 बार करने के बाद नाभि सेट हो जाएगी।

◼️3- सीधा (चित्त) सुलाकर उसकी नाभि के चारों ओर सूखे आँवले का आटा बनाकर उसमें अदरक का रस मिलाकर बाँध दें एवं उसे दो घण्टे चित्त ही सुलाकर रखें। दिन में दो बार यह प्रयोग करने से नाभि अपने स्थान पर आ जाती है हैं।

नाभि सेट करके पाँव के अंगूठों में चांदी की कड़ी भी पहनाई जाती हैं, जिस से भविष्य में नाभि टलने का खतरा कम हो जाता हैं। अक्सर पुराने बुजुर्ग लोग धागा भी बाँध देते हैं।

◼️नाभि के टलने पर और दर्द होने पर 20 ग्राम सोंफ, गुड सम भाग के साथ मिलाकर प्रात: खाली पेट खायें। अपने स्थान से हटी हुई नाभि ठीक होगी। और भविष्य में नाभि टलने की समस्या नहीं होगी।

शुक्रवार, 14 जून 2024

सोशल मीडिया पर चल रहे कि अयोध्या में विकास के दौरान तोड़े गए दुकानों व मकान के कारण अयोध्या में हारी भाजपा, इस पर जिला प्रशासन ने दिया जवाब

प्रेस विज्ञप्ति/ सूचना विभाग

सोशल मीडिया पर चल रहे कि अयोध्या में विकास के दौरान तोड़े गए दुकानों व मकान के कारण अयोध्या में हारी भाजपा, इस पर जिला प्रशासन ने दिया जवाब

अयोध्या।
जिलाधिकारी नितीश कुमार ने बताया कि अयोध्या धाम की ऐतिहासिक एवं पौराणिक विरासतों को संजोते एवं संवारते हुये एक आधुनिक शहर के रूप में विकसित करने की संकल्पना को दृष्टिगत रखते हुये अयोध्या में यातायात एवं आवागमन की सुविधा को आधुनिक एवं सुगम बनाने के लिए विभिन्न प्रमुख मार्गो/पथों का उनके किनारे स्थित दुकानदारों, भवन स्वामियों एवं भू-स्वामियों से समन्वय स्थापित कर तथा उन्हें नियमानुसार पुर्नस्थापित कर अनुग्रह धनराशि व मुआवजा प्रदान करते हुये सौन्दर्यीकरण/चैड़ीकरण किया गया है। 
उन्होंने बताया कि रामपथ, भक्तिपथ, रामजन्मभूमि पथ एवं पंचकोसी एवं चैदहकोसी परिक्रमा मार्ग के सौन्दर्यीकरण एवं चैड़ीकरण से कुल 4616 दुकानदार प्रभावित हुये, जिसमें से 4215 दुकानदार/व्यापारी जिनकी दुकानें आंशिक रूप से चैड़ीकरण में प्रभावित हुई, इन सभी को कुछ अन्तराल के लिए व्यापार प्रभावित होने के एवज में प्रति दुकानदार (आंशिक रूप से तोड़ी गयी दुकान के आकार के आधार पर) अनुग्रह धनराशि का भुगतान किया गया। साथ ही प्रशासन द्वारा उनकी दुकानों का व्यापक सौन्दर्यीकरण भी कराया गया और ये सभी दुकानदार उसी स्थान/दुकान पर अपने-अपने व्यापार/दुकान का संचालन कर रहे है और वर्तमान समय में उनका व्यापार कई गुना बढ़कर सुचार रूप से चल रहा है। इसी के साथ ही उक्त मार्गों के सौन्दर्यीकरण/चैड़ीकरण में कुल 401 दुकानदार पूर्ण रूप से स्थानान्तरित हुये जिनमें से 339 दुकानदारों को प्राधिकरण द्वारा दुकान आवंटित किया गया है तथा इनका व्यापार अन्य स्थल पर स्थानान्तरित होने पर कुछ अन्तराल के लिए व्यापार प्रभावित होने के एवज में प्रति दुकानदार एक से 10 लाख रूपये तक (हटायी गयी दुकान के आकार के आधार पर) अनुग्रह धनराशि का भुगतान उनके खाते में अलग से किया गया है। उक्त मार्गो/पथों के सौन्दर्यीकरण/चैड़ीकरण से पूर्ण रूप से स्थानान्तरित कुल 79 परिवारों को बसा दिया गया है। इस कार्य से कुल 1845 भू-स्वामी/भवन स्वामी प्रभावित हुये, जिन्हें नियमानुसार रू0 300.67 करोड़ की धनराशि मुआवजे एवं अनुग्रह धनराशि के रूप में उनके खाते में प्रदान किया जा चुका है।
इसी प्रकार अयोध्या धाम तक हवाई आवागमन की सुविधा को सुगम बनाने हेतु नवनिर्मित महर्षि बाल्मीकि अन्तर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट के निर्माण के लिए प्रभावित समस्त परिवारों को नियमानुसार पुर्नवासित कराया गया है तथा प्रभावित खातेदारों से समन्वय स्थापित कर उनके सहमति के आधार पर भूमि अर्जन का कार्य किया गया, जिसमें कुल 952.39 करोड़ रूपये का भुगतान भू-स्वामियों/भवन स्वामियों के खाते में किया गया।   
*रामजन्म भूमि पथ:-*
01. उक्त पथ पर कुल दुकानदारों की संख्या-14
02. पूर्ण विस्थापित दुकानदार-07
03. ऐसे दुकानदार जिनका व्यापार दुकान टूटने से प्रभावित हो रहा था उनके व्यापार को पुर्नस्थापित करने के लिए अनुग्रह धनराशि के रूप में आर0 एण्ड आर0 का भुगतान किया गया। उक्त पथ पर 14 दुकानदारों को दुकान के लम्बाई चैड़ाई के क्रम में पी0डब्लू0डी0 द्वारा मूल्यांकन के उपरान्त 10.00 लाख रूपये तक तथा न्यूनतम 1.00 लाख रूपये तक किया गया।
04. पूर्ण विस्थापित 07 दुकानदारों को प्राधिकरण द्वारा निर्मित दुकाने आवष्टित की गयी तथा व्यापार प्रभावित होने के कारण अनुग्रह धनराशि (आर0 एण्ड आर0) का भुगतान किया गया। 
05. मकान व जमीन के मूल्यांकन के उपरान्त 11 भू-स्वामी/भवन स्वामी से सहमति के क्रम में रजिस्ट्री कराकर मुआवजे का भुगतान किया गया।
06. रामजन्म भूमि पथ में कुल 14.12 करोड़ रूपये का भुगतान भू-स्वामी/भवन स्वामी/दुकानदारों को किया गया।

*भक्ति पथ:-*
01. उक्त पथ पर कुल दुकानदारों की संख्या-397
02. पूर्ण विस्थापित दुकानदार-88
03. ऐसे दुकानदार जिनका व्यापार दुकान टूटने से प्रभावित हो रहा था उनके व्यापार को पुर्नस्थापित करने के लिए अनुग्रह धनराशि के रूप में आर० एण्ड आर० का भुगतान किया गया। उक्त पथ पर 397 दुकानदारों को दुकान के लम्बाई चैड़ाई के क्रम में पी0डब्लू0डी0 द्वारा मूल्यांकन के उपरान्त 10.00 लाख रूपये तक तथा न्यूनतम 1.00 लाख रूपये तक किया गया। 
04. उक्त पथ पर 309 दुकानदार जो विस्थापित नहीं हो रहे थे उनको मूल्यांकन के उपरान्त अनुग्रह धनराशि का भुगतान किया गया तथा प्रशासन द्वारा उनकी दुकानों का सौन्दीर्यकरण कराया गया। वर्तमान समय में उनका व्यापार सुचारू रूप से पूर्व के भांति चल रहा है।
05. विस्थापित होने वाले 88 दुकानदारों को प्राधिकरण द्वारा निर्मित दुकानें आवण्टित की गयी तथा व्यापार प्रभावित होने के कारण अनुग्रह धनराशि (आर० एण्ड आर०) का भुगतान किया गया। यह भी स्पष्ट करना है कि भक्ति पथ से विस्थापित सभी दुकानदार हनुमानगढ़ी के परिधि में विभिन्न पटिटयों में सम्मानित महन्थों से सम्पर्क स्थापित कर पूर्व के भांति किराये पर दुकान लेकर व्यवसाय कर रहे हैं। 
06. मकान व जमीन के मूल्यांकन के उपरान्त कुल 09 भू-स्वामी/भवन स्वामी से सहमति के क्रम में रजिस्ट्री कराकर मुआवजे का भुगतान किया गया।
07. भक्ति पथ में कुल 23.66 करोड़ रूपये का भुगतान भू-स्वामी/भवन स्वामी/दुकानदारों को किया गया।

*राम पथ:-*
01. उक्त पथ पर कुल दुकानदारों की संख्या-2338 
02. पूर्ण विस्थापित दुकानदार-306
03. ऐसे दुकानदार जिनका व्यापार दुकान टूटने से प्रभावित हो रहा था उनके व्यापार को पुर्नस्थापित करने के लिए अनुग्रह धनराशि के रूप में आर० एण्ड आर० का भुगतान किया गया। उक्त पथ पर 2338 दुकानदारों को दुकान के लम्बाई चैड़ाई के क्रम में पी0डब्लू0डी0 द्वारा मूल्यांकन के उपरान्त 10.00 लाख रूपये तक तथा न्यूनतम 1.00 लाख रूपये तक किया गया।
04. उक्त पथ पर 2038 दुकानदार जो विस्थापित नहीं हो रहे थे उनको मूल्यांकन के उपरान्त व्यापार पुर्नस्थापित करने के लिए अनुग्रह धनराशि का भुगतान किया गया तथा प्रशासन द्वारा उनकी दुकानों का सौन्दीर्यकरण कराया गया। वर्तमान समय में उनका व्यापार सुचारू रूप से पूर्व के भांति चल रहा है। 
05. विस्थापित होने वाले 306 दुकानदारों को प्राधिकरण द्वारा निर्मित दुकानें आवण्टित की गयी तथा व्यापार प्रभावित होने के कारण अनुग्रह धनराशि (आर0 एण्ड आर0) का भुगतान किया गया।
06. ऐसे परिवार जो पूर्ण रूप से विस्थापित हुए हैं उनको चक्रतीर्थ के मां० काशीराम कालोनी में बसाया गया।
07. रामपथ पर 2173 भू-स्वामी/भवन स्वामी से उनके मकान/जमीन के मूल्यांकन के उपरान्त सहमति के क्रम में रजिस्ट्री कराकर सम्बन्धित भवन स्वामी/भू-स्वामी को मुआवजे की धनराशि का वितरण किया गया।
08. राम पथ में कुल 114.69 करोड रूपये का भुगतान भू-स्वामी/भवन स्वामी/दुकानदारों को किया गया।

*पंचकोसी परिक्रमा मार्ग:-*
01. उक्त पथ पर कुल दुकानदारों की संख्या-510
02. पूर्ण विस्थापित परिवार-25 
03. ऐसे दुकानदार जिनका व्यापार दुकान टूटने से प्रभावित हो रहो था उनके व्यापार को पुर्नस्थापित करने के लिए अनुग्रह धनराशि के रूप में आर० एण्ड आर० का भुगतान किया गया। उक्त पथ पर 510 दुकानदारों को दुकान के लम्बाई चैडाई के क्रम में पी०डब्लूडी द्वारा मूल्यांकन के उपरान्त 10.00 लाख रूपये तक तथा न्यूनतम 1.00 लाख रूपये तक किया गया। 
04. उक्त पथ पर ऐसे दुकानदार जिनका विस्थापित नहीं हो रहा है। वह अपने बचे हुए भू-भाग पर दुकान बना करके व्यवसाय कर रहे हैं। प्रभावित भू-भाग का मूल्यांकन के अनुसार व्यापार प्रभावित होने के कारण अनुग्रह धनराशि (आर० एण्ड आर०) का भुगतान किया गया।
05. विस्थापित होने वाले 25 परिवारों को उनके निकट स्थान पर पुर्नवासित कराया गया है तथा इनके मकान का मूल्यांकन कराते हुए मकान का सहमति के आधार पर रजिस्ट्री कराया गया और उनके मुआवजे का भुगतान किया गया।
06. पंचकोसी परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले कुल 153 भू-स्वामी/भवन स्वामी से उनके मकान/जमीन के मूल्यांकन के उपरान्त सहमति के क्रम में रजिस्ट्री कराकर सम्बन्धित भवन स्वामी/भू-स्वामी को मुआवजे की धनराशि का वितरण किया गया।
07. पंचकोसी परिक्रमा मार्ग में कुल 29.00 करोड रूपये का भुगतान भू-स्वामी/भवन स्वामी/दुकानदारों को किया गया।

*14 कोसी परिक्रमा मार्ग:-*
01. उक्त पथ पर कुल दुकानदारों की संख्या-1357
02. ऐसे दुकानदार जिनका व्यापार दुकान टूटने से प्रभावित हो रहा था उनके व्यापार को पुर्नस्थापित करने के लिए अनुग्रह धनराशि के रूप में आर० एण्ड आर० का भुगतान किया गया। उक्त पथ पर 1357 दुकानदारों को दुकान के लम्बाई चैड़ाई के क्रम में पी०डब्लू०डी० द्वारा मूल्यांकन के उपरान्त 10.00 लाख रूपये तक तथा न्यूनतम 1.00 लाख रूपये तक किया गया।
03. चैदहकोसी परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले 826 भू-स्वामी/भवन स्वामी से उनके मकान/जमीन के मूल्यांकन के उपरान्त सहमति के क्रम में रजिस्ट्री कराकर सम्बन्धित भवन स्वामी/भू-स्वामी को मुआवजे की धनराशि का वितरण किया गया। 
04. चैदहकोसी परिक्रमा मार्ग में कुल 119.20 करोड़ रूपये का भुगतान भू-स्वामी/भवन स्वामी/दुकानदारों को किया गया।

*एयरपोर्ट:-*
01. कुल भूमि 823.21 एकड़
02. खातेदारों की निजी भूमि-499.6846 एकड
03. सहमति के आधार पर क्रय (रजिस्ट्री) की गयी भूमि 478.774 एकड़ (95.82 प्रतिशत)
04. अर्जन के माध्यम से प्राप्त भूमि-20.910 एकड़ (4.18 प्रतिशत)
05. कुल परिसम्पत्तियों की संख्या जिन्हें क्रयध् रजिस्ट्री कराया गया-668
06. ग्राम-जनौरा के मजरे राजाबोध पुरवा, भुजवा की बगिया, शंकर का पुरवा, त्रिभवन नगर, बल्दी पाण्डेय का पुरवा ग्राम-गंजा, ग्राम-धरमपुर सहादत तथा ग्राम-कुशमाहा के ऐसे परिवार जो एयरपोर्ट विस्तारीकरण में विस्थापित हुए उनको मलिकपुर, अचारी सगरा, सरेठी, पूरा हुसैन खां, हांसापुर, शमसुद्दीनपुर आदि उपलब्ध स्थानों पर परिवारों की संख्या को देखते हुए पुर्नवासित कराया गया।
07. परियोजना में कुल 952.39 करोड रूपये का भुगतान भू-स्वामी/भवन स्वामी को किया गया।
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