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सोमवार, 6 अप्रैल 2026

सर्व शक्तिशाली पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र हनुमान जी को समर्पित है।

 

पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र

सर्व शक्तिशाली पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र हनुमान जी को समर्पित है।


पंचमुखी हनुमान कवच बहुत ही शुभ फलदायी है।

पंचमुखी हनुमान कवच का जाप करने से जातक के आसपास एक सुरक्षा आवरण बन जाता है, जो जातक को सभी संकटों से बचाता है। उसके सभी शत्रु से उसे मुक्ति देता हैं।

पंचमुखी हनुमान कवच पाठ की सरल विधि।

पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र का जाप करने से पहले स्नान कर खुद को पवित्र कर लें।

स्नान के बाद पंचमुखी हनुमान जी की तस्वीर को किसी लाल आसन पर स्थापित करें।

पंचमुखी हनुमान जी को सिंदूर चढ़ाएं।

इसके बाद पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र का पाठ करें।

पाठ करने के बाद हनुमान जी को प्रणाम करते हुए अपनी गलतियों के लिए क्षमा मांगें।

पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र से लाभ।

पंचमुखी हनुमान की आराधना से जातक के भय, रोग-दोष का नाश होता है।

पंचमुखी हनुमान की आराधना करने वाले जातक के जीवन में सुख शांति आता है।

श्री हनुमान कवच से बुराइयों पर जीत मिलती है।

इस कवच स्तोत्र के पाठ से भूत, प्रेत, चांडाल, और बुरी आत्माओं से मुक्ति मिलती है। शत्रु का नाश होता है।

अथ श्री पंचमुखहनुमत्कवचम् स्तोत्र

श्री गणेशाय नमः।

ॐ अस्य श्रीपञ्चमुखहनुमत्कवचमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषि:।

गायत्री छंद:। पञ्चमुख-विराट् हनुमान् देवता। ह्रीं बीजम्।

श्रीं शक्ति:। क्रौं कीलकं। क्रूं कवचं।

क्रैं अस्त्राय फट्। इति दिग्बन्ध:।

अर्थ:

इस पंचमुख हनुमत कवच स्तोत्र के ऋषि ब्रह्मा हैं, छंद गायत्री है, देवता पंचमुख विराट हनुमान जी हैं, ह्रीं बीज मंत्र है, श्रीं शक्ति है, क्रौं कीलक है, क्रूं कवच है और ‘क्रैं अस्त्राय फट्’ मंत्र दिग्बन्ध हैं।

श्री गरुड़ उवाच

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वांगसुंदर,

यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम्॥

अर्थ:

गरुड़जी ने उद्घोष किया हे सर्वांगसुंदर, देवाधिदेव के द्वारा, उन्हें प्रिय रहने वाला जो हनुमानजी का ध्यान लगाया, मैं उनके नाम का सुमिरण करता हूं। मैं उन मां का ध्यान करता हूं, जिनसे आपकी उत्पत्ति हुई है।

पञ्चवक्त्रं महाभीमं त्रिपञ्चनयनैर्युतम्,

बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम्।।

अर्थ:

श्री हनुमान जी पांच मुख वाले, अत्यंत विशालकाय, पंद्रह नेत्र (त्रि-पञ्च-नयन) धारी हैं, श्री हनुमान जी दस हाथों वाले हैं, वे सकल काम एवं अर्थ इन पुरुषार्थों की सिद्धि करने वाले देव हैं। भाव है की श्री हनुमान जी पांच मुख वाले, पंद्रह नेत्र धारी और दस हाथों वाले हैं जो सभी कार्यों को सिद्ध करते हैं।

पूर्वं तु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभ,

दंष्ट्रा कराल वदनं भ्रुकुटिकुटिलेक्षणम्॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी का मुख सदा ही पर्व दिशा की और रहता है, पूर्व मुखी हैं। श्री हनुमान जी जो वानर मुखी हैं, उनका तेज करोड़ों सूर्य के तुल्य है। श्री हनुमान जी के मुख पर विशाल दाढ़ी है और इनकी भ्रकुटी टेढ़ी हैं। ऐसे दांत वाले श्री हनुमान जी हैं।

अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्,

अत्युग्र तेज वपुष् भीषणं भय नाशनम्॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी बदन दक्षिण दिशा में देखने वाला है और इनका मुख सिंह मुखी है जो अत्यंत ही दिव्य और अद्भुत है। श्री हनुमान जी का मुख भय को समाप्त करने वाला है। श्री हनुमान जी का मुख शत्रुओं के लिए भय पैदा करने वाला है।

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम्,

सर्व नाग प्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम्॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी का जो मुख पश्चिम दिशा में देखने वाला है वह गरुद्मुख है और वह मुख अत्यंत ही बलवान और सामर्थ्यशाली है। विष और भूत को (समस्त बाधाओं को दूर करने वाला) दूर करने वाला गरुडानन है। साँपों और भूतों को दूर करने वाले हैं।

उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम्।

पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम्॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी का उत्तर दिशा में देखने वाला मुख वराह मुख (आगे की और मुख निकला हुआ ) है। वराह मुख श्री हनुमान जी कृष्ण वर्ण के हैं और उनकी तुलना आकाश से की जा सकती है। श्री हनुमान जी पाताल वासियों के प्रमुख बेताल और भूगोल के कष्ट हरने वाले हैं। बीमारियों और ज्वर को समूल नष्ट करने वाले ऐसे वराह मुख हनुमान जी हैं।

ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम्।

येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यं महासुरम् ॥

जघान शरणं तत् स्यात् सर्व शत्रु हरं परम्।

ध्यात्वा पञ्चमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ॥

अर्थ:

ऊर्ध्व दिशा मुखी हनुमान जी हैं जो दानवों का नाश करने वाले हैं। हे हनुमान जी (वीसपेंद्र) जी आप गायत्री के उपासक हैं और आप असुरों का नाश करने वाले हैं। हमें ऐसे पंचमुखी हनुमान जी की शरण में रहना चाहिए। श्री हनुमान जी रूद्र और दयानिधि हैं इनकी शरण में हमें रहना चाहिए। श्री हनुमान जी भक्तों के लिए दयालु और शत्रुओं का नाश करने वाले हैं।

खड़्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशमङ्कुशपर्वतम्।

मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुं॥

भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुङ्गवम्।

एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम्॥

अर्थ:

श्री पंचमुख हनुमान जी हाथों में तलवार, त्रिशूल और खड्ग धारी हैं। श्री हनुमान जी के हाथों में तलवार, त्रिशूल, खट्वाङ्ग नाम का आयुध, पाश, अंकुश, पर्वत है और मुष्टि नाम का आयुध, कौमोदकी गदा, वृक्ष और कमंडलु पंचमुख हनुमानजी ने धारण कर रखे हैं। श्री हनुमान जी ने भिन्दिपाल (लोहे धातु से बना अस्त्र) अस्त्र को धारण कर रखा है। श्री हनुमान जी का दसवां शस्त्र ज्ञान मुद्रा है।

प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम्।

दिव्य माल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी प्रेतासन पर बैठे हैं और उन्होंने समस्त आभूषण धारण कर रखे हैं, श्री हनुमान जी ने दिव्य मालाएं ग्रहण कर रखी हैं जो आकाश के समान हैं और यह दिव्य गंध का लेप समस्त बाधाओं को दूर करने वाला है।

सर्वाश्‍चर्यमयं देवं हनुमद्विश्‍वतो मुखम्,

पञ्चास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं,

शशाङ्कशिखरं कपिराजवर्यम्।

पीताम्बरादिमुकुटैरुपशोभिताङ्गं,

पिङ्गाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी समस्त आश्चर्यों से भरे हुए हैं और श्री हनुमान जी जिन्होंने विश्व में सर्वत्र जिन्होंने मुख किया है, ऐसे ये पंचमुख-हनुमानजी हैं और ये पांच मुख रहने वाले (पञ्चास्य), अच्युत और अनेक अद्भुत वर्णयुक्त (रंगयुक्त) मुख रहने वाले हैं। श्री हनुमान जी ने चन्द्रमा को अपने शीश पर धारण कर रखा है और सभी कपियों में सर्वश्रेष्ठ रहने वाले ऐसे ये हनुमानजी हैं। श्री हनुमान जी पीतांबर, मुकुट आदि से सुशोभित हैं। श्री हनुमान जी पिङ्गाक्ष, आद्यम् और अनिशं हैं। ऐसे इन पंचमुख-हनुमानजी का हम मनःपूर्वक स्मरण करते हैं।

मर्कटेशं महोत्साहं सर्व शत्रु हरं परं।

शत्रुं संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर॥

अर्थ:

श्री हनुमान जी वानरों में श्रेष्ठ हैं, प्रचंड हैं और बहुत उत्साही भी हैं। श्री हनुमान जी शत्रुओं का नाश करने वाले हैं और में रक्षा कीजिए मेरा उद्धार कीजिये वानर श्रेष्ठ, प्रचंड उत्साही हनुमान जी सारे शत्रुओं का नि:पात करते हैं।हे श्रीमन् पंचमुख-हनुमानजी, मेरे शत्रुओं का संहार कीजिए। संकट में से मेरा उद्धार कीजिए।

ॐ हरिमर्कट मर्कट मंत्र मिदं परि लिख्यति लिख्यति वामतले।

यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं यदि मुञ्चति मुञ्चति वामलता॥

ॐ हरि मर्कटाय स्वाहा॥

अर्थ:

महाप्राण हनुमान जी के बाये पैर के तलवे के नीचे ‘ॐ हरि मर्कटाय स्वाहा’ लिखने से उसके केवल शत्रु का ही नहीं बल्कि शत्रु कुल का नाश हो जायेगा। श्री हनुमान जी वामलता को यानी दुरितता को, तिमिर प्रवृत्ति को हनुमानजी समूल नष्ट कर देते हैं और ऐसे एक बदन को स्वाहा कहकर नमस्कार किया है।

॥ ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पूर्वकपिमुखाय सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा॥

अर्थ:

सकल शत्रुओं का संहार करने वाले पूर्व मुख को, कपिमुख को, भगवान श्री पंचमुख-हनुमानजी को मेरा नमन है।

॥ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा॥

अर्थ:

दुष्प्रवृत्तियों के प्रति भयानक मुख रहने वाले (करालवदनाय), सारे भूतों का उच्छेद करने वाले, दक्षिण मुख को, नरसिंह मुख को, भगवान श्री पंचमुख-हनुमानजी को मेरा नमस्कार है।

॥ॐ नमो भगवते पंचवदनाय पश्चिममुखाय गरुडाननाय सकलविषहराय स्वाहा॥

अर्थ:

हर प्रकार के विष का हरण करने वाले पश्चिममुखी को, गरुड़ मुख को, भगवान श्री पंचमुख-हनुमानजी को मेरा नमस्कार है।

॥ॐ नमो भगवते पंचवदनाय उत्तरमुखाय आदिवराहाय सकलसंपत्कराय स्वाहा॥

अर्थ:

सकल संपदाएं प्रदान करने वाले उत्तरमुख को, आदिवराहमुख को, भगवान श्री पंचमुख-हनुमान जी को मेरा नमस्कार है।

॥ॐ नमो भगवते पंचवदनाय ऊर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय सकलजनवशकराय स्वाहा॥

अर्थ:

सकल जनों को वश में करने वाले, ऊर्ध्वमुख को, अश्वमुख को, भगवान श्री पंचमुख-हनुमानजी को मेरा नमस्कार है।

॥ॐ श्री पंचमुख हनुमंताय आंजनेयाय नमो नमः॥

अर्थ:

अंजनी पुत्र श्री पञ्चमुख-हनुमान जी को पुन: मेरा नमस्कार है।

आप सबके बार बार पूछने पर ये पंचमुखी हनुमान कवच स्तोत्र भेजा है।

आज समझते है कि मंत्र की ऊर्जा और उसकी प्रक्रिया क्या होती है।

 

आज समझते है कि मंत्र की ऊर्जा और उसकी प्रक्रिया क्या होती है।

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मंत्रों का प्रयोग मानव ने अपने कल्याण के साथ-साथ दैनिक जीवन की संपूर्ण समस्याओं के समाधान हेतु यथासमय किया है और उसमें सफलता भी पाई है, परंतु आज के भौतिकवादी युग में यह विधा मात्र कुछ ही व्यक्तियों के प्रयोग की वस्तु बनकर रह गई है।

मंत्रों में छुपी अलौकिक शक्ति का प्रयोग कर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाया जा सकता है। सबसे पहले प्रश्न यह उठता है कि 'मंत्र' क्या है, इसे कैसे परिभाषित किया जा सकता है। इस संदर्भ में यह कहना उचित होगा कि मंत्र का वास्तविक अर्थ असीमित है। किसी देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए प्रयुक्त शब्द समूह मंत्र कहलाता है। जो शब्द जिस देवता या शक्ति को प्रकट करता है उसे उस देवता या शक्ति का मंत्र कहते हैं। मंत्र एक ऐसी गुप्त ऊर्जा है, जिसे हम जागृत कर इस अखिल ब्रह्मांड में पहले से ही उपस्थित इसी प्रकार की ऊर्जा से एकात्म कर उस ऊर्जा के लिए देवता (शक्ति) से सीधा साक्षात्कार कर सकते हैं।

ऊर्जा अविनाशिता के नियमानुसार ऊर्जा कभी भी नष्ट नहीं होती है, वरन्‌ एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होती रहती है। अतः जब हम मंत्रों का उच्चारण करते हैं तो उससे उत्पन्न ध्वनि एक ऊर्जा के रूप में ब्रह्मांड में प्रेषित होकर जब उसी प्रकार की ऊर्जा से संयोग करती है तब हमें उस ऊर्जा में छुपी शक्ति का आभास होने लगता है। ज्योतिषीय संदर्भ में यह निर्विवाद सत्य है कि इस धरा पर रहने वाले सभी प्राणियों पर ग्रहों का अवश्य प्रभाव पड़ता है।

चंद्रमा मन का कारक ग्रह है और यह पृथ्वी के सबसे नजदीक होने के कारण खगोल में अपनी स्थिति के अनुसार मानव मन को अत्यधिक प्रभावित करता है। अतः इसके अनुसार जो मन का त्राण (दुःख) हरे उसे मंत्र कहते हैं। मंत्रों में प्रयुक्त स्वर, व्यंजन, नाद व बिंदु देवताओं या शक्ति के विभिन्न रूप एवं गुणों को प्रदर्शित करते हैं। मंत्राक्षरों, नाद, बिंदुओं में दैवीय शक्ति छुपी रहती है।

मंत्र उच्चारण से ध्वनि उत्पन्न होती है, उत्पन्न ध्वनि का मंत्र के साथ विशेष प्रभाव होता है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति, स्थान, वस्तु के ज्ञानर्थ कुछ संकेत प्रयुक्त किए जाते हैं, ठीक उसी प्रकार मंत्रों से संबंधित देवी-देवताओं को संकेत द्वारा संबंधित किया जाता है, इसे बीज कहते हैं। विभिन्न बीज मंत्र इस प्रकार हैं :

ॐ- परमपिता परमेश्वर की शक्ति का प्रतीक है।

ह्रीं- माया बीज,

श्रीं- लक्ष्मी बीज,

क्रीं- काली बीज,

ऐं- सरस्वती बीज,

क्लीं- कृष्ण बीज।

मंत्रों में देवी-देवताओं के नाम भी संकेत मात्र से दर्शाए जाते हैं, जैसे राम के लिए 'रां', हनुमानजी के लिए 'हं', गणेशजी के लिए 'गं', दुर्गाजी के लिए 'दुं' का प्रयोग किया जाता है। इन बीजाक्षरों में जो अनुस्वार (ं) या अनुनासिक (जं) संकेत लगाए जाते हैं, उन्हें 'नाद' कहते हैं। नाद द्वारा देवी-देवताओं की अप्रकट शक्ति को प्रकट किया जाता है।

लिंगों के अनुसार मंत्रों के तीन भेद होते हैं-

पुर्लिंग : जिन मंत्रों के अंत में हूं या फट लगा होता है।

स्त्रीलिंग : जिन मंत्रों के अंत में 'स्वाहा' का प्रयोग होता है।

नपुंसक लिंग : जिन मंत्रों के अंत में 'नमः' प्रयुक्त होता है ।

अतः आवश्यकतानुसार मंत्रों को चुनकर उनमें स्थित अक्षुण्ण ऊर्जा की तीव्र विस्फोटक एवं प्रभावकारी शक्ति को प्राप्त किया जा सकता है। मंत्र, साधक व ईश्वर को मिलाने में मध्यस्थ का कार्य करता है। मंत्र की साधना करने से पूर्व मंत्र पर पूर्ण श्रद्धा, भाव, विश्वास होना आवश्यक है तथा मंत्र का सही उच्चारण अति आवश्यक है। मंत्र लय, नादयोग के अंतर्गत आता है। मंत्रों के प्रयोग से आर्थिक, सामाजिक, दैहिक, दैनिक, भौतिक तापों से उत्पन्न व्याधियों से छुटकारा पाया जा सकता है। रोग निवारण में मंत्र का प्रयोग रामबाण औषधि का कार्य करता है। मानव शरीर में 108 जैविकीय केंद्र (साइकिक सेंटर) होते हैं जिसके कारण मस्तिष्क से 108 तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) उत्सर्जित करता है।

शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने मंत्रों की साधना के लिए 108 मनकों की माला तथा मंत्रों के जाप की आकृति निश्चित की है। मंत्रों के बीज मंत्र उच्चारण की 125 विधियाँ हैं। मंत्रोच्चारण से या जाप करने से शरीर के 6 प्रमुख जैविकीय ऊर्जा केंद्रों से 6250 की संख्या में विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं, जो इस प्रकार हैं :

मूलाधार 4 ×125=500

स्वधिष्ठान 6 ×125=750

मनिपुरं 10 ×125=1250

हृदयचक्र 13 ×125=1500

विध्रहिचक्र 16 ×125=2000

आज्ञाचक्र 2 ×125=250

कुल योग 6250 (विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों की संख्या)

भारतीय कुंडलिनी विज्ञान के अनुसार मानव के स्थूल शरीर के साथ-साथ 6 अन्य सूक्ष्म शरीर भी होते हैं। विशेष पद्धति से सूक्ष्म शरीर के फोटोग्राफ लेने से वर्तमान तथा भविष्य में होने वाली बीमारियों या रोग के बारे में पता लगाया जा सकता है। सूक्ष्म शरीर के ज्ञान के बारे में जानकारी न होने पर मंत्र शास्त्र को जानना अत्यंत कठिन होगा।

मानव, जीव-जंतु, वनस्पतियों पर प्रयोगों द्वारा ध्वनि परिवर्तन (मंत्रों) से सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों के उत्पन्न होने को प्रमाणित कर लिया गया है। मानव शरीर से 64 तरह की सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें उत्सर्जित होती हैं जिन्हें 'धी' ऊर्जा कहते हैं। जब धी का क्षरण होता है तो शरीर में व्याधि एकत्र हो जाती है।

मंत्रों का प्रभाव वनस्पतियों पर भी पड़ता है। जैसा कि बताया गया है कि चारों वेदों में कुल मिलाकर 20 हजार 389 मंत्र हैं, प्रत्येक वेद का अधिष्ठाता देवता है। ऋग्वेद का अधिष्ठाता ग्रह गुरु है। यजुर्वेद का देवता ग्रह शुक्र, सामवेद का मंगल तथा अथर्ववेद का अधिपति ग्रह बुध है। मंत्रों का प्रयोग ज्योतिषीय संदर्भ में अशुभ ग्रहों द्वारा उत्पन्न अशुभ फलों के निवारणार्थ किया जाता है। ज्योतिष वेदों का अंग माना गया है। इसे वेदों का नेत्र कहा गया है। भूत ग्रहों से उत्पन्न अशुभ फलों के शमनार्थ वेदमंत्रों, स्तोत्रों का प्रयोग अत्यन्त प्रभावशाली माना गया है।

उदाहरणार्थ आदित्य हृदयस्तोत्र सूर्य के लिए, दुर्गास्तोत्र चंद्रमा के लिए, रामायण पाठ गुरु के लिए, ग्राम देवता स्तोत्र राहु के लिए, विष्णु सहस्रनाम, गायत्री मंत्रजाप, महामृत्युंजय जाप, क्रमशः बुध, शनि एवं केतु के लिए, लक्ष्मीस्तोत्र शुक्र के लिए और मंगलस्रोत मंगल के लिए। मंत्रों का चयन प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथों से किया गया है। वैज्ञानिक रूप से यह प्रमाणित हो चुका है कि ध्वनि उत्पन्न करने में नाड़ी संस्थान की 72 नसें आवश्यक रूप से क्रियाशील रहती हैं। अतः मंत्रों के उच्चारण से सभी नाड़ी संस्थान क्रियाशील रहते हैं।

बर्तन के बदले तो नहीं बेच रहे पुराना फोन, बर्तनों के बदले पुराने फोन देकर हो रही साइबर ठगी

 बर्तन के बदले तो नहीं बेच रहे पुराना फोन, इस्तार की गिरफ्तारी से खुला ‘मदरबोर्ड स्कैम’: जानें- कैसे साइबर अपराधियों का हथियार बन सकती है लापरवाही

बर्तनों के बदले पुराने फोन देकर हो रही साइबर ठगी (फोटो साभार : ChatGPT)
जब आप अपना पुराना, टूटा या बेकार हो चुका मोबाइल फोन किसी फेरीवाले को चंद बर्तनों के बदले दे देते हैं, तो आपको लगता है कि आपने कबाड़ का सही सौदा किया। लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में एक ऐसा खुलासा हुआ है, जो आपकी रातों की नींद उड़ा सकता है।
कटिहार का एक मामूली सा मोबाइल दुकानदार इस्तार आलम, इंटरनेशनल साइबर अपराधियों का ‘हथियार सप्लायर’ निकला है। यह गिरोह आपके पुराने फोन के मदरबोर्ड को चीन और बांग्लादेश के साइबर ठगों तक पहुँचा रहा था, ताकि आपका पर्सनल डेटा चोरी कर बैंक खाते साफ किए जा सकें।

क्या है पूरा मामला? कैसे हुई गिरफ्तारी
इस पूरे खेल का पर्दाफाश तब हुआ जब उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले की लालगंज पुलिस ने 16 मार्च की रात एक ट्रक को पकड़ा। इस ट्रक में 11,605 पुराने मोबाइल फोन भरे हुए थे, जिनकी कीमत करीब 1 करोड़ रुपए आँकी गई। पुलिस ने जब ट्रक में सवार 8 लोगों को गिरफ्तार किया, तो उन्होंने बिहार के कटिहार जिले के रहने वाले इस्तार आलम का नाम उगला।
इसके बाद बिहार STF और यूपी पुलिस ने संयुक्त छापेमारी कर कटिहार के रौतारा इलाके से इस्तार को धर दबोचा। इस्तार कहने को तो एक छोटी सी मोबाइल दुकान चलाता था, लेकिन असल में वह एक इंटरनेशनल सिंडिकेट का सरगना था।

गली का ‘बर्तन वाला’ और पुराना मोबाइल: गिरोह का मॉडल

इस गिरोह के काम करने का तरीका इतना व्यवस्थित और शातिर है कि आम इंसान को इसकी भनक तक नहीं लगती। गिरोह के सरगना इस्तार आलम ने देश के कई बड़े राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, दिल्ली, तमिलनाडु और हैदराबाद में अपना एक बड़ा जाल बिछा रखा था। इस काम के लिए उसने बड़ी संख्या में ‘फेरीवालों’ को काम पर रखा था। ये लोग साधारण कबाड़ वाले बनकर गली-मोहल्लों में घूमते हैं ताकि किसी को शक न हो।
इन फेरीवालों का मुख्य काम लोगों को लालच देना होता है। ये खासतौर पर घरों की महिलाओं को अपना निशाना बनाते हैं और उन्हें नए चमचमाते स्टील के बर्तन या प्लास्टिक के डिब्बों का लालच देते हैं। इसके बदले में वे लोगों से उनके घर में पड़े पुराने, खराब या टूटे हुए स्मार्टफोन माँगते हैं। अधिकतर लोग यह सोचकर अपना पुराना फोन उन्हें दे देते हैं कि ‘यह तो कचरा है, इसके बदले नया बर्तन मिलना फायदे का सौदा है’, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि वे अपना कीमती डेटा अपराधियों को सौंप रहे हैं।
जब ये फेरीवाले अलग-अलग शहरों से हजारों की संख्या में मोबाइल इकट्ठा कर लेते हैं, तो इन्हें बड़े ट्रकों में भरकर बिहार के कटिहार भेजा जाता है। कटिहार इस्तार आलम का मुख्य केंद्र है। एक बार में करीब 10 से 20 हजार मोबाइल वहाँ पहुँचते हैं। वहाँ पहुँचने के बाद इस्तार अपनी दुकान में इन सभी फोनों को बेरहमी से तोड़ देता है और उनके अंदर से ‘मदरबोर्ड’ निकाल लेता है।
मदरबोर्ड मोबाइल का वह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है जिसे फोन का ‘दिमाग’ कहा जाता है। फोन भले ही ऊपर से टूटा हो या बंद हो, लेकिन उसकी याददाश्त यानी सारा पर्सनल डेटा (फोटो, पासवर्ड, बैंक डिटेल्स) इसी मदरबोर्ड में सुरक्षित रहता है। इस्तार का असली मकसद इसी चिप या बोर्ड को निकालकर अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधियों तक पहुँचाना होता है, ताकि वे आपके डेटा का गलत इस्तेमाल कर सकें।

चीन और बांग्लादेश से कनेक्शन: डेटा की तस्करी

पुलिस की जाँच में यह बेहद चौंकाने वाली बात सामने आई है कि इस्तार आलम महज एक कबाड़ का कारोबारी नहीं था, बल्कि वह पिछले एक साल से अंतरराष्ट्रीय स्तर के खतरनाक साइबर अपराधियों के साथ मिलकर काम कर रहा था। वह अपने द्वारा निकाले गए मोबाइल के मदरबोर्ड्स को चीन और बांग्लादेश के उन साइबर ठगों तक पहुँचाता था, जो कंबोडिया, मलेशिया और म्यांमार जैसे देशों में बैठकर बड़े-बड़े ‘साइबर स्कैम कंपाउंड’ यानी ठगी के केंद्र चला रहे हैं। यह एक बहुत बड़ा नेटवर्क है जो दुनियाभर के लोगों को अपना शिकार बनाता है।
इन मदरबोर्ड्स का विदेशी हैकर्स के पास जाने का मतलब है आपकी निजी जानकारी का खतरे में पड़ना। दरअसल, ये विदेशी हैकर्स इतने शातिर होते हैं कि वे आधुनिक सॉफ्टवेयर और मशीनों के जरिए आपके उन पुराने मदरबोर्ड से भी डेटा रिकवर कर लेते हैं। भले ही आपने अपना फोटो, वीडियो, कॉन्टैक्ट लिस्ट या बैंक से जुड़ी जानकारी डिलीट कर दी हो, लेकिन ये हैकर्स उन्हें वापस निकालकर आपकी पहचान चोरी कर सकते हैं और आपके बैंक खातों में सेंध लगा सकते हैं।
हैरानी की बात यह भी है कि इस्तार का यह धँधा सिर्फ विदेशों तक ही सीमित नहीं था। उसने भारत के भीतर भी साइबर अपराधियों को यह ‘कच्चा माल’ उपलब्ध कराया। वह इन मदरबोर्ड्स को भारत के सबसे कुख्यात साइबर अपराध केंद्र ‘जामताड़ा’ और बिहार के स्थानीय छोटे-बड़े ठगों को भी बेचता था। यानी एक छोटा सा मोबाइल बोर्ड कटिहार से निकलकर जामताड़ा के ठगों से लेकर चीन और कंबोडिया के बड़े हैकर्स तक के पास पहुँच रहा था, जो डिजिटल इंडिया के दौर में देश की सुरक्षा और आम लोगों की गाढ़ी कमाई के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है।

करोड़ों का ट्रांजेक्शन: दिहाड़ी मजदूर के खाते में लाखों

यह पूरा गिरोह कबाड़ के काम की आड़ में असल में करोड़ों रुपयों का काला कारोबार कर रहा था। बाहर से देखने पर भले ही यह पुराने मोबाइल का साधारण लेने-देन लगता हो, लेकिन इसके पीछे की कमाई चौंकाने वाली है। इस गिरोह के लोग इतने शातिर हैं कि वे खुद को गरीब दिखाने की कोशिश करते हैं ताकि किसी को संदेह न हो। पुलिस की जाँच में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने सबके होश उड़ा दिए। गिरोह का एक सदस्य, जो खुद को एक मामूली दिहाड़ी मजदूर बताता था और कहता था कि वह सिर्फ इस्तार के लिए मजदूरी करता है, जब पुलिस ने उसका बैंक खाता खंगाला तो उसमें पिछले दो साल के भीतर 45 लाख रुपए का बड़ा लेन-देने मिला।



मंगलवार, 31 मार्च 2026

अकबर ने 7 फ़ीट 8 इंची बहलोल_खान को भेजा था महाराणा_प्रताप का सर लाने,

 

अकबर ने 7 फ़ीट 8 इंची बहलोल_खान को भेजा था

महाराणा_प्रताप का सर लाने, कभी नहीं हारा था बहलोल

मुगली अकबर का सबसे खतरनाक वाला एक सेना नायक हुआ नाम - बहलोल खां

कहा जाता है कि हाथी जैसा बदन था इसका और ताक़त का जोर इतना कि नसें फटने को होती थीं

ज़ालिम इतना कि तीन दिन के बालक को भी गला रेत-रेत के मार देता था बशर्ते वो हिन्दू का हो

एक भी लड़ाई कभी हारा नहीं था अपने पूरे करियर में ये बहलोल खां ॥

काफी लम्बा था, 7 फुट 8 इंच की हाइट थी, कहा जाता है की घोडा उसने सामने छोटा लगता था ॥ बहुत चौड़ा और ताकतवर था बहलोल खां, अकबर को बहलोल खां पर खूब नाज था, लूटी हुई औरतों में से बहुत सी बहलोल खां को दे दी जाती थी ॥

फिर हल्दीघाटी का युद्ध हुआ, अकबर और महाराणा प्रताप की सेनाएं आमने सामने थी, अकबर महाराणा प्रताप से बहुत डरता था इसलिए वो खुद इस युद्ध से दूर रहा ॥

अब इसी बहलोल खां को अकबर ने भिड़ा दिया हिन्दू-वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप से

लड़ाई पूरे जोर पर और मुगलई गंद खा-खा के ताक़त का पहाड़ बने बहलोल खां का आमना-सामना हो गया अपने प्रताप से ॥

अफीम के ख़ुमार में डूबी हुई सुर्ख नशेड़ी आँखों से भगवा अग्नि की लपट सी प्रदीप्त रण के मद में डूबी आँखें टकराईं और जबरदस्त भिडंत शुरू. . . कुछ देर तक तो राणा यूँ ही मज़ाक सा खेलते रहे मुगलिया बिलाव के साथ

और फिर गुस्से में आ के अपनी तलवार से एक ही वार में घोड़े सहित हाथी सरीखे उस नर का पूरा धड़ बिलकुल सीधी लकीर में चीर दिया

ऐसा फाड़ा कि बहलोल खां का आधा शरीर इस तरफ और आधा उस तरफ गिरा ॥

ऐसे-ऐसे युद्ध-रत्न उगले हैं सदियों से भगवा चुनरी ओढ़े रण में तांडव रचने वाली मां भारती ने...

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सोमवार, 30 मार्च 2026

पञ्चाङ्ग की उपयोगिता 🍁* *(अति महत्वपूर्ण जानकारी)*

*🍁 पञ्चाङ्ग की उपयोगिता 🍁*
    *(अति महत्वपूर्ण जानकारी)*
भारतीय पंचांग का आधार विक्रम संवत है जिसका सम्बंध राजा विक्रमादित्य के शासन काल से है। ये कैलेंडर विक्रमादित्य के शासनकाल में जारी हुआ था। इसी कारण इसे विक्रम संवत के नाम से जाना जाता है। पंचाग पाँच अंगो के मिलने से बनता है, ये पाँच अंग इस प्रकार हैं:-

👉 1:- तिथि (Tithi) 2:- वार (Day) 3:- नक्षत्र (Nakshatra) 4:- योग (Yog) 5:- करण (Karan)
पंचाग का पठन एवं श्रवण अति शुभ माना जाता है इसीलिए भगवान श्रीराम भी पंचाग का श्रवण करते थे ।

👉 शास्त्रों के अनुसार तिथि के पठन और श्रवण से माँ लक्ष्मी की कृपा मिलती है ।

👉 वार के पठन और श्रवण से आयु में वृद्धि होती है।

👉 नक्षत्र के पठन और श्रवण से पापो का नाश होता है।

👉 योग के पठन और श्रवण से प्रियजनों का प्रेम मिलता है। उनसे वियोग नहीं होता है ।

👉 करण के पठन श्रवण से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है ।

इसलिए हर मनुष्य को जीवन में शुभ फलो की प्राप्ति के लिए नित्य पंचांग को देखना और बोल कर पढ़ना चाहिए।

चन्द्रमा की एक कला को एक तिथि माना जाता है जो उन्नीस घंटे से 24 घंटे तक की होती है । अमावस्या के बाद प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक की तिथियों को शुक्लपक्ष और पूर्णिमा से अमावस्या तक की तिथियों को कृष्ण पक्ष कहते हैं।

*तिथियाँ इस प्रकार होती है :*

1. प्रतिपदा, 2. द्वितीय , 3. तृतीया, 4. चतुर्थी, 5. पँचमी, 6. षष्टी, 7. सप्तमी, 8. अष्टमी, 9. नवमी, 10. दशमी, 11. एकादशी, 12. द्वादशी, 13. त्रियोदशी, 14. चतुर्दशी, 15. पूर्णिमा एवं 30. अमावस्या

*तिथियों के प्रकार:-* 👉 1-6-11 नंदा, 2-7-12 भद्रा, 3-8-13 जया, 4-9-14 रिक्ता और 5-10-15 पूर्णा तथा 4-6-8-9-12-14 तिथियाँ पक्षरंध्र संज्ञक हैं ।

*मुख्य रूप से तिथियाँ 5 प्रकार की होती है।*

*नन्दा तिथियाँ:-* 👉 दोनों पक्षों की 1 , 6 और 11 तिथि अर्थात प्रतिपदा, षष्ठी व एकादशी तिथियाँ नन्दा तिथि कहलाती हैं । इन तिथियों में अंतिम प्रथम घटी या अंतिम 24 मिनट को छोड़कर सभी मंगल कार्यों को करना शुभ माना जाता है ।

*भद्रा तिथियाँ:-* 👉 दोनों पक्षों की 2, 7, और 12 तिथि अर्थात द्वितीया, सप्तमी व द्वादशी तिथियाँ भद्रा तिथि कहलाती है । इन में कोई भी शुभ, मांगलिक कार्य नहीं किये जाते है लेकिन यह तिथियाँ मुक़दमे, चुनाव , शल्य चिकित्सा सम्बन्धी कार्यो के लिए अच्छी मानी जाती है और व्रत, जाप, पूजा अर्चना एवं दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्यों के लिए यह शुभ मानी गयी हैं ।

*जया तिथि:-* 👉 दोनों पक्षों की 3 , 8 और 13 तिथि अर्थात तृतीया, अष्टमी व त्रयोदशी तिथियाँ जया तिथि कहलाती है । यह तिथियाँ विद्या, कला जैसे गायन, वादन नृत्य आदि कलात्मक कार्यों के लिए उत्तम मानी जाती है ।

*रिक्ता तिथि:-* 👉 दोनों पक्षों की 4 , 9, और 14 तिथि अर्थात चतुर्थी, नवमी व चतुर्दशी तिथियाँ रिक्त तिथियाँ कहलाती है । तिथियों में कोई भी मांगलिक कार्य, नया व्यापार, गृह प्रवेश, नहीं करने चाहिए परन्तु मेले, तीर्थ यात्राओं आदि के लिए यह ठीक होती हैं ।

*पूर्णा तिथियाँ:-* 👉दोनों पक्षों की 5, 10 , 15 , तिथि अर्थात पंचमी, दशमी और पूर्णिमा और अमावस 
पूर्णा तिथि कहलाती हैं । इनमें अमवस्या को छोड़कर बाकि दिनों में अंतिम 1 घटी या 24 मिनट पूर्व तक सभी प्रकार के लिए मंगलिक कार्यों के लिए ये तिथियाँ शुभ मानी जाती हैं ।

*वार:-* 👉 एक सप्ताह में 7 दिन या 7 वार होते है । सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार, शनिवार और रविवार । इन सभी वारो के अलग अलग देवता और ग्रह होते है जिनका इन वारो पर स्पष्ट रूप से प्रभाव होता है ।

*नक्षत्र:-* 👉 हमारे आकाश के तारामंडल में अलग अलग रूप में दिखाई देने वाले आकार नक्षत्र कहलाते है । नक्षत्र 27 प्रकार के माने जाते है । ज्योतिषियों में अभिजीत नक्षत्र को 28 वां नक्षत्र माना है । नक्षत्रों को उनके स्वभाव के आधार पर 7 श्रेणियों ध्रुव, चंचल, उग्र, मिश्र, क्षिप्रा, मृदु और तीक्ष्ण में बाँटा गया है । चन्द्रमा इन सभी नक्षत्रो में भृमण करता रहता है ।

*नक्षत्रो के नाम:-* 👉 1.अश्विनी, 2. भरणी, 3. कृत्तिका, 4. रोहिणी, 5. मॄगशिरा, 6. आद्रा, 7. पुनर्वसु, 8. पुष्य, 9. अश्लेशा, 10. मघा, 11. पूर्वाफाल्गुनी, 12. उत्तराफाल्गुनी, 13. हस्त, 14. चित्रा, 15. स्वाति, 16. विशाखा, 17. अनुराधा, 18. ज्येष्ठा, 19. मूल, 20. पूर्वाषाढा, 21. उत्तराषाढा, 22. श्रवण, 23. धनिष्ठा, 24. शतभिषा, 25. पूर्वाभाद्रपद, 26. उत्तराभाद्रपद और 27. रेवती।

*नक्षत्रों का स्वभाव:-* 👉 नक्षत्रों को उनके स्वभाव के आधार पर 7 श्रेणियों ध्रुव, चंचल, उग्र, मिश्र, क्षिप्रा, मृदु और तीक्ष्ण में बाँटा गया है । नक्षत्रों की शुभाशुभ फल के आधार पर तीन श्रेणी होती हैं । शुभ, मध्यम एवं अशुभ ।

*शुभ फलदायी:-* 👉 1 ,4 ,8 ,12 ,13 ,14 ,17 ,21 ,22 ,23 ,24 ,26 ,27 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह 13 नक्षत्र शुभ फलदायी माने जाते हैं ।
*मध्यम फलदायी :-* 👉 5 , 7 ,10 ,16 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह चार नक्षत्र मध्यम फल अर्थात थोड़ा फल देते हैं।

*अशुभ फलदायी:-* 👉 2 ,3 ,6 ,9 ,11 ,15 ,18 ,19 ,20 ,25 शास्त्रों के अनुसार या दस नक्षत्र अशुभ फल देते हैं अत: इन नक्षत्रों में शुभ कार्यो को करने से बचना चाहिए ।

*योग:-* 👉 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार 27 योग कहे गए है । सूर्य और चन्द्रमा की विशेष दूरियों की स्थितियों से योग बनते है । जब सूर्य और चन्द्रमा की गति में 13º-20' का अन्तर पड्ता है तो एक योग बनता है। दूरियों के आधार पर बनने वाले योगो के नाम निम्नलिखित है,

1. विष्कुम्भ (Biswakumva), 2. प्रीति (Priti), 3. आयुष्मान(Ayushsman), 4. सौभाग्य (Soubhagya), 5. शोभन (Shobhan), 6. अतिगड (Atigad), 7. सुकर्मा (Sukarma), 8. घृति (Ghruti), 9. शूल (Shula), 10. गंड (Ganda), 11. वृद्धि (Bridhi), 12. ध्रुव (Dhrub), 13. व्याघात (Byaghat), 14. हर्षण (Harshan), 15. वज्र (Bajra), 16. सिद्धि (Sidhhi), 17. व्यतीपात (Biytpat), 18. वरीयान (Bariyan), 19. परिध (paridhi), 20. शिव (Shiba), 21. सिद्ध (Sidhha), 22. साध्य (Sadhya), 23. शुभ (Shuva), 24. शुक्ल (Shukla), 25. ब्रह्म (Brahma), 26. ऎन्द्र (Indra), 27. वैधृति (Baidhruti)

इन 27 योगों में से 9 योगों को अशुभ माना जाता है इसीलिए इनमें सभी प्रकार के शुभ कार्यों से बचने को कहा गया है। ये अशुभ योग हैं: विष्कुम्भ, अतिगण्ड, शूल, गण्ड, व्याघात, वज्र, व्यतीपात, परिघ और वैधृति।

*करण:-*👉 एक तिथि में दो करण होते हैं- एक पूर्वार्ध में तथा एक उत्तरार्ध में। कुल 11 करण होते हैं- बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज, विष्टि, शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किस्तुघ्न। इसमें विष्टि करण को भद्रा कहते हैं। भद्रा में सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं।

*महीनो के नाम:-* 👉 भारतीय पंचाग के अनुसार हिन्दु कैलेण्डर में 12 माह होते है जिनके नाम आकाशमण्डल के नक्षत्रों में से 12 नक्षत्रों के नामों पर रखे गये हैं। जिस मास की पूर्णमासी को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसी के नाम पर उस मास का नाम रखा गया है।

चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्र मास (मार्च-अप्रैल)

विशाखा नक्षत्र के नाम पर वैशाख मास (अप्रैल-मई)

ज्येष्ठा नक्षत्र के नाम पर ज्येष्ठ मास (मई-जून)

आषाढ़ा नक्षत्र के नाम पर आषाढ़ मास (जून-जुलाई)

श्रवण नक्षत्र के नाम पर श्रावण मास (जुलाई-अगस्त)

भाद्रपद (भाद्रा) नक्षत्र के नाम पर भाद्रपद मास (अगस्त-सितम्बर)

अश्विनी के नाम पर आश्विन मास (सितम्बर-अक्तूबर)

कृत्तिका के नाम पर कार्तिक मास (अक्तूबर-नवम्बर)

मृगशीर्ष के नाम पर मार्गशीर्ष (नवम्बर-दिसम्बर)

पुष्य के नाम पर पौष (दिसम्बर-जनवरी)

मघा के नाम पर माघ (जनवरी-फरवरी) तथा फाल्गुनी नक्षत्र के नाम पर फाल्गुन मास (फरवरी-मार्च) का नामकरण हुआ है।

*पंचांग दर्शन के लाभ*

      *तिथेश्च श्रियमाप्नोति वारादायुष्य वर्धनम्,* 
      *नक्षत्रात् हरते पापं योगात् रोग निवारणम्।* 
     *करणात् कार्यसिद्धिस्यात् एवं पंचांगमुत्तमम्।।*
             
*भावार्थ:-*

 {1} हर दिन की तिथी देखने से संपत्ती की प्राप्ती होती है।

{2 }वार का स्मरण करने से आयुष्य की अभिवृद्धि होती है।
  
 { 3} नक्षत्र देवता का स्मरण करने से पाप निवारण होता है।

 {4} करण देवता स्मरण करने से आपके कार्य सफल होते है।

{ 5} योग देवता का स्मरण करने से रोगनिवृत्ति होती है।

     इसलिये हर दिन पंचांग देखना चाहिए।

*🙏राम राम सा जी 🙏*

चश्मे को कहें अलविदा... इस देसी कंपनी ने बना ली है आई ड्रॉप, चींटी जैसे शब्‍द भी दिखेंगे हाथी!

 

भारत की दवा नियामक संस्था ने प्रेसबायोपिया के इलाज के लिए नई उपचार पद्धति को मंजूरी दी है। मुंबई की एंटोड फार्मास्यूटिकल्स ने प्रेसवू आई ड्रॉप बनाई है। यह आई ड्रॉप 40 से ज्‍यादा उम्र के लोगों को चश्मे की आवश्यकता को कम करने में मदद करेगी। आई ड्रॉप अक्टूबर के पहले सप्ताह से उपलब्ध होगी।

नई दिल्‍ली: मुंबई की दवा कंपनी ने एक नई आई ड्रॉप बनाई है। इससे चश्मे की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। एंटोड फार्मास्यूटिकल्स का कहना है कि उनकी PresVu आई ड्रॉप प्रेसबायोपिया का इलाज कर सकती है। प्रेसबायोपिया उम्र के साथ होने वाली आंखों की समस्या है। इसमें पास की चीजें धुंधली दिखाई देती हैं। यह समस्या आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद शुरू होती है। भारत में लगभग 1.09 अरब से 1.80 अरब लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। दुनियाभर में भी यह एक आम समस्या है।

PresVu आई ड्रॉप को भारत के औषधि महानियंत्रक (DCGI) ने मंजूरी दे दी है। इससे पहले केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) की विशेषज्ञ समिति ने इसकी सिफारिश की थी। कंपनी का दावा है कि यह भारत में अपनी तरह की पहली आई ड्रॉप है जो प्रेसबायोपिया के इलाज के लिए बनाई गई है। यह 40 साल से ज्यादा उम्र के उन लोगों के लिए है जो चश्मा लगाना नहीं चाहते हैं।

आई ड्रॉप की सबसे खास बात

PresVu आई ड्रॉप की सबसे खास बात यह है कि इसमें एडवांस्ड डायनामिक बफर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। इससे यह आई ड्रॉप आंखों के पीएच लेवल के हिसाब से खुद को ढाल लेती है। लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर भी यह सुरक्षित रहती है। एंटोड फार्मास्यूटिकल्स के सीईओ निखिल के मसुरकर का कहना है कि PresVu केवल एक प्रोडक्‍ट नहीं है, यह एक समाधान है जो लाखों लोगों को बेहतर दृष्टि प्रदान करके उनके जीवन को बेहतर बना सकती है

डॉक्टर आदित्य सेठी का कहना है कि PresVu आई ड्रॉप के इस्तेमाल से सिर्फ 15 मिनट में पास की नजर बेहतर होने लगती है। यह उन लोगों के लिए एक बेहतर विकल्प है जो प्रेसबायोपिया की समस्या से जूझ रहे हैं। यह आई ड्रॉप अक्टूबर के पहले हफ्ते से बाजार में उपलब्ध होगी। 40 से 55 साल की उम्र के लोग जिनको प्रेसबायोपिया की शिकायत है, वे डॉक्टर की सलाह पर इस आई ड्रॉप का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसकी कीमत 350 रुपये रखी गई है।

शनिवार, 28 मार्च 2026

क्या सचमुच 84 लाख योनियों में भटकना होता है ?

 क्या सचमुच 84 लाख योनियों में भटकना होता है ?


हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार जीवात्मा 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मनुष्य जन्म पाता है। अब सवाल कई उठते हैं। पहला यह कि ये योनियां क्या होती हैं? दूसरा यह कि जैसे कोई बीज आम का है तो वह मरने के बाद भी तो आम का ही बीज बनता है तो फिर मनुष्य को भी मरने के बाद मनुष्य ही बनना चाहिए। पशु को मरने के बाद पशु ही बनना चाहिए। क्या मनुष्यात्माएं पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेतीं? या कहीं ऐसा तो नहीं कि 84 लाख की धारणा महज एक मिथक-भर है? तीसरा सवाल यह कि क्या सचमुच ही एक आत्मा या जीवात्मा को 84 लाख योनियों में भटकने के बाद ही मनुष्य जन्म मिलता है? आओ इनके उत्तर जानें...

क्या हैं योनियां

जैसा कि सभी को पता है कि मादा के जिस अंग से जीवात्मा का जन्म होता है, उसे हम योनि कहते हैं। इस तरह पशु योनि, पक्षी योनि, कीट योनि, सर्प योनि, मनुष्य योनि आदि। उक्त योनियों में कई प्रकार के उप-प्रकार भी होते हैं। योनियां जरूरी नहीं कि 84 लाख ही हों। वक्त से साथ अन्य तरह के जीव-जंतु भी उत्पन्न हुए हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार अमीबा से लेकर मानव तक की यात्रा में लगभग 1 करोड़ 04 लाख योनियां मानी गई हैं। ब्रिटिश वैज्ञानिक राबर्ट एम मे के अनुसार दुनिया में 87 लाख प्रजातियां हैं। उनका अनुमान है कि कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, पौधा-पादप, जलचर-थलचर सब मिलाकर जीव की 87 लाख प्रजातियां हैं। गिनती का थोड़ा-बहुत अंतर है। लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि आज से हजारों वर्ष पूर्व ऋषि-मुनियों ने बगैर किसी साधन और आधुनिक तकनीक के यह जान लिया था कि योनियां 84 लाख के लगभग हैं।

क्रम विकास का सिद्धांत :

गर्भविज्ञान के अनुसार क्रम विकास को देखने पर मनुष्य जीव सबसे पहले एक बिंदु रूप होता है, जैसे कि समुद्र के एककोशीय जीव। वही एकको‍शीय जीव बाद में बहुकोशीय जीवों में परिवर्तित होकर क्रम विकास के तहत मनुष्य शरीर धारण करते हैं। स्त्री के गर्भावस्था का अध्ययन करने वालों के अनुसार जंतुरूप जीव ही स्वेदज, जरायुज, अंडज और उद्भीज जीवों में परिवर्तित होकर मनुष्य रूप धारण करते हैं। मनुष्य योनि में सामान्यत: जीव 9 माह और 9 दिनों के विकास के बाद जन्म लेने वाला बालक गर्भावस्था में उन सभी शरीर के आकार को धारण करता है, जो इस सृष्टि में पाए जाते हैं।

गर्भ में बालक बिंदु रूप से शुरू होकर अंत में मनुष्य का बालक बन जाता है अर्थात वह 83 प्रकार से खुद को बदलता है। बच्चा जब जन्म लेता है, तो पहले वह पीठ के बल पड़ा रहता है अर्थात किसी पृष्ठवंशीय जंतु की तरह। बाद में वह छाती के बल सोता है, फिर वह अपनी गर्दन वैसे ही ऊपर उठाता है, जैसे कोई सर्प या सरीसृप जीव उठाता है। तब वह धीरे-धीरे रेंगना शुरू करता है, फिर चौपायों की तरह घुटने के बल चलने लगता है। अंत में वह संतुलन बनाते हुए मनुष्य की तरह चलता है। भय, आक्रामकता, चिल्लाना, अपने नाखूनों से खरोंचना, ईर्ष्या, क्रोध, रोना, चीखना आदि क्रियाएं सभी पशुओं की हैं, जो मनुष्य में स्वत: ही विद्यमान रहती हैं। यह सब उसे क्रम विकास में प्राप्त होता है।
 
हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि में जीवन का विकास क्रमिक रूप से हुआ है।
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार..
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्तया वृक्षान्‌ सरीसृपपशून्‌ खगदंशमत्स्यान्‌।
तैस्तैर अतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव:॥ (11 -9 -28 श्रीमद्भागवतपुराण)
 
अर्थात विश्व की मूलभूत शक्ति सृष्टि के रूप में अभिव्यक्त हुई और इस क्रम में वृक्ष, सरीसृप, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, मत्स्य आदि अनेक रूपों में सृजन हुआ, परंतु उससे उस चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हुई अत: मनुष्य का निर्माण हुआ, जो उस मूल तत्व ब्रह्म का साक्षात्कार कर सकता था।
 
योग के 84 आसन : योग के 84 आसन भी इसी क्रम विकास से ही प्रेरित हैं। एक बच्चा वह सभी आसन करता रहता है, जो कि योग में बताए जाते हैं। उक्त आसन करने रहने से किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता। वृक्षासन से लेकर वृश्चिक आसन तक कई पशुवत आसन हैं। मत्स्यासन, सर्पासन, बकासन, कुर्मासन, वृश्चिक, वृक्षासन, ताड़ासन आदि अधिकतर पशुवत आसन ही है।
 
जैसे कोई बीज आम का है तो वह मरने के बाद भी तो आम का ही बीज बनता है तो फिर मनुष्य को भी मरने के बाद मनुष्य ही बनना चाहिए। पशु को मरने के बाद पशु ही बनना चाहिए। क्या मनुष्यात्माएं पाशविक योनियों में जन्म नहीं लेतीं?

प्रश्न : मनुष्य मरने के बाद मनुष्य और पशु मरने के बाद पशु ही बनता है?
उत्तर : क्रम विकास के हिन्दू और वैज्ञानिक सिद्धांत से हमें बहुत-कुछ सीखने को मिलता है, लेकिन हिन्दू धर्मानुसार जीवन एक चक्र है। इस चक्र से निकलने को ही 'मोक्ष' कहते हैं। माना जाता है कि जो ऊपर उठता है, एक दिन उसे नीचे भी गिरना है, लेकिन यह तय करना है उक्त आत्मा की योग्यता और उसके जीवट संघर्ष पर।

यदि यह मान लिया जाए कि कोई पशु आत्मा पशु ही बनती है और मनुष्य आत्मा मनुष्य तो फिर तो कोई पशु आत्मा कभी मनुष्य बन ही नहीं सकती। किसी कीड़े की आत्मा कभी पशु बन ही नहीं सकती। ऐसा मानने से बुद्ध की जातक कथाएं अर्थात उनके पिछले जन्म की कहानियों को फिर झूठ मान लिया जाएगा। इसी तरह ऐसे कई ऋषि-मुनि हुए हैं जिन्होंने अपने कई जन्मों पूर्व हाथी-घोड़े या हंस के होने का वृत्तांत सुनाया। ...तो यदि यह कोई कहता है कि मनुष्यात्माएं मनुष्य और पशु-पक्षी की आत्माएं पशु या पक्षी ही बनती हैं, वे सैद्धांतिक रूप से गलत हैं। हो सकता है कि उन्हें धर्म की ज्यादा जानकारी न हो।
 
दरअसल, उक्त प्रश्न के उत्तर को समझने के लिए हमें कर्म-भाव, सुख-दुख और विचारों पर आधारित गतियों को समझना होगा। सामान्य तौर पर 3 तरह की गतियां होती हैं- 1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3. अधो गति। प्रत्येक जीव की ये 3 तरह की गतियां होती हैं। यदि कोई मनुष्यात्मा मरकर उर्ध्व गति को प्राप्त होती है तो वह देवलोक को गमन करती है। स्थिर गति का अर्थ है कि वह फिर से मनुष्य बनकर वह सब कार्य फिर से करेगा, जो कि वह कर चुका है। अधोगति का अर्थ है कि अब वह संभवत: मनुष्य योनि से नीचे गिरकर किसी पशु योनि में जाएगा या यदि उसकी गिरावट और भी अधिक है तो वह उससे भी नीचे की योनि में जा सकता है अर्थात नीचे गिरने के बाद कहां जाकर वह अटकेगा, कुछ कह नहीं सकते। 'आसमान से गिरे और लटके खजूर पर आकर' ऐसा भी उसके साथ हो सकता है। ...इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य योनि बड़ी दुर्लभ है और इसे जरा संभालकर ही रखें। कम से कम स्थिर गति में रहें।

84 लाख योनियों के प्रकार जानिए...
 
84 लाख योनियां अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग बताई गई हैं, लेकिन हैं सभी एक ही। अनेक आचार्यों ने इन 84 लाख योनियों को 2 भागों में बांटा है। पहला योनिज तथा दूसरा आयोनिज अर्थात 2 जीवों के संयोग से उत्पन्न प्राणी योनिज कहे गए और जो अपने आप ही अमीबा की तरह विकसित होते हैं उन्हें आयोनिज कहा गया। इसके अतिरिक्त स्थूल रूप से प्राणियों को 3 भागों में बांटा गया है-
 
1. जलचर : जल में रहने वाले सभी प्राणी।
2. थलचर : पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी प्राणी।
3. नभचर : आकाश में विहार करने वाले सभी प्राणी।
 
उक्त 3 प्रमुख प्रकारों के अंतर्गत मुख्य प्रकार होते हैं अर्थात 84 लाख योनियों में प्रारंभ में निम्न 4 वर्गों में बांटा जा सकता है।

1. जरायुज : माता के गर्भ से जन्म लेने वाले मनुष्य, पशु जरायुज कहलाते हैं।
2. अंडज : अंडों से उत्पन्न होने वाले प्राणी अंडज कहलाते हैं।
3. स्वदेज : मल-मूत्र, पसीने आदि से उत्पन्न क्षुद्र जंतु स्वेदज कहलाते हैं।
4. उदि्भज : पृथ्वी से उत्पन्न प्राणी उदि्भज कहलाते हैं।
पदम् पुराण के एक श्लोकानुसार...
जलज नव लक्षाणी, स्थावर लक्ष विम्शति, कृमयो रूद्र संख्यक:।
पक्षिणाम दश लक्षणं, त्रिन्शल लक्षानी पशव:, चतुर लक्षाणी मानव:।। -(78:5 पद्मपुराण)
अर्थात जलचर 9 लाख, स्थावर अर्थात पेड़-पौधे 20 लाख, सरीसृप, कृमि अर्थात कीड़े-मकौड़े 11 लाख, पक्षी/नभचर 10 लाख, स्थलीय/थलचर 30 लाख और शेष 4 लाख मानवीय नस्ल के। कुल 84 लाख।
 
आप इसे इस तरह समझें
* पानी के जीव-जंतु- 9 लाख
* पेड़-पौधे- 20 लाख
* कीड़े-मकौड़े- 11 लाख
* पक्षी- 10 लाख
* पशु- 30 लाख
* देवता-मनुष्य आदि- 4 लाख
कुल योनियां- 84 लाख।
 
'प्राचीन भारत में विज्ञान और शिल्प' ग्रंथ में शरीर रचना के आधार पर प्राणियों का वर्गीकरण किया गया है जिसके अनुसार 1. एक शफ (एक खुर वाले पशु)- खर (गधा), अश्व (घोड़ा), अश्वतर (खच्चर), गौर (एक प्रकार की भैंस), हिरण इत्यादि। 2. द्विशफ (दो खुर वाले पशु)- गाय, बकरी, भैंस, कृष्ण मृग आदि। 3. पंच अंगुल (पांच अंगुली) नखों (पंजों) वाले पशु- सिंह, व्याघ्र, गज, भालू, श्वान (कुत्ता), श्रृंगाल आदि। 

प्रश्न : क्या सचमुच 84 लाख योनियों में भटकना होता है?
उत्तर : ऊपर हमने एक प्रश्न कि मनुष्य मरने के बाद मनुष्य और पशु मरने के बाद पशु ही बनता है? का उत्तर दिया था। उसके उत्तर में ही उपरोक्त प्रश्न का आधा जवाब मिल ही गया होगा। इससे पूर्व क्रम विकास में भी इसका जवाब छिपा है। दरअसल, पहले गतियों को अच्छे से समझें फिर समझ में आएगा कि हमारे कर्म, भाव और विचार को क्यों उत्तम और सकारात्मक रखना चाहिए।

क्रम विकास 2 तरह का होता है- एक चेतना (आत्मा) का विकास, दूसरा भौतिक जीव का विकास। दूसरे को पहले समझें। यह जगत आकार-प्रकार का है। अमीबा से विकसित होकर मनुष्य तक का सफर ही भौतिक जीव विकास है। इस भौतिक शरीर में जो आत्मा निवास करती है।
 
प्रत्येक जीव की मरने के बाद कुछ गतियां होती हैं, जो कि उसके घटना, कर्म, भाव और विचार पर आधारित होती हैं। मरने के बाद आत्मा की 3 तरह की गतियां होती हैं- 1. उर्ध्व गति, 2. स्थिर गति और 3. अधो गति। इसे ही अगति और गति में विभाजित किया गया है। वेदों, उपनिषदों और गीता के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा की 8 तरह की गतियां मानी गई हैं। ये गतियां ही आत्मा की दशा या दिशा तय करती हैं। इन 8 तरह की गतियों को मूलत: 2 भागों में बांटा गया है- 1. अगति, 2. गति। अधो गति में गिरना अर्थात फिर से कोई पशु या पक्षी की योनि में चला जाना, जो कि एक चक्र में फंसने जैसा है।
 
1. अधोगति : अगति में व्यक्ति को मोक्ष नहीं मिलता है और उसे फिर से जन्म लेना पड़ता है।
2. गति : गति में जीव को किसी लोक में जाना पड़ता है।
3.अधोगति के प्रकार : अगति के 4 प्रकार हैं- 1. क्षिणोदर्क, 2. भूमोदर्क, 3. अगति और 4. दुर्गति।
 
1. क्षिणोदर्क : क्षिणोदर्क अगति में जीव पुन: पुण्यात्मा के रूप में मृत्युलोक में आता है और संतों-सा जीवन जीता है।
2. भूमोदर्क : भूमोदर्क में वह सुखी और ऐश्वर्यशाली जीवन पाता है।
3. अगति : अगति में नीच या पशु जीवन में चला जाता है।
4. दुर्गति : गति में वह कीट-कीड़ों जैसा जीवन पाता है।
 
गति के प्रकार : गति के अंतर्गत 4 लोक दिए गए हैं: 1. ब्रह्मलोक, 2. देवलोक, 3. पितृलोक और 4. नर्कलोक। जीव अपने कर्मों के अनुसार उक्त लोकों में जाता है।
 
पुराणों के अनुसार आत्मा 3 मार्गों के द्वारा उर्ध्व या अधोलोक की यात्रा करती है। ये 3 मार्ग हैं- 1. अर्चि मार्ग, 2. धूम मार्ग और 3. उत्पत्ति-विनाश मार्ग।
 
1. अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक : अर्चि मार्ग ब्रह्मलोक और देवलोक की यात्रा के लिए है।

2. धूममार्ग पितृलोक : धूममार्ग पितृलोक की यात्रा के लिए है। सूर्य की किरणों में एक 'अमा' नाम की किरण होती है जिसके माध्यम से पितृगण पितृ पक्ष में आते-जाते हैं।

3. उत्पत्ति-विनाश मार्ग : उत्पत्ति-विनाश मार्ग नर्क की यात्रा के लिए है। यह यात्रा बुरे सपनों की तरह होती है।
 
जब भी कोई मनुष्य मरता है और आत्मा शरीर को त्यागकर उत्तर कार्यों के बाद यात्रा प्रारंभ करती है तो उसे उपरोक्त 3 मार्ग मिलते हैं। उसके कर्मों के अनुसार उसे कोई एक मार्ग यात्रा के लिए प्राप्त हो जाता है।
 
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगत: शाश्वते मते।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुन:।। -गीता
 
भावार्थ : क्योंकि जगत के ये 2 प्रकार के शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए हैं। इनमें एक द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 24 के अनुसार अर्चिमार्ग से गया हुआ योगी।) जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परम गति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ (अर्थात इसी अध्याय के श्लोक 25 के अनुसार धूममार्ग से गया हुआ सकाम कर्मयोगी) फिर वापस आता है अर्थात‌ जन्म-मृत्यु को प्राप्त होता है।।26।।
 
कठोपनिषद अध्याय 2 वल्ली 2 के 7वें मंत्र में यमराजजी कहते हैं कि अपने-अपने शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार शास्त्र, गुरु, संग, शिक्षा, व्यवसाय आदि के द्वारा सुने हुए भावों के अनुसार मरने के पश्चात कितने ही जीवात्मा दूसरा शरीर धारण करने के लिए वीर्य के साथ माता की योनि में प्रवेश कर जाते हैं। जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्य का और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु-पक्षी का शरीर धारण कर उत्पन्न होते हैं और कितने ही जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, स्थावर भाव को प्राप्त होते हैं अर्थात वृक्ष, लता, तृण आदि जड़ शरीर में उत्पन्न होते हैं। 
 
अंतिम इच्छाओं के अनुसार परिवर्तित जीन्स जिस जीव के जीन्स से मिल जाते हैं, उसी ओर ये आकर्षित होकर वही योनि धारण कर लेते हैं। 84 लाख योनियों में भटकने के बाद वह फिर मनुष्य शरीर में आता है।
 
'पूर्व योनि तहस्त्राणि दृष्ट्वा चैव ततो मया।
आहारा विविधा मुक्ता: पीता नानाविधा:। स्तना...।
स्मरति जन्म मरणानि न च कर्म शुभाशुभं विन्दति।।' गर्भोपनिषद्
 अर्थात उस समय गर्भस्थ प्राणी सोचता है कि अपने हजारों पहले जन्मों को देखा और उनमें विभिन्न प्रकार के भोजन किए, विभिन्न योनियों के स्तनपान किए तथा अब जब गर्भ से बाहर निकलूंगा, तब ईश्वर का आश्रय लूंगा। इस प्रकार विचार करता हुआ प्राणी बड़े कष्ट से जन्म लेता है, पर माया का स्पर्श होते ही वह गर्भज्ञान भूल जाता है। शुभ-अशुभ कर्म लोप हो जाते हैं। मनुष्य फिर मनमानी करने लगता है और इस सुरदुर्लभ शरीर के सौभाग्य को गंवा देता है।
 विकासवाद के सिद्धांत के समर्थकों में प्रसिद्ध वैज्ञानिक हीकल्स के सिद्धांत 'आंटोजेनी रिपीट्स फायलोजेनी' के अनुसार चेतना गर्भ में एक बीज कोष में आने से लेकर पूरा बालक बनने तक सृष्टि में या विकासवाद के अंतर्गत जितनी योनियां आती हैं, उन सबकी पुनरावृत्ति होती है। प्रति 3 सेकंड से कुछ कम के बाद भ्रूण की आकृति बदल जाती है। स्त्री के प्रजनन कोष में प्रविष्ट होने के बाद पुरुष का बीज कोष 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8, 8 से 16, 16 से 32, 32 से 34 कोषों में विभाजित होकर शरीर बनता है।



क्या आपको पता है कि हम भारतीय एक खतरनाक साजिश का शिकार हो चुके हैं और वह साजिश है हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर उन्हें उपभोक्ता बनाने की..???

 क्या आपको पता है कि हम भारतीय एक खतरनाक साजिश का शिकार हो चुके हैं और वह साजिश है हमारे संयुक्त परिवारों को तोड़कर उन्हें उपभोक्ता बनाने की..???

 जब परिवार टूटते हैं, तभी बाजार फलते फूलते हैं— ये सिर्फ विचार नहीं, पूरी रणनीति है ....

भारत की सबसे मजबूत चीज क्या थी..???
भारत पर मुगल आए, अंग्रेज़ आए, और कई हमलावर आए लेकिन एक चीज कभी नहीं टूटी, वो थी एकता....??

  3 पीढ़ियाँ एक छत के नीचे रहती थी बुज़ुर्गों का अनुभव बच्चों में संस्कार खर्च में सामूहिकता और त्यौहारों में गर्माहट हुआ करती थी...

यह हमारी असली “Social Security” थी। कोई पेंशन की ज़रूरत नहीं थी, कोई अकेलापन नहीं, कोई Mental Health Crisis नहीं।

पश्चिमी देशों को यह चीज खटकने लगी और उन्होंने परिवारों को तोड़ने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया..???

क्योंकि पश्चिमी देश हमेशा से ही उपनिवेशवादी रहे हैं — उनके लिए बाज़ार सबसे बड़ा धर्म है??

लेकिन भारत जैसा देश, जहाँ लोग साझा करते हैं, कम खर्च करते हैं, और सामूहिक सोच रखते हैं — वहां वे अपने उत्पाद बेच ही नहीं पा रहे थे।

इसलिए एक शातिर रणनीति बनाई गई...???

इनके परिवार ही तोड़ दो, हर कोई अकेला हो जाएगा,और हर कोई ग्राहक बन जाएगा।

कैसे हुआ ये हमला..???

1.मीडिया का सहारा लेकर संयुक्त परिवारों को तोड़ने की शुरुआत...
संयुक्त परिवार को “झगड़ों का अड्डा”, “बोझ” और “रुकावट” के रूप में दिखाया गया।
न्यूक्लियर परिवार को “फ्रीडम”, “मॉर्डन”, “Self-made” बताकर  ग्लैमराइज किया गया।
याद कीजिए: टीवी पर आज भी कितने ही शो हैं जहां पूरे दिन बहू-सास की लड़ाई, नन्द भाभी की लड़ाई, देवरानी जिठानी की लड़ाई पूरे दिन दिखाई जाती है, और हमारे/आपके परिवार की घरेलू औरतें पूरे दिन यही धारावाहिकों को देखती है और इनका निष्कर्ष/सॉल्यूशन निकलता है – “अलग हो जाओ!”
 2. उपभोक्तावाद के ज़रिए...
जब हर जोड़ा अलग रहने लगा...
पश्चिमी देशों अपनी चाल में कामयाब हुए और हमारे परिवार विखर का उनका बाजार बन गए 
पहले 1 परिवार में चार भाई रहते थे, अब एक परिवार सिर्फ चार लोग (पति-पत्नी, और 2 बच्चे)
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 टीवी, अब 4 भाईयों के बीच 4 टीवी
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 रसोई, अब 4 भाईयों के बीच 4 किचन सेट
 पहले 4 भाईयों के बीच 1 कार और 1 मोटरसाइकिल, अब 4 भाईयों के बीच 4 कार, 4स्कूटी और 4 मोटरसाइकिल।
बाजार में बूम आ गया – और समाज में टूटन।
भारत में क्या हुआ इस “सोचलेवा हमले” के बाद?

 सामाजिक पतन...???
 बुज़ुर्ग अब बोझ हैं
 बच्चे अकेले हैं (और स्क्रीन में गुम)
 रिश्तेदार “उपलब्ध नहीं” हैं
 संस्कारों की जगह “Influencers” ने ले ली
मानसिक स्वास्थ्य संकट...???
 पहले जो बात नानी-दादी से होती थी, अब काउंसलर से होती है...
 अकेलापन अब इलाज़ मांगता है, पहले प्यार से दूर होता था
 बाजार का फायदे...????
 हर समस्या का एक उत्पाद
 हर भावना का एक ऐप
 हर उत्सव का एक“ *ऑनलाइन ऑर्डर”
“संस्कार की जगह सब्सक्रिप्शन ने ले ली है”
आज का सवाल — हम क्या बनते जा रहे हैं?
हमने “आधुनिकता” की दौड़ में...???
 संयुक्तता को “Old culture” कहा...
 माता-पिता को “Obstacles” कहा...
 परिवार को “फालतू भावना” कहा...
 रिश्तों को “Unfollow” कर दिया...
लेकिन क्या आपने सोचा..???
Amazon का फायदा तभी है जब आप Diwali पर अकेले हों — और Shopping करें, परिवार के साथ न बैठें।
Zomato तभी कमाता है जब कोई माँ का खाना नहीं खा रहा।
Netflix तभी देखेगा जब कोई दादी की कहानी नहीं सुन रहा।
समाधान: हम अभी भी वापसी कर सकते हैं???
 संयुक्त परिवार को पुनः “संपत्ति” मानें, बोझ नहीं।
 बच्चों को उपभोक्ता नहीं, संस्कारी इंसान बनाएं।
 बुज़ुर्गों को घर से बाहर न करें — उनके अनुभव हर Google Search से ऊपर हैं।
त्यौहार मनाएं, सामान नहीं।
अकेलापन कम करने के लिए App नहीं, अपनापन बढ़ाइए।
निष्कर्ष :--
“पश्चिम ने व्यापार के लिए परिवार तोड़े,और हम ‘आधुनिक’ बनने के लिए अपना वजूद बेच आए।”
अब समय है रुकने का, सोचने का, और अपने संस्कारों को फिर से अपनाने का — नहीं तो अगली पीढ़ी को ‘संयुक्त परिवार’ शब्द का अर्थ बताने के लिए भी शायद Google की जरूरत पड़ेगी l

क्या आपको नहीं लगता कि हम  ज़िन्दगी की सुख सुविधाओं के लिए अपने परिवारिक माहौल के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं हम अपनी असल जिंदगी खोते जा रहे हैं,हम स्वार्थी हो रहे हैं एक बार अपना 30 बर्ष पुराना जीवन याद करके देख लो, जहां सिर्फ भाईचारा था इमोशन था कोई सोसाइड नहीं करता था, सहयोग की भावना थी, संस्कार ऐसे कि गांव के हर आदमी को पिता जितना सम्मान दिया जाता था किन्तु आज तो पिता ही "यार पापा" हो गए , और आज यही संस्कार हमारी आधुनिकता को दर्शाती है और हमें घिन आती है ऐसी आधुनिकता पर, कृपया एक बार विचार अवश्य करें।
जय श्री कृष्णा 🙏 

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