मंगलवार, 23 जुलाई 2013

केन्या में सोने के भाव बिकती हैं ये पत्तियां, हमें मिल जाती है फ्री में...

केन्या में सोने के भाव बिकती हैं ये पत्तियां, हमें मिल जाती है फ्री में...
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हमारे देश में एक कहावत है कि एक नीम सौ हकीम के बराबर है। यह कहावत सही भी है, क्योंकि स्वाद में इसकी हरेक चीज जितनी कड़वी है, उसके शारीरिक फायदे उतने ही मीठे हैं। मूलत: यह वृक्ष भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे देशों में ही पाया जाता था, लेकिन जब दुनिया ने इसकी शक्ति पहचानी तो अब यह दुनिया भर में पहुंच चुका है।

भले ही हमारे देश में लोग नीम के पेड़ को उतनी अहमियत नहीं देते, लेकिन विदेशों में इसकी कीमत सोने-चांदी खरीदने सरीखी ही है।

पेरिन हीटर सोमवार को बारडोली शहर में थीं। उन्होंने यहां के एक स्कूल में विद्यार्थियों को नीम के बारे में अनेकों रोचक जानकारियां दीं। पेरिन हीटर मूल सूरत की हैं। वे पिछले कई वर्षों से केन्या में ही परिवार के साथ रह रही हैं। हालांक पेरिन पेशे से शिक्षिका हैं, लेकिन इसके साथ ही साथ वे नीम पर अनेकों रिसर्च भी कर चुकी हैं। नीम वृक्ष कितना महत्वूपर्ण होता है, इस पर अपने सफल रिसर्चो के कारण अब वे केन्या में एक पहचाना हुआ नाम हैं।

पेरिन कहती हैं कि यह भारत के लोगों की खुशकिस्मती ही है कि उनके लिए नीम के पेड़ हरेक जगह उपलब्ध हैं। लेकिन जिन देशों में ये वृक्ष नहीं हैं, वहां के लोग इसकी कीमत अच्छी तरह से जानते हैं। केन्या की बात करते हुए पेरिन बताती हैं कि यहां नीम की एक बहुत छोटी सी डाली की कीमत ही 10 रुपए होती है, जबकि उसके एक बीज की कीमत 2 रुपए है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कितना कीमती वृक्ष है।

पेरिन पिछले काफी समय से गुजरात के विविध शहरों में सामाजिक वन्यीकरण के साथ काम कर रही हैं। वे अब स्कूल-कॉलेजों और सेमिनार में जा-जाकर नीम की उपयोगिता से लोगों को अवगत करा रही हैं।

नीम के पेटेंट की लंबी लड़ाई
यूरोपीय पेटेंट ऑफिस ने 1995 में कृषि की बहुराष्ट्रीय कंपनी डब्ल्यु आर ग्रेस को नीम का फफूंदनाशक के रूप में पेटेंट दे दिया था। भारत की अपील पर इसे सन 2000 में वापस कर दिया। पर बहुराष्ट्रीय कंपनी ने इसके खिलाफ अपील कर दी और इस बार भी उनकी अपील ठुकरा दी गई।

भारत की ओर से पेटेंट ऑफिस के सामने तथ्य रखे गए थे कि 1995 से पहले भी भारत में नीम का फफूंदनाशक और दवा के रूप में इस्तेमाल होता था।

यह मामला 10 सालों तक चला, लेकिन निर्णय भारत के पक्ष में हुआ। यह फैसला बहुत महत्वपूर्ण इसलिए भी था, क्योंकि अमरीकी कंपनी नीम से जुड़े सभी उत्पादों को इसमें शामिल करना चाहती थी।

भारत में जिन परंपरागत पद्धतियों का सदियों से इस्तेमाल किया जाता रहा है उन पर विदेशों में पेटेंट लेना अब एक आम बात हो गई है।
सन 1996 में एक अमरीकी कंपनी ने हल्दी को घाव भरने की एक अचूक दवा कह कर पेटेंट कराने की कोशिश की थी। एक अन्य अमरीकी कंपनी ने ऐसी ही कोशिश बासमती चावल की खूबियों को लेकर की थी। प्रेक्षकों का कहना है कि भारत की ओर से सदियों पुरानी जानकारी को बचाने की कोई ठोस कोशिश नहीं की जा रही है।

दांतों को चमकाने के लिए आज हम जिस ब्रश का प्रयोग करते हैं उसका इतिहास दरअसल सैकड़ों साल पुराना है। पहले इंसान नीम या बबूल की टहनी को ही दांतों की सफाई के लिए इस्तेमाल किया करता था, लेकिन आज से 512 साल पहले 26 जून 1498 को चीन में एक व्यक्ति ने एक ऐसा ब्रश तैयार किया जिससे दांतों की सफाई दातुन के मुकाबले ज्यादा अच्छी तरह की जा सकती थी।

छब्बीस जून को अविष्कार होने के कारण ही दुनियाभर में 26 जून को टूथब्रश डे मनाया जाता है।

कैंसर का इलाज भी संभव
औषधीय गुणों के कारण गुणकारी नीम सदियों से भारत में कीट-कृमिनाशी और जीवाणु-विषाणुनाशी के रूप में प्रयोग में लाया जाता रहा है। अब कोलकाता के वैज्ञानिक इसके प्रोटीन का इस्तेमाल करते हुए कैंसर के खिलाफ जंग छेड़ने की तैयारी में जुट गए हैं। चित्तरंजन नेशनल कैंसर इंस्टीच्यूट (सीएनसीआई) के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम ने अपने दो लगातार पचरे में बताया है कि किस तरह नीम की पत्तियों से संशोधित प्रोटीन चूहों में ट्यूमर के विकास को रोकने में सहायक हुआ है।

कुष्ठरोग में नीम

7.1 दुनियाँ में 25 करोड़ से भी अधिक और भारत में पचासों लाख लोग कुष्ट रोग के शिकार हैं। सैकड़ों कोढ़ नियंत्रण चिकित्सा केन्द्रों के बावजूद इस रोग से पीड़ितों की संख्या में मामूली कमी आयी है। यह रोग एक छड़नुमा %माइRोबैक्टेरिया लेबी% से होता है। चमड़ी एवं तंत्रिकाओं में इसका असर होता है। यह दो तरह का होता है-पेप्सी बेसीलरी, जो चमड़ी पर धब्बे के रूप में होता है, स्थान सुन्न हो जाता है। दूसरा मल्टीबेसीलरी, इसमें मुँह लाल, उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी तथा नाक चिपटी हो जाती है। नाक से खून आता है। दूसरा संRामक किस्म का रोग है। इसमें डैपसोन रिफैमिसीन और क्लोरोफाजीमिन नामक एलोपैथी दवा दी जाती है। लेकिन इसे नीम से भी ठीक किया जा सकता है।

7.2 प्राचीन आयुर्वेद का मत है कि कुष्ठरोगी को बारहों महीने नीम वृक्ष के नीचे रहने, नीम के खाट पर सोने, नीम का दातुन करने, प्रात:काल नित्य एक छटाक नीम की पत्तियों को पीस कर पीने, पूरे शरीर में नित्य नीम तेल की मालिश करने, भोजन के वक्त नित्य पाँच तोला नीम का मद पीने, शैय्या पर नीम की ताजी पत्तियाँ बिछाने, नीम पत्तियों का रस जल में मिलाकर स्नान करने तथा नीम तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर घाव पर लगाने से पुराना से पुराना कोढ़ भी नष्ट हो जाता है।

नीम के द्वारा बनाया गया लेप वालों में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं। नीम और बेर के पत्तों को पानी में उबालें, ठंण्डा होने पर इससे बाल, धोयें स्नान करें कुछ दिनों तक प्रयोग करने से बाल झडने बन्द हो जायेगें व बाल काले व मजबूत रहेंगें।

मलेरिया
नीम मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों को दूर रखने में अत्यन्त सहायक है। जिस वातावरण में नीम के पेड़ रहते हैं, वहाँ मलेरिया नहीं फैलता है। नीम के पत्ते जलाकर रात को धुआं करने से मच्छर नष्ट हो जाते हैं और विषम ज्वर (मलेरिया) से बचाव होता है।

दाग तथा अन्य चर्म रोग
नीम की छाल को जलाकर उसकी राख में तुलसी के पत्तों का रस मिलाकर लगाने से दाग़ तथा अन्य चर्म रोग ठीक होते हैं।

नीम एक ऐसा पेड़ है जो सबसे ज्यादा कड़वा होता है, लेकिन अपने गुणों के कारण चिकित्सा जगत में इसका अपना एक अहम स्थान है। नीम रक्त साफ करता है। दाद, खाज, सफेद दाग और ब्लडप्रेशर में नीम की पत्ती का रस लेना लाभदायक है। नीम कीडों को मारता है, इसलिये इसकी पत्ती कपडों और अनाजों में रखे जाते हैं। नीम की दस पत्तियां रोजाना खायें रक्तदोष नहीं होगा। नीम के पंचांग जड, छाल, टहनियां, फूल पत्ते और निंबोरी उपयोगी हैं। इन्ही कारणों से हमारे पुराणों में नीम को अमृत के समान माना गया है।

ऐसी दैवीय शक्तियां जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझ पाया!!

ऐसी दैवीय शक्तियां जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझ पाया!!
ऐसी दैवीय शक्तियां जिन्हें विज्ञान भी नहीं समझ पाया!!
विज्ञान और चमत्कारों के बीच कोई ना कोई बहस आए दिन चलती रहती है. जिन चीजों को विज्ञान स्वीकारता है उसे चमत्कार का सिद्धांत नकार देता है और जिन्हें चमात्कार के सिद्धांत सिद्ध करते हैं विज्ञान उन्हें फिजूल करार दे देता है. लेकिन आज हम जिन स्थानों का जिक्रयहां करने जा रहे हैं उसे अगर चमत्कार नहीं कहा जा सकता तो विज्ञान के पास भी इसका कोई जवाब नहीं है. यहां ऐसा क्यों होता है, आखिर क्या कारण है इन गतिविधियों का, अभी तक वैज्ञानिक भी इसका जवाब नहीं ढूंढ़ पाए हैं.
1. काला डुंगर: गुजरात की यह जगह बेहद रहस्यमयी है. इस सड़क पर जो ढलान है वहां गाड़ी नीचे उतरते हुए तो रफ्तार पकड़ती ही हैलेकिन अजीब बात यह है कि ऊपर चढ़ते हुए भी गाड़ी तेज गति से भागने लगती है. विशेषज्ञों ने यह जानने की कोशिश तो की कि ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन कोई भी इसके पीछे का रहस्य नहीं समझ पाया.
2. तुलसीश्याम: गुजरात के गिर जंगल की तरफ जाने वाले मार्ग तुलसीश्याम की भी अजीब कहानी है. गुरुत्वाकर्षण के नियम को नकारती इस सड़क को गुजरात की एंटी ग्रैविटेशनल सड़क भी कहा जाता है. यहां कोई भी गाड़ी या वस्तु नीचे की तरफ नहीं बल्कि ऊपर की ओर चढ़ती है.
3. पहाड़ी का रहस्य: अमरेली स्थित बाबरा शहर से लगभग 7 किलोमीटर दूर करियाणा गांव में एक रहस्यमयी पहाड़ी है. इस पहाड़ी की खासियत यह है कि इस पहाड़ी के प्रत्येक पत्थर में से झालर के बजने जैसी आवाज आती है. इस पहाड़ी पर ग्रेनाइट के महंगे पत्थर काफी मात्रा में मिलते हैं. लेकिन अभी तक कोई भी यह पता नहीं लगा पाया कि इन पत्थरों से आवाज क्यों आती है.पत्थरों में से आने वाली आवाज के पीछे एक धार्मिक मान्यता भी विद्यमान है जिसके अनुसार प्राचीन समय में एक बार यहां स्वामीनारायण भगवान आए थे और पूजा अर्चना के समय इन पत्थरों को घंटी के रूप में प्रयोग किया गया.
4. ठोकर मारते ही नगाड़े बजने लगते हैं: जूनागढ़ (गुजरात) स्थित पवित्र गिरनार के समीप दातार पर्वत के नगरिया पत्थर यहां आने वाले श्रद्धालुओं का केन्द्र है. यहां के पत्थरों की खासियत यह है कि इन पत्थरों को ठोकर मारते ही इसमें से नगाड़े बजने की आवाज आने लगती है. दातार पर्वत गिरनार के दक्षिण में जूनागढ़ से मात्र 2 किमी की दूरी पर स्थित है.
5. टुवा टिंबा: यह स्थान भी गुजरात के गोधरा से लगभग 15 किलोमीटर दूर है. यहां गर्म पानी का एक कुंड है जिसका पानी कभी खत्म नहीं होता.इतना ही नहीं यह पानी सालभर एकदम गर्म रहता है. अब इसके गर्म रहने के पीछे क्या कारण है यह भी अभी तक कोई जान नहीं पाया. इस पानी से स्नान करने के बाद श्रद्धालुओं की यात्रा सफल होती है. पौराणिक कथा के अनुसार पांडव और भगवान राम ने भी इस स्थल की यात्रा की थी. ऐसा भी माना जाता है कि संत सूरदास के उपचार हेतु गर्म पानी के लिए यह जमीन भगवान राम ने खुद भेदी थी जहां से गर्म पानी का प्रवाह शुरू हुआ.
विज्ञान और चमत्कारों के बीच कोई ना कोई बहस आए दिन चलती रहती है. जिन चीजों को विज्ञान स्वीकारता है उसे चमत्कार का सिद्धांत नकार देता है और जिन्हें चमात्कार के सिद्धांत सिद्ध करते हैं विज्ञान उन्हें फिजूल करार दे देता है. लेकिन आज हम जिन स्थानों का जिक्रयहां करने जा रहे हैं उसे अगर चमत्कार नहीं कहा जा सकता तो विज्ञान के पास भी इसका कोई जवाब नहीं है. यहां ऐसा क्यों होता है, आखिर क्या कारण है इन गतिविधियों का, अभी तक वैज्ञानिक भी इसका जवाब नहीं ढूंढ़ पाए हैं.
1. काला डुंगर: गुजरात की यह जगह बेहद रहस्यमयी है. इस सड़क पर जो ढलान है वहां गाड़ी नीचे उतरते हुए तो रफ्तार पकड़ती ही हैलेकिन अजीब बात यह है कि ऊपर चढ़ते हुए भी गाड़ी तेज गति से भागने लगती है. विशेषज्ञों ने यह जानने की कोशिश तो की कि ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन कोई भी इसके पीछे का रहस्य नहीं समझ पाया.
2. तुलसीश्याम: गुजरात के गिर जंगल की तरफ जाने वाले मार्ग तुलसीश्याम की भी अजीब कहानी है. गुरुत्वाकर्षण के नियम को नकारती इस सड़क को गुजरात की एंटी ग्रैविटेशनल सड़क भी कहा जाता है. यहां कोई भी गाड़ी या वस्तु नीचे की तरफ नहीं बल्कि ऊपर की ओर चढ़ती है.
3. पहाड़ी का रहस्य: अमरेली स्थित बाबरा शहर से लगभग 7 किलोमीटर दूर करियाणा गांव में एक रहस्यमयी पहाड़ी है. इस पहाड़ी की खासियत यह है कि इस पहाड़ी के प्रत्येक पत्थर में से झालर के बजने जैसी आवाज आती है. इस पहाड़ी पर ग्रेनाइट के महंगे पत्थर काफी मात्रा में मिलते हैं. लेकिन अभी तक कोई भी यह पता नहीं लगा पाया कि इन पत्थरों से आवाज क्यों आती है.पत्थरों में से आने वाली आवाज के पीछे एक धार्मिक मान्यता भी विद्यमान है जिसके अनुसार प्राचीन समय में एक बार यहां स्वामीनारायण भगवान आए थे और पूजा अर्चना के समय इन पत्थरों को घंटी के रूप में प्रयोग किया गया.
4. ठोकर मारते ही नगाड़े बजने लगते हैं: जूनागढ़ (गुजरात) स्थित पवित्र गिरनार के समीप दातार पर्वत के नगरिया पत्थर यहां आने वाले श्रद्धालुओं का केन्द्र है. यहां के पत्थरों की खासियत यह है कि इन पत्थरों को ठोकर मारते ही इसमें से नगाड़े बजने की आवाज आने लगती है. दातार पर्वत गिरनार के दक्षिण में जूनागढ़ से मात्र 2 किमी की दूरी पर स्थित है.
5. टुवा टिंबा: यह स्थान भी गुजरात के गोधरा से लगभग 15 किलोमीटर दूर है. यहां गर्म पानी का एक कुंड है जिसका पानी कभी खत्म नहीं होता.इतना ही नहीं यह पानी सालभर एकदम गर्म रहता है. अब इसके गर्म रहने के पीछे क्या कारण है यह भी अभी तक कोई जान नहीं पाया. इस पानी से स्नान करने के बाद श्रद्धालुओं की यात्रा सफल होती है. पौराणिक कथा के अनुसार पांडव और भगवान राम ने भी इस स्थल की यात्रा की थी. ऐसा भी माना जाता है कि संत सूरदास के उपचार हेतु गर्म पानी के लिए यह जमीन भगवान राम ने खुद भेदी थी जहां से गर्म पानी का प्रवाह शुरू हुआ.

बुधवार, 10 जुलाई 2013

क्यों मुसलमान भक्त की मजार पर रूकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?

क्यों मुसलमान भक्त की मजार पर रूकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?

मुसलिम भक्त को मंदिर में आने नहीं दिया गया तो भगवान खुद पहुंच गये भक्त के घर।
अगर आपको हैरानी हो रही है तो आप इस घटना की सच्चाई को खुद अपनी आंखों को देख सकते हैं।

10 जुलाई को इस साल भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकलेगी।

रास्ते में जगन्नाथ जी भक्त से मिलने के लिए रूकेंगे और फिर उनका रथ आगे बढ़ेगा।

यह सिलसिला बीते कई वर्षों से चला आ रहा है।
हर साल भगवान जगन्नाथ अपने भक्त की मजार पर रूकते हैं और बताते हैं कि जो भी सच्चे मन से उनकी भक्ति करेगा वह उनका अपना होगा।

भगवान जगन्नाथ का रथ जिस मुसलमान भक्त की मजार पर रूकता है उनका नाम सालबेग था।

सालबेग के पिता हिंदू थे और माता मुसलमान।

सालबेग बड़ा होकर मुगल सेना में शामिल हो गया।
एक बार जंग में इसे माथे पर ऐसा घाव हुआ जो किसी भी वैद्य से ठीक नहीं हुआ।

सेना से भी सालबेग को निकाल दिया गया।

इसके बाद सालबेग की मां ने भगवान जगन्नाथ की भक्ति करने की सलाह दी।

मां की बात मानकर सालबेग भगवान जगन्नाथ की भक्ति में डूब गया।

कुछ दिन बाद सपने में भगवान जगन्नाथ ने सालबेग को विभूति दिया।

सालबेग ने सपने में ही उस विभूति को सिर पर लगाया और जैसे ही नींद खुली उसने देख वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुका है।
इसके बाद सालबेग भगवान जगन्नाथ का भक्त बन गया।

मगर मुसलमान होने के कारण सालबेग को मंदिर में प्रवेश नहीं मिला।

भक्त सालबेग मंदिर के बाहर बैठकर जगन्नाथ की भक्ति करते और भक्ति पूर्ण गीत लिखते।

उड़िया भाषा में लिखे इनके भक्ति गीत धीरे- धीरे लोकप्रिय होने लगे और लोगों के जुबान पर चढ़ गये।
बावजूद इसके सालबेग को जब तक जीवित रहे मंदिर में प्रवेश नहीं मिला।

मृत्यु के बाद इन्हें जगन्नाथ मंदिर और गुंडिचामंदिर के बीच में दफना दिया गया।

सालबेग ने एक बार कहा था कि अगर मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरे मरने के बाद भगवान जगन्नाथ मेरी मजार पर आकर मुझसे मिलेंगे।

सालबेग के मृत्यु के बाद जब रथ यात्रा निकली तो रथ इनके मजार के सामने आकर रूक गया।

लोगों ने लाख कोशिशें की लेकिन रथ अपने स्थान से हिला तक नहीं।

जब सभी लोग परेशान हो गये तब किसी व्यक्तिने उड़ीसा के राजा को भक्त सालबेग का जयकारा लगाने के लिए कहा।

सालबेग के नाम का जयघोष होते ही रथ अपने आप चल पड़ा।

इस घटना के बाद से ही यह परंपरा चली आ रही हैकि भक्त सालबेग की मजार पर जगन्नाथ जी का रथ कुछ समय के लिए रूकता है फिर आगे की ओर बढ़ता है।

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