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गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

22 फीट के पंचमुखी बालाजी के श्रृंगार में लगता है 1 माह, 16 किलो सिंदूर और 5 किलो तेल

मेहरानगढ़ की तलहटी में सिटी पुलिस स्थित मंदिर में विराजित है प्रतिमा, शहर की सबसे लंबी-चौड़ी 550 साल पुरानी प्रतिमा 

 
एक ऐसे हनुमान मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां माथा टेकने भर से ही सभी भक्तों को संकटों से छुटकारा मिल जाता है. साथ ही, सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. भगवान श्री हनुमान के प्रति भक्तों में विशेष आस्था देखने को मिलती है. कुछ इस तरह का नजारा जोधपुर के पंचमुखी बालाजी मंदिर में देखने को मिलता है. इस मंदिर में जोधपुर शहर के श्रद्धालु ही नहीं, दूरदराज से भी लोग हनुमान जी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं|

22 फीट के पंचमुखी बालाजी के श्रृंगार में लगता है 1 माह, 16 किलो सिंदूर और 5 किलो तेल, मेहरानगढ़ दुर्ग की तलहटी में विराजे पंचमुखा बालाजी मंदिर में 
श्री हनुमान प्राकट्योत्सव पर विशेष पूजा-अर्चना होगी। भीतरी शहर सिटी पुलिस की तंग गलियों से होकर मंदिर तक पहुंचने के लिए 101 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।
मंदिर की खासियत यह है कि यहां शहर की सबसे लंबी और चौड़ी बालाजी की मूर्ति स्थापित हैं। करीब 550 वर्ष पुराने इस मंदिर में पंचमुखा बालाजी की मूर्ति स्वयं भू प्रकट हुई थी। बालाजी के पांच मुख और 10 हाथ हैं। मूर्ति की ऊंचाई 22 फुट और चौड़ाई 12.50 फुट है।

मूर्ति के बारे में यह कहा जाता है कि जो भी यहां पर 8 फेरी देता है उसके सभी कष्ट व पीड़ा हर ली जाती है।
पंचमुखा बालाजी मूर्ति की विशालता को देखते हुए साल में केवल दो बार ही श्रृंगार होता है। एक बार के श्रृंगार में एक माह का समय लगता है, जिसमें 30 से 35 हजार रुपए का खर्च आता है। मूर्ति पर 16 किलो सिंदूर लगता है। यह सिंदूर घाणी के तेल में ही डालकर लगाया जाता है। तेल लगभग 5 किलो लगता है। एक माह तक प्रतिदिन सात-आठ पुजारी 5-6 घंटे तक श्रृंगार करने का काम करते है।
मंदिर के पुजारी रामेश्वर प्रसाद ने बताया कि प्रतिमा के पांव के नीचे पाताल की देवी की भी प्रतिमा है।
प्रति मंगलवार और शनिवार को विशेष पूजा-अर्चना होती है। बालाजी को विशेष रूप से रोट और गुड़ का भोग लगता है। साथ ही विशेष रूप से पान का बीड़ा लूंग के साथ भोग लगाया जाता है। पुजारी अनिल शर्मा, सुनील और मंगल प्रसाद बताते हैं कि हनुमान जयंती के दिन शनिवार को विशेष पूजा के साथ मंदिर परिसर में फूल मंडली और आकर्षक रोशनी की जाएगी। यह शहर की सबसे प्राचीनतम हनुमान मूर्ति में से एक है।

अहिरावण को वरदान था कि जब तक पांच दिशाओं में लगी ज्योति को एक साथ नहीं बुझाया जाएगा, तब तक उसका वध नहीं किया जा सकता. अहिरावण के वध के लिए हनुमान जी ने पंचमुखी अवतार लिया | 
पंचमुखी हनुमान मंदिर की बड़ी मान्यता है. भगवान श्रीराम और लक्ष्मण को जब अहिरावण पाताल लोक ले गए थे, तब भगवान हनुमान उनकी खोज करते हुए पताल लोक पहुंचे थे. लेकिन, अहिरावण को देवी का वरदान था कि जब तक 5 दिशाओं में जल रही अखंड ज्योति को कोई एक साथ नहीं बुझाएगा, तब तक अहिरावण का वध नहीं हो सकता था. ऐसे में हनुमान जी ने पंचमुखी रूप धारण कर पांचों दिशाओं की ज्योति एक साथ बुझाई और अहिरावण का वध किया. 
बालाजी का पहला मुख हनुमान, दूसरा नृसिंह, तीसरा वराह, चौथा हयग्रीव व पांचवां घोड़े का
मंदिर के पुजारी रामेश्वर प्रसाद ने बताया कि पंचमुखा में पहला मुख हनुमान, दूसरा नृसिंह, तीसरा वराह, चौथा हयग्रीव और पांचवां घोड़े का मुख लगा है। इनके हाथ में पहाड़, दूसरे में संजीवनी बूटी, तीसरे में त्रिशूल, चौथे में कमंडल, पांचवें में नाग देवता, छठे हाथ में तलवार, सातवें मुस्ठिका, आठवें में अंकुश, नौवें हाथ में गदा और दसवें हाथ में डमरू है। वहीं इस मंदिर पर जाने वाली रोड पर ब्ल्यू सिटी की थीम पर दिवारों पर पेंटिंग भी की गई है। इस दौरान यहां आने वाले शहरवासियों का रूझान भी बढ़ने लगा है। शहरवासी यहां सेल्फी लेकर पंचमुखा बालाजी के दर्शन करने जरूर जाते है। इस दौरान इस मंदिर में हमेशा चहल-पहल बनी रहती हैं।

मंदिर से मिले हुए फूलों का क्या करना चाहिए?

 मंदिर से मिले हुए फूलों का क्या करना चाहिए?

आइए जानते हैं कि मंदिर से मिले इन फूलों या हार को सूख जाने पर क्या करना चाहिए.

मंदिर से मिले फूल या हार घर लाने पर जब कुछ दिन के बाद यह सूख जाय तो इन सूखे हुए फूलों को किसी कपड़े में बांध कर घर की तिजोरी में रख देना चाहिए. ऐसा करने से फूल या हार की पॉजिटिव एनर्जी घर में मौजूद रहती है.

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जब हम किसी तीर्थ स्थान या किसी दूर-दराज के मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं तो वहां भी मंदिर का पुजारी भगवान को चढ़ाई गई माला या फूल उठाकर हमें दे देता है. मंदिर के पुजारी द्वारा दी गई इस माला या फूल को लेकर हम परेशान हो जाते हैं कि अब इसका क्या किया जाय क्योंकि घर पहुंचते-पहुंचते यह खराब हो सकता है. ऐसी स्थिति में मंदिर से मिले हुए फूल को हथेली पर रखकर सूंघ लेना चाहिए. सूंघने के बाद इस फूल को किसी पेड़ के नीचे या किसी नदी में प्रवाहित कर देना चाहिए. ऐसा माना जाता जाता है कि सूंघने से फूल की पॉजिटिव एनर्जी हमारे शरीर में चली आती है. इसके बाद भी मंदिर से मिले हुए फूल या हार नहीं संभाले जा रहे हैं तो इसे किसी बहते हुए शुद्ध जलधारा में प्रवाहित कर देना चाहिए.

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ?


सुंदरकांड पढ़ते हुए 25 वें दोहे पर ध्यान थोड़ा रुक गया। तुलसीदास ने सुन्दर कांड में, 
जब हनुमान जी ने लंका मे आग लगाई थी, उस प्रसंग पर लिखा है -

हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास॥25॥
अर्थात : (जब हनुमान जी ने लंका को अग्नि के हवाले कर दिया तो) -
भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे।
हनुमान जी अट्टहास करके गर्जे और आकार बढ़ाकर आकाश से जा लगे।
यह विचारणीय है -
इन उनचास मरुत का क्या अर्थ है ?
यह तुलसी दास जी ने भी विस्तार से नहीं लिखा।

49 प्रकार की वायु के बारे में जानकारी हमारे गुरुओं ने दी है।
उसी 49 वायु का उल्लेख गोस्वामीजी ने किया है।
सृष्टि विज्ञान के रहस्य उद्घाटित करने वाले हमारे सनातन धर्म पर अत्यंत गर्व होता है।

 हम सभी को तुलसीदासजी के वायु ज्ञान पर सुखद आश्चर्य होना स्वाभाविक है, जिससे शायद आधुनिक मौसम विज्ञान भी अनभिज्ञ है ।
    हमें यह जानना चाहिए कि - 
वेदों में वायु की 7 शाखाओं के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है। 
अधिकतर लोग यही समझते हैं कि वायु तो एक ही प्रकार की होती है, लेकिन उसका रूप बदलता रहता है, जैसे कि ठंडी वायु, गर्म वायु और समान वायु - अपान वायु, लेकिन ऐसा नहीं है। 

जल के भीतर जो वायु है उस का शास्त्रों में अलग नाम दिया गया है और आकाश में स्थित जो वायु है उसकी प्रकृति और उसका नाम अलग है।
अंतरिक्ष में जो वायु है वह अलग और पाताल में स्थित वायु भी भिन्न है।
नाम अलग होने का मतलब यह कि उसका गुण और व्यवहार भी अलग ही होता है।
इस तरह वेदों में 7 प्रकार की वायु का वर्णन मिलता है।

ये 7 प्रकार हैं-
1.प्रवह,
2.आवह,
3.उद्वह,
4. संवह,
5.विवह,
6.परिवह और
7.परावह।
 
1. प्रवह : पृथ्वी को लांघकर मेघमंडलपर्यंत जो वायु स्थित है, उसका नाम प्रवह है। इस प्रवह के भी प्रकार हैं। यह वायु अत्यंत शक्तिमान है और वही बादलों को इधर-उधर उड़ाकर ले जाती है। धूप तथा गर्मी से उत्पन्न होने वाले मेघों को यह प्रवह वायु ही समुद्र जल से परिपूर्ण करती है जिससे ये मेघ काली घटा के रूप में परिणत हो जाते हैं और अतिशय वर्षा करने वाले होते हैं। 
 
2. आवह : आवह सूर्यमंडल में बंधी हुई है। उसी के द्वारा ध्रुव से आबद्ध होकर सूर्यमंडल घूमता जाता है।
 
3. उद्वह : वायु की तीसरी शाखा का नाम उद्वह है, जो चन्द्रलोक में प्रतिष्ठित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध होकर यह चन्द्र मंडल घूमता जाता है। 
 
4. संवह : वायु की चौथी शाखा का नाम संवह है, जो नक्षत्र मंडल में स्थित है। उसी से ध्रुव से आबद्ध होकर संपूर्ण नक्षत्र मंडल घूमता रहता है।
 
5. विवह : पांचवीं शाखा का नाम विवह है और यह ग्रह मंडल में स्थित है। उसके ही द्वारा यह ग्रह चक्र ध्रुव से संबद्ध होकर घूमता रहता है। 
 
6. परिवह : वायु की छठी शाखा का नाम परिवह है, जो सप्तर्षिमंडल में स्थित है। इसी के द्वारा ध्रुव से संबद्ध हो सप्तर्षि आकाश में भ्रमण करते हैं।
 
7. परावह : वायु के सातवें स्कंध का नाम परावह है, जो ध्रुव में आबद्ध है। इसी के द्वारा ध्रुव चक्र तथा अन्यान्य मंडल एक स्थान पर स्थापित रहते हैं।
 
   इन सातो वायु के सात सात गण हैं जो निम्न स्थानों में विचरण करते हैं

 ब्रह्मलोक,
इंद्रलोक,
अंतरिक्ष,
भूलोक की पूर्व दिशा,
भूलोक की पश्चिम दिशा,
भूलोक की उत्तर दिशा और
भूलोक कि दक्षिण दिशा।
इस प्रकार 7 x 7 = 49
कुल 49 मरुत हो जाते हैं
जो देव रूप में विचरण करते रहते हैं।

हम रामायण, भगवद् गीता आदि सनातन धर्म की पुस्तकें पढ़ते हैं।
उनमें लिखी छोटी-छोटी बातें,
गहन अध्ययन- मनन करने योग्य हैं।

बोलिए सिया वर रामचंद्र की जय
पवनसुत हनुमान की जय 🚩

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