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बुधवार, 12 जून 2024

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई (पुण्य तिथि) 12 जून विशेष

झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई (पुण्य तिथि) 12 जून विशेष 

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सिंहासन हिल उठे राजवंषों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सब ने मन में ठानी थी.
चमक उठी सन सत्तावन में, यह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

कानपुर के नाना की मुह बोली बहन छब्बिली थी,
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वो संतान अकेली थी,
नाना के सॅंग पढ़ती थी वो नाना के सॅंग खेली थी
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी, उसकी यही सहेली थी.
वीर शिवाजी की गाथाएँ उसकी याद ज़बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वो स्वयं वीरता की अवतार,
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना यह थे उसके प्रिय खिलवाड़.
महाराष्‍ट्रा-कुल-देवी उसकी भी आराध्या भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,
ब्याह हुआ बन आई रानी लक्ष्मी बाई झाँसी में,
राजमहल में बाजी बधाई खुशियाँ छायी झाँसी में,
सुघत बुंडेलों की विरूदावली-सी वो आई झाँसी में.
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

उदित हुआ सौभाग्या, मुदित महलों में उजियली च्छाई,
किंतु कालगती चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,
रानी विधवा हुई है, विधि को भी नहीं दया आई.
निसंतान मारे राजाजी, रानी शोक-सामानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

बुझा दीप झाँसी का तब डॅल्लूसियी मान में हरसाया,
ऱाज्य हड़प करने का यह उसने अच्छा अवसर पाया,
फ़ौरन फौज भेज दुर्ग पर अपना झंडा फेहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज झाँसी आया.
अश्रुपुर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई वीरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की मॅयैया,
व्यापारी बन दया चाहता था जब वा भारत आया,
डल्हौसि ने पैर पसारे, अब तो पलट गयी काया
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया.
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

छीनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,
क़ैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घाट,
ऊदैपुर, तंजोर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात?
जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात.
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

रानी रोई रनवासों में, बेगम गुम सी थी बेज़ार,
उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,
सरे आम नीलाम छपते थे अँग्रेज़ों के अख़बार,
"नागपुर के ज़ेवर ले लो, लखनऊ के लो नौलख हार".
यों पर्दे की इज़्ज़त परदेसी के हाथ बीकानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,
वीर सैनिकों के मान में था अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धूंधूपंत पेशवा जूटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आहवान.
हुआ यज्ञा प्रारंभ उन्हे तो सोई ज्योति जगानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,
यह स्वतंत्रता की चिंगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर, में भी कुछ हलचल उकसानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में काई वीरवर आए काम,
नाना धूंधूपंत, तांतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुंवर सिंह, सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम.
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो क़ुर्बानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दनों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्ध आसमानों में.
ज़ख़्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्ग तत्काल सिधार,
यमुना तट पर अँग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार.
अँग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

विजय मिली, पर अँग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुंहकी खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,
यूद्ध क्षेत्र में ऊन दोनो ने भारी मार मचाई थी.
पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,
किंतु सामने नाला आया, था वो संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार.
घायल होकर गिरी सिंहनी, उसे वीर गति पानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,
मिला तेज से तेज, तेज की वो सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेईस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता-नारी थी,
दिखा गयी पथ, सीखा गयी हमको जो सीख सिखानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी.

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,
यह तेरा बलिदान जागावेगा स्वतंत्रता अविनासी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी.
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।
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*ना तुम गलत,ना में..*.(यह बंधन तो..प्यार का बंधन है)

*ना तुम गलत,ना में..*.
(यह बंधन तो..प्यार का बंधन है)

*सन 1980 के आसपास*
 का समय था, एक दस्यु सुंदरी  फूलन देवी का नाम हरेक की जबान पर था। दस्यु सुंदरी  के रूप में कुख्यात ओर जिस पर 22 मर्दों की जान लेने,30  लूटपाट ओर 18 अपहरण के केस लगे होने के बाद भी जब उसने आत्मसमर्पण किया था,तब भी उसने कभी अपने को गुनाहगार नही माना,उसका कहना था,मेरी जगह कोई और होता तो भी ऐसा ही करता।
अब यदि यह भी इतने घोर अपराध करने के बाद में भी कोई अपने को गलत नही मानता तो क्या हम जिससे रोज संपर्क में आते है,क्या वो अपनी गलती मानने या आलोचना सुनने के लिए तैयार होगा?,हम किसी दूसरे की बात नही भी करे,अपने संव्य पर  लेके देखे तो क्या हम कभी किसी विवाद या मतभेद पर अपने को गलत मानते है? सच्चाई यह है कि हमे किसी की गलती निकालनी हो तो  हम प्रधानमंत्री से लेकर एक सन्तरी तक कि निकाल देंगे,लेकिन कोई यदि हमारी निकालने लग जाये तो क्या हम बरदास्त कर पाते है?
हां, कोई भी-शिकायत आलोचना या बुराई यदि हम गलत है तो भी सुनना पसंद नही करते।कोई कह भी देगा तो हम तुरन्त रिएक्ट करेंगे, तो क्या इसका मतलब गलतियां होती ही नही है? लेकिन किसी के द्वारा की गई आलोचना हमारे अहंकार को चोट पहुंचाती है..  इसलिए हम बहस करते रहेंगे,चिलम चिलो करते रहंगे..जोर शोर से अपना पक्ष रखते रहेंगे।रिश्तो की बलि ले लेंगे। पर झुकना स्वीकार नही करेंगे।
तो सवाल आता है?फिर समाधान कैसे हो? क्या फिर हर दिन संबंधों को कसौटी पर लगाते रहे?रिश्ते दांव पर लगाते रहे?
 *2020 में 3 कर्षि कानूनों को लेकर पंजाब हरियाणा दिल्ली बॉर्डर पर जबरदस्त  किसान आंदोलन हूवा।यह बहुत लंबा खींचता जा रहा था*।आम नागरिकों को भी बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा था, आंदोलन में बहुत सी अप्रिय घटनाएं भी हुई। विपक्ष ने खूब हवा दी।और पीछे से मदद भी की..भारत सरकार को इसे सख्ती से कुचलना नही था,क्योंकि मोदी जी की यह कार्यप्रणाली का हिस्सा नही है। फिर 26 जनवरी का कांड भी हो गया..
अनेक वार्ताएं भी हुई..किसान टस से मस नही हो रहा था,प्रधान मंत्री जी  एक दिन रेडियो पर आकर घोषणा कर दी,हम किसानों की बेहतरी के लिए 3 कानून लेके आये थे,लेकिन शायद हम उनको ठीक से समझा नही सके,इसलिए इन कानूनों को हम वापस लेते है।
*ओर देखते ही देखते इस आंदोलन की हवा निकल गयी*।
ऐसा रिश्तो में,परस्पर संबंधों में जब हम विवाद को बहुत खींच लेते है,तो उसके दुष्परिणाम सामने आने लगते है।आज जो  परिवारों में,पति पत्नियों के मध्य ,भाई भाई के मध्य,पड़ोसियों के मध्य ,एक समुदाय से दूसरे समुदाय के मध्य किसी भी गलत फहमी को लेकर तलवारे खींच जाती है।और जब कोई विवेक पूर्ण ढंग से इसका समय पर हल नही खोजता तो, उसके बड़े नुकशान सामने आते है।
*अभी लोकसभा के चुनाव में राजकोट के सांसद रुपाला जी ने कोई विवादास्पद बयान दे दिया*..देश की एक मार्शल कोम को यह नागवारा गुजरा..उनके स्वाभिमान को आहत करने वाला और  गैर जरुरी बयान था।रुपाला जी ने स्पष्ठ भी किया, माफी भी मांगी,ओर यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि,उनका अभिप्राय यह नही था। *लेकिन उनकी पार्टी ने उनके खिलाफ कोई एक्शन नही लिया तो,चुनावो में भाजपा को केवल इस बात के लिए  इतना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा*। चुनाव 2024 के क्लीन स्वीप सा माहौल को एक बड़ी कोम की नाराजगी को सही वक्त पर संतुष्ठ ओर उचित कदम नही उठाने से इस चुनाव को संघर्ष मय बना दिया।बल्कि विलुप्त होरहे विपक्ष को वापस प्राण वायु दे दी।
  *आज कोडक, एच एम टी, अम्बेसेडर जैसी एक समय की मार्किट की लीडिंग कम्पनियों के सीईओ को जब अपने  उत्पाद में नवाचार संबंधी कोई सुझाव होता तो वो ध्यान ही नही धरते*, ओर अपने को सही मानते रहते..कालांतर हमने देखा सभी फेल हो गए।यही दूसरी तरफ  हर जापानियों के खून में है कि वो गलतियो को मूल्यवान मानते है।और वे गलती खोजने को अपनी उपलब्धि जैसा मानते है,क्योंकि यही भाव उसके सुधार की कुंजी है।और इसीलिए *मेड इन जापान* लिखा देखने के बाद  गुणवत्ता के लिए चिंता का कोई अवसर ही नही होता।
यह तमाम बातें ,हमारे जीवन के व्यवहार,आचरण और समझ के हिस्से है।जो जितना जल्दी इनको समझ लेता है,जो ढल जाता है,जो सुधार आमंत्रित कर लेता है..इसका  इतना सा  अर्थ है कि वो *अपने जीवन को सुंदर ओर सुखमय बना लेता है। जो लोग रिश्तो में जिद कर लेते है,उनके रिश्ते बिगड़ जाते है, रिश्तो में प्रेम ओर उनको अटूट बनाये रखने के लिए जिद छोड़ देनी चाहिए।जीवन मे सुख शांति और प्रेम चाहते है तो लोगो के सामने झुकना सीखे।यदि हम प्रेम से आज झुक रहे है तो कल वो भी झुकेंगे*।
हम रिश्तो को ही नही,संस्कृति को बचा रहे होते है।
यह नींर्णय की कौन गलत कोन सही..इसकी कोई अहमियत नही है।इसका कोई मूल्य नही।

*रामानंद काबरा*

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