सोमवार, 20 जुलाई 2015

सौ में से पचास बीमारियां मानसिक है -ओशो

 सौ में से पचास बीमारियां मानसिक है
यह हो सकता है, जीसस ने किसी के हाथ पर हाथ रखा हो और आँख ठीक हो गयी हो, लेकिन फिर भी चमत्‍कार नहीं है। क्‍योंकि पूरी बात अब पता चल गयी है। अब पता चल गयी है कि कुछ अंधे तो सिर्फ मानसिक रूप से अंधे होते है। वे अंधे होते है ही नहीं सिर्फ मेंटल बलांइडनेस होती है। उनको सिर्फ ख्‍याल होता है अंधे होने का और यह ख्‍याल इतना मजबूत हो जाता है कि आँख काम करना बंद कर देती है। अगर कोई आदमी उनको भरोसा दिला दे तो उनकी आंखे ठीक हो सकती है। तो उनका मन तत्‍काल वापस लौट आयेगा और आँख ठीक हो गयी, तो वह तत्‍काल उनका मन वापस लौट आयेगा और आँख के तल पर काम करना शुरू कर देगा।
आज तो यह बात जगत जाहिर हो गयी है। कि सौ में से पचास बीमारियां मानसिक है, इसलिए पचास बीमारियां तो ठीक की ही जा सकती है। बिना किसी दवा के और सौ बीमारियों में से भी जो बीमारियां असली है, उनमें भी पचास प्रतिशत हमारी कल्‍पना से बढ़ोतरी हो जाती है। यह पचास प्रतिशत कल्‍पना भी काटी जा सकती है। सौ सांप में से केवल तीन सांप में जहर होता है। तीन प्रतिशत साँपों में। सतान्‍नबे प्रतिशत सांप बिना जहर के होते है। लेकिन सतान्‍नबे प्रतिशत साँपों के काटने से आदमी मर जाता है। इसलिए नहीं की उन में जहर है। इस लिए की उसे सांप ने काटा है। सांप के काटने से कम मरता है, सांप ने कांटा मुझे, इसलिए ज्‍यादा मरता है।
तो जिस सांप में बिलकुल जहर नहीं है, उससे आपको कटवाँ कर भी मारा जा सकता है। तब एक चमत्‍कार तो हो गया। क्‍योंकि जहर था ही नहीं। कोई कारण नहीं मरने का। जब सांप ने काटा यह भाव इतना गहरा है। यह मृत्‍यु बन सकती है। तब मंत्र से फिर आपको बचाया भी जा सकता है। झूठा सांप मार रहा है। झूठा मंत्र बचा लेता है। झूठी बीमारी को झूठी तरकीब बचा जाती है।
मेरे पड़ोस में एक आदमी रहते थे। सांप झाड़ने का काम करते थे। उन्‍होंने सांप पाल रखे थे। तो जब भी किसी सांप का झड़वाने वाला आता, तब वह बहुत शोर-गुल मचाते। ड्रम पीटते और पुंगी बजाते और बहुत शोर गुल मचाते, धुंआ फैलाते, फिर उनका ही पला हुआ सांप आकर एकदम सर पटकनें लग जाता। जब वह सांप, जिसको काटे,वह आदमी देखता रहे कि सांप आ गया। वह सांप को बुल देता है। वह कहता है, पहले सांप से मैं पूछेगा की क्‍यों काटा? मैं उसे डांटुगा, समझाऊंगा, बुझाऊंगा, उसी के द्वारा जहर वापस करवा दूँगा। तो वह डाँटते, डपटते, वह सांप क्षमा मांगने लगता,वह गिरने लगता, लौटने लगता। फिर वह सांप, जिस जगह काटा होता आदमी को, उसी जगह मुंह को रखवाते। सब वह आदमी ठीक हो जाता।
कोई छह या सात साल पहले उनके लड़के को सांप ने काट लिया। तब बड़ी मुश्‍किल में पड़े, क्‍योंकि वह लड़का बस जानता है। वह लड़का कहता है, इससे मैं न बचूंगा, क्‍योंकि मुझे तो सब पता है। सांप घर का ही है। वह भागकर मेरे पास आये कुछ करिये, नहीं तो लड़का मर जायेगा। मैंने कहां आपका लड़का और सांप के काटने से मरे, तो चमत्‍कार हो गया। आप तो कितने ही लोगो को सांप के काटने से बचा चुके हो। उसने कहा कि मेरे लड़के को न चलेगा। क्‍योंकि उसको सब पता है कि सांप अपने ही घर का है। वह कहता है, यह तो घर का सांप है। वह बूलाइये, जिसने काटा है। तो आप चलिए, कुछ करिये,नहीं तो मेरा लड़का जाता है। सांप के जहर से कम लोग मरते है। सांप के काटने से ज्‍यादा लोग मरते है। वह काटा हुआ दिक्‍कत दे जाता है। वह इतनी दिक्‍कत दे जाता है कि जिसका हिसाब नहीं।
मैंने सुना है कि एक गांव के बहार एक फकीर रहता था। एक रात उसने देखा की एक काली छाया गांव में प्रवेश कर रही हे। उसने पूछा कि तुम कौन हो। उसने कहां, मैं मोत हुं ओर शहर में महामारी फैलने वाली है। इसी लिये में जा रही हूं। एक हजार आदमी मरने है, बहुत काम है। मैं रूक न सकूँगा। महीने भर में शहर में दस हजार आदमी मर गये। फकीर ने सोचा हद हो गई झूठ की मोत खुद ही झूठ बोल रही है। हम तो सोचते थे कि आदमी ही बेईमान है ये तो देखो मौत भी बेईमान हो गई। कहां एक हजार ओर मार दिये दस हजार। मोत जब एक महीने बाद आई तो फकीर ने पूछा की तुम तो कहती थी एक हजार आदमी ही मारने है। दस हजार आदमी मर चुके और अभी मरने ही जा रहे है।
उस मौत ने कहां, मैंने तो एक हजार ही मारे है। नौ हजार तो घबराकर मर गये हे। मैं तो आज जा रही हूं, और पीछे से जो लोग मरेंगे उन से मेरा कोई संबंध नहीं होगा और देखना अभी भी शायद इतनी ही मेरे जाने के बाद मर जाए। वह खुद मर रहे है। यह आत्‍म हत्या है। जो आदमी भरोसा करके मर जाता है। यदि मर गया वह भी आत्‍म हत्या हो गयी। ऐसी आत्‍मा हत्‍याओं पर मंत्र काम कर सकते है ताबीज काम कर सकते है, राख काम कर सकती है। उसमें संत-वंत को कोई लेना-देना नहीं है। अब हमें पता चल गया है कि उसकी मानसिक तरकीबें है, तो ऐसे अंधे है।
एक अंधी लड़की मुझे भी देखने को मिली,जो मानसिक रूप से अंधी है। जिसको डॉक्टरों ने कहा कि उसको कोई बीमारी नहीं है। जितने लोग लक़वे से परेशान है, उनमें से कोई सत्‍तर प्रतिशत लो लगवा पा जाते है। पैरालिसिस पैरों में नहीं होता। पैरालिसिस दिमाग में होता है। सतर प्रतिशत।
सुना है मैंने एक घर में दो वर्ष से एक आदमी लक़वे से परेशान है—उठ नहीं सकता है, न हिल ही सकता है। सवाल ही नहीं है उठने का—सूख गया है। एक रात—आधी रात, घर में आग लग गयी हे। सारे लोग घर के बाहर पहुंच गये पर प्रमुख तो घर के भीतर ही रह गया। पर उन्‍होंने क्‍या देखा की प्रमुख तो भागे चले आ रहे है। यह तो बिलकुल चमत्‍कार हो गया। आग की बात तो भूल ही गये। देखा ये तो गजब हो गया। लकवा जिसको दो साल से लगा हुआ था। वह भागा चला आ रहा है। अरे आप चल कैसे सकते है। और वह वहीं वापस गिर गया। मैं चल ही नहीं सकता।
अभी लक़वे के मरीजों पर सैकड़ों प्रयोग किये गये। लक़वे के मरीज को हिप्रोटाइज करके, बेहोश करके चलवाया जा सकता है। और वह चलता है, तो उसका शरीर तो कोई गड़बड़ नहीं करता। बेहोशी में चलता है। और होश में नहीं चल पाता। चलता है, चाहे बेहोशी में ही क्‍यों न चलता हो एक बात का तो सबूत है कि उसके अंगों में कोई खराबी नहीं है। क्‍योंकि बेहोशी में अंग कैसे काम कर रहे है। अगर खराब हो। लेकिन होश में आकर वह गिर जाता है। तो इसका मतलब साफ है।
बहुत से बहरे है, जो झूठे बहरे है। इसका मतलब यह नहीं है कि उनको पता नहीं है क्‍योंकि अचेतन मन ने उनको बहरा बना दिया है। बेहोशी में सुनते है। होश में बहरे हो जाते है। ये सब बीमारियाँ ठीक हो सकती है। लेकिन इसमें चमत्कार कुछ भी नहीं है। चमत्‍कार नहीं है, विज्ञान जो भीतर काम कर रहा है। साइकोलाजी, वह भी पूरी तरह स्‍पष्‍ट नहीं है। आज नहीं कल, पूरी तरह स्‍पष्‍ट हो जायेगा और तब ठीक ही बातें हो जायें।
आप एक साधु के पास गये। उसने आपको देखकर कह दिया,आपका फलां नाम है? आप फलां गांव से आ रहे है। बस आप चमत्‍कृत हो गये। हद हो गयी। कैसे पता चला मेरा गांव, मेरा नाम, मेरा घर? क्‍योंकि टेलीपैथी अभी अविकसित विज्ञान है। बुनियादी सुत्र प्रगट हो चुके है। अभी दूसरे के मन के विचार को पढ़ने कि साइंस धीरे-धीरे विकसित हो रही है। और साफ हुई जा रही है। उसका सबूत है, कुछ लेना देना नहीं है। कोई भी पढ़ सकेगा,कल जब साइंस हो जायेगी, कोई भी पढ़ सकेगा। अभी भी काम हुआ है। और दूसरे के विचार को पढ़ने में बड़ी आसानी हो गयी हे। छोटी सी तरकीब आपको बता दूँ, आप भी पढ़ सकते है। एक दो चार दिन प्रयोग करें। तो आपको पता चल जायेगा, और आप पढ सकते है। लेकिन जब आप खेल देखेंगे तो आप समझेंगे की भारी चमत्‍कार हो रहा है।
एक छोटे बच्‍चे को लेकर बैठ जायें। रात अँधेरा कर लें। कमरे में। उसको दूर कोने में बैठा लें। आप यहां बैठ जायें और उस बच्‍चे से कह दे कि हमारी तरफ ध्‍यान रख। और सुनने की कोशिश कर, हम कुछ ने कुछ कहने की कोशिश कर रहे है। और अपने मन में एक ही शब्‍द ले लें और उसको जोर से दोहरायें। अंदर ही दोहरायें, गुलाब, गुलाब, को जोर से दोहरायें, गुलाब, गुलाब, गुलाब…….दोहरायें आवाज में नहीं मन में जोर से। आप देखेंगे की तीन दिन में बच्‍चे ने पकड़ना शुरू कर दिया। वह वहां से कहेगा। क्‍या आप गुलाब कह रहे है। तब आपको पता चलेगा की बात क्‍या हो गयी।
जब आप भीतर जोर से गुलाब दोहराते है। तो दूसरे तक उसकी विचार तरंगें पहुंचनी शुरू हो जाती है। बस वह जरा सा रिसेप्‍टिव होने की कला सीखने की बात है। बच्‍चे रिसेप्‍टिव है। फिर इससे उलट भी किया जा सकता है। बच्‍चे को कहे कि वह एक शब्‍द मन में दोहरायें और आप उसे तरफ ध्‍यान रखकर, बैठकर पकड़ने की कोशिश करेंगें। बच्‍चा तीन दिन में पकड़ा है तो आप छह दिन में पकड़ सकते है। कि वह क्‍या दोहरा रहा है। और जब एक शब्‍द पकड़ा जा सकता है। तो फिर कुछ भी पकड़ा जा सकता है।
हर आदमी के अंदर विचार कि तरंगें मौजूद है, वह पकड़ी जा रही है। लेकिन इसका विज्ञान अभी बहुत साफ न होने की वजह से कुछ मदारी इसका उपयोग कर रह है। जिनको यह तरकीब पता है वह कुछ उपयोग कर रहे है। फिर वह आपको दिक्‍कत में डाल देते है।
यह सारी की सारी बातों में कोई चमत्‍कार नहीं है। न चमत्‍कार कभी पृथ्‍वी पर हुआ नहीं। न कभी होगा। चमत्‍कार सिर्फ एक है कि अज्ञान है, बस और कोई चमत्‍कार नहीं है। इग्‍नोरेंस हे, एक मात्र मिरेकल है। और अज्ञान में सब चमत्‍कार हिप्‍नोटिक होते रहते हे। जगत में विज्ञान है, चमत्‍कार नहीं। प्रत्‍येक चीज का कार्य है, कारण है, व्‍यवस्‍था है। जानने में देर लग सकती है। जिस दिन जान जी जायेगी उस दिन हल हो जायेगी उस दिन कोई कठिनाई नहीं रह जायेगी।
ओशो

टेलीपैथिक विद्या - भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा

टेलीपैथी को हिंदी में दूरानुभूति कहते हैं। टेली शब्द से ही टेलीफोन, टेलीविजन आदि शब्द बने हैं ये सभी दूर के संदेश और चित्र को पकड़ने वाले यंत्र हैं। आदमी के मस्तिष्क में भी इस तरह की क्षमता होती है। बस उस क्षमता को पहचानकर उसका उपयोग करने की बात है।

कोई व्यक्ति जब किसी के मन की बात जान ले या दूर घट रही घटना को पकड़ कर उसका वर्णन कर दे तो उसे पारेंद्रिय ज्ञान से संपन्न व्यक्ति कहा जाता है। महाभारत काल में संजय के पास यह क्षमता थी। उन्होंने दूर चल रहे युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को सुनाया था।

भविष्य का आभास कर लेना भी टेलीपैथिक विद्या के अंतर्गत ही आता है। किसी को देखकर उसके मन की बात भांप लेने की शक्ति हासिल करने तो बहुत ही आसान है।

इस तरह की शक्ति जिसके पास होती है मोटे तौर पर इसे ही टेलीपैथी कह दिया जाता है। दरअसल टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के उस आदान-प्रदान को भी कहते हैं।

इस विद्या में हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता, यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह हमारे मन और मस्तिष्क की शक्ति होती है और यह ध्यान तथा योग के अभ्यास से हासिल की जा सकती है।

टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था। कहते हैं कि जिस व्यक्ति में यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है। यह परामनोविज्ञान का विषय है जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए जाते हैं।
किसी का मन पढ़ने की कला
टेलीपैथी दो व्यक्तियों के बीच विचारों और भावनाओं के उस तबादले को कहते हैं जिसमें हमारी पांच ज्ञानेंद्रियों का इस्तेमाल नहीं होता. यानी इसमें देखने, सुनने, सूंघने, छूने और चखने की शक्ति का इस्तेमाल नहीं होता है. टेलीपैथी शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल 1882 में फ़्रैड्रिक डब्लू एच मायर्स ने किया था. कहते हैं कि जिस व्यक्ति में यह छठी ज्ञानेंद्रिय होती है वह जान लेता है कि दूसरों के मन में क्या चल रहा है. यह परामनोविज्ञान का विषय है जिसमें टेलीपैथी के कई प्रकार बताए गए हैं. लेकिन इसे प्रमाणित करना बड़ा मुश्किल है. इस क्षेत्र में बहुत से प्रयोग हो चुके हैं लेकिन संशय करने वालों का तर्क है कि टेलीपैथी के कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिल सके हैं. कुछ लोग टैक्नोपैथी की बात करते हैं. उनका मानना है कि भविष्य में ऐसी तकनोलॉजी विकसित हो जाएगी जिससे टेलीपैथी संभव हो. इंगलैंड के रैडिंग विश्वविद्यालय के कैविन वॉरिक का शोध इसी विषय पर है कि किस तरह एक व्यावहारिक और सुरक्षित उपकरण तैयार किया जाए जो मानव के स्नायु तंत्र को कंप्यूटरों से और एक दूसरे से जोड़े. उनका कहना है कि भविष्य में हमारे लिए संपर्क का यही प्रमुख तरीक़ा बन जाएगा
टेलीपैथी मन को खोल देती है 
 
बहुत बार ऐसा हुआ कि जब मैंने या मेरे किसी परिचित ने एक-दूसरे को याद किया तो उसी समय दूसरे को भी एहसास हुआ और इस संवाद के साथ संपर्क हुआ कि ‘मैं अभी आपको ही याद कर रहा था।’ ऐसा क्यों होता है?   
-Sanwariya

यह अनुभव टेलीपैथी से जुड़ा हुआ है। टैलीपैथी को परिचित बोध भी कहा जाता है। महाभारत, रामायण तथा बाइबल में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। महाभारत में संजय, धृतराष्ट्र को कुरूक्षेत्र का पूरा हाल इस प्रकार सुनाते हैं, मानो प्रत्यक्ष देख रहे हों। परिचित बोध हमारे अवचेतन मन का हिस्सा है, जिसमें व्यक्ति बिना बोले/सुने दूसरों के मनोभाव को पढ़ने में समर्थ होता है। यह हमारे विचारों तथा भावनाओं की एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के मन में संचार प्रक्रिया है। यह अक्सर परस्पर परिचित व्यक्तियों में ज्यादा होती है। विशेषकर माता-पिता और बच्चों में अधिक विकसित होती है। अक्सर माता-पिता को बिना समाचार और बातचीत के अहसास हो जाता है कि उनका बच्चा बीमार अथवा कष्ट में है।

टेलीपैथी के संकेतों को समझें


टेलीपैथी द्वारा हम न केवल अपने विचारों को संप्रेषित करते हैं, बल्कि तस्वीरों और शब्दों को भी भेज सकते हैं। ऐसा करने के लिए आपको अपने मन-मस्तिष्क को स्वच्छ करना होता है तथा विचारों पर फोकस करना होता है। यह उन स्थितियों में विशेष लाभकारी होता है, जब कोई व्यक्ति आपसे संदेश प्राप्त करना चाहता है। इस स्थिति में दूसरा व्यक्ति संदेश के लिए अपना मन खोल देता है। टेलीपैथी में हमारा ऊर्जा चक्र भी क्रियाशील रहता है। हर व्यक्ति की एक विशेष आत्मिक ऊर्जा होती है। हमारी आत्मिक ऊर्जा का पैटर्न अनेक लोगों से मेल खाता है। इसी कारण हमारी अनेक बातों, इच्छाओं, सपनों, विचारों तथा अंर्तज्ञान (इन्ट्यूशन) की ऊर्जा का टेलीपैथिक ट्रांसफर हो जाता है।

टेलीपैथ रुस्तम जे तारापोरवाला की तरफ से आने वाले टैलीपैथी संकेतों अंकित अजमेरा समझते हैं। क्या यह काम करता है, जानने के लिए आगे पढ़ें:
मैंने रॉबर्ट सिल्वरबर्ग की साइंस फिक्शन नॉवेल ‘डाइंग इनसाइड’ को बस पढ़कर खत्म ही किया था। नॉवेल का मुख्य किरदार डेविड, अन्य लोगों के मन को पढ़ने की क्षमता के साथ पैदा हुआ है। वह इस बात को सामान्य बात मानकर जीवन में आगे बढ़ता रहता है शायद ही कभी वह दूसरों को इस बारे में बताते है क्योंकि उसे लगता है कि लोगों को ये बात पहले से ही मालूम होगी। और मैं बहुत ज़्यादा बातचीत नहीं करता और यह विचार कि यदि टैलीपैथी संभव हो तो दुनिया में कोई गलतफहमी नहीं होगी, मेरे मन में बैठ गया। इसलिए मैं इंटरनेट पर टैलीपैथ की खोज करने लगा और आखिरकार एक दिन मुझे टैलपैथ मिल गया।
ब्रह्मांडीय संबंध
रुस्तम जे तारापोरवाला, अधिकांश समय के लिए एक रियल एस्टेट व्यापारी, 35 साल से टैलीपेथी का अभ्यास कर रहे हैं। मेरे द्वारा किया गया फोन उनका पहला फोन था जबकि उनकी सेवाएं 10 साल से सूचीबद्ध थी। मैं अगले दिन टारडियो मार्ग स्थित उनके घर पर उनसे मिला। मैं उनके दरवाजे पर पहुंच गया तो मुझे उन्हें बुलाना नहीं पड़ा क्योंकि जैसे ही मैं वहां पहुंचा वो दरवाज़े पर आ गए। क्या उन्हें मेरी उपस्थिति का अहसास हो गया था? मेरी योजना मुझे कौशल सिखाने के लिए उन्हें मजबूर करना था, लेकिन क्या वह पहले से ही ये बात जानते थे? उन्होंने मुझसे पूछा और साथ में कहा, "तुम यहां क्यों आए हो? मैं दूसरों के मन को नहीं पढ़ता।" मैं निराश था। तारापोरवाला के अनुसार, टैलीपैथी का उद्देश्य किसी के मन को पढ़ना नहीं है। यह केवल संदेश देने और प्राप्त करने के लिए एक इंस्टैंट मैसेंजर की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। दो लोगों के बीच टैलीपैथिक कनेक्शन काम करने के लिए उनका एक दूसरे को अच्छी तरह से जानना जरूरी है। पति-पत्नी, भाई बहन, करीबी दोस्त या रिश्तेदार। एक सुपर हीरो बनने की मेरी उम्मीदें धराशायी हो गई। लेकिन तब उन्होंने कुछ बेहतर कहा। उन्होंने कहा कि वह मुझे टैलीपैथी सिखा सकते हैं। एक तरफ तो मैं यह समझने की कोशिश कर रहा था कि क्या वह वाकई यह कर सकते हैं और दूसरी तरफ मैं वास्तव में जल्दी से इसे सीखना चाहता था और सुपरहीरो बनने के अपने रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता था। लेकिन उसे तब तक इंतजार करना पड़ता जब तक कि वे इसके पीछे के दर्शन पर अपने व्याख्यान को समाप्त नहीं कर लेते।
तारापोरवाला के अनुसार, टैलीपैथी इसलिए काम करती है क्योंकि पृथ्वी पर एक बड़ी ब्रह्मांडीय टावर मौजूद है, बिल्कुल सेलफोन के टावर की तरह ही। यह व्यक्तियों के बीच मस्तिष्क तरंगों के प्रसारण की सुविधा देता है। वह बताते हैं, "यह हमारे साथ अक्सर होता है लेकिन हमें इसका एहसास नहीं होता। कभी-कभी आप ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं जिसके आप काफी करीब है और वह व्यक्ति उसी पल आपको कॉल कर देता है या आपके दरवाजे पर खड़ा होता है।" यदि मैं दुनिया को प्रभावी ढंग से संदेश भेजना चाहता हूँ, तो, मुझे कम से कम एक महीने के लिए तकनीक का अभ्यास करने की जरूरत है। अतः न सुपरहीरो बनना, न मन पढ़ना, सिर्फ बहुत सारा अभ्यास। मैं अपनी पढ़ाई शुरू होने से पहले ही निराश हो गया।
अपने मस्तिष्क को प्रशिक्षण देना
प्रशिक्षण एक लक्ष्य के अभ्यास की तरह है। उन्होंने कहा, "आपका मस्तिष्क एक बंदूक की तरह है। आप जिस व्यक्ति को संदेश भेजना चाहते हैं, आपके लक्ष्य को संदेश केवल तभी दिया जा सकता है जब आप अपने मस्तिष्क को ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।" ध्यान केंद्रित करने के लिए, मुझे अपना मन शांत करना पड़ा। सबसे पहले 25 से 1 तक उलटी गिनती गिनें। शांत हो जाओ, गहरी सांस लो। और हो गया। अपने अंदर की जीवन शक्ति पर ध्यान केन्द्रित करो। मैने अपने फेफड़ों को फूलते हुए महसूस किया, अपने दिल की धड़कन को सुना।

अब, आप बाहर जो संदेश भेजना चाहते हैं उस पर ध्यान लगाएं। अपने दिमाग में उसे दोहराएँ। मेरे पास पूरी दुनिया के लिए एक संदेश था। मैं एक बड़े घर को चाहता हूँ। मैने इसे मानसिक रूप से दोहराया। बार बार दोहराया।
अपने सपनों का घर मांगने के 30 सेकंड के बाद, मैं धरती माता के पास वापस आ गया। इस बार मैंने सीधे क्रम में 1 से 25 गिनती बोली। संदेश ने मेरा आउटबॉक्स छोड़ दिया और ब्रह्मांडीय टॉवर पर पहुंच गया।
फिर तारापोरवाला ने मुझे एक महीना अभ्यास करने के लिए एक कार्य दिया। उन्होंने मुझे एक चक्र की तस्वीर दी जिसके बीच में एक काला बिंदु था।

रविवार, 19 जुलाई 2015

आप तुलसी के पौधे के बीज को संभाल कर रक्खे ये बड़े काम की है

आप तुलसी के पौधे के बीज को संभाल कर रक्खे ये बड़े काम की है ....!
जब भी तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने पर तोड़ लेना चाहिए वरना तुलसी के झाड में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है . इन पकी हुई मंजिरियों को रख ले . इनमे से काले काले बीज अलग होंगे उसे एकत्र कर ले . यही सब्जा है . अगर आपके घर में नही है तो बाजार में पंसारी या आयुर्वैदिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएंगे ..



जब भी तुलसी में खूब फुल यानी मंजिरी लग जाए तो उन्हें पकने पर तोड़ लेना चाहिए वरना तुलसी के झाड में चीटियाँ और कीड़ें लग जाते है और उसे समाप्त कर देते है . इन पकी हुई मंजिरियों को रख ले . इनमे से काले काले बीज अलग होंगे उसे एकत्र कर ले . यही सब्जा है . अगर आपके घर में नही है तो बाजार में पंसारी या आयुर्वैदिक दवाईयो की दुकान पर मिल जाएंगे ..
* तुलसी चटपटी, कड़वी अग्निदीपक, हृदय को हितकारी गरम, दाह, पित्त, वृद्धिकर, मूत्रकृच्छ, कोढ़, रक्तविकार, पसली-पीड़ा तथा कफ वातनाशक है। पाश्चात्य मतानुसार श्वेत तुलसी उष्ण, पाचक एवं बालकों के प्रतिश्याय व कफ रोग में कार्यान्वित होता है। काली तुलसी शीत, स्निग्ध, कफ एवं ज्वरनाशक है। फुसफुस के अन्दर से कफ निकालने के लिए काली मिर्च के साथ तुलसी के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। तुलसी रोगाणुनाशक पौधा है। प्राय: सभी हिन्दू घरों में यह मिलता है और इसकी पूजा होती है।
* केवल क्षय और मलेरिया के कीटाणु ही तुलसी की गंध से समाप्त नहीं हो जाते, अन्य रोगों के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व मलाया में मलेरिया की अधिकता को देखकर वहां की सरकार ने पार्कों में वनों में खाली जमीन जहां भी थी वहां तुलसी के पौधे रोपने का एक जोरदार अभियान चलाया था। उसके परिणामस्वरूप महामारी के रूप में कुख्यात मलेरिया धीरे-धीरे कम होते हुए अब बिलकुल समाप्त हो गया है। वहां के निवासी तुलसी के गुणों से भली-भांति परिचित हो चुके हैं। आज उनके घरों में तुलसी के एक-दो नहीं कई-कई पौधे लहलहाते दिखाई देते हैं।
* अनेक होमियोपैथिक दवाइयां तुलसी के रस से तैयार की जाती हैं। मेटेरिया मेडिका में तुलसी के अनेक गुणों का उल्लेख किया गया है।
* हमारे दैनिक जीवन में तुलसी का बहुत ही व्यापक उपयोग है। घर में हम अन्य फूलदार पौधे गमलों में लगाते हैं क्योंकि हर घर में कच्ची जमीन नहीं होती। हमें गमलों में तुलसी के भी दो-चार पौधे लगाने चाहिए। हालांकि जमीन में तुलसी का पौधा जिस तेजी से पनपता और विकसित होता है गमले में नहीं हो पाता। लेकिन इससे उसके गुणों में कोई अन्तर नहीं आता।
* तुलसी का सेवन करते समय कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। तुलसी का उपयोग करने के तत्काल बाद दूध नहीं पीना चाहिए। उससे कई रोग पैदा हो जाते हैं। अनेक आयुर्वेदिक औषधियों का सेवन दूध के साथ बताया गया है लेकिन तुलसी का सेवन गंगाजल, शहद या फिर सामान्य पानी के साथ बताया गया है।
आयुर्वेद के मतानुसार, यदि कार्तिक मास में प्रातःकाल निराहार तुलसी के कुछ पत्तों का सेवन किया जाए तो मनुष्य वर्ष भर रोगों से सुरक्षित रहता है।

* तुलसी के सेवन का मनुष्य के चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ता है। तुलसी के सेवन से विचार शुद्ध और पवित्र रहते हैं। आध्यात्मिक विचार उत्पन्न होते हैं। वासना की ओर मन आकृष्ट नहीं हो पाता। मन में न तो वासनात्मक विचार उत्पन्न होते हैं न क्रोध आता है। तुलसी के नियमित सेवन से शरीर में चुस्ती-फुर्ती पैदा होती है। चेहरा कान्तिपूर्ण बन जाता है।
तुलसी रक्त विकार का सबसे बड़ा शत्रु है। रक्त में किसी भी कारण से विकार उत्पन्न हो गए हों, धोखे या जानबूझकर खा लेने पर विष रक्त में घुलमिल गया हो, तुलसी के नियमित प्रयोग से वह विष रक्त से निकल जाता है।
तुलसी के पौधे आंखों की ज्योति और मन को शान्ति प्रदान करते हैं। वातावरण में सात्विकता की सृष्टि करते हैं। तुलसी हृदय को सात्विक बनाती है। मन, वचन और कर्म से पवित्र रहने की प्रेरणा के लिए तुलसी प्रयोग की जाती है।
जीवन की सफलता मन की एकाग्रता पर बहुत कुछ निर्भर करती है। यदि मन एकाग्र न हो तो मनुष्य न तो भजन, पूजन, आराधना और चिन्तन-मनन कर सकता है न ही अध्ययन कर सकता है।
* भारतीय चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) का सबसे प्राचीन और मान्य ग्रंथ चरक संहिता में तुलसी के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है-

हिक्काल विषश्वास पार्श्व शूल विनाशिनः।
पितकृतात्कफवातघ्र सुरसः पूर्ति गंधहा।।

अर्थात् तुलसी हिचकी, खांसी, विष विकार, पसली के दाह को मिटाने वाली होती है। इससे पित्त की वृद्धि और दूषित कफ तथा वायु का शमन होता है। भाव प्रकाश में तुलसी को रोगनाशक, हृदयोष्णा, दाहिपितकृत शक्तियों के सम्बन्ध में लिखा है।
तुलसी कटुका तिक्ता हृदयोष्णा दाहिपितकृत।
दीपना कष्टकृच्छ् स्त्रार्श्व रुककफवातेजित।।

अर्थात् तुलसी कटु, तिक्त, हृदय के लिए हितकर, त्वचा के रोगों में लाभदायक, पाचन शक्ति को बढ़ाने वाली मूत्रकृच्छ के कष्ट को मिटाने वाली होती है। यह कफ और वात सम्बन्धी विकारों को ठीक करती है।
धन्वंतरि निघुंट में कहा गया है-
तुलसी लघु उष्णाच्य रूक्ष कफ विनाशिनी।
क्रिमिमदोषं निहंत्यैषा रुचि वृद्वंहिदीपनी।।

तुलसी, हल्की, उष्ण रूक्ष, कफ दोषों और कृमि दोषों को मिटाने वाली अग्नि दीपक होती है।
* सामान्यतः तुलसी के दो ही भेद जाने जाते हैं जिन्हें रामा और श्यामा कहते हैं। रामा के पत्तों का रंग हलका होता है जिससे उसका नाम गौरी पड़ गया है। श्यामा अथवा कृष्णा तुलसी के पत्तों का रंग गहरा होता है और उसमें कफनाशक गुण अधिक होता है। इसलिए औषधि के रूप में प्रायः कृष्णा तुलसी का ही प्रयोग किया जाता है। इसकी गंध व रस में तीक्ष्णता होती है। तुलसी की अन्य कई प्रजातियाँ होती हैं। एक प्रजाति ‘वन तुलसी’ है जिसे ‘कठेरक’ भी कहते हैं। इसकी गंध घरेलू तुलसी की अपेक्षा कम होती है और इसमें विष का प्रभाव नष्ट करने की क्षमता होती है। रक्त दोष, नेत्रविकार, प्रसवकालीन रोगों की चिकित्सा में यह विशेष उपयोगी होती है। दूसरी जाति को ‘मरुवक’ कहते हैं। राजा मार्तण्ड ग्रन्थ में इसके लाभों की जानकारी देते हुए लिखा गया है कि हथियार से कट जाने या रगड़ लगकर घाव हो जाने पर इसका रस लाभकारी होता है। किसी विषैले जीव के डंक मार देने पर भी इसका रस लाभकारी होता है। तीसरी जाति बर्बरी या बुबई तुलसी की होती है, इसकी मंजरी की गंध अधिक तेज होती है। इसके बीज अत्यधिक वाजीकरण माने गए हैं।

* अनेक हकीमी नुस्खों में इनका प्रयोग होता है। वीर्य की वृद्धि करने व पतलापन दूर करने के लिए बर्बरी जाति की तुलसी के बीजों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा तुलसी की एक कृमिनाशक जाति भी होती है।
जैसा नाम वैसा गुण:--
तुलसी के कई नाम हैं जो इसके गुणों का इतिहास बताते हैं। वेदों, औषधि-विज्ञान के ग्रंथों और पुराणों में इसके कुछ प्रमुख नाम-गुण इस प्रकार हैं-
* कायस्था--क्योंकि यह काया को स्थिर रखती है।
* तीव्रा--क्योंकि यह तीव्रता से असर करती है।
* देव-दुन्दुभि--इसमें देव-गुणों का निवास होता है।
* दैत्यघि- -रोग-रूपी दैत्यों का संहार करती है।
* पावनी- -मन, वाणी और कर्म से पवित्र करती है।
* पूतपत्री- -इसके पत्र (पत्ते) पूत (पवित्र) कर देते हैं।
* सरला-- हर कोई आसानी से प्राप्त कर सकता है।
* सुभगा- -महिलाओं के यौनांग निर्मल-पुष्ट बनाती है।
* सुरसा-- यह अपने रस (लालारस) से ग्रन्थियों को सचेतन करती है।

शोभा, सुगन्धि और पवित्रता की प्रतीक है ये ---
तुलसी का पौधा जिस आंगन में लहलहाता है, उसकी शोभा और सुगन्धि में पवित्रता होती है। महिलाएं अपना चरित्र तुलसी-जैसा बनाने में ही अपना जीवन सार्थक मानती हैं।
इसीलिए विनम्र भाव से वे कहती हैं- ‘‘मैं तुलसी तेरे आंगन की।’’
तुलसी का माहात्म्य:--
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1 यह मन में बुरे विचार नहीं आने देती।
2 रक्त-विकार शान्त करती है।
3 त्वचा और छूत के रोग नहीं होने देती।
4 तुलसी की कंठी माला कंठ रोगों से बचाती है।
5 कामोत्तेजना नहीं होने देती, नपुंसक भी नहीं बनाती।
6 तुलसी-दल चबाने वाले के दांतों को कीड़ा नहीं लगता।
7 तुलसी के सेवक को क्रोध कम आता है।
8 तुलसी की माला, कंठी, गजरा और करधनी पहनना शरीर को निर्मल, रोगमुक्त और सात्विक बनाता है।
9 कार्तिक महीने में जो तुलसी का सेवन करता है, उसे साल भर तक डॉक्टर-वैद्य, हकीम के पास जाने की जरूरत नहीं पड़तीं।
10 तुलसी को अंधेरे में तोड़ने से शरीर में विकार आ सकते हैं क्योंकि अंधकार में इसकी विद्युत लहरें प्रखर हो जाती हैं।
11 तुलसी का सेवन करने के बाद दूध न पीएं। इससे चर्म-रोग हो सकते हैं।
12 कार्तिक महीने में यदि तुलसी-दल या तुलसी-रस ले चुकें हों तो उसके बाद पान न खाएं। ये दोनों गर्म हैं और कार्तिक में रक्त-संचार भी प्रबलता से होता है, इसलिए तुलसी के बाद पान खाने से परेशानी में पड़ सकते हैं।
13 तुलसी-दल के जल से स्नान करके कोढ़ नहीं होता।
14 सूर्य-चन्द्र ग्रहण के दौरान अन्न-सब्जी में तुलसी-दल इसलिए रखा जाता है कि सौरमण्डल की विनाशक गैसों से खाद्यान्न दूषित न हो।
15 जीरे के स्थान पर पुलाव आदि में तुलसी रस के छींटे देने से पौष्टिकता और महक में दस गुना वृद्धि हो जाती है।
16 तेजपात की जगह शाक-सब्जी आदि में तुलसी-दल डालने से मुखड़े पर आभा, आंखों में रोशनी और वाणी में तेजस्विता आती है।
17 तेल, साबुन, क्रीम और उबटन में तुलसी, दल और तुलसी रस का उपयोग, तन-बदन को निरोग, सुवासित, चैतन्य और कांतिमय बनाता है।
18 स्वभाव में सात्विकता लाने वाला केवल यही पौधा है।
19 तुलसी केवल शाखा-पत्तों का ढेर नहीं, आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक है।
20 तुलसी के आगे खड़े होकर पढ़ने, विचारने दीप जलाने और पौधे की परिक्रमा करने से दसों इन्द्रियों के विकार दूर होकर मानसिक चेतना मिलती है।

* बुखार का हमला मनुष्य पर कभी भी हो सकता है। मौसम बदलना शुरू हुआ नहीं कि बुखार ने आ घेरा। मच्छरों का आक्रमण भी मलेरिया जैसे जानलेवा बुखार को आमिन्त्रत कर देता है। ऐसे में आवश्यकता होती है उचित इलाज और सटीक जानकारी की, जो इस अध्याय में दी जा रही है।
सामान्य ज्वर:-
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* इसमें शरीर का तापमान 102-103 डिग्री हो जाता है। बेचैनी, शरीर में दर्द, प्यास का अधिक लगना, सिर-हाथ-पैरों में पीड़ा।
गर्मी या धूप में अधिक घूमना, थकावट, पेट में दर्द, सर्दी-गर्मी के प्रभाव से यह रोग हो सकता है।

उपचार:-
* दस तुलसी के पत्ते, बीस काली मिर्च, पांच लौंग, थोड़ी-सी सोंठ पीसकर ढाई सौ मिलीलीटर पानी में उबाल लें और शक्कर मिलाकर रोगी को पिला दें। अगर रोगी को ज्वर के कारण घबराहट महसूस होती हो तो तुलसी के रस में शक्कर डालकर शरबत बना लें और रोगी को पिला दें। शीघ्र आराम मिलता है।
मौसमी बुखार:-
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* बरसात या मौसम बदलने से रक्त संचार पर भला-बुरा असर पड़ता ही है और ज्वर के रूप में हमारे अंदर घंटी बजा देता है।
उपचार:-
* तुलसी की दस ग्राम जड़ लेकर पानी में उबालिए और पी जाइए दो-तीन दिन सुबह-शाम इस उपचार से रक्त-साफ स्वच्छ हो जाएगा।
पुराना बुखार:-
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* पुराना बुखार हो तो फेफड़े कमजोर होने लगते हैं, खांसी उठती रहती है, छाती में दर्द भी होता है।
उपचार:-
तुलसी रस में मिश्री घोलकर तीन-तीन घंटे बाद तीन दिन तक पिलाए। ज्वर भी उतर जाएगा और खांसी व दर्द भी जाते रहेंगे।
सर्दी बुखार:-
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उपचार:-
* पांच तुलसी-दल और पांच काली मिर्च पानी में पीसकर पिलाएं। तुलसी-मिर्च का वह चूर्ण ढाई सौ ग्राम पानी में उबालकर पिलाने से तुरन्त असर होता है। आधे-आधे घंटे बाद दो बडे़ चम्मच पिलाते रहने से निश्चित लाभ होता है।
खांसी बुखार:-
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उपचार:-
* दस ग्राम तुलसी-रस, बीस ग्राम शहद और पांच ग्राम अदरक का रस मिलाकर एक बड़ा चम्मच भर कर पिला दें। अद्भुत योग है, आजमाकर देख लें।
* ग्यारह पत्ते तुलसी और ग्यारह दाने काली मिर्च, दोनों को पानी में पीसकर छान लें। इधर आग पर मिट्टी का खाली सकोरा पकाकर लाल कर दें और उसमें तुलसी काली मिर्च का घोल छौंक दें। यह घोल गुनगुना रह जाने पर काला नमक मिलाकर पिला दें। खांसी बुखार समूल निकल भागेंगे।
* दो ग्राम तुलसी पत्ते, दो ग्राम अजवायन पीसकर पचास ग्राम पानी में घोलकर पिला दें। सुबह-शाम पिलाएं।

मलेरिया:-
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* इसके लक्षण हैं-ठंड लगकर बुखार आना, कंपकपी लगना, शरीर में दर्द, घबराहट, भोजन में अरुचि, आंखों में लाली, मुंह सूख जाना।
मौसमी बुखार, बदहजमी, पेट के विकार, कब्ज लू लगने आदि विकारों से ग्रस्त रोगियों का खून जब मच्छरों द्वारा फैलता है तो अच्छे-अच्छों को चारपाई पर पटक देता है। इसी को मलेरिया कहते हैं।

उपचार:-
* तुलसी का रस, मंजरी, तुलसी-माला, तुलसी के पौधे और तुलसी-बीज मलेरिया को काटकर फेंक देते हैं। तुलसी-रस दस ग्राम और पिसी काली मिर्च एक ग्राम मिलाकर रोगी को दिन में पांच-छह बार दो-दो घंटे बाद पिलाते रहें। परेशानी से बचना चाहें तो तुलसी के दो सौ ग्राम रस में सौ ग्राम काली मिर्च मिलाकर रख दें। सुबह-दोपहर-शाम एक-एक चम्मच पिलाएं।
पुराना मलेरिया:-
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उपचार:-
* सात तुलसी-दल और सात काली मिर्च दोनों दाढ़ के नीचे रखकर चूसते रहें दिन में तीन-चार बार यही प्रक्रिया दोहराने से महीनों पुराना मलेरिया भी भाग जाएगा।
लगातार बुखार रहना:-
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उपचार:-
* जलकुम्भी के फूल, काली मिर्च और तुलसी-दल, तीनों समान मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें और प्रातः-सायं पिलाएं।
* तुलसी-दल दस ग्राम लेकर पांच दाने काली मिर्च के साथ घोट लें और दिन में तीन बार सेवन कराएं। आन्तरिक सफाई होते ही बुखार का नामोनिशान भी नहीं रहेगा।
सन्निपात:-
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उपचार:-
* ज्वर इतने जोर का बढ़ जाए कि आदमी बड़बड़ाने लगे, ऐसी स्थिति में तुलसी, बेल (बिल्व) और पीपल के पत्तों का काढ़ा उबालें। जब पानी ढाई-तीन सौ ग्राम बच जाए तो शीशी में भर लें। दस-दस ग्राम दो-दो घंटे बाद रोगी का पिलाते रहें। निश्चित ही लाभ होगा।
लू लगना:-
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उपचार:-
* एक चम्मच तुलसी-रस में देशी शक्कर मिलाकर एक-एक घंटे बाद देते रहें। यह न समझें कि तुलसी-रस गर्म होने से हानि पहुंचाएगा। संजीवनी शक्ति जिस कन्दमूल में भी होगी, वह गर्म ही होगा। आराम आने के बाद भी धूप में निकलना हो तो तुलसी रस में नमक मिलाकर पीएं इससे लू लगने की आशंका ही नहीं रहेगी। प्यास भी कम लगेगी और चक्कर भी नहीं आएंगे।
टूटा-टूटा बदन:-
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* उपचार-तुलसी दल की चाय बनाकर पीएं आपके बदन में ताजगी की लहरें दौड़ने लगेंगी। घर में अगर चाय की पत्ती की जगह तुलसी दल सुखाकर रख लें तो कफ, सर्दी, जुकाम, थकान और बुखार या सिर-दर्द पास भी नहीं फटकेंगे।
श्वसन संस्थान के रोग:-
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* प्रदूषण के साथ ही दिनचर्या व खानपान का अव्यवस्थित होना मुख्य रूप से फेफड़ों से संबंधित रोगों के कारण है। बिना किसी पूर्व योजना के बने फ्लैट्स और मकानों में खुली हवा के न होने से भी फेफड़े रोगग्रस्त होते हैं।
जुकाम:-
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* इसके लक्षण हैं: नाक में खुश्की या श्लेष्मा अधिक बहना, खांसी के साथ कफ का निकलना, कान बंद हो जाना, छींक आना, आंखों से पानी आना, सिरदर्द। यह ऋतु के बदलने, अत्यधिक ठण्डे पेय पदार्थों के प्रयोग, पानी में भीगने, अत्यधिक मदिरापान, धूम्रपान तम्बाकू-गुटखे का सेवन करने से हो जाता है।
उपचार:-
* छोटी इलायची के कुल दो दाने और एक ग्राम तुलसी बौर (मंजरी) डालकर काढ़ा बनाएं और चाय की तरह दूध-चीनी डालकर पिला दें। दिन में चार-पांच बार भी पिला देंगे तो खुश्की नहीं करेगी, मगर सर्दी-जुकाम को जड़ से ही गायब कर देगी।
* तुलसी के पत्ते छः ग्राम सोंठ और छोटी इलायची छः-छः ग्राम, दालचीनी एक ग्राम पीसकर चाय की तरह उबाल लें। थोड़ी-सी शक्कर डाल लें। दिन में इस चाय का चार बार बनाकर पीएं। कुछ खाएं नहीं जुकाम कैसा भी हो ठीक हो जाएगा।
यदि जुकाम के साथ बुखार भी हो तो चाय के अलावा तुलसी के पत्तों का रस निकालकर उसमें शहद मिलाकर दिन में चार बार सेवन करें। जुकाम के कारण होने वाला ज्वर शान्त हो जाएगा।

* दालचीनीं, सोंठ और छोटी इलायची, कुल एक ग्राम, तुलसी-दल, छह ग्राम, इन्हें पीसकर चाय बनाएं और पीएं। दिन में ऐसी चाय चार बार भी ले सकते हैं। उस रात पेट भरकर खाना न खाएं। अगली सुबह आराम आ जाएगा।
शीघ्र पतन एवं वीर्य की कमी:-
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* तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से समस्या दूर होती है
नपुंसकता:--
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* तुलसी के बीज 5 ग्राम रोजाना रात को गर्म दूध के साथ लेने से नपुंसकता दूर होती है और यौन-शक्ति में बढोतरि होती है।
मासिक धर्म में अनियमियता:-
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* जिस दिन मासिक आए उस दिन से जब तक मासिक रहे उस दिन तक तुलसी के बीज 5-5 ग्राम सुबह और शाम पानी या दूध के साथ लेने से मासिक की समस्या ठीक होती है और जिन महिलाओ को गर्भधारण में समस्या है वो भी ठीक होती है
* तुलसी के पत्ते गर्म तासीर के होते है पर सब्जा शीतल होता है . इसे फालूदा में इस्तेमाल किया जाता है . इसे भिगाने से यह जेली की तरह फुल जाता है . इसे हम दूध या लस्सी के साथ थोड़ी देशी गुलाब की पंखुड़ियां दाल कर ले तो गर्मी में बहुत ठंडक देता है .इसके अलावा यह पाचन सम्बन्धी गड़बड़ी को भी दूर करता है .यह पित्त घटाता है ये त्रीदोषनाशक , क्षुधावर्धक है

सफ़ेद बालों की समस्या से परेशान है

सफ़ेद बालों की समस्या से परेशान है .....!

* हर किसी को बाल काले ही अच्‍छे लगते हैं लेकिन जब यह बिना बुढापे के ही सफेद होने लगें तो दिल घबरा सा जाता है। पर आपको जानना होगा कि बाल सफेद क्‍यों हो जाते हैं वो भी तब जब हमारी खेलने खाने की उम्र होती है।
* जब बालों में मिलेनिन पिगमेंटेशन की कमी हो जाती है तब बाल अपना काला रंग खो देते हैं और सफेद हो जाते हैं।

* हांलाकि बालों का सफेद होना आज कल आम सी बात हो गई है इसलिये इसके लिये घबराना बिल्‍कुल नहीं चाहिये। आज हम आपको कुछ ऐसे घरेलू उपाय बताएंगे जिसे आजमा कर आपके सफेद हो रहे बाल काले होने शुरु हो जाएगें....!
* बालों का असमय सफेद होना एक बड़ी समस्या बन चुकी है। इसके लिए कई लोग कलर का इस्तेमाल करते हैं। हालांकि कलर बालों को जड़ से कमजोर बना सकता है....!
* आंवले को न सिर्फ डाइट में शामिल करें बल्कि मेंहदी में मिलाकर इसके घोल से बालों की कंडिशनिंग करते रहें। चाहे तो आंवले को बारीक काट लें और गर्म नारियल तेल में मिलाकर सिर पर लगाएं।
* आमला हो या उसका पाउडर, दोनों ही बालों को काला करने में मददगार होते हैं। आमला का रस अगर बादाम के तेल में मिक्‍स कर के बालों में लगाया जाए तो बाल काले होगें।
* काली मिर्च के दानों को पानी में उबाल कर उस पानी को बाल धोने के बाद सिर में डालें। लंबे समय तक बालों में इस तरह करने से यह असर दिखाती है।
* सफेद हो चुके बालों को अगर आप ब्लैक टी या कॉफी के अर्क से धोएंगें तो आपके सफेद होते बाल दोबारा से काले होने लगेगें। ऐसा आप दो दिन में एक बार जरूर करें। काली चाय को बनाने के लिए पैन में पानी डालें, उसमें 2 चम्‍मच चाय की पत्‍ती डाल कर खौलाएं और जब यह पानी ठंडा हो जाए तो इसे छान कर बालों में लगाएं। इसे लगाने के बाद बालों में शैंपू न लगाएं वरना असर खत्‍म हो जाएगा।
* अपनी डाइट में कडी पत्‍ता शामिल करें। इसे आप चटनी के रूप में खा सकते हैं। इसको खाने से बालों का सफेद होना रुक जाएगा। दक्षिण भारतीय महिलाए सबसे जादा कड़ी पत्ते का प्रयोग करती है और उनके बाल असमय सफ़ेद नहीं होते है .
* बालों में एलोवेरा जेल लगाने से भी बालों का झडऩा और सफेद‬ होना बंद हो जाता है। इसके लिए आप एलोवेरा जेल में नींबू का रस बना कर पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को बालों में लगाएं।
* हिना और दही को बराबर मात्रा में मिलाकर पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को बालों में लगाइये। इस घरेलू उपचार को हफ्ते में एक बार लगाने से ही बाल‬ काले होने लगते हैं।
* नहाने से कुछ देर पहले अपने बालों में ‪‎प्याज‬ का पेस्ट लगायें। इससे आपके #सफेद बाल काले होने शुरू हो ही जाएंगे, बालों में चमक आएगी और साथ ही बालों का गिरना भी रुक जाएगा।
* भृंगराज और अश्वगंधा की जड़ें बालों के लिए वरदान मानी जाती हैं। इनका पेस्ट बना कर नारियल तेल में मिलाकर बालों की जड़ों में एक घंटे के लिए लगाएं। फिर बालों को गुनगुने पानी से अच्छी तरह से धो लें|
* प्रतिदिन देशी गाय का दूध बालों में लगाने से बाल कुदरती तौर पर काले होने लगते हैं। ऐसा हफ्ते में एक दिन करें | गाय का शुद्ध घी से सिर की मालिश करके भी बालों‬ के सफेद होने की समस्या दूर होगी |
* नहाने से पहले कढ़ी पत्ते को नहाने के पानी में छोड़ दें और एक घंटे के बाद उस पानी से सिर धो लें। या फिर आंवले की तरह कढ़ी पत्ते को भी बारीक काटकर और गर्म नारियल तेल में मिलाकर सिर पर लगाएं। नारियल तेल को कडी पत्‍ता और आमला के साथ गरम करें। इस तेल को लगातार लगाने से बाल मजबूत होगें और उसका पुराना रंग वापस आ जाएगा।
* बालों को सफेद होने से रोकने के लिये बालों और सिर की त्‍वचा पर अम्‍लान का रस लगाएं। इससे बाल ज्‍यादा उगते हैं और वह शाइनी और कोमल होते हैं।

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