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रविवार, 10 मई 2026

आने वाले 30 वर्षों में दुनिया से जेलें समाप्त हो जाएँगी।”

*दीवार के उस पार*
   (लघु ~ कथा)
*हॉल खचाखच भरा हुआ था*।
देश–विदेश से आए युवा उद्यमी, शिक्षक, प्रबंधक और विद्यार्थी अपनी नोटबुक लिए बैठे थे।
मंच पर प्रसिद्ध लेखक और मोटिवेशनल वक्ता *David J. Schwartz* खड़े थे।

विषय था —
*रचनात्मक तरीके से कैसे सोचें*?”

कुछ देर तक वे सामान्य बातें करते रहे।
फिर अचानक उन्होंने श्रोताओं की ओर देखते हुए कहा —
“आने वाले 30 वर्षों में दुनिया से जेलें समाप्त हो जाएँगी।”
पूरा हॉल जैसे ठहर गया।
लोगों को लगा शायद उन्होंने गलत सुना है।
एक साथ कई आवाज़ें उठीं —
“सर… ज़रा फिर से कहिए?”
डेविड मुस्कुराए और बोले —
“मैंने कहा…
*एक दिन दुनिया से जेलें समाप्त हो जाएँगी*।”
अब हॉल में हलचल बढ़ गई।
किसी ने धीमे स्वर में कहा —
“यह असंभव है…”
दूसरा बोला —
“जब तक इंसान हैं, अपराध रहेंगे…”
तीसरा हँसते हुए बोला —
“फिर तो दुनिया में अराजकता फैल जाएगी…”
डेविड सब सुनते रहे।
फिर उन्होंने मंच से नीचे उतरते हुए कहा —
“ठीक है…
अब कल्पना कीजिए कि सरकार ने सचमुच यह निर्णय ले लिया है कि जेलें समाप्त करनी हैं।”
“अब आप बताइए —
ऐसी स्थिति में क्या किया जा सकता है?”

*कुछ क्षणों तक सन्नाटा रहा*।
*फिर पीछे बैठे एक युवक ने हाथ उठाया* —
“गरीबी कम करनी होगी…
क्योंकि अपराध की जड़ अक्सर अभाव होता है।”
दूसरा बोला —
“युवाओं के लिए कौशल और रोजगार केंद्र खोलने होंगे।”
तीसरा बोला —
“मानसिक स्वास्थ्य और हिंसक प्रवृत्तियों पर शोध बढ़ाना होगा।”
एक महिला ने कहा —
“पुलिस व्यवस्था को अधिक संवेदनशील और प्रशिक्षित बनाना होगा।”
अब जैसे पूरा हॉल बदल चुका था।
जो लोग कुछ देर पहले इस विचार पर हँस रहे थे,
वे अब तेजी से समाधान गिना रहे थे।
कोई तकनीक की बात कर रहा था…
कोई शिक्षा सुधार की…
कोई पारिवारिक संस्कारों की…
कुछ ही देर में बोर्ड पर 78 सुझाव लिखे जा चुके थे।
डेविड ने मुस्कुराकर सबकी ओर देखा।
फिर शांत स्वर में बोले —

“यही इस प्रयोग का उद्देश्य था।”
“जब आप मान लेते हैं कि कोई काम असंभव है…
तो आपका दिमाग़ उसके खिलाफ तर्क ढूँढ़ने लगता है।”
“लेकिन जैसे ही आप विश्वास करते हैं कि समाधान संभव है…
वही दिमाग़ रास्ते खोजने लगता है।”
पूरा हॉल शांत था।
उन्होंने आगे कहा —
*दिमाग़ को उपजाऊ ज़मीन बनाइए*।
*उसके सामने समस्या रखिए*…
और फिर उस पर विश्वास कीजिए।”
*हर समस्या अपने साथ समाधान का बीज लेकर आती है*।”
शायद यही कारण है कि दुनिया बदलती रहती है।

कभी इलेक्ट्रिक कारें मज़ाक लगती थीं…फिर Tesla ने उन्हें क्रांति बना दिया।
कभी लोग सोच भी नहीं सकते थे कि कोई अनजान व्यक्ति अपने घर में यात्रियों को ठहराएगा…
फिर Airbnb ने दुनिया की सोच बदल दी।
कभी टैक्सी केवल शहरों तक सीमित थी…
फिर Uber ने यात्रा की परिभाषा बदल दी।
ये चमत्कार आसमान से नहीं उतरे थे।
ये केवल उन लोगों की देन थे,
जिन्होंने वहाँ भी रास्ता खोजा…
जहाँ बाकी लोग दीवार देख रहे थे।

याद रखिए —
कोई भी बीज बर्फ पर नहीं उगता।
यदि आप अपने दिमाग़ पर परंपराओं, डर और असफलताओं की बर्फ जमने देंगे,
तो नए विचार जन्म ही नहीं ले पाएँगे।

औसत लोग अक्सर प्रगति से डरते हैं।
क्योंकि नया विचार पहले असुविधा पैदा करता है…
फिर सवाल…
और अंत में बदलाव।

लेकिन सच यह है —
एक अच्छा काम कई तरीकों से किया जा सकता है।
जितने इंसान… उतने रास्ते।
और अंत में डेविड ने जो कहा,
वह शायद उस पूरी कार्यशाला का सबसे बड़ा सत्य था —

*दुनिया को बदलने वाले लोग सबसे बुद्धिमान नहीं होते*…”
*वे केवल इतने अलग होते हैं कि*
*जहाँ बाकी लोग दीवार देखते हैं*…
*वहाँ वे दरवाज़ा खोजने लगते हैं*।”
क्योंकि वास्तव में —
हर असंभवता के पीछे,
एक अनखोजा रास्ता छुपा होता है।


*रामानंद काबरा*
 9414070142

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