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रविवार, 29 जून 2025

अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था

यह कोई मज़ाक नहीं है...🙏
पढ़ें और यदि अच्छा लगे तो दूसरों को भी पढ़ने का अवसर दें!!

!!!!! अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था !!!!!
दो-तीन दिन बुखार रहा, दवा न लेते तो भी ठीक हो जाते, शरीर अपने आप कुछ दिनों में ठीक हो जाता। लेकिन आप डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर साहब ने शुरुआत में ही ढेर सारे टेस्ट लिख दिए। टेस्ट रिपोर्ट में बुखार का कोई खास कारण तो नहीं मिला, लेकिन कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर थोड़े से बढ़े हुए पाए गए, जो सामान्य इंसानों में थोड़ा बहुत ऊपर-नीचे होना आम बात है।

बुखार तो चला गया, लेकिन अब आप बुखार के मरीज नहीं रहे। डॉक्टर साहब ने बताया — आपका कोलेस्ट्रॉल ज़्यादा है और शुगर थोड़ी अधिक है, यानी आप ‘प्री-डायबेटिक’ हैं। अब आपको कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए दवाएं लेनी होंगी। साथ ही खाने-पीने में बहुत सारी पाबंदियाँ लगा दी गईं। आपने खाने में पाबंदियाँ भले न मानी हों, लेकिन दवाएं लेना नहीं भूले।

ऐसे तीन महीने बीते। फिर टेस्ट कराया गया। कोलेस्ट्रॉल कुछ कम हुआ, लेकिन अब ब्लड प्रेशर थोड़ा बढ़ा हुआ पाया गया। उसे कंट्रोल करने के लिए एक और दवा दी गई। अब आपकी दवाओं की संख्या हो गई 3।

इतनी बात सुनने के बाद आपकी चिंता बढ़ने लगी। "अब क्या होगा?" — इसी चिंता में आपकी नींद उड़ने लगी। डॉक्टर ने नींद की दवा भी शुरू कर दी। अब दवाओं की संख्या 4 हो गई।

इतनी सारी दवाएं खाते ही अब आपको पेट में जलन शुरू हो गई। डॉक्टर बोले — खाने से पहले एक गैस की टैबलेट खाली पेट लेना होगा। दवाओं की संख्या बढ़कर 5 हो गई।

ऐसे ही छह महीने बीत गए। एक दिन सीने में दर्द हुआ तो आप भागे अस्पताल की इमरजेंसी में। डॉक्टर ने सब चेकअप करके कहा — "समय पर आ गए, नहीं तो बहुत बड़ा हादसा हो सकता था।" फिर कुछ विशेष जाँचों की सलाह दी गई।

कई महंगे टेस्ट के बाद डॉक्टर बोले — "पुरानी दवाएं तो चलती रहेंगी, अब हार्ट की दो दवाएं और जुड़ेंगी। साथ ही आपको एक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट (हार्मोन विशेषज्ञ) से भी मिलना होगा।" अब आपकी दवाओं की संख्या हो गई 7।

हार्ट स्पेशलिस्ट के कहने पर आप एंडोक्रिनोलॉजिस्ट के पास गए। उन्होंने शुगर के लिए एक और दवा और थायरॉइड थोड़ा बढ़ा होने पर एक और दवा जोड़ दी।

अब आपकी कुल दवाएं हो गईं 9।

अब आप अपने मन में यह मानने लगे कि आप बहुत बीमार हैं — हार्ट के मरीज, शुगर के मरीज, अनिद्रा के मरीज, गैस के मरीज, थायरॉइड के मरीज, किडनी के मरीज, आदि-आदि।

आपको यह नहीं बताया गया कि आप अपनी इच्छाशक्ति, आत्मबल और जीवनशैली सुधार कर स्वस्थ रह सकते हैं। बल्कि आपको बार-बार यह बताया गया कि आप एक "गंभीर रोगी" हैं, निर्बल हैं, असमर्थ हैं, एक टूटे हुए व्यक्ति हैं!

ऐसे ही और छह महीने बीतने के बाद दवाओं के साइड इफेक्ट से आपको पेशाब की कुछ समस्याएं हुईं। फिर रूटीन चेकअप में पता चला कि आपकी किडनी में भी कुछ समस्या है। डॉक्टर ने फिर कई टेस्ट करवाए।

रिपोर्ट देखकर डॉक्टर बोले — "क्रिएटिनिन थोड़ा बढ़ा हुआ है, लेकिन दवाएं नियमित चलती रहीं तो चिंता की बात नहीं।" और दो दवाएं और जोड़ दी गईं।

अब आपकी कुल दवाओं की संख्या हो गई 11।

अब आप भोजन से ज्यादा दवा खा रहे हैं, और दवाओं के अनेक दुष्प्रभावों से आप धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ रहे हैं!!

जबकि जिस बुखार की वजह से आप सबसे पहले डॉक्टर के पास गए थे, अगर डॉक्टर साहब कहते:

"चिंता की कोई बात नहीं। यह मामूली बुखार है, कोई दवा लेने की ज़रूरत नहीं। कुछ दिन आराम कीजिए, भरपूर पानी पिएं, ताजे फल-सब्जियाँ खाएँ, सुबह टहलने जाइए — बस, इतना ही काफी है। दवा की ज़रूरत नहीं।"

तो फिर डॉक्टर साहब और दवा कंपनियों का पेट कैसे भरता❓

और सबसे बड़ा सवाल: किस आधार पर डॉक्टर मरीजों को कोलेस्ट्रॉल, हाई बीपी, डायबिटीज, हार्ट डिज़ीज और किडनी डिज़ीज़ घोषित कर रहे हैं❓❓❓

ये मानदंड कौन तय करता है❓

आइए, थोड़ा विस्तार से जानें —
★ 1979 में जब ब्लड शुगर 200 mg/dl से ऊपर होता था, तभी व्यक्ति को डायबिटिक माना जाता था। उस समय दुनिया की सिर्फ 3.5% आबादी को टाइप-2 डायबिटिक माना जाता था।

★ 1997 में इंसुलिन बनाने वाली कंपनियों के दबाव में यह स्तर घटाकर 126 mg/dl कर दिया गया। इससे डायबिटिक मरीजों की संख्या 3.5% से बढ़कर 8% हो गई — यानी बिना किसी लक्षण के 4.5% और लोग रोगी बना दिए गए! 1999 में WHO ने भी इस पैमाने को मान लिया।

इंसुलिन कंपनियों ने जबरदस्त मुनाफा कमाया और नई फैक्ट्रियाँ खोलीं।

★ 2003 में ADA (American Diabetes Association) ने फास्टिंग ब्लड शुगर 100 mg/dl को डायबिटीज का मानक घोषित किया। इसके चलते बिना कारण 27% लोग डायबेटिक रोगी घोषित कर दिए गए।

★ अब ADA के अनुसार पोस्ट प्रांडियल (भोजन के बाद) 140 mg/dl को डायबिटीज का संकेत माना जाता है। इससे दुनिया की लगभग 50% आबादी डायबेटिक घोषित हो चुकी है — जबकि इनमें से कई वास्तविक मरीज नहीं हैं।

भारतीय दवा कंपनियाँ इसे और नीचे, 5.5% HbA1c पर लाने की कोशिश कर रही हैं। ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मरीज बन जाएँ और दवा बिके।

जबकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि HbA1c 11% तक डायबिटीज नहीं मानी जानी चाहिए।

एक और उदाहरण:
2012 में अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रसिद्ध दवा कंपनी पर $3 बिलियन का जुर्माना लगाया। आरोप था कि उनकी डायबिटीज की दवा से 2007–2012 के बीच हार्ट अटैक के कारण मरीजों की मृत्यु दर 43% बढ़ गई थी।

कंपनी को यह पहले से पता था, लेकिन उन्होंने मुनाफे के लिए जानबूझकर इसे छुपाया। इसी अवधि में उन्होंने 300 बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया।

यही है आज की 'अति-आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था'!!
सोचिए... और सोचना शुरू कीजिए...

#निश्चित रूप से संग्रहित
🧏‍♂️ 🧏 🧏‍♀️
सभी स्वस्थ रहें, खुश रहें — आज की यही कामना है।

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कभी सोचा है...गाँव को छोड़े कितने बरस बीत गए?

"आओ! गाँव चलें..." — एक नई उम्मीद, एक नई पहल

कभी सोचा है...
गाँव को छोड़े कितने बरस बीत गए?

किसी को सौ साल, किसी को अस्सी, साठ, चालीस या बीस साल...
वक़्त की रफ्तार तेज़ रही, लेकिन यादें वहीं ठहरी रहीं।
मन के कोने में अब भी गाँव की वही तस्वीर बसी है।

यादों की गलियों से...

कई लोग हैं जो आज भी गाँव का नाम बड़े गर्व से लेते हैं, पर बरसों से वहाँ गए नहीं।
कुछ कभी-कभार लौटते हैं, तो कुछ अब भी उस मिट्टी की सौरभ को महसूस करते हैं।
वो गलियाँ आज भी बुलाती हैं...
पीपल की छाँव, तालाब का किनारा, मंदिर की घंटियाँ,
रविवार की गोठ, ताश की महफिल, हँसी-ठिठोली भरे लम्हे —
सब जैसे कहीं मन में ठहरे हैं।

यादें आती हैं...
बड़ों के हाथ की स्नेहभरी रोटियाँ,
भाभियों के हाथ की वो चाय की प्याली —
जिसमें स्वाद से ज्यादा अपनापन होता था।

वो गाँव... जहाँ दिल खुले थे

हाँ, वहाँ बड़ी गाड़ियाँ नहीं थीं, न ऊँची कोठियाँ थीं,
सड़कों की चौड़ाई सीमित थी...
पर दिल बड़े थे।
बिना बनावट, बिना दिखावे के —
सिर्फ प्रेम से भरे हुए।

अब वक़्त है लौटने का... कुछ लौटाने का

आज हम में से कई लोग उस गाँव से निकलकर ऊँचाइयाँ पा चुके हैं।
नाम कमाया है, पहचान बनाई है।
तो क्या अब हमारा फर्ज़ नहीं बनता
कि उस माटी को कुछ लौटाएँ?

हर कोई अपनी श्रद्धा, शक्ति और भावना के अनुसार
गाँव के लिए कोई एक छोटा सा काम चुन सकता है —

स्कूल या पुस्तकालय बनवाना

जल-संरक्षण की पहल

वृद्धाश्रम या गौशाला

छात्राओं की शिक्षा

खेल प्रांगण, स्वास्थ्य सेवा या डिजिटल सुविधा


कुछ भी — बस मन से चुना जाए।
तो फिर, क्या नहीं हो सकता?

बस कोई दस आगे आएं... हाथ पकड़ें, दीप जलाएँ

आओ साथ चलें —
कोई सिर्फ 10 आगे आ जाएं,
हाथ पकड़ कर चलिए —
एक दीप गाँव की ओर जलाएँ।

क्योंकि जिस मिट्टी ने हमें खड़ा किया,
अब समय है उसे संवारने का।
वो ऋण चुकाने का, जो हमारे गाँव ने चुपचाप हमें दिया।


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गाँववालों से एक निवेदन...

आज आपके गाँव के माटी-पुत्रों ने दूर जाकर आपके नाम को रोशन किया है।
पर उनके हृदय में आज भी वही आत्मीयता, वही सम्मान, वही प्रेम बाकी है।

क्या आप उनके लौटने पर उन्हें अपनापन देंगे?
क्या उन्हें वो मान-सम्मान मिलेगा
जो उन्हें फिर से गाँव से आत्मिक रूप से जोड़ सके?

आपका प्रेम, आपका स्वागत —
उन्हें गाँव की ओर खींच लाएगा।
और तब हम सब मिलकर गाँव और मानवता के लिए
कुछ बड़ा, कुछ सुंदर रच सकेंगे।


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"आओ! गाँव चलें..."
एक नई उम्मीद, एक नई पहल के साथ...

पाकिस्तान तो पर्दे का पर्दा है... असली पटकथा वैश्विक शक्ति संतुलन की है, और निर्देशक बने हैं – नरेंद्र दामोदरदास मोदी

*_पाकिस्तान तो पर्दे का पर्दा है... असली पटकथा वैश्विक शक्ति संतुलन की है, और निर्देशक बने हैं – नरेंद्र दामोदरदास मोदी।*

*_पिछले 10 वर्षों में मोदी ने एक-एक करके वैश्विक ताकतों की वो लताड़ लगाई है कि आज अमेरिका, चीन और यूरोप की लॉबीयों के पसीने छूट रहे हैं*

*_Pharma लॉबी? – Covid वैक्सीन के समय भारत ने उन्हें दिखा दिया कि सेवा और समर्पण की ताकत क्या होती है। पूरी दुनिया को मुफ़्त वैक्सीन देकर अरबों डॉलर की दवा मंडी को झटका दे दिया।*

*_पेट्रो लॉबी? – रूस से सस्ते तेल का सौदा कर ऐसा पटका कि OPEC देशों को मुनाफ़े के पेट में मरोड़ शुरू हो गई है।*

*_हथियार लॉबी? – सिर्फ़ 3 घंटे की सैन्य कार्रवाई में अमेरिका-नाटो-चीन को बता दिया कि अब Made in Bharat की गरज सुनो लो, बाज़ार का रास्ता यहीं से जाता है।*

*_मोदी का मिशन शुरू से स्पष्ट था: भारत को विश्व का निर्णायक बनाना – न तो किसी के आगे झुकना, न किसी को झुकने देना।*

*_भारत के वैज्ञानिक, इनोवेटर्स, R&D संस्थान आज आत्मनिर्भर भारत को सिर्फ़ नारा नहीं, ज़मीनी हकीकत बना चुके हैं। टॉय से लेकर टैंक तक, भारत अब बाज़ार नहीं—ब्रांड बन चुका है।*

*_तेल की कीमतें? – गल्फ अब खुद कीमत तय नहीं कर सकता, भारत की "ना" सब पर भारी है।*

*_दवाओं का बाज़ार? – भारत विश्व का फार्मेसी हब बन चुका है, अमेरिका भी पीछे पीछे चल रहा है।*

*_हथियार? – भारतीय सेना के दम और स्वदेशी हथियारों की धमक अब NATO के कॉन्फ्रेंस रूम तक सुनाई दे रही है।*

*_तुर्की के ड्रोन धंधे की चूलें हिल चुकी हैं।*

*_ट्रम्प मोदी के दरवाज़े पर शांति प्रस्ताव लेकर खड़ा है।*

*चीन अंदर ही अंदर खौल रहा है, पर बोल नहीं पा रहा।*

*_और कुछ मूर्ख हैं इस देश में जो अभी भी मोदी को "बनिया", "कायर",* *_"नपुंसक" कहने का दुस्साहस करते हैं...*
*तुम्हें शर्म आनी चाहिए!*
*_जिस व्यक्ति ने बिना युद्ध के, सिर्फ़ रणनीति और नेतृत्व से अमेरिकी-चीन के व्यापार युद्ध को ताश के पत्तों की तरह उड़ाया हो – वो कोई सामान्य नेता नहीं, रणनीतिक योद्धा है।*

*_यह तो सिर्फ़ ट्रेलर था, पार्टी तो अब शुरू हुई है।*

1976 तक भारत अघोषित हिन्दुराष्ट्र था ।। फिर भारत "सेकुलर" कैसे बना ?

#1976 तक भारत अघोषित हिन्दुराष्ट्र था ।। फिर भारत "सेकुलर" कैसे बना ...?? 🤔 🤔 🤔

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12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के द्वारा इंदिरा गांधी पर सरकारी मशीनरी का गलत उपयोग करने पर अगले 6 साल के लिए चुनाव लड़ने और किसी भी पद को संभालने पर रोक लगा दी गई थी 
उसके बाद 25 जून को अपनी प्रधानमंत्री कुर्सी छोड़ने की बजाय पूरे भारत में इमरजेंसी लगा दी गई मार्च 1977 तक ताकि ना तो कोई कुर्सी से हटा सके ना अगले साल चुनाव हो सके 

इतिहास में इसे भारत का काला दिन बोला गया क्योंकि न्यायालय के फैसले के खिलाफ जाते हुए अपनी शक्तियों का गलत उपयोग किया गया और देश पर अपनी कुर्सी बचाने के लिए आपातकाल लगा दिया गया और यह आपातकाल पूरे 21 महीनों तक पूरे भारत पर लागू रहा जिस दौरान मूल संविधान जिसको बाबा साहब भीमराव अंबेडकर जी ने रखा था उस संविधान के साथ छेड़छाड़ की गई

उसके बाद जिसने भी आंदोलन किए उसको उठाकर जेल में डाल दिया
लोगों की नसबंदी की गई वह भी जबरदस्ती करीब 60 लाख लोगों की जबरदस्ती नसबंदी की गई जिसमें सैकड़ों लोगों की जान भी गई

इसे कहते हैं दादागिरी और संविधान का अपमान

यह लोग आज भारत को संविधान की बात समझाते हैं सहिष्णुता की बात समझाते हैं शांति की बात समझाते हैं 

आपातकाल के दौरान मूल संविधान में जोड़े गए शब्द जो आज भी विवादित हैं
भारतीय संविधान में बयालीसवाँ संशोधन, जो सन 1976 में हुआ, उसमे संसद को सर्वोच्चता प्रदान की गई और मौलिक अधिकारों पर निर्देशक सिद्धांतों को प्रधानता दी गई। इसमें 10 मौलिक कर्तव्यों को भी जोड़ा गया। नये शब्द – (सोशलिस्ट),(सेक्युलर) को संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया।
भारत में पंथनिरपेक्षता इससे पहले नहीं थी, ऐसा नहीं, किन्तु संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द के रूप में इसका उल्लेख नहीं था। आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि संविधान सभा ने लंबी बहस के वावजूद भी मूल संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द को जगह नहीं दी थी। क्या उन्हें भय था कि यह शब्द भविष्य में दुबारा भारत के विभाजन का कारण बन सकता है? बिलकुल सही बात है। देश के कुछ महान नेताओं के विचार पढ़ें तो सत्यता का अहसास हो जाएगा। यदि आप मोहनदास करम चन्द्र गांधी (गांधी जी की जीवनी.. धनंजय कौर), सरदार वल्लभ भाई पटेल (संविधान सभा में दिए गए उनके भाषण) और बाबा साहब भीम राव अंबेडकर (डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय, खण्ड १५१) के इस्लाम पर व्यक्त किये गए विचार पढ़ लें तो आपको पता चल जाएगा कि ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्द को संविधान में वो क्यों रखने के पक्ष में नहीं थे
भारत और कई विदेशी इतिहासकारों ने इसे भारतीय संविधान का काला दिन बताया

इसके बाद जब आपातकाल हटाया गया और चुनाव हुए तो उसमें कांग्रेस बुरी तरीके से पराजित हुई और भारत के लोकतंत्र ने उसे जमीन पर ला गिराया

इसके लिए 2 जनवरी 2011 को न्यायालय ने इस गलती को स्वीकार किया और माना कि एक प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी बचाने के लिये भारत पर आपातकाल लगाया गया और उस दौरान संविधान और लोकतंत्र की हत्या हुई जिसके लिए उच्च न्यायालय ने लोकतंत्र से माफी मांगी

अब आज कॉन्ग्रेस संविधान और लोकतंत्र की दुहाई जो दे रही है उसे अपना असली चेहरा देखना चाहिए उसने संविधान को और लोकतंत्र को माना ही कब है उसे जब जब मौका मिला है उसने संविधान के साथ छेड़छाड़ की है और डेमोक्रेसी की हत्या की है......

भारत स्वाभाविक हिन्दुराष्ट्र है , अब इसे घोषित हिन्दुराष्ट्र बनाने के लिए हमें संघर्ष के लिए खड़ा होना चाहिये।
ये राष्ट्र हमारा है , इसे लूटने नहीं देगें।

कांग्रेस ने हिंदुओं को न भरने वाले घाव दिये हैं ।
🙏🏼 🙏

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