गुजरात की पावन धरती पर, डाकोर और द्वारका के बीच की दूरी सैकड़ों किलोमीटर की है, लेकिन एक भक्त की पुकार ने इस दूरी को मिटा दिया। यह कहानी है विजयसिंह बोडाणा की, जिनके प्रेम ने द्वारकाधीश को अपना सिंहासन छोड़ने पर विवश कर दिया।
विजयसिंह बोडाणा, एक क्षत्रिय राजपूत, जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था—द्वारकाधीश के दर्शन। जवानी से लेकर बुढ़ापे तक, हर छह महीने में, वे अपने हाथों में तुलसी का पौधा लेकर डाकोर से द्वारका तक की लंबी यात्रा पैदल तय करते थे।
वर्षों बीतते गए, मौसम बदलते रहे, लेकिन बोडाणा का नियम नहीं टूटा। 72 वर्ष की आयु तक वे निरंतर चलते रहे। लेकिन अब शरीर थकने लगा था। हड्डियाँ जवाब दे रही थीं और पैरों के छाले अब नासूर बन चुके थे।
अपनी अंतिम यात्रा के दौरान, जब वे द्वारका पहुँचे, तो उनकी आँखों में आंसू थे। उन्होंने गर्भ गृह में खड़े होकर कांपती आवाज़ में कहा:
"हे प्रभु! मेरा मन तो आपके चरणों में ही रहना चाहता है, लेकिन अब यह शरीर साथ नहीं देता। शायद यह मेरे जीवन का अंतिम दर्शन हो। मुझे क्षमा करना, अब मैं और नहीं आ सकूँगा।"
भक्त की यह पीड़ा भगवान से देखी नहीं गई। उसी रात, द्वारकाधीश बोडाणा के सपने में आए। भगवान की आवाज़ में एक सखा जैसा अपनापन था--
"बोडाणा! तुझे उदास होने की आवश्यकता नहीं है। यदि तू मेरे पास नहीं आ सकता, तो क्या हुआ? मैं स्वयं तेरे पास आऊँगा। अगली बार जब तू आए, तो पैदल मत आना, एक बैलगाड़ी लेकर आना। मैं तेरे साथ डाकोर चलूँगा।"
बोडाणा की खुशी का ठिकाना न रहा। वे वापस डाकोर गए और जैसे-तैसे एक टूटी-फूटी बैलगाड़ी का इंतजाम किया।
जब बोडाणा अपनी जर्जर बैलगाड़ी लेकर द्वारका पहुँचे, तो वहाँ के पुजारियों (गुगलियों) ने उनका मज़ाक उड़ाया— "अरे बोडाणा! इस टूटी गाड़ी में किसे ले जाओगे?" बोडाणा केवल मुस्कुरा दिए।
रात के गहरे सन्नाटे में, जब पूरी द्वारका नगरी सो रही थी, त्रिभुवन के स्वामी भगवान श्री रणछोड़राय चुपके से मंदिर से निकले और बोडाणा की बैलगाड़ी में विराजमान हो गए।
कहते हैं कि उस रात एक चमत्कार हुआ। जिस रास्ते को तय करने में बैलों को हफ़्तों लगते थे, वह सैकड़ों किलोमीटर का रास्ता भगवान की कृपा से पलक झपकते ही एक ही रात में तय हो गया। सुबह की पहली किरण के साथ, द्वारकाधीश डाकोर में थे।
सुबह जब द्वारका के मंदिर के पट खुले, तो वहाँ हाहाकार मच गया—मूर्ति गायब थी! पुजारियों को तुरंत समझ आ गया कि यह काम बोडाणा का ही है। क्रोध और लोभ में अंधे होकर, वे घोड़ों पर सवार होकर डाकोर की ओर दौड़े।
डाकोर पहुँचकर उन्होंने बोडाणा को घेर लिया। भगवान को वहाँ के गोमती तालाब में छिपा दिया गया था, लेकिन पुजारियों ने उन्हें ढूँढ निकाला। वे मूर्ति वापस ले जाने पर अड़ गए। बोडाणा गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन पुजारियों की नज़र केवल चढ़ावे और धन पर थी।
अंत में, पुजारियों ने एक असंभव शर्त रखी:
"अगर तुम मूर्ति के वजन के बराबर सोना हमें दे दो, तो हम भगवान को यहीं छोड़ देंगे, वरना हम उन्हें ले जा रहे हैं।"
बोडाणा अत्यंत निर्धन थे। सोने के नाम पर उनके पास कुछ न था। पुजारियों को लगा कि वे जीत गए हैं। लेकिन बोडाणा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पत्नी गंगाबाई की ओर देखा। पत्नी ने बिना एक पल गँवाए, अपनी नाक की छोटी सी स्वर्ण नथ (नाक की बाली) उतारकर बोडाणा के हाथ में रख दी।
गाँव के बीचों-बीच तराजू सजाया गया।
एक पलड़े में ब्रह्मांड के स्वामी, भारी-भरकम पत्थर की मूर्ति।
दूसरे पलड़े में भक्त के प्रेम से भीगी हुई, रत्ती भर की सोने की नथ।
पुजारी हँस रहे थे, लेकिन तभी वह हुआ जो इतिहास बन गया।
जैसे ही नथ तराजू पर रखी गई, मूर्ति वाला पलड़ा हवा में उठ गया और नथ वाला पलड़ा भारी हो गया! पुजारियों की आँखें फटी की फटी रह गईं।
भगवान ने उस दिन सिद्ध कर दिया कि वे सोने-चांदी से नहीं, केवल सच्चे भाव से खरीदे जा सकते हैं। भक्त का प्रेम इतना भारी था कि भगवान उसके वश में होकर, उस छोटी सी नथ के मोल "बिक" गए।
पुजारियों को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे खाली हाथ और ग्लानि के साथ द्वारका लौट गए (जहाँ बाद में नई मूर्ति स्थापित की गई),लेकिन डाकोर के भव्य मंदिर में आज भी वही मूल मूर्ति विराजमान है, जिसे बोडाणा अपनी बैलगाड़ी में लाए थे।
आज भी जब भक्त 'रणछोड़राय' के दर्शन करते हैं, तो उन्हें याद आता है कि ईश्वर धनवानों का नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम करने वालों का है।
जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻🙏🏻