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रविवार, 8 फ़रवरी 2026

यह रहा Kalmegh Q (Andrographis paniculata) का उपयोग, मात्रा और फायदे – हिंदी में 🌿👇

यह रहा Kalmegh Q (Andrographis paniculata) का उपयोग, मात्रा और फायदे – हिंदी में 🌿👇

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Kalmegh Q – उपयोग (Uses)

🟡 लिवर रोग (मुख्य दवा)

पीलिया (Jaundice)

फैटी लिवर

लिवर एन्ज़ाइम बढ़े हुए (SGOT / SGPT)

लिवर में सूजन (Hepatomegaly)

🤢 पाचन तंत्र

भूख न लगना

मतली, उल्टी

कड़वा स्वाद मुंह में

गैस, अपच

🔥 बुखार (विशेषकर वायरल)

वायरल फीवर

मलेरिया, डेंगू में सहायक

शरीर टूटना, कमजोरी

🛡️ इम्युनिटी बूस्टर

बार-बार संक्रमण

कमजोर प्रतिरोधक क्षमता

रिकवरी फेज में उपयोगी

🩸 त्वचा व रक्त शुद्धि

खून की गर्मी

फोड़े-फुंसी

एलर्जिक स्किन प्रॉब्लम

🧠 अन्य लाभ

सूजन कम करता है

एंटी-वायरल, एंटी-बैक्टीरियल गुण

शरीर को डिटॉक्स करता है

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Kalmegh Q – मात्रा (Dose)

💧 मदर टिंचर (Q)

10–20 बूंद

आधे कप पानी में

दिन में 2–3 बार

⏳ अवधि

तीव्र रोग: 7–10 दिन

पुराना लिवर रोग: 4–6 हफ्ते (डॉक्टर की सलाह से)

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कब सबसे ज्यादा असरदार? (Keynote)

👉 कड़वा स्वाद + लिवर खराब + भूख नहीं लगती
👉 बुखार के बाद कमजोरी
👉 पीलिया में आंखें पीली

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सावधानियां

⚠️ बहुत ज्यादा कमजोरी या लो BP में सावधानी
⚠️ गर्भवती महिलाएं बिना सलाह न लें
⚠️ अत्यधिक मात्रा से मतली बढ़ सकती है

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होम्योपैथिक दवा एड्रेनालिनम और इसकी विभिन्न पोटेंसी और इसके उपयोग

🌿🌿होम्योपैथिक दवा एड्रेनालिनम और इसकी विभिन्न पोटेंसी  और इसके उपयोग
                                              हम उस दवा की बात करेंगे जो शॉक, अस्थमा, लो ब्लड प्रेशर, हृदय की कमजोरी, एलर्जी रिएक्शन, हेमोरेज, हाय फीवर, यूटिकेरिया, ग्रेव्स और एडिसन डिजीज, तथा हार्मोनल इम्बैलेंस से होने वाली कमजोरी (adrenal insufficiency या chronic stress से थकान, वीकनेस) में सबसे तेज़ और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है। यह है एड्रेनालिनम (Adrenalinum). यह दवा सुप्रारेनल ग्रंथि के सेक्रेशन (एपिनेफ्रिन/एड्रेनालिन) से बनती है। होम्योपैथी में इसे “शॉक, अस्थमा, लो बीपी और एड्रेनल कमजोरी का सबसे अच्छा टॉनिक” कहा जाता है। जब मरीज कहे “डॉक्टर साहब, शॉक लग गया है, सांस फूल रही है, बीपी बहुत कम है, थकान बहुत है, हार्मोनल असंतुलन से कमजोरी महसूस हो रही है” – तो यह दवा 7-15 दिन में चमत्कार कर देती है।

🌿🌿🌿🌿Adrenalinum क्या है?  
Adrenalinum एक होम्योपैथिक सरकोड दवा है जो एड्रेनल ग्रंथि (suprarenal glands) के मेडुला से निकाले गए एपिनेफ्रिन से बनाई जाती है।  
मुख्य कंपाउंड: एड्रेनालिन – वासोकॉन्स्ट्रिक्शन (रक्त वाहिकाओं का संकुचन) करता है, ब्लड प्रेशर बढ़ाता है, सिम्पैथेटिक सिस्टम को स्टिमुलेट करता है, एड्रेनल फंक्शन को बैलेंस करता है।

 उपयोग और फायदे
एड्रेनालिनम मुख्य रूप से शॉक, रेस्पिरेटरी, कार्डियोवैस्कुलर, एलर्जी और हार्मोनल इम्बैलेंस में इस्तेमाल होती है।

1. शॉक / सर्कुलेटरी कोलैप्स – पेलर, लो बीपी, कोल्ड स्वेट, एनेस्थीसिया के दौरान शॉक  
2. अस्थमा / एक्यूट लंग कंजेशन – ब्रोंकियल अस्थमा, डिफिकल्ट ब्रीदिंग, थोरैसिक कंस्ट्रिक्शन  
3. लो ब्लड प्रेशर / हार्ट फेलियर – कमजोर पल्स, हार्ट फेलियर  
4. एंजाइना पेक्टोरिस / एरिटेरियोस्क्लेरोसिस – एंजाइना, क्रॉनिक एओर्टाइटिस  
5. हाय फीवर / एलर्जी – हाय फीवर, सीरम रैशेज, एक्यूट यूटिकेरिया  
6. हेमोरेज / ब्लीडिंग – कैपिलरी ब्लीडिंग रोकना  
7. हार्मोनल इम्बैलेंस से कमजोरी – एड्रेनल इंसफिशिएंसी (Addison’s disease), क्रॉनिक स्ट्रेस/बर्नआउट से थकान, वीकनेस, एंडोक्राइन डिसऑर्डर (Grave’s disease), एड्रेनल एग्जॉर्शन से जनरल डेबिलिटी  

 विभिन्न पोटेंसी जो विभिन्न बीमारियों में काम आती हैं
 2X-6X: एक्यूट शॉक, अस्थमा, लो बीपी, हार्मोनल कमजोरी – दिन में 2-4 बार (सबसे ज्यादा इस्तेमाल, बोएरिक के अनुसार)  
 30C : एलर्जी, हाय फीवर, एंजाइना – दिन में 2-3 बार  
 200C : क्रॉनिक अस्थमा, एड्रेनल कमजोरी, हार्मोनल इम्बैलेंस – हफ्ते में 1 डोज  
 1M : बहुत पुरानी कार्डियक या एंडोक्राइन समस्या – महीने में 1 डोज  

 सावधानियां
- अधिक डोज से कार्डियक या आर्टेरियल समस्या हो सकती है  
- सॉल्यूशन को एयर और लाइट से बचाएं  
- गर्भवती महिलाएँ डॉक्टर की सलाह से  
- 3 महीने कोर्स के बाद 15 दिन गैप जरूरी  

एड्रेनालिनम शॉक, अस्थमा, लो ब्लड प्रेशर और हार्मोनल इम्बैलेंस से कमजोरी की नंबर-1 होम्योपैथिक दवा है।  
जब मरीज कहे “डॉक्टर साहब, शॉक लग गया, सांस नहीं आ रही, थकान बहुत है, हार्मोनल कमजोरी महसूस हो रही है” – तो यह दवा 7-15 दिन में नई ताकत देती है। हजारों मरीजों ने अस्थमा, एलर्जी, शॉक और एड्रेनल कमजोरी ठीक की है। यह एड्रेनल का होम्योपैथिक चमत्कार है। कोई भी होम्योपैथिक दवा होम्योपैथिक डॉक्टर की सलाह से ही लें।
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भगवान ने उस दिन सिद्ध कर दिया कि वे सोने-चांदी से नहीं, केवल सच्चे भाव से खरीदे जा सकते हैं। भक्त का प्रेम इतना भारी था कि भगवान उसके वश में होकर, उस छोटी सी नथ के मोल "बिक" गए।

गुजरात की पावन धरती पर, डाकोर और द्वारका के बीच की दूरी सैकड़ों किलोमीटर की है, लेकिन एक भक्त की पुकार ने इस दूरी को मिटा दिया। यह कहानी है विजयसिंह बोडाणा की, जिनके प्रेम ने द्वारकाधीश को अपना सिंहासन छोड़ने पर विवश कर दिया।
विजयसिंह बोडाणा, एक क्षत्रिय राजपूत, जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य था—द्वारकाधीश के दर्शन। जवानी से लेकर बुढ़ापे तक, हर छह महीने में, वे अपने हाथों में तुलसी का पौधा लेकर डाकोर से द्वारका तक की लंबी यात्रा पैदल तय करते थे।

वर्षों बीतते गए, मौसम बदलते रहे, लेकिन बोडाणा का नियम नहीं टूटा। 72 वर्ष की आयु तक वे निरंतर चलते रहे। लेकिन अब शरीर थकने लगा था। हड्डियाँ जवाब दे रही थीं और पैरों के छाले अब नासूर बन चुके थे।

अपनी अंतिम यात्रा के दौरान, जब वे द्वारका पहुँचे, तो उनकी आँखों में आंसू थे। उन्होंने गर्भ गृह में खड़े होकर कांपती आवाज़ में कहा:

 "हे प्रभु! मेरा मन तो आपके चरणों में ही रहना चाहता है, लेकिन अब यह शरीर साथ नहीं देता। शायद यह मेरे जीवन का अंतिम दर्शन हो। मुझे क्षमा करना, अब मैं और नहीं आ सकूँगा।"

भक्त की यह पीड़ा भगवान से देखी नहीं गई। उसी रात, द्वारकाधीश बोडाणा के सपने में आए। भगवान की आवाज़ में एक सखा जैसा अपनापन था--

"बोडाणा! तुझे उदास होने की आवश्यकता नहीं है। यदि तू मेरे पास नहीं आ सकता, तो क्या हुआ? मैं स्वयं तेरे पास आऊँगा। अगली बार जब तू आए, तो पैदल मत आना, एक बैलगाड़ी लेकर आना। मैं तेरे साथ डाकोर चलूँगा।"

बोडाणा की खुशी का ठिकाना न रहा। वे वापस डाकोर गए और जैसे-तैसे एक टूटी-फूटी बैलगाड़ी का इंतजाम किया।

जब बोडाणा अपनी जर्जर बैलगाड़ी लेकर द्वारका पहुँचे, तो वहाँ के पुजारियों (गुगलियों) ने उनका मज़ाक उड़ाया— "अरे बोडाणा! इस टूटी गाड़ी में किसे ले जाओगे?" बोडाणा केवल मुस्कुरा दिए।

रात के गहरे सन्नाटे में, जब पूरी द्वारका नगरी सो रही थी, त्रिभुवन के स्वामी भगवान श्री रणछोड़राय चुपके से मंदिर से निकले और बोडाणा की बैलगाड़ी में विराजमान हो गए।

कहते हैं कि उस रात एक चमत्कार हुआ। जिस रास्ते को तय करने में बैलों को हफ़्तों लगते थे, वह सैकड़ों किलोमीटर का रास्ता भगवान की कृपा से पलक झपकते ही एक ही रात में तय हो गया। सुबह की पहली किरण के साथ, द्वारकाधीश डाकोर में थे।

सुबह जब द्वारका के मंदिर के पट खुले, तो वहाँ हाहाकार मच गया—मूर्ति गायब थी! पुजारियों को तुरंत समझ आ गया कि यह काम बोडाणा का ही है। क्रोध और लोभ में अंधे होकर, वे घोड़ों पर सवार होकर डाकोर की ओर दौड़े।

डाकोर पहुँचकर उन्होंने बोडाणा को घेर लिया। भगवान को वहाँ के गोमती तालाब में छिपा दिया गया था, लेकिन पुजारियों ने उन्हें ढूँढ निकाला। वे मूर्ति वापस ले जाने पर अड़ गए। बोडाणा गिड़गिड़ाते रहे, लेकिन पुजारियों की नज़र केवल चढ़ावे और धन पर थी।
अंत में, पुजारियों ने एक असंभव शर्त रखी:
 "अगर तुम मूर्ति के वजन के बराबर सोना हमें दे दो, तो हम भगवान को यहीं छोड़ देंगे, वरना हम उन्हें ले जा रहे हैं।"

बोडाणा अत्यंत निर्धन थे। सोने के नाम पर उनके पास कुछ न था। पुजारियों को लगा कि वे जीत गए हैं। लेकिन बोडाणा ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पत्नी गंगाबाई की ओर देखा। पत्नी ने बिना एक पल गँवाए, अपनी नाक की छोटी सी स्वर्ण नथ (नाक की बाली) उतारकर बोडाणा के हाथ में रख दी।

गाँव के बीचों-बीच तराजू सजाया गया।

  एक पलड़े में ब्रह्मांड के स्वामी, भारी-भरकम पत्थर की मूर्ति।
 दूसरे पलड़े में भक्त के प्रेम से भीगी हुई, रत्ती भर की सोने की नथ।

पुजारी हँस रहे थे, लेकिन तभी वह हुआ जो इतिहास बन गया।

जैसे ही नथ तराजू पर रखी गई, मूर्ति वाला पलड़ा हवा में उठ गया और नथ वाला पलड़ा भारी हो गया! पुजारियों की आँखें फटी की फटी रह गईं। 

भगवान ने उस दिन सिद्ध कर दिया कि वे सोने-चांदी से नहीं, केवल सच्चे भाव से खरीदे जा सकते हैं। भक्त का प्रेम इतना भारी था कि भगवान उसके वश में होकर, उस छोटी सी नथ के मोल "बिक" गए।

पुजारियों को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे खाली हाथ और ग्लानि के साथ द्वारका लौट गए (जहाँ बाद में नई मूर्ति स्थापित की गई),लेकिन डाकोर के भव्य मंदिर में आज भी वही मूल मूर्ति विराजमान है, जिसे बोडाणा अपनी बैलगाड़ी में लाए थे।

आज भी जब भक्त 'रणछोड़राय' के दर्शन करते हैं, तो उन्हें याद आता है कि ईश्वर धनवानों का नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम करने वालों का है।

जय श्री राधे कृष्णा 🙏🏻🙏🏻

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