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शुक्रवार, 24 जून 2022

बुढ़ापे में घुटने दर्द ना हो इसके लिए क्या करना चाहिए ?

 

बुढ़ापे में घुटने दर्द ना हो इसके लिए क्या करना चाहिए ?

प्राचीन काल से ही मनुष्य अपने रोगों का इलाज जड़ी बूटियों के माध्यम से करता आया है। कालांतर में लिखी इसी विधा की कई किताबें आज भी दुनिया के तमाम प्रकार के रोगों का इलाज कर रही हैं। हड्डियां मानव श्रृंखला की जड़ होती हैं जब इन्हीं में दर्द शुरू हो जाये तब इंसान दुख ग्रस्त हो जाता है। इन्हीं जोड़ों में एक जोड़ घुटने का भी होता है जो पैरों के बीच स्थित होता है। घुटना दर्द एक ऐसा रोग है जो आज के दौर में आम हो गया है। मसलन यह मर्ज बीते दौर में बुढ़ापे का रोग कहलाता था लेकिन आज समाज का हर तबका इसकी जद में आ चुका है।

बदलते दौर में लगातार जीवनशैली में परिवर्तन और गलत खान पान के अलावा पुरानी चोट ओर मधुमेह सहित मोटापा भी इसका बड़ा कारण माना जाता है। खान पान में विकृतियों के चलते इंसान की हड्डियों में यूरिक एसिड जमा होकर दर्द बढ़ा देता है। घुटना दर्द के लिए आज के दौर में कई प्रकार की चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध हैं लेकिन आयुर्वेद द्वारा काफी हद तक इस रोग पर विजय प्राप्त की जा सकती है। आज इस लेख के माध्यम से हम आपको आयुर्वेद द्वारा घुटना दर्द में। फायदे और नुकसान पर प्रकाश डालेंगे।

आयुर्वेदिक उपचार के फायदे।[1]

जड़ी बूटियों द्वारा निर्मित दवाएं हमारे जीवन को नया प्रकाश देती हैं। मसलन कुछ ऐसे उपाय हैं जिनसे हम घुटने दर्द में लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

दूध और अश्वगंधा का सेवन

दूध पीकर नवजात शिशु बड़ा होता है। दूध ऐसा पदार्थ है जिसमें कैल्शियम की भरपूर मात्रा पाई जाती है। अश्वगंधा एक ऐसी जड़ी होती है जो शरीर की हड्डियों को प्रचुरता से विटामिन डी प्रदान करती है। एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण खाकर एक गिलास गुनगुना दूध पीने से घुटने में उठ रहा दर्द समाप्त हो जाता है।

लहसुन और सरसों तेल के फायदे

लहसुन एक प्राकृतिक दर्द नाशक माना जाता है। हड्डियों के दर्द में 10 से 15 कली लहसुन को सरसों के तेल में अच्छे से उबालकर जोड़ों पर मालिश करें। इससे दर्द में राहत मिलती है। इसके अलावा लहसुन को उबालकर बचे हुए पानी की एक चम्मच मात्रा दिन में सूप की भांति 2 बार सेवन करने से घुटना दर्द समाप्त हो जाता है।

लौंग के फायदे

लौंग ऐसा दर्द निवारक है जो मिनटों में दर्द दूर भगा देता है। चार से 5 कली लौंग को तवे पर भूनकर इसे चूर्ण बना लें। इसी चूर्ण में एक चम्मच देशी शहद मिलाकर खाली पेट इस्तेमाल करने से घुटना दर्द दूर होने लगता है। इसे नियमित तौर पर इस्तेमाल करने से शरीर मे मौजूद हड्डियों के समस्त विकार दूर होने लगते हैं।

आयुर्वेदिक उपचार के नुकसान[2]

आदिकाल से दवाओं के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली जड़ी बूटियों का वैसे तो कोई नुकसान देखने को नहीं मिलता लेकिन कुछ सावधानियां ना बरतने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है। मसलन जब भी हम इस उपचार माध्यम का प्रयोग करें चिकित्सक की सलाह जरूर लें। औषधि इस्तेमाल करने से पहले उसकी मात्रा के बारे में अच्छे से जान लें। यदि गलत मात्रा का सेवन किया गया तो यह इंसान के आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकता है जो किसी भी रूप में शरीर पर साइड इफेक्ट के रूप में सामने आ जाता है।

रामबाण औषध

स्तोत्-गुगल फोटो

हड़जाेड़ ( Hadjod ) को आयुर्वेद में हड्डी जोड़ने की कारगर दवा बताया गया है। इसे अस्थि संधानक या अस्थिशृंखला ( Asthisamharaka ) के नाम से भी जानते हैं। यह छह इंच की खंडाकार बेल होती है। इसके हर खंड से एक नया पौधा पनप सकता है। हृदय के आकार जैसी दिखने वाली पत्तियों वाले इस पौधेे में लाल रंग के मटर के दाने के बराबर फल लगते हैं। जानते हैं इसके बारे में:-

उपयोग और लाभ

भूरे रंग का हड़जाेड़ ( Cissus Quadrangularis ) पौधा स्वाद में कसैला और तीखा होता है। इसकी बेल में हर 5-6 इंच पर गांठ होती है। इस पौधे की प्रकृति गर्म होती है। जैसा कि इसके नाम से ही साफ है कि यह टूटी हड्डियों को जोड़ने मेंं कारगर है ( Plants Used For Healing Of Bone Fracture )। यह खाने और लगाने दोनों में काम आता है।

ऐसे लें :

250-500 मिलीग्राम की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ लें। इसका रस निकालकर ठंडे दूध के साथ ले सकते हैं। इसका 5-6 अंगुल तना लेकर बारीक टुकड़े काटकर काढ़ा बना लें व सुबह-शाम पीएं।

खास बातें : हड़जाेड़ ( Veld Grape ) में सोडियम, पोटैशियम, कार्बोनेट भरपूर पाया जाता है। इसमें मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट और फॉस्फेट हड्डियों को मजबूत करता है। आयुर्वेद सेंट्रल लैब के एक शोध में पाया गया कि हड़जाेड़ ( Devil's Backbone ) के उपयोग से हड्डी के जुड़ने का समय 33-50 फीसदी तक कम हो जाता है। यानी प्लास्टर के साथ हड़जाेड़ ( Pirandai ) लिया जाए तो हड्डी जल्दी जुड़ती है। ये हड्डियों को लचीला भी बनाता है इसलिए इसका प्रयोग खिलाड़ी भी करते हैं।[3]

फुटनोट

किन 25 लोगों को नहीं देना पड़ेगा टोल टैक्स, भारत सरकार द्वारा जारी की गई लिस्ट?

 

किन 25 लोगों को नहीं देना पड़ेगा टोल टैक्स, भारत सरकार द्वारा जारी की गई लिस्ट?

टोल टैक्स या टोल वह शुल्क है जो वाहन चालकों को कुछ अंतरराज्यीय एक्सप्रेसवे, सुरंगों, पुलों और अन्य राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों को पार करते समय चुकाना पड़ता है। इन सड़कों को टोल रोड कहा जाता है और ये भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के नियंत्रण में हैं।

टोल टैक्स का उपयोग सड़क निर्माण और रखरखाव के लिए किया जाता है। इसलिए, यह टोल टैक्स लगाकर नवनिर्मित टोल सड़कों की लागत को कवर करता है। भारत सरकार ने फास्टैग पेश किया है जो कैशलेस टोल टैक्स भुगतान के लिए RFID (रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन) तकनीक का उपयोग करते हैं।

हालांकि राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्ग शुल्क (दरों और संग्रह का निर्धारण) नियम, 2008 के नियम 11 के अनुसार टोल टैक्स का भुगतान करने से छूट प्राप्त लोगों और वाहनों की एक सूची है।

भारत के राष्ट्रपति

भारत के उपराष्ट्रपति

भारत के प्रधानमंत्री

किसी राज्य का राज्यपाल

भारत के मुख्य न्यायाधीश

लोक सभा के अध्यक्ष

संघ के कैबिनेट मंत्री

किसी राज्य का मुख्यमंत्री

सुप्रीम कोर्ट के जज

संघ राज्य मंत्री

एक केंद्र शासित प्रदेश के उपराज्यपाल

चीफ ऑफ स्टाफ जो पूर्ण सामान्य या समकक्ष रैंक का पद धारण करता है

किसी राज्य की विधान परिषद के सभापति

किसी राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश

ससद सदस्य

थल सेनाध्यक्ष के सेना कमांडर और अन्य सेवाओं में समकक्ष

संबंधित राज्य के भीतर किसी राज्य सरकार के मुख्य सचिव

सचिव, भारत सरकार

राज्यों की परिषद सचिव

सचिव, लोक सभा

राजकीय यात्रा पर विदेशी गणमान्य व्यक्ति

किसी राज्य की विधान सभा के सदस्य और अपने-अपने राज्य के भीतर किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्य, यदि वह राज्य के संबंधित विधानमंडल द्वारा जारी अपना पहचान पत्र प्रस्तुत करता है या नहीं

परमवीर चक्र, अशोक चक्र, महावीर चक्र, कीर्ति चक्र, वीर चक्र, और शौर्य चक्र से सम्मानित व्यक्ति, यदि ऐसा पुरस्कार प्राप्तकर्ता ऐसे पुरस्कार के लिए उपयुक्त या सक्षम प्राधिकारी द्वारा विधिवत प्रमाणित अपना फोटो पहचान पत्र प्रस्तुत करता है

हालांकि अन्य श्रेणी भी हैं जिन्हें टोल टैक्स से छूट दी गई है।

केंद्र और राज्य के सशस्त्र बल वर्दी में। इसमें अर्धसैनिक बल और पुलिस, एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट, अग्निशमन विभाग या संगठन, एम्बुलेंस के रूप में उपयोग , अंतिम संस्कार वैन के रूप में उपयोग, यांत्रिक वाहन जो विशेष रूप से शारीरिक अक्षमता से पीड़ित व्यक्ति के उपयोग के लिए डिज़ाइन और निर्मित किए जाते हैं।

कहां लिखा है कि लड़कियों को शिव भक्ति में #नशा करना, और गांजा फुकना और ऐसे छोटे कपड़े पहन कर नशे करके #नाचना

⛳🚩⛳🌹🌺🌻🌼ये जो #माथे पर #टीका लगाकर #उल्टे सीधे कपड़े पहनकर, गले मे #रुद्राक्ष जैसी परम #पवित्र माला डालकर, #गांजा फुकते हुए, और नाम के आगे भक्त महाभक्त #परमभक्त लगाकर लोग गुगल से लेकर फेसबुक तक धर्म का #मजाक बनाये बैठे हैं #शर्म नहीं आती है ऐसे #निच हरकत करते हुए??

और खास कर ये ऐसे लड़कियां जो बहुत बड़े शिव भक्त का #ठेकेदार बनी फिर रही है, कहां लिखा है कि लड़कियों को शिव भक्ति में #नशा करना, और गांजा फुकना और ऐसे छोटे कपड़े पहन कर नशे करके #नाचना??

अपने कायदे में रहें तो ही अच्छा होगा धर्म #संस्कृति को बदनाम कर के रख दिया है लोगों ने,

#सुल्फे के साथ फोटो डालना अपने साथ साथ हमारे #सनातन समाज और धर्म का भी #अपमान करना आराध्य #महादेवजी की सुल्फे के साथ फोटो बनाकर पेश करना, अरे मूर्खो क्या ईश्वर को भूख प्यास लगती है क्या ईश्वर नशा करते है या ईश्वर #मादक पदार्थो का सेवन करते है बिल्कुल नही करते हैं।

ये सब झूठ है एक दम महाझूठ जिसे कुछ नशेड़ी और दिमाग से #विकलांग लोगों ने धर्म के नाम पर #शौक़ बना दिया है अपनी मर्जी पूरी करने के लिए,

#यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।

#निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥

यानी जो सुख #भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद (नशा) से उत्पन्न सुख #तामस कहा गया है.

इसके अलावा भी #गीता में कई जगह नशा न करने की सलाह दी गई है।

आज की युवा पीढ़ी सुल्फा भांग गांजा बीड़ी सिगरेट शराब का नाम भगवान से जोड़ते है इनका सेवन करते है अपने भगवानो को भी नही बख्शते ।

अपनी फोटो लाइक करवाने के लिए कपड़े बदल बदलकर और हाथ मे सुल्फा लेकर फोटो खिंचवाने वाले लोगों ने ही हमारे धर्म में ये नशेड़ीपना फैलाया है📙📒🚩⛳🌺🌻🌹

योगिनी एकादशी व्रत आज

 योगिनी एकादशी व्रत आज

आषाढ़ कृष्ण एकादशी को योगिनी एकादशी कहते हैं। हर शाप का होता है यह व्रत करने से निवारण


योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। पंचांग के अनुसार, यह एकादशी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पड़ती है। मान्यता है कि योगिनी एकादशी का व्रत रखने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इसके अलावा मान्यता यह भी है कि इस व्रत के प्रभाव से किसी के दिए हुए श्राप का निवारण हो जाता है।


योगिनी एकादशी तिथि

पंचांग के मुताबिक साल 2022 में योगिनी एकादशी 24 जून, शुक्रवार को है। एकदशी तिथि का आरंभ 23 जून को रात 9 बजकर 41 मिनट से हो रहा है। जबकि एकादशी तिथि की समाप्ति 24 जून को रात 11 बजकर 12 मिनट पर होगी। एकादशी व्रत का पारण 25 जून को सुबह 5 बजकर 41 मिनट के बाद और 8 बजकर 12 मिनट से बीच किया जा सकता है। पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय सुबह 5 बजकर 41 मिनट है।  


योगिनी एकादशी व्रत पूजा विधि

अन्य एकादशी व्रत के जैसा ही योगिनी एकादशी व्रत का नियम एक दिन पहले यानी दशमी से ही शुरू हो जाता है। ऐसे में दशमी तिथि की रात से ही जौ, गेहूं और मूंग की दाल से बना भोजन नहीं किया जाता है। साथ ही व्रत के दिन नमक वाले भोज्य पदार्थ का सेवन नहीं किया जाता है। एकादशी वाले दिन सुबह स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद पूजा स्थल पर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखकर पूजा की जाती है। पूजन के दौरान भगवान विष्णु को पीले फूल और पीली मिठाईयों का भोग लगाया जाता है। पूजा खत्म होने के बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की आरती की जाती है।


योगिनी एकादशी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यतानुसार योगिनी एकादशी का व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि और आनंद की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि योगिनी एकादशी का व्रत तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। मान्यता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करने से बहुत अधिक पुण्य मिलता है।


योगिनी एकादशी की व्रत कथा

स्वर्ग की अलकापुरी नामक नगरी में कुबेर नाम का राजा था। वह शिव के उपासक था। हेम नाम का माली पूजन के लिए उसके यहां फूल लाया करता था। हेम की पत्नी थी विशालाक्षी। वह बहुत सुंदर स्त्री थी। एक दिन वह मानसरोवर से पुष्प तो ले आया लेकिन मन भटकने की वजह से वो पत्नी को देखकर कामासक्त हो गया और उसके साथ रमण करने लगा। उधर पूजा में विल्म्ब होने के चलते राजा कुबेर ने सेवकों से माली के न आने का कारण पूछा तो सेवकों ने राजा को सारी बात सच बता दी। यह सुनकर कुबेर बहुत क्रोधित हुआ और उसने माली को श्राप दे दिया।


राजा कुबेर ने दिया माली को ये श्राप

गुस्से में कुबेर ने हेम माली से कहा कि तूने कामवश होकर भगवान शिव का अनादर किया है। मैं तुझे श्राप देता हूं कि तू स्त्री का वियोग सहेगा और मृत्युलोक(पृथ्वी)में जाकर कोढ़ी बनेगा। कुबेर के श्राप से हेम माली का स्वर्ग से पतन हो गया और वह उसी क्षण पृथ्वी पर गिर गया। पृथ्वीलोक में आते ही उसके शरीर में कोढ़ हो गया। वो कई समय तक ये दु:ख भोगता रहा।


मार्कण्डेय ऋषि ने बताया कुष्ठ रोग निवारण उपाय

एक एक दिन वह मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुंच गया। उसे देखकर मार्कण्डेय ऋषि बोले तुमने ऐसा कौन सा पाप किया है, जिसके प्रभाव से तुम्हारी यह हालत हो गई। हेम माली ने पूरी बात उन्हें बता दी। उसकी व्यथा सुनकर ऋषि ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने के लिए कहा। हेम माली ने विधिपूर्वक योगिनी एकादशी का व्रत किया, जिसका उसे सफल परिणाम मिला। वो कुष्ठ रोग से मुक्ति पाकर अपने पुराने रूप में आ गया औूर पत्नी के साथ सुखी जीवन यापन करने लगा।

जिसने अपने दिमाग का सही इस्तेमाल किया वहीं इस दुनिया का सुल्तान बन सकता है।

 

इस तस्वीर से हमें यह पता चलता है सबसे ताकतवर दिमाग ही है। जिसने अपने दिमाग का सही इस्तेमाल किया वहीं इस दुनिया का सुल्तान बन सकता है। देखिए किस तरह इस चिड़िया ने अपने दुश्मन से बचने के लिए अपने घोंसले में उसको कैसे चकमा दिया। यदि इसी तरह हम इंसान भी अपने दिमाग का सही प्रयोग करें तो हम किसी भी स्थिति को बदल सकते हैं।

उम्मीद हम इस तस्वीर से कुछ सीखेंगे। यदि आपको यह तस्वीर पसंद आई कृपया इसे शेयर करें।

रामायण काल का पात्र जामवन्त जो उस समय बूढ़े हो गए थे, जवानी में वो कितने बलशाली थे?

 

चित्र स्रोत: गूगल

जामवंत रामायण के एक ऐसे पात्र हैं जिनके विषय में बहुत विस्तार से नहीं लिखा गया है। हालाँकि रामायण में ही उनके विषय में केवल एक-दो चीजें ऐसी बताई गयी है जिनसे आप उनके बल के बारे में अनुमान लगा सकते हैं। आइये उन्हें देखते हैं।

  • पहली बात तो जामवंत सतयुग के व्यक्ति थे। अब सतयुग में निःसंदेह योद्धा अन्य युगों की अपेक्षा बहुत अधिक शक्तिशाली होते थे। उनकी उत्पत्ति सीधे ब्रह्माजी से बताई गयी है। अब परमपिता ब्रह्मा से जो जन्मा हो उसकी शक्ति के बारे में तो केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
  • रामचरितमानस में उनके पराक्रम के बारे में दो घटना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन दोनों स्थानों पर जामवंत का युद्ध रावण और मेघनाद के साथ हुआ था जिसमें दोनों को जामवंत ने अपने पाद प्रहार से मूर्छित कर दिया था। मेघनाद की शक्ति तो उन्होंने अपने हाथों से ही पकड़ कर पलट दी थी। अत्यंत वृद्धावस्था में भी जो रावण और मेघनाद जैसे योद्धाओं को अपने घात से मूर्छित कर दे, जरा सोचिये युवावस्था में उसका बल क्या होगा।
  • जब द्वापर आया और जामवंत और अधिक बूढ़े हो गए, उस समय उनका युद्ध श्रीकृष्ण से हुआ था। जनमवंत को परास्त करने के लिए श्रीकृष्ण को उनसे एक-दो नहीं बल्कि 28 दिनों तक युद्ध करना पड़ा। स्वयं परमेश्वर कृष्ण को जिसे परास्त करने में अट्ठाइस दिन लग गए हों, वो भी वृद्धावस्था में, जवानी में उनके बल के बारे में हम केवल अनुमान ही लगा सकते हैं।
  • जब सीता माता को खोजने के लिए समुद्र लांघने की बात चल रही थी उस समय जामवंत कहते हैं कि "मैं तो अब बहुत बूढ़ा हो गया हूँ, फिर भी इस समुद्र में मैं 90 योजन तक जा सकता हूँ।" हनुमान जी अपनी युवावस्था में 100 योजन छलांग गए, जामवंत की आयु उस समय 6 मन्वन्तर की बताई गयी है। एक मन्वन्तर तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हजार वर्षों का होता है, फिर भी वे 90 योजन तक जाने की क्षमता रखते थे, इसी से उनके बल का पता चलता है।
  • इस वार्तालाप के दौरान उन्होंने युवावस्था में अपने बल के बारे में दो बातें बताई जिसे ध्यान से सुनना आवश्यक है। इससे आपको जामवंत की वास्तविक शक्ति का पता चलेगा।
    • पहली घटना तब की है जब समुद्र मंथन चल रहा था जिसे देवता और दैत्य मिलकर बड़ी मुश्किल से कर पा रहे थे। उस समय जामवंत ने अपनी जवानी के जोश में एक बार अकेले ही सम्पूर्ण मंदराचल पर्वत को घुमा दिया था। मंदराचल को अकेले घुमाने के लिए कितनी शक्ति चाहिए होगी, क्या आपको अंदाजा है?
    • दूसरी घटना भगवान विष्णु के वामन अवतार की है। जब श्रीहरि ने विराट स्वरुप लिया और एक पैर से स्वर्ग को नाप लिया। फिर जब उन्होंने अपना पैर पृथ्वी को नापने के लिए उठाया, उस दौरान जामवंत ने केवल 7 पल में पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली थी। जरा सोचिये महावीर हनुमान एक ही रात में लंका से सैकड़ों योजन दूर से पर्वत शिखर उखाड़ कर ले आये लेकिन जामवंत ने केवल सात पल में पृथ्वी की सात परिक्रमा कर ली थी। एक पल लगभग 24 सेकंड का होता है। क्या आप उनकी गति का अनुमान लगा सकते हैं?
  • उस उनके बल का ऐसा वर्णन सुनकर जब अंगद उनसे पूछते हैं कि उनका बल क्षीण कैसे हुआ? तब वे बताते हैं कि जब वे पृथ्वी की परिक्रमा कर रहे थे तो अंतिम परिक्रमा के समय उनके पैर के अंगूठे का नाख़ून महामेरु पर्वत से छू गया, जिससे उसका शिखर खंडित हो गया। इसे अपना अपमान मानते हुए मेरु ने जामवंत को ये श्राप दे दिया कि वो सदा के लिए बूढ़ा हो जाएगा और उसका बल क्षीण हो जाएगा।

आशा है आपको जामवंत की शक्ति का कुछ अंदाजा हो गया होगा। किन्तु इतने शक्तिशाली होने के बाद भी उनमें लेश मात्र भी घमंड नहीं था। जय श्रीराम।

इस गांव के सभी लोग अंधे हैं यहां तक इस गांव के जानवर भी अंधे हैं।

 

इस गांव के सभी लोग अंधे हैं यहां तक इस गांव के जानवर भी अंधे हैं।

आज हम बात करेंगे कि इस गांव के लोगों के अंधेपन की वजह क्या है?

तो आइए इस गांव के विषय में विस्तार से जानकारी लेते हैं।

क्यों खास है टिल्टेपक गांव?

मेक्सिको देश में बसा है यह गांव, यह गांव काफी छोटा है इस गांव में केवल 70 झोपड़ी है जिसमें कुल मिलाकर 300 के आसपास लोग रहा करते हैं इस गांव में जोपोटेक नाम की जनजाति रहती है।

टिल्टेपक गाँव के सभी लोग अंधे हैं यहां तक कि जीव- जंतु पशु -पक्षी भी अंधे हैं ।ऐसा नहीं है कि यह सभी लोग जन्मजात अंधे होते हैं जब यहां के बच्चे का जन्म होता है तब बच्चा कुछ दिनों तक सामान्य रहता है फिर उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है।

यहां के पक्षी भी अंधे हैं जिसकी वजह से वह उड़ नहीं पाते अगर कोई पक्षी उड़ने का प्रयास भी करता है तो वह पेड़ों से टकरा जाता है और उसकी मौत हो जाती है।

गांव के किसी भी झोपड़ी में खिड़की नहीं है क्योंकि उन्हें उजाले से कोई मतलब नहीं है सभी लोग लाठियों के सहारे अपना सभी काम करते हैं

क्या श्रापित पेड़ की वजह से इस गांव के लोग अंधे हैं?

गांव के लोगों के अनुसार उनके अंधेपन की वजह एक श्रापित पेड़ है उसे देखने के बाद लोगों की आंखें चली जाती है हालांकि इस बात को वैज्ञानिकों ने सिरे से नकार दिया वैज्ञानिकों ने गांव के लोगों को अंधेपन की कुछ अलग वजह बताई।

तो क्या है गांव के लोगों की अंधेपन की असली वजह?

वैज्ञानिकों ने अपने शोध में पाया कि क्या गांव के लोगों के अंधेपन की वजह कोई श्रापित पेड़ नहीं है, बल्कि एक मक्खी है।

जी हां, आपने बिल्कुल सही पढ़ा गांव के आस पास पाए जाने वाली जहरीली मक्खी के काटने से वहां के लोग अंधे हो जाते हैं।

जिस मक्खी का जहर आंखों के द्वारा दिमाग को भेजे गए सिग्नल को रोक देता है जिससे व्यक्ति देख नहीं पाता है।

यही वजह है कि गांव के नए जन्मजात बच्चे देख पाते हैं और कुछ ही दिनों बाद उन्हें वह मक्खी काटने की वजह से उनकी दृष्टि चली जाती है।

ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी” श्रीरामचरितमानस में कहीं नहीं किया गया है शूद्रों और नारी का अपमान।

ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी”
श्रीरामचरितमानस में कहीं नहीं किया गया है शूद्रों और नारी का अपमान।


भगवान श्रीराम के चित्रों को जूतों से पीटने वाले भारत के राजनैतिक शूद्रों को पिछले 450 वर्षों में गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित हिंदू महाग्रंथ 'श्रीरामचरितमानस' की कुल 10902 चौपाईयों में से आज तक मात्र 1 ही चौपाई पढ़ने में आ पाई है और वह है भगवान श्री राम का मार्ग रोकने वाले समुद्र द्वारा भय वश किया गया अनुनय का अंश है जो कि सुंदर कांड में 58 वें दोहे की छठी चौपाई है "ढोल गँवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी”

इस सन्दर्भ में चित्रकूट में मौजूद तुलसीदास धाम के पीठाधीश्वर और विकलांग विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री राम भद्राचार्य जी जो नेत्रहीन होने के बावजूद संस्कृत, व्याकरण, सांख्य, न्याय, वेदांत, में 5 से अधिक GOLD Medal जीत चुकें हैं।

महाराज का कहना है कि बाजार में प्रचलित रामचरितमानस में 3 हजार से भी अधिक स्थानों पर अशुद्धियां हैं और इस चौपाई को भी अशुद्ध तरीके से प्रचारित किया जा रहा है।

उनका कथन है कि तुलसी दास जी महाराज खलनायक नहीं थे,आप स्वयं विचार करें यदि तुलसीदास जी की मंशा सच में शूद्रों और नारी को प्रताड़ित करने की ही होती तो क्या रामचरित्र मानस की 10902 चौपाईयों में से वो मात्र 1 चौपाई में ही शूद्रों और नारी को प्रताड़ित करने की ऐसी बात क्यों करते ?


यदि ऐसा ही होता तो भील शबरी के जूठे बेर को भगवान द्वारा खाये जाने का वह चाहते तो लेखन न करते।यदि ऐसा होता तो केवट को गले लगाने का लेखन न करते।

स्वामी जी के अनुसार ये चौपाई सही रूप में

- ढोल,गवार, शूद्र,पशु,नारी नहीं है
बल्कि यह "ढोल,गवार,क्षुब्ध पशु,रारी” है।

ढोल = बेसुरा ढोलक

गवार = गवांर व्यक्ति

क्षुब्ध पशु = आवारा पशु जो लोगो को कष्ट देते हैं

रार = कलह करने वाले लोग

चौपाई का सही अर्थ है कि जिस तरह बेसुरा ढोलक, अनावश्यक ऊल जलूल बोलने वाला गवांर व्यक्ति, आवारा घूम कर लोगों की हानि पहुँचाने वाले (अर्थात क्षुब्ध, दुखी करने वाले) पशु और रार अर्थात कलह करने वाले लोग जिस तरह दण्ड के अधिकारी हैं उसी तरह मैं भी तीन दिन से आपका मार्ग अवरुद्ध करने के कारण दण्ड दिये जाने योग्य हूँ।

स्वामी राम भद्राचार्य जी जो के अनुसार श्रीरामचरितमानस की मूल चौपाई इस तरह है और इसमें ‘क्षुब्ध' के स्थान पर 'शूद्र' कर दिया और 'रारी' के स्थान पर 'नारी' कर दिया गया है।

www.sanwariyaa.blogspot.com

दूध में एक टुकड़ा गुड़ मिलाकर पीने के जबरदस्त फायदे

 दूध में एक टुकड़ा गुड़ मिलाकर पीने के जबरदस्त फायदे


आप फिटनेस आपके लाइफस्टाइल पर ही नहीं बल्कि आपके ब्रेकफास्ट पर भी निर्भर करती है।आप अगर दिन की शुरूआत हेल्दी ब्रेकफास्ट से करते हैं, तो इससे चांसेस काफी बढ़ जाते हैं कि आपका वजन नहीं बढ़ेगा। हेल्दी रहने के लिए कई लोग सुबह गुनगुने पानी का सेवन करते हैं। कुछ आंवला जूस भी पीते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि सुबह उठकर गर्म दूध के साथ गुड़ का सेवन भी फायदेमंद है-


दूध और गुड़ में मौजूद तत्व

दूध में अधिक मात्रा में विटामिन ए, विटामिन बी और डी के अलावा कैल्शियम, प्रोटीन और लैक्टिक एसिड पाया जाता है। वही दूसरी ओर गुड़ में अधिक मात्रा में सुक्रोज, ग्लूकोज, खनिज तरल और पानी कुछ मात्रा में पाई जाती है। इसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा और कई तत्व पाएंं जातेे हैंं।


नेचुरल ब्लड प्यूरीफायर

गुड़ में ऐसे गुण पाए जाते हैं, जो आपके शरीर में मौजूद अशुद्धियों को साफ कर देता है इसलिए रोजाना गर्म दूध और गुड़ का सेवन करने से आपके शरीर से ऐसी अशुद्धियां निकल जाती है। जिससे आपको कोई बीमारी नहीं होगी।

मोटापा को करें कंट्रोल

माना जाता है कि अगर आप दूध के साथ चीनी का इस्तेमाल करते है, तो इसकी जगह आप गुड़ का इस्तेमाल करें। ऐसा करने से आपका वजन कंट्रोल में रहेगा। जिससे आप मोटापा का शिकार नहीं होंगे।

पेट संबंधी समस्या को रखें ठीक

अगर आपको पाचन संबधी कोई भी समस्या है, तो गर्म-गर्म दूध और गुड़ का सेवन करने से आपको पेट संबंधी हर समस्या से निजात मिल जाती है।

जोड़ों के दर्द को करें दूर

गुड़ खाने से जोड़ों के दर्द में आराम मिलता है, अगर रोजाना गुड़ का एक छोटा पीस अदरक के साथ मिला कर खाया जाए, तो जोड़ों में मजबूती आएगी और दर्द दूर होगा। आपकी खूबसूरती को बढ़ाएं। गर्म दूध और गुड़ का सेवन करने से आपकी त्वचा मुलायम होने के साथ-साथ त्वचा संबंधी समस्या न होगी। साथ ही इसका सेवन करने से आपके बाल भी हेल्दी रहेंगे।

पीरियड्स में दर्द को करें ठीक

कहा जाता है कि अगर आपको कही दर्द हो,तो गर्म दूध पीने से तुरंत आराम मिल जाता है और महिलाओं को पीरियड के समय का दर्द हो रहा हो तो गर्म दूध के साथ गुड़ का सेवन करने से आपको इससे निजात मिल सकता है। आप फिर पीरियड शुरु होने के 1 हफ्ते पहले 1 चम्मच गुड़ का सेवन रोजाना करें। इससे आपको दर्द से निजात मिलेगी।

जलवैज्ञानिक वराहमिहिर और उनका मानसून वैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ सिद्धांत”

भारत की जल संस्कृति-12

“जलवैज्ञानिक वराहमिहिर और उनका मानसून वैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ सिद्धांत”

लेखक:- डॉ. मोहन चंद तिवारी
वैदिक संहिताओं के काल में ‘सिन्धुद्वीप’ जैसे वैदिक कालीन मंत्रद्रष्टा ऋषियों के द्वारा जलविज्ञान और जलप्रबन्धन सम्बन्धी मूल अवधारणाओं का आविष्कार कर लिए जाने के बाद वैदिक कालीन जलविज्ञान सम्बन्धी ज्ञान साधना का उपयोग करते हुए कौटिल्य ने एक महान अर्थशास्त्री और जलप्रबंधक के रूप में राज्य के जल संसाधनों को कृषि की उत्पादकता से जोड़कर घोर अकाल और सूखे जैसे संकटकाल से निपटने के लिए अनेक शासकीय उपाय भी किए. भारतीय जलविज्ञान की इसी परंपरागत पृष्ठभूमि में छठी शताब्दी ई. में एक महान खगोलशास्त्री तथा जल वैज्ञानिक वराहमिहिर का आविर्भाव हुआ.

वराहमिहिर ने अपने युग में प्रचलित जलविज्ञान की मान्यताओं का संग्रहण करते हुए अपने ग्रन्थ ‘बृहत्संहिता’ में जलविज्ञान का सुव्यवस्थित विवेचन दो भागों में विभाजित करके किया. इनमें से एक प्रकार का जल अन्तरिक्षगत जल है जो समुद्र आदि से वाष्पीभूत होकर आकाश में बादलों के रूप में संचयित होता है और दूसरे प्रकार का जल बादलों से बरस कर भूमिगत जल बन जाता है. आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से अन्तरिक्षगत जल का विवेचन ‘मौसमविज्ञान’ के अन्तर्गत किया जाता है तो भूमिगत जल का विवेचन ‘जलविज्ञान’ के धरातल पर होता है. वराहमिहिर ने भी जल प्राप्ति के इन दो आयामों का विवेचन दो अलग अलग शाखाओं के अन्तर्गत किया है. बृहत्संहिता के 21वें‚ 22वें और 23वें अध्यायों में वराहमिहिर ने मेघों से प्राप्त होने वाले अन्तरिक्ष जल की चर्चा की है और 54वें अध्याय में ‘दकार्गलम्’के नाम से भूमिगत जल का शास्त्रीय विवेचन किया है.
वराहमिहिर का जलविज्ञान एकांगी रूप से केवल भूस्तरीय जल अथवा भूगर्भीय जल पर आधारित सैद्धान्तिक विज्ञान ही नहीं बल्कि वर्षाकालीन अन्तरिक्षगत मेघों के पर्यवेक्षण और मौसमविज्ञान सम्बन्धी जलवायु परीक्षण पर आधारित प्रायोगिक विज्ञान भी है.

वराहमिहिर का जलवैज्ञानिक सिद्धान्त
वराहमिहिर का जलविज्ञान एकांगी रूप से केवल भूस्तरीय जल अथवा भूगर्भीय जल पर आधारित सैद्धान्तिक विज्ञान ही नहीं बल्कि वर्षाकालीन अन्तरिक्षगत मेघों के पर्यवेक्षण और मौसमविज्ञान सम्बन्धी जलवायु परीक्षण पर आधारित प्रायोगिक विज्ञान भी है. वराहमिहिर का स्पष्ट कथन है कि बलदेव आदि प्राचीन ऋतुवैज्ञानिकों के मतानुसार मौसम वैज्ञानिकों द्वारा आगामी मानसूनों के आने की भविष्यवाणी ज्येष्ठ पूर्णिमा के बाद होने वाली ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति तथा जलवायु परीक्षण के आधार पर की जानी चाहिए-
“मेघोद्भवं प्रथममेव मया प्रदिष्टं
ज्येष्ठामतीत्य बलदेवमतादि दृष्ट्वा.
भौमं दकार्गलमिदं कथितं द्वितीयं
सम्यग्वराहमिहिरेण मुनिप्रसादात्..”
              -बृहत्संहिता‚ 54.125

वराहमिहिर का ‘वृष्टिगर्भ’ सिद्धान्त
वर्षा से प्राप्त होने वाले अन्तरिक्ष जल को ही वराहमिहिर ने भूस्तरीय तथा भूगर्भीय जल का मूल कारण माना है. इसलिए एक जलवैज्ञानिक के रूप में वराहमिहिर अन्तरिक्ष जल की तीन अवस्थाओं का विवेचन करते हैं. ये तीन अवस्थाएं हैं-
1- मेघों का गर्भलक्षण‚
2- मेघों का गर्भधारण
3- मेघों का प्रवर्षण.

मानसूनी वर्षा के बारे में वराहमिहिर की मान्यता है कि बादलों के ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करने की अवधि साढ़े छह महीने यानी 195 दिनों की होती है. बादल चन्द्रमा के जिस नक्षत्र में गर्भ धारण करते हैं ठीक 195 दिनों के बाद उसी नक्षत्र में वर्षा के रूप में बादलों का प्रसव होता है-
“यन्नक्षत्रमुपगते गर्भश्चन्द्रे भवेत् स चन्द्रवशात्.
पंचनवते दिनशते तत्रैव प्रसवमायाति…”
                      -बृहत्संहिता‚ 21.7

वराहमिहिर का मानना है कि कृष्णपक्ष में दिखाई देने वाला बादलों का गर्भ शुक्ल पक्ष में‚ दिन का गर्भ रात्रि में और रात्रि गर्भ दिन में वर्षा उत्पन्न करता है (बृहत्संहिता‚21.8). किन्तु समय पर वर्षा न होना तथा बादलों का फटना इस स्थिति का द्योतक है कि बादलों का समय से पहले ही गर्भस्राव हो गया है. वराहमिहिर के अनुसार यदि बादलों के गर्भ धारण के बाद आंधी‚ चक्रवाती तूफान, उल्कापात, दिग्दाह‚ भूकम्प आदि प्राकृतिक उत्पात के लक्षण प्रकट हों तो निश्चित कालावधि में मानसूनी वर्षा की अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए तथा मान लेना चाहिए कि मेघों का गर्भस्राव हो चुका है (बृ.सं.21.25)
मानवीय सृष्टिविज्ञान के संदर्भ में जैसे स्त्री में गर्भधारण होने के पश्चात् नौ माह के उपरांत बच्चे का प्रसव होता है उसी प्रकार सूर्य द्वारा मेघों में वृष्टिका गर्भ धारण होने के लगभग 195 दिनों के उपरांत पर्जन्यवृष्टि होती है. तब तक वृष्टिगर्भ की अन्तरिक्ष में पालन पोषण और वृद्धि होती रहती है. मानवीय गर्भ का जिस प्रकार प्रसव काल सुनिश्चित है  उसी प्रकार आचार्य वराहमिहिर ने ‘वृष्टिगर्भ’ से वर्षा के प्रसव का काल 195 दिन के बाद निर्धारित किया है. अर्थात् वराहमिहिर के अनुसार ‘वृष्टिगर्भ’ धारण होने के आरंभ से वृष्टिप्रसव होने तक की प्रक्रिया एक सजीव प्रकृति वैज्ञानिक प्रक्रिया है.

‘वृष्टिगर्भ’:आर्यों का वैज्ञानिक आविष्कार
वस्तुत: बहुत कम लोगों को ही मालूम होगा कि भातीय ऋतुविज्ञान में ‘वृष्टिगर्भ’ की अवधारणा सूर्य के संवत्सर चक्र से जुड़ी एक वैज्ञानिक अवधारणा है. जैसे कि स्त्री और पुरुष के शारीरिक यौन सम्बन्ध से स्त्री में गर्भ निषेचन की प्रक्रिया होती है तभी दसवें महीने प्रसव सम्भव हो पाता है.उसी प्रकार   वेदकालीन ऋतु वैज्ञानिकों की भी मान्यता थी कि ब्रह्मांड में भी वार्षिक मानसूनों सृष्टि वृष्टिगर्भ की प्रक्रिया से सम्पादित होती है.
इस सम्बंध में ऋग्वेद के पांचवे मंडल के 78वें सूक्त के तीन मंत्र,जो ‘गर्भस्रावणी उपनिषद्’ के रूप में प्रसिद्ध हैं,विशेष रूप से अवलोकनीय हैं-
“यथा वातः पुष्करिणीं समिङ्गयति सर्वतः.
एवा ते गर्भ एजतु निरैतु दशमास्यः॥
यथा वातो यथा वनं यथा समुद्र एजति.
एवा त्वं दशमास्य सहावेहि जरायुणा॥
दश मासाञ्छशयानः कुमारो अधि मातरि.
निरैतु जीवो अक्षतो जीवो जीवन्त्या अधि॥”
                        – ऋग्वेद,5.78.7-9

वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है.सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण ही इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया इसलिए सूर्य संक्रान्ति के विविध पर्वों मकर संक्रान्ति और छठ पर्व के साथ वृष्टि विज्ञान के भी गूढ़ सिद्धान्त जुड़े हुए हैं.

कृषि प्रधान भारतवासियों के लिए वर्षा उनके जीविकोपार्जन का मुख्य आधार है और वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रक्रिया सूर्य के द्वारा जल में प्रवेश करने से सम्पन्न होती है.यह भारतवंशी सूर्योपासक आर्यों का ही वैज्ञानिक आविष्कार है,जिसके अनुसार मकर संक्रान्ति के दिन से ही आगामी साढ़े छह महीनों यानी 195 दिनों तक तक मेघ सूर्य के वाष्पीकरण की प्रक्रिया से ‘वृष्टिगर्भ’ को धारण करते हैं तथा वर्षा ऋतु में दक्षिण पश्चिमी मानसूनी वर्षा इसी सफल ‘वृष्टिगर्भ’ का परिणाम मानी जाती है.

मकर संक्रान्ति और ‘वृष्टिगर्भ’
हमें अपने देश के राष्ट्रीय लोक पर्वों का भी विशेष आभारी रहना चाहिए कि ये पर्व धार्मिक महोत्सव होने के साथ साथ पर्यावरण संचेतना के प्रति भी लोगों को जागरूक रखते हैं. वैज्ञानिक धरातल पर मकर राशि में सूर्य के प्रवेश होने का तात्पर्य है वाष्पीकरण की सतत प्रक्रिया द्वारा मानसूनों का गर्भाधान होना,जिसे भारतीय ऋतुवैज्ञानिक ‘वृष्टिगर्भ’ कहते हैं. मकर संक्रान्ति की प्रभात वेला में भारतवर्ष का कृषक वर्ग इसी वृष्टिकारक सूर्य को ‘वृष्टिगर्भ’ के सफल निष्पादन हेतु प्रणाम करता है तथा आने वाले समय में सुख-समृद्धि और फसल के अनुकूल मानसूनी वर्षा की कामना करता है.
जलवायु परिवर्तन और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के इस दौर में छठ पर्व भी महज एक धार्मिक आस्था का पर्व नहीं रह जाता है बल्कि भूमिगत जलस्तर को सुधारने हेतु परम्परागत जल-स्रोतों जैसे तालाब, सरोवर, नदियों आदि जलाशयों के संरक्षण, संवर्धन और उनकी साफ-सफाई का पर्यावरण वैज्ञानिक अभियान भी है ताकि ‘वाटर हारवेस्टिंग’ जैसे परम्परागत वृष्टिविज्ञान और जलविज्ञान को पुनर्जीवित किया जा सके. कार्तिक मास में छठ पूजा के बाद देव प्रबोधिनी एकादशी से पुरुष और प्रकृति के मिलन की ऋतु आती है.

छठ पर्व मेघों के गर्भधारण का पर्व
जलवायु परिवर्तन और ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के इस दौर में छठ पर्व भी महज एक धार्मिक आस्था का पर्व नहीं रह जाता है बल्कि भूमिगत जलस्तर को सुधारने हेतु परम्परागत जल-स्रोतों जैसे तालाब, सरोवर, नदियों आदि जलाशयों के संरक्षण, संवर्धन और उनकी साफ-सफाई का पर्यावरण वैज्ञानिक अभियान भी है ताकि ‘वाटर हारवेस्टिंग’ जैसे परम्परागत वृष्टिविज्ञान और जलविज्ञान को पुनर्जीवित किया जा सके. कार्तिक मास में छठ पूजा के बाद देव प्रबोधिनी एकादशी से पुरुष और प्रकृति के मिलन की ऋतु आती है. जब सूर्य ‘हस्तिशुण्डविधि’ से तालाब, सरोवर आदि प्राकृतिक जलाशयों से वाष्पीकरण करते हैं तथा अन्तरिक्ष में मेघों का गर्भधारण होता है.यही मेघ चान्द्रमास के बारह पक्षों यानी छह महीनों के बाद चातुर्मास में मानसूनों की वर्षा द्वारा धरती को धन-धान्य से समृद्ध करते हैं. छठ पूजा के अवसर पर मिट्टी के हाथी भी बनाए जाते हैं जो प्रतीक हैं हाथी के सूंड के आकार वाले जल स्तम्भों के. इसे ही भारतीय ऋतुविज्ञान में ‘हस्तिशुण्डविधि’ कहते हैं, जिनसे मानसून बनने की प्रक्रिया सक्रिय रहती है.पूजा में गन्ने के बारह पेड़ उसके नीचे मिट्टी का एक घड़ा और छह दिए जलाकर रखे जाते हैं ताकि यथाकाल छह महीने का वृष्टिगर्भ सफल हो सके.छठ पर्व के अवसर पर भारतवर्ष का कृषक वर्ग प्रतिवर्ष अस्त होते और उगते वृष्टिकारक सूर्य से यही कामना करता है कि नियत समय पर मानसूनों की वर्षा हो ताकि उसका राष्ट्र खुशहाल हो सके –
“निकामे निकामे वर्षन्तु मेघाः”

आगामी लेख में पढिए- “वर्षा के पूर्वानुमान की ऋतुवैज्ञानिक मान्यताएं” 
✍🏻मोहन चंद तिवारी, हिमान्तर में प्रकाशित आलेख
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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