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शनिवार, 14 जनवरी 2017

मकर संक्रान्ति पर्व की हार्दिक मंगलकामनाऐं

मकर संक्रांति
मकर संक्रान्ति (अंग्रेज़ी: Makar Sankranti) भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष जनवरी के महीने में समस्त भारत में मनाया जाता है। इस दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बाँटा जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीज़ें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर पर इस पर्व में सूर्य देव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है। इन्हीं की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज उत्पन्न करती है, जिससे जीव समुदाय का भरण-पोषण होता है। यह एक अति महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य एवं उत्सव है। लगभग 80 वर्ष पूर्व उन दिनों के पंचांगों के अनुसार, यह 12वीं या 13वीं जनवरी को पड़ती थी, किंतु अब विषुवतों के अग्रगमन (अयनचलन) के कारण 13वीं या 14वीं जनवरी को पड़ा करती है।

मकर संक्रांति
संक्रांति का अर्थ
'संक्रान्ति' का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना, अत: वह राशि जिसमें सूर्य प्रवेश करता है, संक्रान्ति की संज्ञा से विख्यात है। राशियाँ बारह हैं, यथा मेष, वृषभ, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक , धनु, मकर, कुम्भ, मीन। मलमास पड़ जाने पर भी वर्ष में केवल 12 राशियाँ होती हैं। प्रत्येक संक्रान्ति पवित्र दिन के रूप में ग्राह्य है। मत्स्यपुराण ने संक्रान्ति व्रत का वर्णन किया है। एक दिन पूर्व व्यक्ति (नारी या पुरुष) को केवल एक बार मध्याह्न में भोजन करना चाहिए और संक्रान्ति के दिन दाँतों को स्वच्छ करके तिल युक्त जल से स्नान करना चाहिए। व्यक्ति को चाहिए कि वह किसी संयमी ब्राह्मण गृहस्थ को भोजन सामग्रियों से युक्त तीन पात्र तथा एक गाय यम, रुद्र एवं धर्म के नाम पर दे और चार श्लोकों को पढ़े, जिनमें से एक यह है- 'यथा भेदं' न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्। तथा ममास्तु विश्वात्मा शंकर:शंकर: सदा।। अर्थात् 'मैं शिव एवं विष्णु तथा सूर्य एवं ब्रह्मा में अन्तर नहीं करता, वह शंकर, जो विश्वात्मा है, सदा कल्याण करने वाला है। दूसरे शंकर शब्द का अर्थ है- शं कल्याणं करोति। यदि हो सके तो व्यक्ति को चाहिए कि वह ब्राह्मण को आभूषणों, पर्यंक, स्वर्णपात्रों (दो) का दान करे। यदि वह दरिद्र हो तो ब्राह्मण को केवल फल दे। इसके उपरान्त उसे तैल-विहीन भोजन करना चाहिए और यथा शक्ति अन्य लोगों को भोजन देना चाहिए। स्त्रियों को भी यह व्रत करना चाहिए। संक्रान्ति, ग्रहण, अमावस्या एवं पूर्णिमा पर गंगा स्नान महापुण्यदायक माना गया है और ऐसा करने पर व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। प्रत्येक संक्रान्ति पर सामान्य जल (गर्म नहीं किया हुआ) से स्नान करना नित्यकर्म कहा जाता है, जैसा कि देवीपुराण में घोषित है- 'जो व्यक्ति संक्रान्ति के पवित्र दिन पर स्नान नहीं करता वह सात जन्मों तक रोगी एवं निर्धन रहेगा; संक्रान्ति पर जो भी देवों को हव्य एवं पितरों को कव्य दिया जाता है, वह सूर्य द्वारा भविष्य के जन्मों में लौटा दिया जाता है।
पुण्यकाल
मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग बेचने वाला
प्राचीन ग्रंथ में ऐसा लिखित है कि केवल सूर्य का किसी राशि में प्रवेश मात्र ही पुनीतता का द्योतक नहीं है, प्रत्युत सभी ग्रहों का अन्य नक्षत्र या राशि में प्रवेश पुण्यकाल माना जाता है। हेमाद्रि एवं काल निर्णय ने क्रम से जैमिनि एवं ज्योति:शास्त्र से उद्धरण देकर सूर्य एवं ग्रहों की संक्रान्ति का पुण्यकाल को घोषित किया है- 'सूर्य के विषय में संक्रान्ति के पूर्व या पश्चात् 16 घटिकाओं का समय पुण्य समय है; चन्द्र के विषय में दोनों ओर एक घटी 13 फल पुण्यकाल है; मंगल के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल; बुध के लिए 3 घटिकाएँ एवं 14 पल, बृहस्पति के लिए चार घटिकाएँ एवं 37 पल, शुक्र के लिए 4 घटिकाएँ एवं एक पल तथा शनि के लिए 82 घटिकाएँ एवं 7 पल
सूर्य जब एक राशि छोड़कर दूसरी में प्रवेश करता है तो उस काल का यथावत् ज्ञान हमारी माँसल आँखों से सम्भव नहीं है, अत: संक्रान्ति की 30 घटिकाएँ इधर या उधर के काल का द्योतन करती हैं। सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश काल इतना कम होता है कि उसमें संक्रान्ति कृत्यों का सम्पादन असम्भव है, अत: इसकी सन्निधि का काल उचित ठहराया गया है। देवीपुराण में संक्रान्ति काल की लघुता का उल्लेख यों है- 'स्वस्थ एवं सुखी मनुष्य जब एक बार पलक गिराता है तो उसका तीसवाँ काल 'तत्पर' कहलाता है, तत्पर का सौवाँ भाग 'त्रुटि' कहा जाता है तथा त्रुटि के सौवें भाग में सूर्य का दूसरी राशि में प्रवेश होता है। सामान्य नियम यह है कि वास्तविक काल के जितने ही समीप कृत्य हो वह उतना ही पुनीत माना जाता है।' इसी से संक्रान्तियों में पुण्यतम काल सात प्रकार के माने गये हैं- 3, 4, 5, 7, 8, 9 या 12 घटिकाएँ। इन्हीं अवधियों में वास्तविक फल प्राप्ति होती है। यदि कोई इन अवधियों के भीतर प्रतिपादित कृत्य न कर सके तो उसके लिए अधिकतम काल सीमाएँ 30 घटिकाओं की होती हैं; किंतु ये पुण्यकाल-अवधियाँ षडशीति[15]एवं विष्णुपदी[16]को छोड़कर अन्य सभी संक्रान्तियों के लिए है।'[2]
मकर संक्रांति मनाते लोग
आज के ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जाड़े का अयन काल 21 दिसम्बर को होता है और उसी दिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। किंतु भारत में वे लोग, जो प्राचीन पद्धतियों के अनुसार रचे पंचांगों का सहारा लेते हैं, उत्तरायण का आरम्भ 14 जनवरी से मानते हैं। वे इस प्रकार उपयुक्त मकर संक्रान्ति से 23 दिन पीछे हैं। मध्यकाल के धर्मशास्त्र ग्रंथों में यह बात उल्लिखित है, यथा हेमाद्रिने कहा है कि प्रचलित संक्रान्ति से 12 दिन पूर्व ही पुण्यकाल पड़ता है, अत: प्रतिपादित दान आदि कृत्य प्रचलित संक्रान्ति दिन के 12 दिन पूर्व भी किये जा सकते हैं।
पुण्यकाल के नियम
संक्रान्ति के पुण्यकाल के विषय में सामान्य नियम के प्रश्न पर कई मत हैं। शातातप[18], जाबाल एवं मरीचि ने संक्रान्ति के धार्मिक कृत्यों के लिए संक्रान्ति के पूर्व एवं उपरान्त 16 घटिकाओं का पुण्यकाल प्रतिपादित किया है; किंतु देवीपुराण एवं वसिष्ठ[19] ने 15 घटिकाओं के पुण्यकाल की व्यवस्था दी है। यह विरोध यह कहकर दूर किया जाता है कि लघु अवधि केवल अधिक पुण्य फल देने के लिए है और 16 घटिकाओं की अवधि विष्णुपदी संक्रान्तियों के लिए प्रतिपादित है। संक्रान्ति दिन या रात्रि दोनों में हो सकती है। दिन वाली संक्रान्ति पूरे दिन भर पुण्यकाल वाली होती है। रात्रि वाली संक्रान्ति के विषय में हेमाद्रि, माधव आदि में लम्बे विवेचन उपस्थित किए गये हैं। एक नियम यह है कि दस संक्रान्तियों में, मकर एवं कर्कट को छोड़कर पुण्यकाल दिन में होता है, जबकि वे रात्रि में पड़ती हैं।
तिल के लड्डू
आजकल के पंचांगों में मकर संक्रान्ति का देवीकरण भी हो गया है। वह देवी मान ली गयी है। संक्रान्ति किसी वाहन पर चढ़ती है, उसका प्रमुख वाहन हाथी जैसे वाहन पशु हैं; उसके उपवाहन भी हैं; उसके वस्त्र काले, श्वेत या लाल आदि रंगों के होते हैं; उसके हाथ में धनुष या शूल रहता है, वह लाह या गोरोचन जैसे पदार्थों का तिलक करती है; वह युवा, प्रौढ़ या वृद्ध है; वह खड़ी या बैठी हुई वर्णित है; उसके पुष्पों, भोजन, आभूषणों का उल्लेख है; उसके दो नाम सात नामों में से विशिष्ट हैं; वह पूर्व आदि दिशाओं से आती है और पश्चिम आदि दिशाओं को चली जाती है और तीसरी दिशा की ओर झाँकती है; उसके अधर झुके हैं, नाक लम्बी है, उसके 9 हाथ है। उसके विषय में अग्र सूचनाएँ ये हैं- संक्रान्ति जो कुछ ग्रहण करती है, उसके मूल्य बढ़ जाते हैं या वह नष्ट हो जाता है; वह जिसे देखती है, वह नष्ट हो जाता है, जिस दिशा से वह जाती है, वहाँ के लोग सुखी होते हैं, जिस दिशा को वह चली जाती है, वहाँ के लोग दुखी हो जाते हैं।[2]
संक्रांति पर दान पुण्य
पूर्व पुण्यलाभ के लिए पुण्यकाल में ही स्नान दान आदि कृत्य किये जाते हैं। सामान्य नियम यह है कि रात्रि में न तो स्नान किया जाता है और न ही दान। पराशर[29] में आया है कि सूर्य किरणों से पूरे दिन में स्नान करना चाहिए, रात्रि में ग्रहण को छोड़कर अन्य अवसरों पर स्नान नहीं करना चाहिए। यही बात विष्णुधर्मसूत्र में भी है। किंतु कुछ अपवाद भी प्रतिपादित हैं। भविष्यपुराण [30] में आया है कि रात्रि में स्नान नहीं करना चाहिए, विशेषत: रात्रि में दान तो नहीं ही करना चाहिए, किंतु उचित अवसरों पर ऐसा किया जा सकता है, यथा ग्रहण, विवाह, संक्रान्ति, यात्रा, जनन, मरण तथा इतिहास श्रवण में। अत: प्रत्येक संक्रान्ति पर विशेषत: मकर संक्रान्ति पर स्नान नित्य कर्म है।
दान निम्न प्रकार के किये जाते हैं-
मेष में भेड़, वृषभ में गायें, मिथुन में वस्त्र, भोजन एवं पेय पदार्थ, कर्कट में घृतधेनु, सिंह में सोने के साथ वाहन, कन्या में वस्त्र एवं गौएँ, नाना प्रकार के अन्न एवं बीज, तुला-वृश्चिक में वस्त्र एवं घर, धनु में वस्त्र एवं वाहन, मकर में इन्घन एवं अग्नि, कुम्भ में गौएँ जल एवं घास, मीन में नये पुष्प। अन्य विशेष प्रकार के दानों के विषय में देखिए स्कन्दपुराण [31], विष्णुधर्मोत्तर, कालिका. [32] आदि।[33]
उपवास
मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उडाते हुए, वाराणसी
मकर संक्रान्ति के सम्मान में तीन दिनों या एक दिन का उपवास करना चाहिए। जो व्यक्ति तीन दिनों तक उपवास करता है और उसके उपरान्त स्नान करके अयन[34] पर सूर्य की पूजा करता है, विषुव एवं सूर्य या चन्द्र के ग्रहण पर पूजा करता है तो वह वांछित इच्छाओं की पूर्णता पाता है। आपस्तम्ब में आया है कि जो व्यक्ति स्नान के उपरान्त अयन, विषुव, सूर्यचंद्र-ग्रहण पर दिन भर उपवास करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है। किंतु पुत्रवान व्यक्ति को रविवार, संक्रान्ति एवं ग्रहणों पर उपवास नहीं करना चाहिए[35]। राजमार्तण्ड में संक्रान्ति पर किये गये दानों के पुण्य-लाभ पर दो श्लोक हैं- 'अयन संक्रान्ति पर किये गये दानों का फल सामान्य दिन के दान के फल का कोटिगुना होता है और विष्णुपदी पर वह लक्षगुना होता है; षडशीति पर यह 86000 गुना घोषित है[36]। चंद्र ग्रहण पर दान सौ गुना एवं सूर्य ग्रहण पर सहस्त्र गुना, विषुव पर शतसहस्त्र गुना तथा आकामावै[37] की पूर्णिमा पर अनन्त फलों को देने वाला है। भविष्यपुराण ने अयन एवं विषुव संक्रान्तियों पर गंगा-यमुना की प्रभूत महत्ता गायी है।[38]।[2]
नारी द्वारा दान
मकर संक्रान्ति पर अधिकांश में नारियाँ ही दान करती हैं। वे पुजारियों को मिट्टी या ताम्र या पीतल के पात्र, जिनमें सुपारी एवं सिक्के रहते हैं, दान करती हैं और अपनी सहेलियों को बुलाया करती हैं तथा उन्हें कुंकुम, हल्दी, सुपारी, ईख के टुकड़े आदि से पूर्ण मिट्टी के पात्र देती हैं। दक्षिण भारत में पोंगल नामक उत्सव होता है, जो उत्तरी या पश्चिमी भारत में मनाये जाने वाली मकर संक्रान्ति के समान है। पोंगल तमिल वर्ष का प्रथम दिवस है। यह उत्सव तीन दिनों का होता है। पोंगल का अर्थ है 'क्या यह उबल रहा' या 'पकाया जा रहा है?'
संक्रांति पर श्राद्ध
कुछ लोगों के मत से संक्रान्ति पर श्राद्ध करना चाहिए। विष्णु धर्मसूत्र [39] में आया है- 'आदित्य अर्थात् सूर्य के संक्रमण पर अर्थात जब सूर्य एक राशि से दूसरी में प्रवेश करता है, दोनों विषुव दिनों पर, अपने जन्म-नक्षत्र पर[40] विशिष्ट शुभ अवसरों पर काम्य श्राद्ध करना चाहिए; इन दिनों के श्राद्ध से पितरों को अक्षय संतोष प्राप्त होता है। यहाँ पर भी विरोधी मत हैं। शूलापाणि के मत से संक्रान्ति-श्राद्ध में पिण्डदान होना चाहिए, किंतु निर्णयसिंधु[41]के मत से श्राद्ध पिण्डविहीन एवं पार्वण की भाँति होना चाहिए। संक्रान्ति पर कुछ कृत्य वर्जित भी थे। विष्णुपुराण[42] में वचन है- 'चतुर्दशी, अष्टमी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं संक्रान्ति पर्व कहे गये हैं; जो व्यक्ति ऐसे अवसर पर संभोग करता है, तैल एवं मांस खाता है, वह विष्मूत्र-भोजन' नामक नरक[43]में पड़ता है। ब्रह्मपुराण [44] में आया है- अष्टमी, पक्षों के अंत की तिथियों में, रवि-संक्रान्ति के दिन तथा पक्षोपान्त (चतुर्दशी) में संभोग, तिल-मांस-भोजन नहीं करना चाहिए। आजकल मकर संक्रान्ति धार्मिक कृत्य की अपेक्षा सामाजिक अधिक है। उपवास नहीं किया जाता, कदाचित कोई श्राद्ध करता हो, किंतु बहुत से लोग समुद्र या प्रयाग जैसे तीर्थों पर गंगा स्नान करते हैं। तिल का प्रयोग अधिक होता है, विशेषत: दक्षिण में। तिल की महत्ता यों प्रदर्शित है- 'जो व्यक्ति तिल का प्रयोग छ: प्रकार से करता है वह नहीं डूबता अर्थात् वह असफल या अभागा नहीं होता; शरीर को तिल से नहाना, तिल से उवटना, सदा पवित्र रहकर तिलयुक्त जल देना[45], अग्नि में तिल डालना, तिल दान करना एवं तिल खाना।[46][2]
सूर्य प्रार्थना
संस्कृत प्रार्थना के अनुसार "हे सूर्य देव, आपका दण्डवत प्रणाम, आप ही इस जगत की आँखें हो। आप सारे संसार के आरम्भ का मूल हो, उसके जीवन व नाश का कारण भी आप ही हो।" सूर्य का प्रकाश जीवन का प्रतीक है। चन्द्रमा भी सूर्य के प्रकाश से आलोकित है। वैदिक युग में सूर्योपासना दिन में तीन बार की जाती थी। महाभारत में पितामह भीष्म ने भी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपना प्राणत्याग किया था। हमारे मनीषी इस समय को बहुत ही श्रेष्ठ मानते हैं। इस अवसर पर लोग पवित्र नदियों एवं तीर्थ स्थलों पर स्नान कर आदिदेव भगवान सूर्य से जीवन में सुख व समृद्धि हेतु प्रार्थना व याचना करते हैं।
मान्यता
यह विश्वास किया जाता है कि इस अवधि में देहत्याग करने वाले व्यक्ति जन्म-मरण के चक्र से पूर्णत: मुक्त हो जाते हैं। महाभारत महाकाव्य में वयोवृद्ध योद्धा पितामह भीष्म पांडवों और कौरवों के बीच हुए कुरुक्षेत्र युद्ध में सांघातिक रूप से घायल हो गये थे। उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त था। पांडव वीर अर्जुन द्वारा रचित बाणशैया पर पड़े भीष्म उत्तरायण अवधि की प्रतीक्षा करते रहे। उन्होंने सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर ही अंतिम सांस ली, जिससे उनका पुनर्जन्म न हो।
तिल
तिल संक्राति
देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज़ भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए। इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को "तिल संक्राति" के नाम से भी पुकारा जाता है। तिल के गोल-गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और शरीर को निरोग रखता है। मंकर संक्रांति में जिन चीज़ों को खाने में शामिल किया जाता है, वह पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले पदार्थ भी हैं।
सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व
जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को "सौर वर्ष" कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना "क्रान्तिचक्र" कहलाता है। इस परिधि चक्र को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना "संक्रान्ति" कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को "मकर संक्रान्ति" कहते हैं।
मकर संक्राति के अवसर पर गंगा स्नान करते श्रद्धालु
सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना 'उत्तरायण' तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना 'दक्षिणायन' है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था। मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति प्रत्येक वर्ष प्रायः 14 जनवरी को पड़ती है।
आभार प्रकट करने का दिन
पंजाब, बिहार व तमिलनाडु में यह समय फ़सल काटने का होता है। कृषक मकर संक्रान्ति को 'आभार दिवस' के रूप में मनाते हैं। पके हुए गेहूँ और धान को स्वर्णिम आभा उनके अथक मेहनत और प्रयास का ही फल होती है और यह सम्भव होता है, भगवान व प्रकृति के आशीर्वाद से। विभिन्न परम्पराओं व रीति–रिवाज़ों के अनुरूप पंजाब एवं जम्मू–कश्मीर में "लोहड़ी" नाम से "मकर संक्रान्ति" पर्व मनाया जाता है। सिन्धी समाज एक दिन पूर्व ही मकर संक्रान्ति को "लाल लोही" के रूप में मनाता है। तमिलनाडु में मकर संक्रान्ति 'पोंगल' के नाम से मनाया जाता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार में 'खिचड़ी' के नाम से मकर संक्रान्ति मनाया जाता है। इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं चूड़ादही का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डु बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।
गुड़
खिचड़ी संक्रान्ति
चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होनी प्रारम्भ हो जाती है। बसन्त के आगमन से स्वास्थ्य का विकास होना प्रारम्भ होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान व सूर्योपासना के बाद ब्राह्मणों को गुड़, चावल और तिल का दान भी अति श्रेष्ठ माना गया है। महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रान्ति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक–दूसरे का वितरित करते हुए शुभ कामनाएँ देकर यह त्योहार मनाया जाता है।
संक्रान्ति दान और पुण्यकर्म का दिन
संक्रान्ति काल अति पुण्य माना गया है। इस दिन गंगा तट पर स्नान व दान का विशेष महत्त्व है। इस दिन किए गए अच्छे कर्मों का फल अति शुभ होता है। वस्त्रों व कम्बल का दान, इस जन्म में नहीं; अपितु जन्म–जन्मांतर में भी पुण्यफलदायी माना जाता है। इस दिन घृत, तिल व चावल के दान का विशेष महत्त्व है। इसका दान करने वाला सम्पूर्ण भोगों को भोगकर मोक्ष को प्राप्त करता है, ऐसा शास्त्रों में कहा गया है। उत्तर प्रदेश में इस दिन तिल दान का विशेष महत्त्व है। महाराष्ट्र में नवविवाहिता स्त्रियाँ प्रथम संक्रान्ति पर तेल, कपास, नमक आदि वस्तुएँ सौभाग्यवती स्त्रियों को भेंट करती हैं। बंगाल में भी इस दिन तिल दान का महत्त्व है। राजस्थान में सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन तिल के लड्डू, घेवर तथा मोतीचूर के लड्डू आदि पर रुपये रखकर, "वायन" के रूप में अपनी सास को प्रणाम करके देती है तथा किसी भी वस्तु का चौदह की संख्या में संकल्प करके चौदह ब्राह्मणों को दान करती है।
पतंग
पतंग उड़ाने का दिन
यह दिन सुन्दर पतंगों को उड़ाने का दिन भी माना जाता है। लोग बड़े उत्साह से पतंगें उड़ाकर पतंगबाज़ी के दाँव–पेचों का मज़ा लेते हैं। बड़े–बड़े शहरों में ही नहीं, अब गाँवों में भी पतंगबाज़ी की प्रतियोगिताएँ होती हैं।
गंगास्नान व सूर्य पूजा
पवित्र गंगा में नहाना व सूर्य उपासना संक्रान्ति के दिन अत्यन्त पवित्र कर्म माने गए हैं। संक्रान्ति के पावन अवसर पर हज़ारों लोग इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर, महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। गुड़ व श्वेत तिल के पकवान सूर्य को अर्पित कर सभी में बाँटें जाते हैं। गंगासागर में पवित्र स्नान के लिए इन दिनों श्रद्धालुओं की एक बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है।
चावल
पुण्यकाल के शुभारम्भ का प्रतीक
मकर संक्रान्ति के आगामी दिन जब सूर्य की गति उत्तर की ओर होती है, तो बहुत से पर्व प्रारम्भ होने लगते हैं। इन्हीं दिनों में ऐसा प्रतीत होता है कि वातावरण व पर्यावरण स्वयं ही अच्छे होने लगे हैं। कहा जाता है कि इस समय जन्मे शिशु प्रगतिशील विचारों के, सुसंस्कृत, विनम्र स्वभाव के तथा अच्छे विचारों से पूर्ण होते हैं। यही विशेष कारण है, जो सूर्य की उत्तरायण गति को पवित्र बनाते हैं और मकर संक्रान्ति का दिन सबसे पवित्र दिन बन जाता है।
खगोलीय तथ्य
सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की थी। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।
आखिर ऐसा क्यों?
सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को 'मकर संक्रांति' कहा जाता है। साल 2012 में यह 14 जनवरी की मध्यरात्रि में था। इसलिए उदय तिथि के अनुसार मकर संक्रांति 15 जनवरी को पड़ी थी। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। मतलब 1728 (72 गुणा 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद 'मकर संक्रांति' 15 जनवरी को पड़ेगी।
ज्योतिषीय आकलन
दालें
ज्योतिषीय आकलन के अनुसार सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकेंड बढ़ रही है। माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर संक्रांति 31 दिसंबर को मनाई जाती थी। पिछले एक हज़ार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने की वजह से 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 5000 साल बाद मकर संक्रांति फ़रवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।[47]
विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति
मकर संक्रान्ति भारत के भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थ रखती है। किन्तु सदा की भॉंति, नानाविधी उत्सवों को एक साथ पिरोने वाला एक सर्वमान्य सूत्र है, जो इस अवसर को अंकित करता है। यदि दीपावली ज्योति का पर्व है तो संक्रान्ति शस्य पर्व है, नई फ़सल का स्वागत करने तथा समृद्धि व सम्पन्नता के लिए प्रार्थना करने का एक अवसर है।
उत्तर प्रदेश में मकर-सक्रांति
उत्तर प्रदेश में यह मुख्य रूप से दान का पर्व है. इलाहाबाद में यह पर्व माघ मेले के नाम से जाना जाता है. 14 जनवरी से इलाहाबाद मे हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है. 14 दिसम्बर से 14 जनवरी का समय खर मास के नाम से जाना जाता है. और उत्तर भारत मे तो पहले इस एक महीने मे किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम नही दिया जाता था. मसलन विवाह आदि मंगल कार्य नहीं किए जाते थे पर अब तो समय के साथ लोग काफ़ी बदल गए है. 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है. माघ मेला पहला नहान मकर संक्रान्ति से शुरू होकर शिवरात्रि तक यानी आख़िरी नहान तक चलता है. संक्रान्ति के दिन नहान के बाद दान करने का भी चलन है.समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है और इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है. इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगता है.
उत्तराखंड में मकर-सक्रांति
उत्तराखंड के बागेश्वर में बड़ा मेला होता है. वैसे गंगा स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं. इस दिन गंगा स्नान करके, तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है. इस पर्व पर भी क्षेत्र में गंगा एवं रामगंगा घाटों पर बड़े मेले लगते है.
महाराष्ट्र में मकर-सक्रांति
महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं. ताल-गूल नामक हलवे के बांटने की प्रथा भी है. लोग एक दूसरे को तिल गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं :- `तिल गुड़ ध्या आणि गोड़ गोड़ बोला` अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो। इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं.
पंजाब में लोहड़ी
मुख्य लेख : लोहड़ी
मकर संक्रान्ति भारत के अन्य क्षेत्रों में भी धार्मिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। पंजाब में इसे 'लोहड़ी' कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहंदी रचाती हैं।
बंगाल में मकर-सक्रांति
गुड़ और तिल से बनी गजक
पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं, जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे 'गंगासागर मेला' कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है। बंगाल में इस पर्व पर स्नान पश्चात तिल दान करने की प्रथा है. यहां गंगासागर में हर साल विशाल मेला लगता है. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं. मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था. इस दिन गंगा सागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीड़ होती है. लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं.
कर्नाटक में मकर-सक्रांति
कर्नाटक में भी फ़सल का त्योहार शान से मनाया जाता है। बैलों और गायों को सुसज्जित कर उनकी शोभा यात्रा निकाली जाती है। नये परिधान में सजे नर-नारी, ईख, सूखा नारियल और भुने चने के साथ एक दूसरे का अभिवादन करते हैं। पंतगबाज़ी इस अवसर का लोकप्रिय परम्परागत खेल है।
गुजरात में मकर-सक्रांति
गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भर जाता है। गुजराती लोग संक्रान्ति को एक शुभ दिवस मानते हैं और इस अवसर पर छात्रों को छात्रवृतियाँ और पुरस्कार बाँटते हैं।
केरल में मकर-सक्रांति
केरल में भगवान अयप्पा की निवास स्थली सबरीमाला की वार्षिक तीर्थयात्रा की अवधि मकर संक्रान्ति के दिन ही समाप्त होती है, जब सुदूर पर्वतों के क्षितिज पर एक दिव्य आभा ‘मकर ज्योति’ दिखाई पड़ती है।
तमिलनाडु में मकर-सक्रांति
तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है.पहले दिन भोगी-पोंगल, दूसरे दिन सूर्य-पोंगल, तीसरे दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल, चौथे व अंतिम दिन कन्या-पोंगल. इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है. पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं. इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है. उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं. असम में मकर संक्रांति को माघ-बिहू या भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं. राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद लेती हैं. साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन व संकल्प कर चौदह ब्राह्मणों को दान देती हैं. अन्य भारतीय त्योहारों की तरह मकर संक्रांति पर भी लोगों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है.

आप सब को मकर संक्रान्ति पर्व की हार्दिक मंगलकामनाऐं । भगवान सूर्य देव के उत्तरायण होने पर भारतवर्ष के उजाले में वृद्धि के प्रतीक पर्व "मकर संक्रान्ति" पर आप सब के जीवन भी प्रकाशमान हों, ऐसी शुभेच्छा के साथ आप को मंगलकानाऐं व बधाई , चलते रहिये ,सुप्रभात , नमस्कार , वन्देमातरम् !
🙏🙏
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रविवार, 1 जनवरी 2017

नया साल कैसे बना 1 जनवरी ?

दोस्तों हर साल आपको, एक हि साल में, कई बार, कुछ सन्देश मिलते होंगे, की ये नया साल मनाओ वो नया साल मनाओ… लेकिन ज्यादा कुछ पता नहीं चलता होगा की कौन कब क्यूँ कोई अलग हि नया साल मना रहा होता है..
 
आखिर है क्या नया साल ?
नया साल किस दिन आता है ?
आखिर नया साल कब से मनाया जा रहा है ?
क्या नया साल शुरू से 1 January से हि मनाया जाता रहा है ?
नया साल कैसे बना 1 जनवरी ?
नया साल रात को १२ बजे क्यूँ शुरू माना जाता है ?
 
जब हम इन सभी सवालों के जवाब ढूंढने चलते हैं तो हमको कुछ और सवालों के जवाब भी मिलते हैं जो आज के ज़माने में बहुत हि कम लोग जानते हैं, जैसे :-
 
एक साल में 365 दिन हि क्यूँ ?
एक साल में 12 महीने हि क्यूँ ?
एक महीने में 30 – 31 दिन हि क्यूँ ?
एक हफ्ते में सात दिन हि क्यूँ ?
एक दिन में 24 घंटे हि क्यूँ ?
सात दिनों के नाम कैसे पड़े ?
12 महीनों के नाम कैसे पड़े ?
फरवरी 28 दिन का हि क्यूँ ?
जुलाई और अगस्त लगातार 31 दिन के हि क्यूँ ?
अप्रैल फूल 1 अप्रैल को कब से मनाया जाता है ?अप्रैल फूल कैसे शुरू हुआ और क्यूँ ?
क्यूँ ज्यादातर विश्व का वित्तीय वर्ष 1 अप्रैल से शुरू होता है ?
 
ऐसे कई रोचक सवाल हैं जिनका जवाब आपके अंग्रेजी स्कूल के teachers के पास भी नहीं मिलेगा. आप चाहे तो उनसे जानने की कोशिश कर सकते हैं … कोई विरला हि होगा जो इन सवालों के जवाब दे पायेगा ..आइये शुरू करते हैं अपनी ज्ञान यात्रा.
आपने शायद ये तो सुना हि होगा की हिन्दू सनातन धर्म को सारा विश्व सबसे पुराना मानता है. अगर आपने अभी तक ऐसा नही सुना तो जान लीजिये की विश्व के बड़े जाने माने नाम भारत के बारे में क्या बोलकर गए हैं
 
इसी हिन्दू सनातन धर्म से निकला सबसे पहला (कुछ देर के लिए मान लीजिये, साबित थोड़ी देर में हो जायेगा) केलिन्डर. जो की पूर्णतः गृह नक्षत्रों के आधार और उनकी स्तिथि व दिशा के आधार पर बनाया गया था. उदाहरण के लिए दिवाली हर साल अमावस की रात को होती है लेकिन दिवाली की कोई निश्चित तारीख अंग्रेजी केलिन्डर में फिक्स नहीं होती यानि दुसरे शब्दों में अगर दिवाली ३ नवम्बर २०१४ को अमावस थी तो ३ नवम्बर २०१५ को अमावस नही होगी. ऐसा इसलिए की हिन्दू केलिन्डर पुर्णतः गृह और नक्षत्रों के आधार पर बनाया गया, जबकि अंग्रेजी केलिन्डर की शुरुआत भारतीय हिन्दू केलिन्डर की नकल से बनाया गया (कुछ देर में ये बात साबित हो जाएगी).
Earth
1 साल में 365 दिन क्यूँ होते हैं ? 365 दिन में पृथ्वी सूर्य की सम्पूर्ण परिक्रमा करती है. (365.25 दिन जो चार साल में .२५*४ होने से 366 बन जाता है)
 
1 साल में १२ मास (महीने) क्यूँ ? हिन्दू केलिन्डर नक्षत्रों पर आधारित है, चंद्रमा हर महीने पूर्ण रूप से खत्म (अमावस) व् पूर्ण स्वरुप (पूर्णिमा) में दिखाई देता है. इस नए चंद्रमा के बनने की शुरुआत से लेकर अगली नयी शुरुआत तक के समय को चन्द्रमा का एक चक्र कहते हैं. हिन्दू केलिन्डर में हर मास की तारीख इस तरह से होती हैं,  
शुकल पक्ष की एकम, द्वितीय, तृतीया चतुर्थी,पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा (15 वा दिन),
फिर से एकम लेकिन अब चन्द्र घटना शुरू होगा अर्थात काला होने लगेगा तो कृष्ण पक्ष की एकम ,द्वितीय, तृतीया चतुर्थी,पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या (30 वा दिन). इसी प्रकार 1 मास को ३० दिन में बांटा गया.
लेकिन उस समय के विज्ञानं के अनुसार (करोड़ो लाखों वर्षों पूर्व) यह चक्र ३० व् ३१ दिन का माना जाता था. तो उसी के अनुसार पहले महीने में ३१ दिन, दुसरे में ३०, तीसरे में ३१ इस तरह से केलिन्डर बनाया गया.
 
नतीजा क्या हुआ ३१+३०+३१+३०+३१+३०+३१+३०+३१+३०+३१ ऐसे पुरे ग्यारह महीने तो बन गए लेकिन क्यूंकि साल में 365 दिन हि होने थे तो बाकी बचे दिन सिर्फ २९ जो की आखरी महीने में रखे गए जैसा की स्वाभाविक भी है की बैलेंसिंग figure आखरी में डाला जाता है. (365-३३६ दिन = २९ दिन)
अब ये सोचने वाली बात है की आखरी महिना तो दिसम्बर होता है (आज के अंग्रेजी केलिन्डर के अनुसार ) लेकिन दिसम्बर तो पुरे ३१ दिन का होता है. तो इसको समझिये,
 
हुआ यूँ की पुराना हिन्दू केलिन्डर जो शुरू होता था आज के 1 मार्च से. (मुझे मालूम है आप कहेंगे 1 अप्रैल लेकिन ऐसा बाद मे हुआ, पहले 1 मार्च से था उसके बाद 1 अप्रैल से हुआ). 1 मार्च अंग्रेजी केलिन्डर का तीसरा महिना होता है, जबकि कुछ समय पहले तक हिन्दुओ का पहला महिना होता था.
यानि पहला महिना अगर march है तो आखरी महिना February हुआ. जो आज के केलिन्डर से सिर्फ थोडा सा अलग है जिसका एक और कारण है.
पहले देखिये march ३१ का पहला महिना
अप्रैल ३०
मई ३१
जून ३०
जुलाई ३१
 
अगस्त ३० का होता था लेकिन आज ३१ है क्यूंकि एक राजा ऑगस्टस के नाम पर ये महिना रखा था (हिन्दुओ ने नही, बाद के अंग्रेजो ने क्यूंकि हम आज के केलिन्डर के अनुसार नाम पढ़ रहे हैं). निचे दिया गया है की august 6 month था जो ३१ का सिर्फ इसलिए किया गया क्यूंकि राजा को लगता था उसके नाम के महीने में 1 दिन कम क्यूँ हो. ऐसा करने के लिए अगले सभी महीनों को छेड़ा गया, सितम्बर जो ३१ का होना चाहिए था वो सिर्फ ३० का कर दिया गया, अक्टूबर को ३० की जगह ३१, नवम्बर को ३०, दिसम्बर को ३१, January को ३१ का हि रखा गया और 1 दिन February से कम कर दिया गया २९ की जगह २८ यानि फिर से बैलेंसिंग figure. January को भी ३१ बाद में सिर्फ इसलिए किया गया की ये पहला महिना घोषित किया गया था (बाद में जो की आज का मौजूद केलिन्डर है)
 
Augustus for ‘August’
After Julius’s grandnephew Augustus defeated Marc Antony and Cleopatra, and became emperor of Rome, the Roman Senate decided that he too should have a month named after him. The month Sextillus (sex = six) was chosen for Augustus, and the senate justified its actions in the following resolution:
Whereas the Emperor Augustus Caesar, in the month of Sextillis . . . thrice entered the city in triumph . . . and in the same month Egypt was brought under the authority of the Roman people, and in the same month an end was put to the civil wars; and whereas for these reasons the said month is, and has been, most fortunate to this empire, it is hereby decreed by the senate that the said month shall be called Augustus.
Not only did the Senate name a month after Augustus, but it decided that since Julius’s month, July, had 31 days, Augustus’s month should equal it: under the Julian calendar, the months alternated evenly between 30 and 31 days (with the exception of February), which made August 30 days long. So, instead of August having a mere 30 days, it was lengthened to 31, preventing anyone from claiming that Emperor Augustus was saddled with an inferior month.
To accommodate this change two other calendrical adjustments were necessary:
The extra day needed to inflate the importance of August was taken from February, which originally had 29 days (30 in a leap year), and was now reduced to 28 days (29 in a leap year).
Since the months evenly alternated between 30 and 31 days, adding the extra day to August meant that July, August, and September would all have 31 days. So to avoid three long months in a row, the lengths of the last four months were switched around, giving us 30 days in September, April, June, and November.
Among Roman rulers, only Julius and Augustus permanently had months named after them—though this wasn’t for lack of trying on the part of later emperors. For a time, May was changed to Claudius and the infamous Nero instituted Neronius for April. But these changes were ephemeral, and only Julius and Augustus have had two-millenia-worth of staying power.
For further reading:
Calendar: Humanity’s Epic Struggle to Determine a True and Accurate Year, David Ewing Duncan (New York: Avon, 1998).
 
Read more: August—History of the Month’s Origin | Infoplease.com http://www.infoplease.com/spot/history-of-august.html#ixzz3August Month Facts
 
अब आते हैं महीनो के नाम पर. जैसा की आपको पहले बताया की अंग्रेजो ने भारतीय केलिन्डर की नकल की थी, उसका सबूत आज भी मौजूद है.
 
सप्त अम्बर  जो की 7 नंबर है वो आज के अंग्रेजी केलिन्डर का 9 वा महिना है.
अष्ट अम्बर 8 था, वो 10 वा महिना है.
नव अम्बर 9 था, आज 11 वा महिना है.
दश अम्बर 10 था, आज १२ वा महिना है.
 
सितंबर, अक्टूबर, नवंबर और दिसंबर क्रम से 7वाँ, 8वाँ, नौवाँ और दसवाँ महीना होना चाहिए जबकि ऐसा नहीं है। ये क्रम से 9वाँ, 10वाँ, 11वां और बारहवाँ महीना है। हिन्दी में सात को सप्त, आठ को अष्ट कहा जाता है,इसे अङ्ग्रेज़ी में sept (सेप्ट) तथा oct (ओक्ट) कहा जाता है। इसी से september तथा October बना। नवम्बर में तो सीधे-सीधे हिन्दी के “नव” को ले लिया गया है तथा दस अङ्ग्रेज़ी में “Dec” बन जाता है जिससे December बन गया। ऐसा इसलिए कि 1752 के पहले दिसंबर दसवाँ महीना ही हुआ करता था। 
 
इसका एक प्रमाण और है। जरा विचार करिए कि 25 दिसंबर यानि क्रिसमस को X-mas क्यों कहा जाता है???? इसका उत्तर ये है की “X” रोमन लिपि में दस का प्रतीक है और mas यानि मास अर्थात महीना। चूंकि दिसंबर दसवां महीना हुआ करता था इसलिए 25 दिसंबर दसवां महीना यानि X-mas से प्रचलित हो गया।
 
अब आते हैं एक हफ्ते में सात दिन हि क्यूँ ?
उस प्राचीन काल में 7 (1 सूर्य 1 चन्द्र और 5 ग्रहों को मिलाकर) ये 7 हि पृथ्वी से आँखों से सीधे देखे जा सकते हैं. (बाकी गृह को देखने के लिए दूरबीन की आवश्यकता पड़ेगी)
पृथ्वी से उत्तरोत्तर दुरी के आधार पर ग्रहों का क्रम निर्धारित किया गया जैसे शनि, गुरु, मंगल, सूर्य, शुक्र, बुध और चन्द्रमा. इनमे चंद्रमा पृथ्वी के सबसे पास है तो शनि सबसे दूर, इसमें एक एक गृह दिन के २४ घंटो में 1 -1 घंटे का अधिपति रहता है, अतः क्रम से सातों गृह 1-1 घंटे अधिपति बनते हैं, यह चक्र चलता रहता है, और 24 घंटे पुरे होने के बाद जो 25 वे घंटे का अधिपति होता है उसी के नाम से दिन का नाम होता है. सूर्य से सृष्टि शुरू हुई इसलिए पहला दिन रवि वार यानी सूर्य का दिन.
 
सूर्य पहले घंटे का अधिपति, उसके बाद शुक्र, बुध, चन्द्र, शनि, गुरु, मंगल.
8, 15, 22 का अधिपति भी सूर्य हि हुआ, २३ का शुक्र, 24 का बुध और २५ का चन्द्रमा, क्यूंकि एक दिवस में 24 हि घंटे होते हैं (क्यूंकि पृथ्वी अपनी धुरी का एक चक्कर 24 घंटे में पूर्ण करती है), तो 25 वा अधिपति अगले दिन का नाम होता है, जो की चंद्रमा हुआ, सोम माने चन्द्र. इसी क्रम को जब आप आगे बढ़ाएंगे तो मंगल, बुध, ब्रहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि आएगा.
 
अब एक और नमूना देखिये अंग्रेजो की नक़ल बिना अक्ल का.
उन्होंने Sunday हमसे चुराया, सूर्य या रवि वार,
Monday जो की moon से है, यानि चंद्रमा, यानि सोम
Tuesday जिसका कोई अर्थ नही है ? मंगल गृह को अंग्रेज mars कहते हैं लेकिन tues क्या है ये तो वो बेचारे भी नहीं जानते. आखिर किस आधार पर उन्होंने ये नाम रखा..
इसी तरह Wednesday जो की हिन्दुओ में बुध गृह है लेकिन wednes के नाम से अंग्रेजी में कोई गृह ?? आपने सुना क्या ?
Thursday भी उसी तरह से
Friday भी
Saturday हमसे हि लिया हुआ है, शनि याने Saturn गृह.
 
अब बात रही अप्रैल से शुरू होने वाले वित्तीय वर्ष की
क्यूंकि जब से बहीखाते या यूँ कहें की व्यापर जगत शुरू हुआ तब से हि पहला मास 1 अप्रैल से माना जाता रहा है. जो उससे पहले कभी 1 march (आज के केलिन्डर अनुसार) हुआ करता था. वो प्रथा सम्पूर्ण विश्व में आज भी देखने को मिलती है जिसको आप और हम सब financial year के नाम से जानते हैं असल में वोही हिन्दू केलिन्डर है.
 
अप्रैल फूल क्या है और क्यूँ मनाया जाता है और कब से ?
New Year’s Day Moves
Ancient cultures, including those of the Romans and Hindus, celebrated New Year’s Day on or around April 1. It closely follows the vernal equinox (March 20th or March 21st.) In medieval times, much of Europe celebrated March 25, the Feast of Annunciation, as the beginning of the New Year.
 
In 1582, Pope Gregory XIII ordered a new calendar (the Gregorian calendar) to replace the old Julian calendar. The new calendar called for New Year’s Day to be celebrated Jan. 1. That year, France adopted the reformed calendar and shifted New Year’s Day to Jan. 1. According to a popular explanation, many people either refused to accept the new date, or did not learn about it, and continued to celebrate New Year’s Day on April 1. Other people began to make fun of these traditionalists, sending them on “fool’s errands” or trying to trick them into believing something false. Eventually, the practice spread throughout Europe. The Gregorian calendar was adopted by England in 1752.
 
1582 में एक चर्च के पादरी ने कहा की 1 January से नया साल शुरू होगा, न कोई कारण न कोई तथ्य बस उसका मन किया और उसने ऐसा कर दिया, नतीजा महीनों के नाम उलटे सीधे हो गए. और वो यहाँ तक भी नही रुका, उसने हिन्दू केलिन्डर मानने वालों को मुर्ख कहना शुरू किया और उस दिवस का नाम मुर्ख दिवस भी खोषित किया. इसी कारण से हिन्दू नव वर्ष की जब शुरुआत होती है तब पूरा विश्व (चर्च व् ईसाईयों के गुलामों द्वारा प्रचारित व् प्रताड़ित ) मुर्ख दिवस मनाता है. शर्म तो तब आती है जब खुद हिन्दू लोग एक दुसरे को अज्ञानता या सच में मूर्खतावश अप्रैल fool मनाते हैं.

By Navneet Singhal

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