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मंगलवार, 24 मई 2022

भारतीय शिक्षा भारतीय कब होगी ?

भारतीय शिक्षा भारतीय कब होगी ? 
किसी भी सभ्यता का इतिहास उस  समाज की शिक्षा का इतिहास भी होता है क्योंकि सभ्यता के लिए आवश्यक पुरुषार्थ अपने ज्ञान परंपरा के संदर्भ में ही संभव होते हैं और किस समाज ने  ज्ञान के किन-किन रूपों की साधना की है और कितना और कैसा ज्ञान अर्जित किया है ,  इससे ही उसमें किए गए और चल रहे पुरुषार्थों का स्वरूप  निर्धारित होता है। 
आज यह विश्व विदित सत्य है कि प्राचीन भारत में जिस शिक्षा व्यवस्था का प्रचार था , वह अपने समय के विश्व की अन्य शिक्षा व्यवस्थाओं की तुलना   में सर्वाधिक श्रेष्ठ और समुन्नत थी ।  
जब कुछ अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारी के रूप में भारत आए और यहां के समाज में कुछ प्रतिष्ठा पाने का प्रयास करने लगे तो उन्होंने पाया कि इस समाज में शिक्षा का बहुत अधिक आदर है इसलिए उन्हें लगा कि हम भी यहां के लोगों को शिक्षा में रुचि लेते हुए दिखे तो शायद इससे हमारा कुछ सम्मान बढ़ेगा और तब हमें अपना व्यापार फैलाने में सहायता मिलेगी इसके लिए उन्होंने कोलकाता और काशी मे विद्यालय स्थापित किए । यद्यपि उन्हे एक आशा यह थी कि शायद इन विद्यालयों द्वारा छद्म रूप से ईसाइयत के प्रसार मे भी सहायता मिलेगी । 
1780 ईस्वी मे कोलकाता मे  एक मदरसा बनाया ताकि उस इलाके के नवाब प्रसन्न हों और 1791 ईस्वी मे काशी मे  संस्कृत विद्यालय बनाया ताकि काशी , दरभंगा , हथुआ, जगदीशपुर , बेतिया , टेकरी , बनैली ,  आदि के राजा गण प्रसन्न हों और शायद वे अपने बच्चों को भी यहाँ पढ़ाने लगें । यह अलग बात है कि दरभंगा नरेश ने स्वयं  एक विशाल संस्कृत विद्यालय की स्थापना की , जो बाद मे विश्व विद्यालय ही बना । 
इंग्लैंड मे यह वह दौर था जब वहाँ भारत की लूट से पहली बार धन पहुँचना शुरू हुआ जो भारतीय व्यापारियों के लिए तो नगण्य धन था पर कंगाल और भूखे इंग्लैंड के लिए वह मानो स्वर्ग का खजाना खुल गया था । भारत के सुंदर मुलायम सूती और रेशमी वस्त्र इंग्लैंड और यूरोप के धनियों के लिए मानो देवलोक की वस्तुएं थे । उधर सामान्य अंग्रेज़ भूख और अभाव से बिलबिलाता था और सस्ती जिन पीकर हजारों गरीब अंग्रेज़ दम तोड़ रहे थे । \
इधर समुद्र मे अपनी अपनी नौकाएँ लिए इंग्लैंड , फ़्रांस और स्पेन के डकैत और लुटेरे ( जो बाद मे व्यापारी कहे जाने लगे ताकि उनके पाप छिपाए जा सकें )आपस मे एक दूसरे को मार और लूट रहे थे और इंग्लैंड मे शिक्षा केवल पादरियों और राजकुमारों तक सीमित थी । इसीलिए कंपनी ने यहाँ भी राज घरानों को ही खुश करने पर ध्यान दिया ।लेकिन जब इसमे सफल नहीं हुये तो अपना स्वतंत्र प्रयास शुरू किया । 
इस बीच इंग्लैंड से पादरी विलियम कैरी भारत आया । इसने इंग्लैंड में रहकर एक पुस्तक लिखी थी:"  हिंदुओं तथा अन्य विधर्मियों  को ईसाई बनाने की विधि "। 
उसने बंगाल में कोलकाता के आस पास आकर लोगों को ईसाई बनाने का अभियान छेड़ा । 
कुछ समय बाद ही उसकी भेंट  बनिए का यानी  साहूकारी का काम कर रहे युवक राम मोहन राय से हुई जो थोड़ी अरबी फारसी पढ़ा था और साहूकारी का धंधा कोलकाता में कर रहा था तथा विशेषकर कंपनी के लोगों को ब्याज पर रकम उधार देता था और अपना गुजारा ब्याज की रकम से चलाता था । इस तरह वह  कंपनी के लोगों से काफी घुल मिल गया था ॥ उसने  कैरी को बताया कि मैंने 9 साल की उम्र में ही अरबी और फारसी पढ़ी  है और संस्कृत भी  जानता हूं क्योंकि मैं एक बार बनारस भी घूम आया हूँ ।  पादरी विलियम कैरी को यह व्यक्ति बिल्कुल उपयुक्त लगा और उसने उसे ईस्ट इंडिया कंपनी मेंउसे  कुछ काम दिलाने का वचन दिया । कैरी की सिफ़ारिश पर  मुशीराबाद में कंपनी की अदालत में मुंशी का काम राममोहन राय करने लगा । जिस से कुछ कमाई अधिक होने लगी । पिता आर्थिक कष्ट मे थे सो उन्हे भी भेजने को कुछ बचत होने लगी । 
पादरी कैरी  और राममोहन राय ने मिलकर एक  जालसाजी से भरा ग्रंथ लिखा : " महानिर्वाण तंत्र " और यह बताया कि "महानिर्वाण तंत्र" भारतीय दर्शन का बहुत बड़ा ग्रंथ है जो कि ईसाइयत के सिद्धांतों को ही  संस्कृत में प्रस्तुत करता है और परमेश्वर के विषय में ईसाइयों की जो मान्यता है,  ठीक वही मान्यता महानिर्वाण तंत्र मे भी  ईश्वर की  है । 

इस समय तक राम मोहन राय अंग्रेजी नहीं जानता था और संस्कृत केवल कामचलाऊ जानता था।  उसने केवल मुंशीगिरी के लिए आवश्यक अरबी और फारसी ही सीखी थी इसलिए उसकी बातों को पादरी विलियम कैरी लिखता गया और यह पुस्तक रची गयी । अपनी जालसाज़ी छिपने के लिए कैरी ने मुंशी राममोहन को अरबी और संस्कृत दोनों का पंडित प्रचारित किया । राम मोहन भी इस जालसाज़ी मे पूरी तरह खुश था । 
 कंपनी का अनुबंधित अस्थायी मुलाजिम रहते हुए राममोहन राय ने एक अभियान छेड़ दिया कि  बंगाल में अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाई हो । इसके साथ ही उसने यह अभियान भी चलाया कि अंग्रेज लोग बंगाल में ज्यादा से ज्यादा संख्या में आकर बसें ।  उसके लिए भारतीयों के समक्ष यह तर्क  रखा कि देखो , यह लोग हमारा धन इंग्लैंड ले जाते हैं ,अगर यही रहेंगे तो हमारा धन यही रहेगा और वे यहीं पर व्यापार करेंगे । 
राममोहन की मदद से कंपनी ने एक एंग्लो संस्कृत स्कूल कोलकाता मे खोला , बाद मे उसे ही वेदान्त महाविद्यालय का नाम दिया जबकि वहाँ ईसाई सिद्धान्त ही वेदान्त कहकर पढ़ाये जाते थे । 
राममोहन राय फारसी के जानकार होने के कारण और कंपनी की प्रेरणा से तथा पादरी विलियम कैरी की प्रेरणा से अकबर शाह द्वितीय नामक जो मुगल खानदान का  वंशज दिल्ली में बचा था , उसके संपर्क में आया और उनका एक पत्र लेकर लंदन जाने का वादा किया । अकबर शाह द्वितीय अपनी पेन्सन बढ़ाने की अर्जी भेजना चाहता था । 
राम मोहन ने अकबर शाह द्वितीय  को समझाया कि इंग्लैंड में लोग तभी मेरी इज्जत करेंगे ,जब आप मुझे भी एक राजा की उपाधि देकर भेजें । 
तब 1830  ईसवी में पहली बार अकबर शाह द्वितीय ने  उसे कागज में राजा लिख दिया तथा अपना संदेश और अपनी विनती लिखकर लंदन मे भारत सचिव को देने के लिए राम मोहन राय को लंदन भेजा । इस बीच राममोहन राय ने ईसाई बपतिस्मा ले लिया था और भारत तथा लंदन आता जाता रहा । इस प्रकार जीवन के अंतिम 3 वर्ष मे वह कागज पर राजा कहलाता रहा । जबकि आजीवन वह एक कंपनी के अधीन एक अनुबंधित अस्थायी मुंशी था।  
अंत में 3  वर्षों बाद वह लंदन में मरा और ईसाई  पद्धति से दफनाया गया । कुछ समय बाद , जिस ईसाई कब्रिस्तान में उसे  दफनाया गया था , वहां के लोगों ने उसे इसके लायक नहीं माना और 9 साल बाद उसे उस कब्र से निकाल कर ब्रिस्टल मे एक दूसरे कब्रिस्तान की कब्र में फिर से 7 फुट गहरे गड्ढे में दफनाया गया । उस कब्रिस्तान के पादरी लोग प्रतिवर्ष 27  सितंबर को राम मोहन राय की स्मृति में प्रार्थना करने उस कब्र पर इकट्ठा होते हैं और नेहरू जी की प्रेरणा से तथा कांग्रेस शासन की योजना से भारतीय राजदूत वहां 1947 ईस्वी के बाद भी प्रतिवर्ष ईसाई कब्रिस्तान में पहुंचकर"  मृतक राम मोहन राय को ईसाई गॉड सद्गति दें" ,  इस प्रार्थना की सभा में शामिल होते हैं । कांग्रेसी लेखक उन्हे राजा राम मोहन राय लिखते हैं । 
राम मोहन राय की प्रेरणा से ईसाई पादरियों ने कोलकाता के आसपास लगभग आधे बंगाल में यह वातावरण बना दिया था कि  भारत में अंग्रेज बस जाएं , यह भारत के राजा और नवाब लोग चाहते हैं और इसीलिए उन्होंने राम मोहन राय को बहुत बड़ा पंडित और सम्पन्न व्यक्ति ,  दोनों बताया जबकि राम मोहन राय आजीवन अपने पिता की गरीबी से दुखी रहा करते और उन्हें कुछ आर्थिक मदद करने के लिए मुंशीगिरी  करते रहे । राममोहन राय ने यह अभियान छेड़ा कि भारत में अंग्रेजी माध्यम से ही शिक्षा हो,  यह आवश्यक है ।
इस बीच ईस्ट इंडिया कंपनी का महा प्रबंधक बनकर विलियम बेंटिक नामक एक महा बदमाश आया जिसकी जालसाजी की चर्चा स्वयं इंग्लैंड की संसद में बाद में हुई थी । उसने राम मोहन की तथा कुछ अन्य  बाँगालियों की मदद से,  विशेषकर प्रार्थना समाज और ब्रह्म समाज की मदद से , यह झूठी अफवाह फैलाई और लंदन में यह रिपोर्ट बारंबार फैलाई कि भारत में हर विधवा  स्त्री को जबरन सती कहकर जला  दिया जाता है और यहां बाल विवाह की कुप्रथा  मौजूद है । ताकि इंग्लैंड के सम्पन्न लोगों को लगे कि कंपनी भारत में जो कर रही है, वह अच्छा ही है। 
 ऐसा वातावरण बन जाने के बाद कंपनी का एक सलाहकार बन कर थॉमस बेबिंगटन  मैकाले नामक व्यक्ति  आया । इसके विषय मे भी भारत मे भारी झूठ फैलाया गया है । 
थॉमस बेबिंगटन मैकाले इंग्लैंड के लिसिस्टरशायर कस्बे में 1800 ईस्वी में पैदा हुआ था और उसने  कस्बे  के एक चर्च में ईसाई कानून की शिक्षा प्राप्त की।  कंपनी का कर्मचारी बन  कर वह 1834 ईस्वी में भारत आया । उसे यह जिम्मा दिया गया कि क्योंकि तुम ईसाई कानून के जानकार हो इसलिए हम जो जाली और फर्जी कोर्ट यहाँ  चलाते हैं,  उसमें कानूनी निर्णय के नाम पर की जा रही जालसाजी में हमारी मदद करो । 
कंपनी भारत में जो कोर्ट चलाती थी वह पूरी तरह जालसाजी और धोखाधड़ी थी और उसका न तो भारत के किसी विधि परंपरा से कोई संबंध था और ना ही स्वयं इंग्लैंड के किसी कानून के अनुसार वह कोर्ट चल रही थी । वह पूरी तरह  जालसाजी थी।  यह बात लंदन में वहां की संसद में वहां के अनेक माननीय सांसदों ने स्वयं प्रमाण सहित कही थी,  जिसके अभिलेख विद्यमान है। 
भारत के बहुत से पढे लिखे लोगों मे इतनी अधिक अंग्रेज़ भक्ति है कि श्रद्धा के  अतिरेक मे वे अंग्रेजों की हर बात को अधिकृत मानते हैं , उन्हे भी जिनहे स्वयम अंग्रेज़ लोग अधिकृत नहीं मानते । 
इंग्लैंड मे व्यापारियों को अपना प्रधान वहाँ के क्राउन को दिखाना पड़ता था परंतु कंपनी पूरी तरह निजी होती थी । केवल कमीशन शासन मे जमा करना होता  था  । 
1834 ईस्वी मे कंपनी का भारत मे यानी मुख्यतः बंगाल मे महा प्रबन्धक था बेंटिक। उसके अधीन विधि सलाहकार बनकर आया थॉमस बेबिंगटन मेकाले। उसे बेंटिक ने शिक्षा के कंपनी बजट  के सही उपयोग के लिए सुझाव देने कहा । जाहीर है , उस से यह अपेक्षा बेंटिक की थी  कि वह उसकी इच्छा के अनुरूप सुझाव दे सो उसने दे दिया । भारत मे मूढ़ या दास बुद्धि लोग उसे लॉर्ड मेकाले के प्रसिद्ध नोट के रूप मे याद करते हैं जिसे पढ़ सुनकर अंग्रेज़ लोग खूब हँसते हैं । 
केवल महा मूर्ख ही यह समझते हैं कि भारत की वर्तमान शिक्षा मेकाले के बताए रास्ते पर चल रही है । सचाई बिलकुल अलग है जिसकी हम यहाँ चर्चा करेंगे ।
सत्य यह है कि मेकाले को लॉर्ड बने गया 1857 ईस्वी मे यद्यपि वह  एक भी दिन हाउस ऑफ लॉर्डस   की  किसी मीटिंग मे भाग नहीं लिया ।
जिन दिनों फरवरी 1835 मे उसमे अपना प्रसिद्ध किया गया नोट लिखा , उन दिनों वह एक कंपनी ( जो भारत के टाटा या अंबानी की आज की  कंपनी से बहुत छोटी हैसियत की  थी ) के महाप्रबंधक का एक अधीनस्थ कर्मचारी मात्र था जिसने मालिक को खुश करने वाला नोट लिखा । उसने लिखा : -
"मैं न तो संस्कृत जानता , न ही अरबी । पर हमारे  परिचय मे जो इन भाषाओं के अध्येता हैं , उनसे चर्चा कर मैं  इस निष्कर्ष पर आया हूँ कि भारत का समस्त संस्कृत साहित्य और अरब का समस्त अरबी साहित्य  ( यहाँ वह मूर्ख फारसी के साहित्य को ही अरबी कह रहा है )मिलाकर भी किसी भी एक अच्छी यूरोपीय लाइब्ररी के एक शेल्फ मे रखी किताबों के सामने गुणवत्ता मे हल्का बैठेगा ।संस्कृत मे काव्य ही सर्वश्रेष्ठ  बताया जाता है पर अङ्ग्रेज़ी और अन्य युरपीय भाषा के बड़े कवियों के सामने वह बहुत हल्का है । ऐसा मी सब परिचित विद्वानों का मत है । सभी लौकिक और नैतिक विषयों मे यूरोपीय साहित्य इनसे बहुत उच्च कोटि का है  । "
अब यह वस्तुतः एक बाबू का नोट है जैसा आए दिन हर भारतीय मंत्री के समक्ष अधीनस्थ बाबू के नोट आते रहते हैं । उन पर "एक्शन " क्या लेना है , यह मंत्री जी को ज्ञात रहता है।  बेंटिक को भी ज्ञात था क्योंकि यह लिखा ही उसके संकेत पर गया था सो बेंटिक ने तदनुसार कंपनी के विद्यालयों मे छठी कक्षा  से अङ्ग्रेज़ी की पढ़ाई अनिवारी कर दी । 1813 ईस्वी मे जो थोड़ा सा बजट शिक्षा के लिए लोगों के दबाव मे रखा था , वह इस प्रकार बेंटिक की  इच्छा अनुसार अङ्ग्रेज़ी की शिक्षा मे ही व्यय किया जाने लगा । मेकाले ने इस शिक्षा के क्या गुण बताए थे , उसकी अतिरंजित चर्चा से सत्य छिपा दबा रह जाता है । 
यह नीति अनेक समान संस्तुतियों के साथ कंपनी 1857 तक चलाती रही 1858 से कंपनी के नियंत्रण तथा संधि वाले इलाकों मे  ब्रिटिश शासन लागू हो गया । 
तब 1882 मे विलियम विल्सन हंटर कमेटी बनी ।फिर कर्ज़न ने एक गुप्त बैठक शिक्षा पर की ।  उसने भी समान संस्तुति दी । प्राथमिक कक्षा से ही अङ्ग्रेज़ी ज्ञान करने पर ध्यान दिया जाने लगा । पर भारतीयों के प्रबल विरोध से यह सहमति बनी कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा से हो।  फिर छठी से अङ्ग्रेज़ी  हो । 
 इस बीच इंग्लैंड जाकर पढ़ने वाले लोग शांतिपूर्ण आंदोलन के नेता बने जो अङ्ग्रेज़ी शिक्षा के परम प्रशंसक बने रहे । 
स्वामी श्रद्धानंद जी ने 1902 मे भारतीय पद्धति से ज्ञान के लिए गुरुकुल काँगड़ी विश्व विद्यालय स्थापित किया । इसी वर्ष 1902 मे अंग्रेजों ने भारतीय विश्वविद्यालय आयोग बनाया । 1916 तक 5 विश्व विद्यालय खोल दिये गए । इनके समानान्तर आर्य समाज ने गुरुकुल पद्धति के विकास पर ज़ोर दिया पर उसे अंग्रेज़ शासन ने अपनी नीति मे स्थान नहीं दिया । महामना मालवीय जी ने सनातन धर्म महामंडल के अधिवेशन मे हिन्दू विश्व विद्यालय का प्रारूप प्रस्तुत किया जिसे सभी हिन्दू राजाओं रानियों और धर्माचार्यों ने समर्थन दिया ।  बाद मे कांग्रेस के अधिवेशन मे भी उन्होने अपनी योजना रखी । मालवीय जी ने हिन्दू राजाओं से सलाह कर इस विश्व विद्यालय को प्रारम्भ मे अङ्ग्रेज़ी मधायम से शिक्षा का केंद्र बनाकर धीरे धीरे हिन्दी को अपनाने की घोषणा की । देश भर से सहयोग मिला और यह विश्व विद्यालय1916 ईस्वी मे  स्थापित हो गया । 
इसके बाद 6  और विश्वविद्यालय  अंग्रेजों ने खोले । मैसूर,  हैदराबाद , पटना  , अलीगढ़ , लखनऊ , ढाका मे । राष्ट्रीय भावना से काशी विद्यापीठ , तिलक विद्यापीठ , गुजरात विद्यापीठ और बिहार विद्यापीठ बनी । परंतु मूल धारा अंग्रेजों की बहाई ही बहती रही । 

15 अगस्त 1947 के बाद शासन ने भारतीय विश्वविद्यालय आयोग बनाया । अनेक विश्व विद्यालय  बनते और चलते रहे ।सब अंग्रेजों की चलायी धारा मे ही । 
परंतु यह स्पष्ट होना चाहिए कि विगत 70 वर्षों मे जो भी शिक्षा नीति बनी है , वह भारत के शासकों ने ही बनाई है । उसका मेकाले से कोई संबंध नहीं है  । 
वस्तुतः श्री  जवाहरलाल नेहरू सोवियत  संघ से प्रभावित थे और उन्होने शिक्षा पर पूर्ण राजकीय नियंत्रण आवश्यक माना । साथ ही भारतीय ज्ञान परंपर को बासी और पुरानी मानकर अंग्रेजों द्वारा चलायी शिक्षा ही और विस्तार के साथ फैला दी ।इसका कोई भी संबंध मेकाले से नहीं है , इसका संबंध नेहरू जी और भारतीय शासकों से है । यह अभारतीय रहे , यह निर्णय भारत के शासकों का है । वे जब चाहेंगे , शिक्षा को भारतीय बना देंगे क्योंकि भारत मे भारतीय शिक्षा पूर्ण रूप से विलुप्त नहीं हुयी है । अनेक गुरुकुलों मे वह मोटे रूप मे विद्यमान है । उसका और  परिष्कार सहज ही संभव है ।

सोमवार, 23 मई 2022

हर मन्दिर दो से ढाई हजार लोगों को रोजगार दे रहा है। यह काम तो हजार करोड़ लगाकर कोई कम्पनी नहीं कर सकती है।

ध्यानपूर्वक पढ़ें
*मंदिर चाहिये या रोजगार ?*
इस प्रश्न में दूषित मानसिकता छिपी है। लेकिन क्या इसका उत्तर वही है, जो हम दे रहे है।

वो पिछले दिनों मैं अपने परिवार के साथ मंदिर गया ।पूजा से पहले दुकान से प्रसाद लिया , चढ़ाने के लिए माला ली । हम तो तुरंत दर्शन कर लिये , बाकी लोग विधि विधान के साथ पूजा पाठ कर रहे थे। 

जिज्ञासु प्रवृत्ति से मैं मंदिर के चारों तरफ घूमने लगा। हर दुकान , हर ठेलिया को देखे कौन क्या बेच रहा है।
फिर सब लोग एक जगह चाट खाये , एक जगह जलेबी , फिर एक दुकान से महिलाओं ने अपने लिए श्रृंगार आदि के सामान लिए फिर आगे आकर सब लोग चाय पीये।

फिर अचानक ध्यान आया यह मंदिर दो से ढाई हजार लोगों को रोजगार दे रहा है। यह काम तो हजार करोड़ लगाकर कोई कम्पनी नहीं कर सकती है।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात है। मंदिर किसको रोजगार दे रहा है ! यह वह लोग है ,जिनके पास किसी संस्थान से डिग्री नहीं है। इतना धन नहीं है कि कोई बड़ा निवेश कर सकें। अर्थव्यवस्था में समाज के निचले स्तर के लोग है।
*मंदिर*
*करोड़ो लोगों को रोजगार देते हैं।*
*कैसे...... ????*

१.धार्मिक पुस्तक बेचने वालों को और उन्हें छापने वालों को रोजगार देते हैं।

२. माला बेचने वालों को घंटी-शंख और पूजा का सामान बेचने वालों को रोजगार देते हैं।

३. फूल वालों को माला बनाने और किसानों को रोजगार देते हैं।

४. मूर्तियां-फोटुएं बनाने और बेचने वालों को रोजगार देते हैं।

५. मंदिर प्रसाद बनाने और बेचने वालों को रोजगार देते हैं।

६. कांवड़ बनाने-बेचने वालों को भी रोजगार देते हैं।

७. रिक्शे वाले गरीब लोग जो कि धार्मिक स्थल तक श्रद्धालुओं को पहुंचाते हैं उन रिक्शा और आटो चालकों को रोजगार देते हैं।

८. लाखों पुजारियों को भी रोजगार देते हैं।

९. रेलवे की अर्थव्यवस्था का १८% हिस्सा मंदिरों से चलता है।

१०. मंदिरों के किनारे जो गरीबों की छोटी-छोटी दुकानें होती है उन्हें भी रोजगार मिलता है।

११. मंदिरों के कारण अंगूठी-रत्न बेचने वाले गरीबों का परिवार भी चलता है।

१२. मंदिरों के कारण दिया बनाने और कलश बनाने वालों को भी तो रोजगार मिलता है।

१३. मंदिरो से उन ६५,००० खच्चर वालों को रोजगार मिलता है जो किश्रद्धालुओ श्रद्धालुओं को दुर्गम पहाड़ों पर प्रभु के द्वार तक ले जाते हैं।

१४. भारत में दो लाख से अधिक जो भी होटल हैं और धर्मशालाएं हैं उनमें रहने वाले लोगों को मंदिर ही तो रोजगार देतें हैं।

१५. तिलक बनाने वाले- नारियल और सिंदूर आदि बेचने वालों को भी ये मंदिर रोजगार देते हैं।

१६. गुड-चना बनाने वालों को भी मंदिर रोजगार देते हैं।

१७. मंदिरों के कारण लाखों अपंग और भिखारियों और अनाथ बच्चों को रोजी-रोटी मिलती है।

१८. मंदिरों के कारण लाखों वानरों की रक्षा होती है और सांपों की हत्या होने से बचती है।

१९. मंदिरों के कारण ही हिंदू धर्म में पीपल-बरगद -पिलखन- आदिहै वृक्षों की रक्षा होती है।

२०. मंदिर के कारण जो हजारों मेले हर वर्ष लगते हैं- मेलों में जो चरखा-झूला चलाने वालों को भी तो रोजगार मिलता है।

२१. मंदिरों के कारण लाखों टूरिस्ट मंदिरों में घूमते हैं और छोटे-छोटे चाय-पकौडे-टिक्की बेचने वाले सभी गरीबों का जीवन यापन भी तो चलता है।

सनातन धर्म उन करोड़ों लोगों को रोजगार देता है जो गरीब हैं।
जो ज्यादा पड़े लिखे नहीं हैं और जिन के पास धन-जमीन और खेती नहीं है जो बचपन में अनाथ हो गए।

जिनका कोई नहीं उनका राम है।
उनका श्याम है उनका शिव है।

यह मंदिर कई सौ वर्ष तक रहेगा।
तब तक रोजगार देता रहेगा।

यह सामाजिक , धार्मिक उन्नयन का केंद्र है।
यदि आर्थिक दृष्टि से देखे तो मंदिर , अपने निवेश से कई हजार गुना रोजगार दे रहा है।
शायद हमनें अपनी धार्मिक आस्था के कारण इसको देखा नहीं। हमारे मंदिर , आर्थिक वितरण के बहुत बड़े , स्थाई केंद्र है। 

आप सभी मित्रो से मैं आशा करता हूं आप सभी मंदिर जरूर जाएं 🙏
🚩🚩 हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे 🚩🚩
🚩🚩हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। 🚩🚩🌱

यति क्रिएशन, जोधपुर द्वारा निर्देशित "संस्कारी इवेंट" मे सांस्कृतिक संध्या का आयोजन

 जय श्री कृष्णा

जोधपुर दिनांक 22 मई 2022, शाम 6 बजे से श्रीराम एंपाइयर होटल मे यति क्रिएशन द्वारा निर्देशित "संस्कारी इवेंट" जोधपुर मे सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया जिसके आयोजक श्री अभिषेक शर्मा ने बताया कि जोधपुर मे 8 वर्ष से 60 वर्ष तक के उभरती प्रतिभाओ को मंच प्रदान करने हेतु सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया| मंच संचालन युगल जोड़ी श्रीमती वंदना शर्मा एवं अभिषेक शर्मा द्वारा किया गया| जिसमे सर्व प्रथम दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया जिसमे यति शर्मा द्वारा गणेश वंदना पर अपनी मनमोहक प्रस्तुति से सभी प्रतिभागियों का मन मोह लिया, उसके बाद सबसे छोटे प्रतिभागी कुंज माहेश्वरी ने आ लौट के आजा मेरे मीत गाकर दर्शको को अभिभूत कर दिया| कार्यक्रम मे मुख्य अतिथि श्री कमलेश जी पुरोहित (निराला), सोनू जी जेठवानी थे, सोनू जी जेठवानी को साँवरिया के संस्थापक श्री कैलाश चंद्र लढा द्वारा दुपट्टा पहना कर सम्मानित किया


कार्यक्रम के संयोजक मानवता की सेवा मे समर्पित साँवरिया ग्रूप के संस्थापक श्री कैलाश चंद्र लढा  ने बताया की कार्यक्रम मे ओल्ड ईज़ गोल्ड पुराने गानो की झलकियाँ दिखाई दी कुंज माहेश्वरी ने आ लौट के आजा मेरे मीत गाकर दर्शको को अभिभूत कर दिया जिस पर सोनू जेठवानी ने मंच पर ही उठकर कुंज माहेश्वरी को पुरूस्कृत किया| विभा व्यास ने बाज़ीगर ओ बाज़ीगर डॉ सुधा मोहता ने तूने ओ रंगीले केसा जादू किया, अमित पेडीवाल ने मेरे रशके कमर, अभिलेश वडेरा ने ये जमी गा रही है योगिता टाक ने तिरछी टोपी वाले, महेन्द्र मालपानी ने मेरे टूटे हुए दिल से कोई तो आज ये पूछे, अजय दवे ने रात कली एक ख्वाब मे आई,  विमल सोनी अंजना सोनी ने युगल गीत अक्सर इस दुनिया मे गाकर समा बाँध दिया, पूरे कार्यक्रम मे सभी ने एक से बढ़कर एक प्रस्तुति दी, कार्यक्रम मे 30 प्रतिभागियों ने भाग लिया जिसमे यति शर्मा, कुंज माहेश्वरी, अंजना सोनी, मनीषा गोयल, योगिता टाक, संतोष जांगिड़, विभा व्यास, कृष्णा खत्री, डॉ. सुधा मोहता, विनीता, वंदना शर्मा, कैलाशचंद्र लढा, अभिषेक शर्मा, विमल सोनी, अजय दवे, अमित पेडीवाल , महेंद्र मालपनि, गौरव महेचा, अर्जुन गर्ग, मुकेश, आसिफ़, साहिल, अभिलेश, प्रकाश गोयल, एस. एन व्यास, दिलीप टाक आदि प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुति दी | साउंड हेम प्रजापत द्वारा लगाया गया, कार्यक्रम के अंत मे सभी प्रतिभागियों को मुख्य अतिथि कमलेश जी पुरोहित (निराला) द्वारा दुपट्टा व सर्टिफिकेट देकर सम्मानित किया गया, कार्यक्रम के अंत मे अभिषेक शर्मा व वंदना शर्मा ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया|
कार्यक्रम के अंत मे प्रतिभागियों के उत्साह को देखते हुए गर्ल्स सेव यूथ असोसियेशन के संस्थापक कनिष्क शर्मा ने बताया इसके अगले आयोजन की जल्द घोषणा की जाएगी
 

कार्यक्रम की झलकिया



























रविवार, 22 मई 2022

10वीं की पढ़ाई छोड़ शुरू की गांव के विकास की मुहिम - लक्ष्मण सिंह लापोड़िया

 10वीं की पढ़ाई छोड़ शुरू की गांव के विकास की मुहिम, मिलिए 100 गांवों की तकदीर बदलने वाले लक्ष्मण सिंह से


लक्ष्मण सिंह ने तीन कामों पर फोकस करके गांवों की दशा सुधारने का काम किया. पहला-जल संरक्षण, दूसरा पौधरोपण और तीसरा स्कूल बनाना. इन तीनों कामों से लक्ष्मण सिंह ने गांवों की बड़ी समस्याओं को काफी हद तक सुलझा दिया.जयपुर से 80 किलोमीटर दूर लापोड़िया गांव में रहने वाले लक्ष्मण सिंह ने आज से करीब 40 साल पहले अपने गांव की सूरत बदलने की कोशिश जब शुरू की थी तो सपने में भी उनको इस बात का अंदाजा नहीं था कि इस काम का नतीजा इस कदर सुंदर हो सकता है. लक्ष्मण सिंह (66 वर्ष) का जन्म जयपुर के लापोड़िया गांव में हुआ था. उन्होंने पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई अपने लापोड़िया गांव से ही की. गांव में आगे पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं था. इसलिए पढ़ाई करने के लिए लक्ष्मण सिंह अपनी ननिहाल जयपुर चले गए.


जयपुर में जब लक्ष्मण सिंह दसवीं की पढ़ाई कर रहे थे, उसी दौरान वे एक बार अपने गांव आए. उस समय उनकी उम्र करीब 18 साल थी. गांव की हालत देखकर लक्ष्मण सिंह को बहुत ही अफसोस हुआ. उस समय गांव में पानी की भारी किल्लत थी. लोग पीने का पानी भरने के लिए कुओं में नीचे तक उतरते थे. पानी की कमी के कारण खेती-बाड़ी बर्बाद हो रही थी. लोग मजदूरी करने के लिए शहरों की तरफ भाग रहे थे. इस हालत ने लक्ष्मण सिंह को कुछ ऐसा करने के लिए प्रेरित किया, जिससे गांव की हालत सुधर सके. फिर युवा लक्ष्मण सिंह ने कुछ ऐसी कोशिश की कि उनसे लोग जुड़ते गए और धीरे-धीरे कारवां बनता गया.

पुराने तालाब की मरम्मत से हुई शुरुआत
शुरू में लक्ष्मण सिंह ने अपने गांव के पुराने तालाब को ठीक करने का बीड़ा उठाया. लेकिन इसके लिए मजदूरों को पैसा देना सबसे बड़ी समस्या थी. इस समस्या को सुलझाने के लिए उन्होंने खुद श्रमदान करने का फैसला किया. पहले करीब 18 लोगों को जोड़कर लक्ष्मण सिंह ने तालाब की मरम्मत का काम शुरू किया. धीरे-धीरे और भी लोग उनसे जुड़ते गए और तालाब ठीक हो गया. तालाब ठीक होने के बाद बरसात अच्छी हुई और उसमें पानी जमा हुआ. लोगों को लक्ष्मण सिंह का काम समझ में आ गया.

इसके बाद तो गांव के लोगों ने मिलकर कई तालाब बनाने का काम किया. लक्ष्मण सिंह ने इसके बाद अपने गांव के युवकों को संगठित करने के लिए ‘ग्राम विकास नवयुवक मंडल लापोड़िया’ बनाया. यह कोई रजिस्टर्ड संस्था नहीं थी. लेकिन फिर भी इसके 80 सदस्य अपने गांव में तालाब बनाने के काम में सहयोग करने के लिए स्वयंसेवा करने को तैयार रहते थे. अपने गांव के तालाबों को ठीक करने के बाद लक्ष्मण सिंह ने अपनी संस्था के लोगों को दूसरे गांवों में भी लोगों को तालाब बनाने के लिए प्रेरित करने भेजा.

गांवों में स्कूल खोल फैलाई शिक्षा की रोशनी

लक्ष्मण सिंह ने एक और काम भी किया. उन्होंने गांवों में स्कूल चलाने का अभियान शुरू किया. जिन गांवों में स्कूल नहीं थे, वहां लक्ष्मण सिंह ने स्कूल खोले और सभी पढ़े-लिखे लोग बारी-बारी से इन स्कूलों में पढ़ाते थे. लक्ष्मण सिंह ने तीन कामों पर फोकस करके गांवों की दशा सुधारने का काम किया. पहला-जल संरक्षण, दूसरा पौधरोपण और तीसरा स्कूल बनाना. इन तीनों कामों से लक्ष्मण सिंह ने गांवों की बड़ी समस्याओं को काफी हद तक सुलझा दिया. धीरे-धीरे लक्ष्मण सिंह ने 40 से 50 गांवों में स्कूल खोले.

इन गांवों में लोगों की नियमित बैठकें होती थीं और उनमें तालाब बनाने, गोचर जमीन के सुधार और स्कूलों में बच्चों को भेजने के बारे में बातें होती थीं. जो गांव ऐसा करने में आनाकानी करते थे या कोई रुचि नहीं दिखाते, ऐसे गांवों को लक्ष्मण सिंह बाद में छोड़ देते. बाद में कई गांव खुद आगे आकर धीरे-धीरे लक्ष्मण सिंह के साथ खुद को जोड़ने लगे और ग्राम विकास का उनका काम तेजी से आगे बढ़ने लगा. उन्होंने स्कूलों में लिखवाया था, ‘ये न सरकारी स्कूल है, न प्राइवेट स्कूल है, ये गांव का स्कूल है.’ इन स्कूलों में कोई फीस नहीं ली जाती और बच्चे हों या बुजुर्ग, यहां पर सभी लोग पढ़ सकते थे. गांव के जो पढ़े-लिखे लोग होते थे, वही इन स्कूलों में पढ़ाते थे.


सरकारी स्कूल खुले तो लक्ष्मण सिंह ने बंद किए स्कूल

लक्ष्मण सिंह ने 1980 से 2006 तक इन स्कूलों को चलाया और उसके बाद इन स्कूलों को छोड़ दिया. इसके बारे में लक्ष्मण सिंह ने कहा कि पहले तो सरकार गांव में स्कूल खोलने के लिए संसाधन उपलब्ध ही नहीं करा पाती थी. लेकिन 2006 के बाद सरकार ने हर गांव में स्कूल खोल दिए. इसलिए उन्होंने अपने स्कूल बंद कर दिए. लक्ष्मण सिंह ये भी कहते हैं कि मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र ने उनको सलाह दी थी इन स्कूलों को बंद न करें. क्योंकि आपके जैसे स्कूल सरकार नहीं चला पाएगी. उनकी ये भविष्यवाणी आगे चलकर सही साबित हुई.

गोचर जमीन के विकास के लिए किया कठिन संघर्ष

गोचर जमीन के विकास के लिए लक्ष्मण सिंह ने जो कठिन संघर्ष किया, उसकी मिसाल शायद ही कहीं मिलती है. सबसे पहले तो गांव की पंचायतों को लगा कि लक्ष्मण सिंह अब गोचर की जमीन पर कब्जा करने की कोशिश में लगे हैं. जबकि लक्ष्मण सिंह के इरादे कुछ और ही थे. जब लक्ष्मण सिंह ने गोचर पर अवैध कब्जा रोकने और हटाने का अभियान चलाया तो इससे गोचर पर कब्जा करने वाले परेशान हो गए. ऐसे लोगों को राजनैतिक संरक्षण भी हासिल रहता था. फिर भी लक्ष्मण सिंह ने हर संकट और परेशानी का सामना करके गोचर जमीन को मुक्त कराया और उसका विकास किया. ऐसा नहीं है कि लक्ष्मण सिंह को हमेशा अकेले संघर्ष करना पड़ा. बाद में सरकार ने उनसे सहयोग मांगा और पाली जिले में उनकी संस्था को पंचायतों को गाइड करके जल संरक्षण और गोचर भूमि विकास का काम सिखाने के लिए नियुक्त किया. इस तरह से उनके काम को सरकारी मान्यता भी मिली.


चौका पद्धति का विकास
गोचर के विकास के लिए लक्ष्मण सिंह ने चौका पद्धति ईजाद की. वह आज पूरी दुनिया में एक मिसाल बन गई है. उन्होंने अपने गांव की 400 बीघा गोचर जमीन पर देखा कि बारिश में पूरा पानी बह जाता है. इससे वहां न तो घास उगती और न पेड़-पौधे. इस गोचर जमीन पर पानी रोकने के लिए वे अजमेर जिले में सरकारी कंटूर बनाने का काम देखने गए. अजमेर में इंजीनियर सरकारी बंजर जमीन पर पानी रोकने के लिए ट्रैक्टरों की मदद से कंटूर बनाते थे. इन कंटूरों में पानी रुकता तो था, लेकिन जैसे ही पानी ज्यादा हुआ, वो कंटूर तोड़कर बह जाता था. इन कंटूरों में ज्यादा पानी जमा होने के कारण न तो जमीन पर कोई घास उगती न कोई पौधा. क्योंकि कंटूर में पानी गहराई तक जमा हो जाता था. इस समस्या को देखकर लक्ष्मण सिंह ने कंटूरों को अपने लिए अनुपयोगी पाया.

कालू दादा ने दिखाई राह

गोचर जमीन के समुचित विकास के लिए लक्ष्मण सिंह अपनी ही धुन में लगे रहे. इस मामले में उनके गांव के ही कालू दादा नामक शख्स ने राह दिखाई. कालू दादा ने लक्ष्मण सिंह को बताया कि पहले गोचर में जमीन पर ज्यादा पानी नहीं रुकता था और वह ओवर फ्लो होकर आगे छोटे तालाब में चला जाता था. इससे वहां घास और पेड़-पौधे उगते रहते थे. अब असली समस्या लक्ष्मण सिंह के सामने ये थी कि गोचर की जमीन में किस तरह से केवल 9 इंच पानी रुके और बाकी पानी को आगे तालाब में भेज दिया जाए. इसके लिए ही उन्होंने चौका तकनीक ईजाद की. इसमें जमीन पर तीन तरफ से मेड़ बना दी जाती है और उसमें छोटे-छोटे गड्ढे खोद दिए जाते हैं.

पहली बरसात के बाद इस पूरे इलाके में देसी घास और खेजड़ी, देसी बबूल जैसे पौधों के बीज छिड़ककर हल से जुताई कर दी जाती है. इससे 400-500 एकड़ के इलाके में घास और पौधे उग जाते हैं. गांव वाले दो महीने तक इसमें अपने पशु नहीं भेजते हैं. जब घास और पौधे 2 फीट की लंबाई के हो जाते हैं तो इसमें पशुओं को भेजा जाता है. इस तरह केवल 5 साल में जंगल तैयार हो जाता है.

चौका तकनीक सिखाने के लिए बुलाए गए इजरायल

एक अंतरराष्ट्रीय संस्था सीआरएस (CRS) ने जब चौका पद्धति को देखा तो उसने इसके कई फायदों को महसूस किया. चौका सिस्टम एक साथ इकोसिस्टम को बैलेंस करता है, जल संरक्षण करता है और साथ ही बिना कोशिश के लाखों पेड़ उगा देता है. उन्होंने इसका अध्ययन किया और अफगानिस्तान और इजरायल में इसको लागू करने की सिफारिश की. क्योंकि वहां सूखे की बहुत समस्या है. चौका सिस्टम की तकनीक बताने के लिए लक्ष्मण सिंह 2008 में इजरायल भी गए, लेकिन वह अफगानिस्तान नहीं गए. उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान से कोई टीम आकर उनका काम देखे और अपने यहां लागू करे. इसके बाद अफगानिस्तान से 40 सदस्यों की एक टीम आई और उनके काम को देखा और फिर उसको अफगानिस्तान में भी अपनाया गया.




गोचर जमीन में लगाए लाखों पेड़ तो पंचायत बनी दुश्मन
गांवों में तालाब बनवाने, स्कूल चलवाने के बाद लक्ष्मण सिंह की नजर में जो सबसे बड़ी बात आई, वो थी गांव की बंजर पड़ी गोचर जमीन के प्रबंधन की. इसके लिए लक्ष्मण सिंह ने सबसे पहले अपने गांव की 400 बीघा गोचर जमीन पर काम करना शुरू किया. गोचर जमीन पर सिंचाई करके पेड़-पौधे और घास उगाना उनके लिए एक बड़ी समस्या बनकर उभरा. लेकिन इसी समस्या ने आज लक्ष्मण सिंह का नाम पूरे देश और दुनिया में फैला दिया है. गोचर जमीन को लक्ष्मण सिंह ने इस तरह विकसित करने की कोशिश की कि वहां देशी पेड़-पौधे और घास उग सके. वहां पानी भी न जमा हो सके और पानी का संरक्षण भी होता रहे. लक्ष्मण सिंह ने जब गोचर की जमीन पर लाखों पेड़ उगा दिए तो पंचायतों ने उन्हें काटने का ठेका दे दिया. लेकिन लक्ष्मण सिंह ने इन पेड़ों को बचाने के लिए मुहिम छेड़ दी. लोगों ने रात भर जागकर पेड़ों की रखवाली की बाद में प्रशासन ने आकर इन पेड़ों को काटने पर रोक लगाई.


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गो पालन से हर परिवार की बढ़ी कमाई

गांव में गोचर की बंजर पड़ी जमीन के उपयोग से लक्ष्मण सिंह ने गो पालन का एक ऐसा काम शुरू किया, जिससे उनके मॉडल को अपनाने वाले हर गांव में हर परिवार को आज कम से कम 40 से 50 रुपये की आमदनी केवल दूध से होती है. लक्ष्मण सिंह ने गुजरात से गिर नस्ल के सांड लाकर भी कई गांवों में छोड़े. जिससे कि गायों की नस्ल सुधार का काम शुरू हुआ और आज यह पूरा इलाका गिर गायों का एक बड़ा केंद्र बन गया है.

बिना दूध बेचे इस गौशाला से होती है हर माह 32 लाख की कमाई!

जल, जंगल सहेजकर रखें गांव

अपनी मेहनत और लगन से राजस्थान के करीब 100 गांवों को हरा-भरा करने वाले लक्ष्मण सिंह आज 66 साल की उम्र में चाहते हैं कि देश के लोग उनके इस काम को अपनाएं. हर गांव के लोग इसे समझें और गांवों की पंचायतें तालाबों और गोचर जमीन के विकास के महत्व को समझें. इससे रोजगार, पर्यावरण सुधार और आय को बढ़ाने का काम एक साथ किया जा सकता है. इससे युवाओं को नौकरी के लिए दर-दर भटकना नहीं पड़ेगा. युवाओं से लक्ष्मण सिंह का यही कहना है कि वे अपने गांव को आधार बनाकर ही कोई काम करें. लक्ष्मण सिंह का ये भी कहना है कि हर गांव में स्कूल इस तरह का होना चाहिए जिसमें लोगों को बुनियादी काम सिखाया जाए. बिना इसके देश में रोजगार और पर्यावरण की समस्या को हल नहीं किया जा सकता है.

अपने सभी बच्चों को कम से कम इस पोस्ट में दिए गए मंत्र वर्ष 2022 के जून तक कंठस्थ हो जाये

 अपने सभी बच्चों को कम से कम इस पोस्ट में दिए गए मंत्र वर्ष 2022 के जून तक कंठस्थ हो जाये* 

इसके लिए पहले तो हम बडो को ही ये कंठस्थ करने होंगे इसके लिए इसमे दिए कुछ मन्त्र रोज के अपने ज़ूम भजन में पढ़े जाएंगे तो साल भर में अपन सभी को ये याद हो जाएंगे



कटु सत्य

ईसाईयों को इंग्लिश आती है वो बाइबिल पढ लेते है
उधर मुस्लिम को उर्दू आती है वो  कुरान शरीफ़ पढ लेते हैं
सिखों को गुरबानी का  पता है  वो श्री गुरू ग्रन्थसाहिब पढ लेते है ।
हिन्दूओ को संस्कृत नही आती वो ना वेद पढ पाते है
और न ही उपनिषद । इस से बडा दुर्भाग्य
और क्या हो सकता है हमारा

🔔🌿

संस्कृत ही विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है इसे अवश्य सीखें

 प्रतिदिन स्मरण योग्य शुभ सुंदर मंत्र। संग्रह

🔹प्रात: कर-दर्शनम्🔹
कराग्रे वसते लक्ष्मी
करमध्ये सरस्वती।
करमूले तू गोविन्दः
प्रभाते करदर्शनम्॥
        
 🔸पृथ्वी क्षमा प्रार्थना🔸
समुद्र वसने देवी
पर्वत स्तन मंडिते।
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं
पाद स्पर्शं क्षमश्वमेव॥

🔺त्रिदेव सह नवग्रह स्मरण🔺

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी
भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥
            
  ♥️ स्नान मन्त्र ♥️

गंगे च यमुने चैव
गोदावरी सरस्वती।
नर्मदे सिन्धु कावेरी
जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु॥
           
🌞 सूर्यनमस्कार🌞

सूर्य आत्माजगतस्तस्य
उषश्च आदित्यस्य नमस्कारं
ये कुर्वन्ति दिने दिने।
दीर्घमायुर्बलं वीर्यं व्याधि
शोक विनाशनम्
सूर्य पादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम्॥

ॐ मित्राय नम:
ॐ रवये नम:
ॐ सूर्याय नम:
ॐ भानवे नम:
ॐ खगाय नम:
ॐ पूष्णे नम:
ॐ हिरण्यगर्भाय नम:
ॐ मरीचये नम:
ॐ आदित्याय नम:
ॐ सवित्रे नम:
ॐ अर्काय नम:
ॐ भास्कराय नम:
ॐ श्री सवितृरे
 ॐ श्री सूर्यनारायणाय नम:

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीदमम् भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥
               

 🔥दीप दर्शन🔥

शुभं करोति कल्याणम्
आरोग्यम् धनसंपदा।
शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते॥

दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते॥
            
🌷 गणपति स्तोत्र 🌷

गणपति: विघ्नराजो लम्बतुन्ड़ो गजानन:।
द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदंतो गणाधिप:॥
विनायक: चारूकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वादश एतानि नामानि प्रात: उत्थाय य: पठेत्॥
विश्वम तस्य भवेद् वश्यम् न च विघ्नम् भवेत् क्वचित्।

विघ्नेश्वराय वरदाय शुभप्रियाय।
लम्बोदराय विकटाय गजाननाय॥
नागाननाय श्रुतियज्ञ विभूषिताय।
गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥

शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्
सर्वविघ्नोपशान्तये॥
        
⚡आदिशक्ति वंदना ⚡

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
           
🔴 शिव स्तुति 🔴

कर्पूर गौरम करुणावतारं
संसार सारं भुजगेन्द्र हारं।
सदा वसंतं हृदयार विन्दे
भवं भवानी सहितं नमामि॥
              
🔵 विष्णु स्तुति 🔵

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
            
⚫ श्री कृष्ण स्तुति ⚫

कस्तुरी तिलकम ललाटपटले, वक्षस्थले कौस्तुभम।
नासाग्रे वरमौक्तिकम करतले, वेणु करे कंकणम॥
सर्वांगे हरिचन्दनम सुललितम, कंठे च मुक्तावलि।
गोपस्त्री परिवेश्तिथो विजयते, गोपाल चूडामणी॥

मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम्‌।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्‌॥
            
⚪ श्रीराम वंदना ⚪

लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम्।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये॥
              
 ♦️श्रीरामाष्टक♦️

हे रामा पुरुषोत्तमा नरहरे नारायणा केशवा।
गोविन्दा गरुड़ध्वजा गुणनिधे दामोदरा माधवा॥
हे कृष्ण कमलापते यदुपते सीतापते श्रीपते।
बैकुण्ठाधिपते चराचरपते लक्ष्मीपते पाहिमाम्॥
    
🔱 एक श्लोकी रामायण 🔱
आदौ रामतपोवनादि गमनं
हत्वा मृगं कांचनम्।
वैदेही हरणं जटायु मरणं
सुग्रीवसम्भाषणम्॥
बालीनिर्दलनं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनम्।
पश्चाद्रावण कुम्भकर्णहननं एतद्घि श्री रामायणम्॥
           
🍁सरस्वती वंदना🍁

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला
या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वींणावरदण्डमण्डितकरा
या श्वेतपदमासना ॥
या ब्रह्माच्युत शङ्कर _प्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा माम पातु सरस्वती भगवती
निःशेषजाड्याऽपहा॥
            
🔔हनुमान वंदना🔔

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम्‌।
दनुजवनकृषानुम् ज्ञानिनांग्रगणयम्‌।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्‌।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगम
जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतं शरणम् प्रपद्ये॥
         
🌹 स्वस्ति-वाचन 🌹

ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्धश्रवाः
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्ट्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
           
 ❄ शांति पाठ ❄

ऊँ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्ष (गुँ) शान्ति:,
पृथिवी शान्तिराप: शान्ति: रोषधय: शान्ति:।
वनस्पतय: शान्ति: विश्वे देवा: शान्तिः ब्रह्म शान्ति:
सर्व (गुँ ) शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

॥ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

🌅🌿🍁🌻🔔🚩
निवेदन
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बहुत ही सुंदर संग्रह
इसे हर हिन्दू को अपने  'Saver' में डाले या प्रिंट आउट ले ।
ऐसा संग्रह सरलता से नही मिलता ।
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🙏 जय श्री राम 🙏
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शनिवार, 21 मई 2022

#ज्ञानवापी मंदिर के बारे मे विस्तृत जानकारी

#ज्ञानवापी मंदिर के बारे मे विस्तृत जानकारी 🚩🚩
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पुराणों के अनुसार, ज्ञानवापी की उत्पत्ति तब हुई थी जब धरती पर गंगा नहीं थी और इंसान पानी के लिए बूंद-बूंद तरसता था तब भगवान शिव ने स्वयं अपने अभिषेक के लिए त्रिशूल चलाकर जल निकाला। यही पर भगवान शिव ने माता पार्वती को ज्ञान दिया। इसीलिए, इसका नाम ज्ञानवापी पड़ा और जहां से जल निकला उसे ज्ञानवापी कुंड कहा गया। ज्ञानवापी का उल्लेख हिंदू धर्म के पुराणों मे मिलता है तो फिर ये मस्जिद के साथ नाम कैसे जुड़ गया?


वापी का अर्थ होता है तालाब। #ज्ञानवापी का सम्पूर्ण अर्थ है ज्ञान का तालाब। काशी की छः वापियों का उल्लेख पुराणों मे भी मिलता है।

पहली वापी: ज्येष्ठा वापी, जिसके बारे मे कहा जाता है की ये काशीपुरा मे थी, अब लुप्त हो गई है।

दूसरी वापी: ज्ञानवापी, जो काशी विश्वनाथ मंदिर के उत्तर मे है।

तीसरी वापी: कर्कोटक वापी, जो नागकुंआ के नाम से प्रसिद्ध है।

चौथी वापी: भद्रवापी, जो भद्रकूप मोहल्ले मे है।

पांचवीं वापी: शंखचूड़ा वापी, लुप्त हो गई।

छठी वापी: सिद्ध वापी, जो बाबू बाज़ार मे है और अब लुप्त हो गई।

अठारह (18) पुराणों मे से एक लिंग पुराण मे कहा गया है:

"देवस्य दक्षिणी भागे वापी तिष्ठति शोभना।
तस्यात वोदकं पीत्वा पुनर्जन्म ना विद्यते।"

इसका अर्थ है: प्राचीन विश्ववेश्वर मंदिर के दक्षिण भाग में जो वापी है, उसका पानी पीने से जन्म मरण से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण मे कहा गया है: उपास्य संध्यां ज्ञानोदे यत्पापं काल लोपजं |
क्षणेन तद्पाकृत्य ज्ञानवान जायते नरः |

अर्थात इसके जल से संध्यावंदन करने का भी बड़ा फल है, इससे भी ज्ञान उत्पन्न होता है, पाप से मुक्ति मिलती है।

स्कंद पुराण:

योष्टमूर्तिर्महादेवः पुराणे परिपठ्यते ।।
तस्यैषांबुमयी मूर्तिर्ज्ञानदा ज्ञानवापिका।।

अर्थात ज्ञानवापी का जल भगवान
शिव का ही स्वरूप है।

पुराण जो ना जाने कितनी सदियों पहले लिखे गए, उसमें भी ज्ञानवापी को भगवान शिव का स्वरूप बताया गया है। सारे पुराण, कह रहे है की ज्ञानवापी हिंदुओं से जुड़ा हुआ है लेकिन आज 2022 मे आप सुनते है की मस्जिद का नाम है ज्ञानवापी मस्जिद। मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण से पहले काशी को अविमुक्त और भगवान शिव को अविमुक्तेश्वर कहा जाता था।










काशी मे अविमुक्तेश्वर के स्वयं प्रकट हुए शिवलिंग की पूजा होती थी जिसे आदिलिंग कहा जाता था लेकिन मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमणो ने काशी के मंदिरों को कई बार नष्ट किया।मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को बनारस विजय के लिए भेजा। कुतुबुद्दीन ऐबक के हमले में बनारस के 1000 से भी अधिक मंदिर तोड़े गए और मंदिर की संपत्ति कहा जाता है 1400 ऊंटों पर लादकर मोहम्मद गोरी को भेज दी गई। बाद मे कुतुबुद्दीन को सुल्तान बनाकर, गोरी अपने देश वापिस लौट गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक ने बनारस मे शासन के लिए 1197 मे एक अधिकारी नियुक्त किया था।बनारस मे ऐबक के शासन ने बड़ी कड़ाई के साथ मूर्तिपूजा हटाने की पूरी कोशिश की। इसका नतीजा ये हुआ की क्षतिग्रस्त मंदिर वर्षों तक ऐसी ही पड़े रहे क्योंकि इन्होंने ऐसा तोड़ा और ऐसा इनका राज चलता था की किसी की हिम्मत ही नहीं हुई की इन मंदिरों को फिर से बनाए। लेकिन 1296 आते -आते, बनारस के मंदिर फिर से बन गए और फिर से काशी की शोभा बढ़ाने लगे।

बाद मे अलाउद्दीन खिलजी के समय, बनारस के मंदिर फिर से तोड़े गए।फिर 14वी सदी मे तुगलक शासकों के दौर मे जौनपुर और बनारस मे कई मस्जिदो का निर्माण हुआ।कहा जाता है, ये सभी मस्जिदे, मंदिरो के अवशेषों पर बनाई गई थी। 14वी सदी मे जौनपुर मे शर्की सुल्तानो  ने पहली बार, काशी विश्वनाथ मंदिर को तुड़वाया। 15वी सदी मे सिकंदर लोदी के समय भी बनारस के सभी मंदिरों को फिर से तोड़ा गया।वर्षों तक मंदिर खंडहर ही बने रहे।

16वीं सदी मे अकबर के शासन मे उनके वित्त मंत्री टोडरमल ने अपने गुरु नारायण भट्ट के आग्रह पर 1585 मे विश्वेश्वर का मंदिर बनवाया जिसके बारे मे कहा जाता है की यही काशी विश्वनाथ का मंदिर है। टोडरमल ने विधिपूर्वक ,विश्वनाथ मंदिर की स्थापना ज्ञानवापी क्षेत्र मे की। इसी ज़माने मे जयपुर के राजा मानसिंह ने बिंदुमाधव का मंदिर बनवाया लेकिन दोनों भव्य मंदिरों को औरंगजेब के शासनकाल मे फिर से तोड़ दिया गया।

1669 मे औरंगजेब ने बनारस के सभी मंदिरों को तोड़ने का फरमान दे दिया था जिसके बाद बनारस मे चार मस्जिदो का निर्माण हुआ जिसमें से तीन उस वक्त के प्रसिद्ध मंदिरों को तोड़कर बनी थी। इसमे विश्वेश्वर मंदिर की जगह जो मस्जिद बनी उसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है ये दावा है लोगों का। दूसरा दावा यह है की बिंदुमाधव मंदिर के स्थान पर धरहरा मस्जिद बनी। फिर है आलमगीर मस्जिद जो कृतिवासेशवर मंदिर की जगह बनाई गई।

📷2: काशी विश्वनाथ मंदिर का 16वी सदी का पुराना नक्शे मे कही भी मस्जिद का कोई भी ज़िक्र नहीं है।बीच मे आप जो हिस्सा देख रहे है वो ज्योतिर्लिंग दिख रहा है।नक्शे को 1820-1830 के बीच ब्रिटिश अधिकारी James Princep ने तैयार किया था।इसमें कहीं भी मस्जिद का ज़िक्र नहीं है। हर जगह, मंदिर बताया गया है और इस नक्शे के मुताबिक मंदिर प्रांगण के चारों कोनो पर तारकेश्वर, मनकेश्वर, गणेश और भैरव मंदिर दिख रहे है। बीच का हिस्सा गृभगृह है जहां शिवलिंग स्थापित है और उसके दोनो तरफ शिव मंदिर भी दिखते है।

📷3+4: ये जो आप लाल border वाला हिस्सा देख रहे है, इसके बारे मे कहा जाता है की ये आज की मस्जिद की boundary है।पुराने नक्शे  मे आपको शिवलिंग दिखाया जा रहा है। अब अगर आज की तारीख मे आप जाइएगा, तो शिवलिंग , मस्जिद परिसर के अंदर दिखता है। अब सवाल यह उठता है की नंदी जी मस्जिद की तरफ क्यों देख रहे है जबकि काशी विश्वनाथ मंदिर तो उनके पीछे स्थित है। नंदी जी तो सदैव शिवलिंग की तरफ ही देखते है।

दावा यह भी किया जाता है की जब औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने के बाद वहीं पर मस्जिद बनाने का फरमान दिया था तब मंदिर के गृभगृह को ही मस्जिद का मुख्य कक्ष बनाने की योजना बनाई गई थी। इस योजना के अनुसार पश्चिम के दोनों छोटे मंदिर और श्रंगार मंडप तोड़ दिए गए और गृभगृह का मुख्य द्वार जो पश्चिम की तरफ था उसे चुन दिया गया। ऐश्वर्य मंडप और मुक्ति मंडप के मुख्य द्वार बंद कर दिए गये और मंदिर का यही भाग, मस्जिद की पश्चिमी दीवार बन गया।


📷5+6+7: मंदिर की पश्चिमी दीवार को ऐसे ही टूटी सिथति मे इसलिए रख दिया गया क्योंकि औरंगजेब चाहता था की हिन्दू समाज को नीचा महसूस हो। जब मंदिर तोड़ा गया उसके मलबे को भी वहीं पड़े रहने दिया गया। दीवारे ,आज भी वैसी ही है। ज्ञानवापी कुंड का जिक्र, पंचकोसी परिक्रमा मे भी है और मध्यकाल की पुरानी कलाकृतियों मे भी ज्ञानवापी कुंड को मंदिर का हिस्सा दिखाया गया है, जहां जाकर भक्त संकल्प लेते है और संकल्प पूरा होने के बाद फिर से ज्ञानवापी आते है।

#ज्ञानवापी मे ,पंडितजी, भक्तों का संकल्प छुड़वाते हुए कहते है :हे, ज्ञानवापी के पीठाधीश्वर, मैं, पंचकौसी परिक्रमा का वाचिक, मानसिक रुप से समर्पित करते हुए, मेरे प्राण छूटे तो आपकी शरण प्राप्त हो।

सारे नक्शे, पंचकौसी परिक्रमा, ज्ञानवापी, सारा ज़िक्र, हिंदुओं के साथ मिलता है।काशी की पंचकौसी परिक्रमा का सनातन धर्म मे बड़ा महत्व है।मान्यता है की 25 कौस के इस क्षेत्र मे 33 कोटि देवताओं का वास है। औरंगजेब के मंदिर तुड़वाने के 125 साल बाद इसका पुनर्निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था।

1777 मे महारानी अहिल्याबाई ने ज्ञानवापी के बगल मे दोबारा विश्वानाथ मंदिर बनवाया।1828 के आसपास, नेपाल के राजा ने मंदिर परिसर मे नंदी की स्थापना करवाई। इसके बाद,  महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था।ये सब अभी वाला जो आप काशीविश्वनाथ मंदिर देखते है, उसके बारे मे बताया जा रहा है।

📷8: एक इतिहास यह भी है की 18वी सदी के दौरान 📷 मराठा सरदार मलहार राव ने काफी कोशिश की थी की ज्ञानवापी मस्जिद की जगह मुस्लिम ,वाजिब मुआवजा लेकर, विश्वनाथ मंदिर फिर बनवा दे लेकिन अंग्रेज, मस्जिद तोड़कर मुस्लिम समाज को नाराज़ नहीं करना चाहते थे।

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद का मामला 1936 मे कोर्ट भी पहुंचा था। तब मुस्लिम पक्ष ने पूरे परिसर को मस्जिद करार करने की अपील भी की थी। 1037 मे वाराणसी ज़िला अदालत ने मुस्लिम पक्ष की अपील को खारिज करते हुए कहा था की ज्ञानकूप के उत्तर मे ही भगवान विश्वनाथ का मंदिर है क्योंकि कोई दूसरा ज्ञानवापी कूप बनारस मे नहीं है।जज ने ये भी लिखा की एक ही विश्वनाथ मंदिर है जो ज्ञानवापी परिसर के अंदर है।


इतिहासकार अनंत सदाशिव अलतेकर ने 1937 मे एक किताब प्रकाशित करते है 'History Of Banaras'। इसमें भी कहा गया है की मस्जिद के चबूतरे पर स्थित खंबों और नक्काशी को देखने से प्रतीत होता है कि ये 14वी-15वी शताब्दी के है।प्राचीन विश्वनाथ मंदिर मे ज्योतिर्लिंग 100 फीट का था।अरघा भी 100 फीट का बताया गया है। ज्योतिर्लिंग पर गंगाजल, बराबर गिरता रहा है, जिसे पत्थर से ढक दिया गया।यहां, शृंगार-गौरी की पूजा-अर्चना होती है। तहखाना यथावत है, ये खुदाई से सपष्ट हो जाएगा।

विश्वनाथ मंदिर, बार-बार गिराए जाने का उल्लेख, विद्वान नारायण भट्ट ने अपनी किताब 'त्रिस्थली सेतु' मे भी किया है।ये किताब संस्कृत मे 1585 मे लिखी गई थी। नारायण भट्ट ने अपनी किताब मे लिखा है की अगर कोई मंदिर तोड़ दिया गया हो और वहां से शिवलिंग हटा दिया गया हो या नष्ट कर दिया गया हो, तब भी वो स्थान महात्म्य की दृष्टि से विशेष पूजनीय है।अगर मंदिर नष्ट कर दिया गया हो तो खाली जगह की भी पूजा की जा सकती है।

इतिहासकार डा. मोतीचंद ने अपनी किताब 'काशी का इतिहास' मे लिखा है की "विद्वान नारायण भट्ट का समय 1514 से 1595 तक था और ऐसा जान पड़ता है की उनके जीवन के बड़े काल मे काशी मे विश्वनाथ मंदिर नहीं था"। मतलब उस दौर मे मंदिर तोड़ा हुआ था, उसका पुनर्निर्माण नहीं हुआ था और ऐसा पता चलता है की औरंगजेब से पहले विश्वनाथ के 15वीं सदी के मंदिर के स्थान पर कोई मस्जिद नही बनी थी।ज्ञानवापी मस्जिद का 125x18 फुट नाप का पूरब की ओर का चबूतरा शायद 14वीं सदी के विश्वनाथ मंदिर का बचा हुआ भाग है।"

डा. मोतीचंद यह भी बताते है की मंदिर केवल गिराया ही नहीं गया उस पर #ज्ञानवापी की मस्जिद भी उठा दी गई।मस्जिद बनाने वालों ने पुराने मंदिर की पश्चिमी दीवार गिरा दी और छोटे मंदिरों को जमीदोंज कर दिया।पश्चिमी उत्तरी और दक्षिणी द्वार भी बंद कर दिए गए।द्वारों पर उठे शिखरों को गिरा दिया गया और उनकी जगह पर गुंबद खड़े कर दिए गए।गर्भगृह मस्जिद के मुख्य दालान में परिणित हो गया। चारों अंतरगृह बचा लिए गए और उन्हें मंडपों से मिलाकर 24 फुट दालान निकाल दी गई।मंदिर का पूर्वी भाग तोड़कर एक बरामदे में बदल दिया गया।

इसमें अब भी पुराने खंभे लगे हैं। मंदिर का पूर्वी मंडप, जो 125x35 फुट का था, उसे एक लंबे चौक में बदल दिया गया।


"तीन चीजें ज्यादा देर तक छिपी नहीं रह सकतीं: सूर्य, चंद्रमा और सत्य" - भगवान बुद्ध
शिव ही सत्य हैं।
  नंदी महाराज का वर्षों का इंतजार खत्म हुआ, बाबा मिल गए।

हर हर महादेव!

शुक्रवार, 20 मई 2022

देश का दुर्लभ तांत्रिक मंदिर है - बाजनामठ




बाजनामठ देश का दुर्लभ तांत्रिक मंदिर है। सिद्ध तांत्रिकों के मतानुसार यह ऐसा तांत्रिक मंदिर है जिसकी हर ईंट शुभ नक्षत्र में मंत्रों द्वारा सिद्ध करके जमाई गई है। ऐसे मंदिर पूरे देश में कुल तीन हैं, जिनमें एक बाजनामठ तथा दो काशी और महोबा में हैं।

बाजनामठ का निर्माण 1520 ईस्वी में राजा संग्राम शाह द्वारा बटुक भैरव मंदिर के नाम से कराया गया था। इस मठ के गुंबद से त्रिशूल से निकलने वाली प्राकृतिक ध्वनि-तरंगों से शक्ति जागृत होती है।




कुछ कथानकों के अनुसार यह मठ ईसा पूर्व का स्थापित माना जाता है। आद्य शंकराचार्य के भ्रमण के समय उस युग के प्रचण्ड तांत्रिक अघोरी भैरवनंद का नाम अलौकिक सिद्धि प्राप्त तांत्रिक योगी के रूप में मिलता है। तंत्र शास्त्र के अनुसार भैरव को जागृत करने के लिए उनका आह्वान तथा स्थापना नौ मुण्डों के आसन पर ही की जाती है। जिसमें सिंह, श्वान, शूकर, भैंस और चार मानव-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इस प्रकार नौ प्राणियों की बली चढ़ाई जाती है। किंतु भैरवनंद के लिए दो बलि शेष रह गई थी।

यह माना जाता है कि बाजनामठ का जीर्णोद्धार सोलहवीं सदी में गोंड राजा संग्राम शाह के शासनकाल में हुआ, किंतु इसकी स्थापना ईसा पूर्व की है।

बाजनामठ को लेकर एक जनश्रुति यह है कि एक तांत्रिक ने राजा संग्राम शाह की बलि चढ़ाने के लिए उन्हें बाजनामठ ले जाकर पूजा विधान किया। राजा से भैरव मूर्ति की परिक्रमा कर साष्टांग प्रणाम करने को कहा, राजा को संदेह हुआ और उन्होंने तांत्रिक से कहा कि वह पहले प्रणाम का तरीका बताए।

तांत्रिक ने जैसे ही साष्टांग का आसन किया, राजा ने तुरंत उसका सिर काटकर बलि चढ़ा दी। मार्गशीष महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भैरव जयंती मनाई जाती है। यह दिन तांत्रिकों के लिए महत्वपूर्ण होता है। बाजनामठ की एक खशसियत यह है कि यहाँ पहले सिर्फ शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ होती थी, लेकिन अब हर दिन यहाँ भारी भीड़ होती है। यह मंदिर नागपुर रोड पर मेडिकल कॉलेज के आगे संग्राम सागर के निकट स्थित है।

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