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मंगलवार, 14 मई 2024

एसिडिटी,अम्लपित्त......▪️▪️रोग परिचय...

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एसिडिटी,अम्लपित्त......

▪️▪️रोग परिचय...
  • पेट में गैस, सीने में जलन और अपच की दिक्कत हो तो समझ लीजिए यह एसिडिटी है। एसिडिटी यानि की अम्ल पित्त, जिसमें खाना पचाने वाले रसायन का स्त्राव या तो बहुत ज्यादा होता है या बहुत कम। एसिडिटी को चिकित्सा की भाषा में गैस्ट्रोइसोफेजियल रिफलक्स डिजीज (Gastroesophageal Reflux Disease) कहते हैं।
 
 • कई बार एसिडिटी के कारण व्यक्ति को सीने में दर्द (Chest Pain) की शिकायत भी हो सकती है। यदि यह तकलीफ बार- बार हो रही हो तो यह गंभीर समस्या बन जाती है। एसिडिटी के कारण कई बार भोजन, भोजन नली से सांस की नली में भी पहुंच जाता है जिससे खांसी या सांस लेने संबंधी (Respiratory) समस्या भी हो सकती है। इतना ही नहीं एसिडिटी की समस्या बढ़ने पर खट्टे पानी के साथ मुंह में खून भी आ सकता है।
   ▪️▪️कारण .....
 • खान-पान में अनियमितता

    • खाने को ठीक से न चबाना

    • पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना

    • मसालेदार खाना ज्यादा खाना

    • धूम्रपान और शराब का ज्यादा सेवन
  ▪️▪️ लक्षण .....
     • कभी-कभी छाती में दर्द हो सकता है।

     • खट्टी डकारें आना

     • खाना या खट्टा पानी (एसिड) मुंह में आ जाना

     • छाती में जलन होना

     • पेट में गैस बनना

     • मतली और उल्टी
  ▪️▪️आयुर्वेदिक उपचार......
         तुलसी के पत्ते (Basil Leaves)

         तुलसी के पत्ते आपको तुरंत एसिडिटी, गैस और उल्टी से राहत दे सकते हैं। उपचार के लिए कुछ तुलसी के पत्ते चबा कर खाएं। इसके अलावा तुलसी के कुछ पत्ते पानी में उबालकर, उस पानी को छान लें। गुनगुना रहने पर शहद मिलाकर पिएं। यह भी एसिडिटी के लिए अच्छा उपाय है।
     ▪️▪️छाछ (Buttermilk)....

         छाछ पीने से भी एसिडिटी में बहुत राहत मिलती है। छाछ में पेट की अम्लता को संतुलित करने के लिए लैक्टिक एसिड होता है। उपचार के लिए मेथी के दानों को पानी के साथ मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को एक गिलास छाछ में मिलाकर पिएं। इससे पेट का दर्द भी ठीक होगा और गैस से भी राहत मिलेगी। साथ ही, एसिडिटी भी खत्म होगी। स्वाद बढ़ाने और बेहतर परिणाम के लिए इस छाछ में काला नमक और काली मिर्च भी मिलाई जा सकती है।
   ▪️▪️ सेब का सिरका (Apple Cider Vinegar).....
     सेब का सिरका भी एसिडिटी को ठीक करने का आसान तरीका है। उपचार के लिए एक कप पानी में दो चम्मच कच्चा सेब का सिरका मिलाकर दिन में दो बार पिएं। खाना खाने से पहले भी इसे पिया जा सकता है।
▪️▪️ जीरा (Cumin.....

    जीरा भी एक बेहतरीन एसिड न्यूट्रालाइजर (Acid Neutralizer) है जो एसिडिटी को कम करता है। इसके साथ ही पाचन शक्ति को बढ़ाकर पेट दर्द से भी राहत देता है। उपचार के लिए जीरा को भूनकर उसका पाउडर बनाएं। इस पाउडर को खाना खाने के बाद एक गिलास पानी में मिलाकर पिएं। जीरा पाउडर को छाछ में मिलाकर भी पिया जा सकता है।
   ▪️▪️अदरक (Ginger).....

   अदरक में पेट की अम्लता से लड़ने के गुण होते हैं जो एसिडिटी से राहत देते हैं। उपचार के लिए खाने के बाद अदरक का एक छोटा टुकड़ा मुंह में रखकर चबाएं। या फिर एक कप पानी में अदरक को कुचलकर डालें और उबालें। इस पानी को छनकर पिएं।
 ▪️▪️ ठंडा दूध (Cold Milk) ....

          दूध पेट में एसिड के निर्माण को रोकता है साथ ही गैस्ट्रिक एसिड को स्थिर करके एसिडिटी की समस्या होने से बचाता है। हालांकि एसिडिटी की समस्या होने पर सिर्फ ठंडा दूध ही पीना चाहिए। गरम दूध उतना लाभकारी नहीं होता।
▪️▪️ सौंफ (Fennel.....

        सौंफ खाने को पचाने में सहायता करती है और गैस को दूर रखती है। हर रोज खाना खाने के बाद सौंफ को मुंह में रखकर चबाएं। सौंफ के साथ मिश्री भी मिलाई जा सकती है। ऐसा करने से एसिडिटी से राहत मिलती है।
▪️▪️ बचाव.....
• पानी ज्यादा से ज्यादा से पीएं

• चाय-कॉफी कम से कम पीएं

• कोल्डड्रिंक या अन्य आर्टिफिशियल पेय न लें
• खाना समय से खाएं और खाकर कुछ देर टहलें, तुरंत सोएं नहीं

• ज्यादा तला-भुना या मसालेदार खाना न खाएं।
• भोजन बनाने में हींग का प्रयोग करे।

सोमवार, 13 मई 2024

रामानुजाचार्य जन्मोत्सव विशेष -रुद्रमाहात्म्य, भव के अंश से रामानुजाचार्य का आविर्भाव...

रामानुजाचार्य जन्मोत्सव विशेष 
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जन्म की कथा
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रुद्रमाहात्म्य, भव के अंश से रामानुजाचार्य का आविर्भाव...

देवगुरु बृहस्पतिजी ने कहा-देवेन्द्र! सृष्टि के प्रारम्भ में विराट् पुरुष की नाभि से एक विस्तृत कमल उत्पन्न हुआ। जिससे कमलासन ब्रह्मा उत्पन्न हुए। वे दो भुजा, चार मुख और दो पैरों वाले थे। उन्हें चिन्ता हुई कि मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और मेरा उत्पत्तिकर्ता कौन है ? इस प्रकार चिन्तित होते ही हृदयस्थ देवता ने कहा-'तुम तप करो। ' यह सुनकर ब्रह्माजी ने महान् तप किया। चतुर्भुज, योगगम्य सनातन विष्णु का कमलासन ब्रह्मा ने हजार वर्ष तक समाधिस्थ होकर ध्यान किया इसी समय नवीन मेघ के समान श्यामल, चतुर्भुज भगवान् विष्णु आयुध एवं दिव्य अलंकारों से अलंकृत होकर बालकरूप में ब्रह्मा के सामने प्रकट हुए। समाधि से जागकर ब्रह्मा उन्हें देखकर चकित हो गये। भगवान् विष्णु ने हँसकर कहा-'वत्स! मैं ही तुम्हारा पिता हूँ।' ब्रह्मा स्वयं को उनका पिता मानते थे । इस प्रकार दोनों में विवाद होने लगा। उसी समय तमोमय रुद्र ज्योतिर्लिङ्गरूप में प्रकट हुआ। हंसरूप में ब्रह्मा और वराहरूप में हरि सौ वर्ष तक क्रमशः ऊपर नीचे आते-जाते रहे, परंतु उसका अन्त न पाकर असफल हो उन दोनों ने लौटकर भगवान् शिव की स्तुति की।  प्रसन्न हो भगवान् भव दर्शन देकर कैलास चले गये और वहाँ समाधि में योगी रुद्र के दिव्य पाँच युग बीत गये इसी बीच तारकासुर नाम के भयंकर दानव ने हजार वर्ष तपकर ब्रह्मा से वर प्राप्त किया कि ' भाव से उत्पन्न पुत्र से ही तुम्हारी मृत्यु होगी।' वर प्राप्तकर तारकासुर ने देवताओं को जीतकर महेन्द्र का स्थान ग्रहण कर लिया। दुःखी देवगणों ने कैलास में जाकर रुद्र की स्तुति की। शिव ने कहा-'वर माँगो। उन लोगों ने नतमस्तक हो प्रणाम पूर्वक कहा-'भगवन्! भगवान् ब्रह्मा ने तारक को यह वर प्रदान किया है कि शिव-शक्ति से उत्पन्न पुत्र ही तुम्हें मारेगा। इसलिये भगवन्! आप हमलोगों की रक्षा करें और विवाह करें। स्वायम्भुव मन्वन्तर में दक्षप्रजापति की साठ कन्याएँ हुईं। उनमें एक सती नाम की भी कन्या थी। उसने एक वर्षतक आपकी पार्थिव पूजा की। उस सती को आपने वर प्रदान किया और वह आपकी प्रिया हुई। उसके पिता दक्ष ने आपका अपमान किया और दक्ष से उत्पन्न शरीर को सती ने यज्ञ में समर्पित कर दिया। उस सती का दिव्य तेज हिमालय में प्रविष्ट हुआ। अब वह अपना शरीर छोड़कर हिमालय तथा मेना की पुत्री पार्वती के रूप में उत्पन्न हुई है। वे गौरी उत्पन्न होते ही नौ वर्ष की हो गयीं। आपकी प्राप्ति के निमित्त उन्होंने सौ वर्ष तक जल में रहकर, सौ वर्ष पञ्चाग्रि का सेवनकर, सौ वर्ष तक वायुमात्र का पानकर और सौ वर्ष तक बिना साँस लिये आकाश-मण्डल तथा चन्द्रमण्डल आदि में
रहकर तपस्या भी की है। अतः हे भगवन् ! अब आप शिवा-पार्वती के साथ विवाह करें।

शिव ने कहा-देवगणो! आपकी बात अनुचित प्रतीत होती है, क्योंकि हमसे ज्येष्ठ ज्योति से उत्पन्न दस रुद्र अभी अविवाहित मैं उन सबसे छोटा भव नामक रुद्र हूँ, मैं उनके विवाह से पूर्व ही कैसे विवाह कर सकता हूँ? दूसरी बात यह है कि वे साक्षात् अव्यक्तरूपा पराम्बा हैं, उनसे सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड परिव्याप्त है। योगीश्वर ! मैं मातृरूपा भगवती का वरण कैसे कर सकता हूँ? अत: आपलोगों के कल्याण के लिये मैं अपनी शक्ति आपलोगों को देता हूँ, वह आपलोगों की कामना पूर्ण करेगी। अनन्तर भगवान् शंकर अपनी शक्ति अग्नि को समर्पित कर स्वयं पुनः समाधिस्थ हो गये। वह्नि के साथ इन्द्रादि देवगणों ने सत्यलोक में आकर ब्रह्मा को सम्पूर्ण वृत्तान्त सूचित किया। पुन: देवताओं के समुद्योग तथा गिरिजा की तपस्या से भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये। उन्होंने पार्वती को पाणिग्रहण करने का वर प्रदान किया। इसपर भगवती पार्वती ने नमस्कार कर कहा-'देव! मैं पिता-माता की आज्ञा के अनुसार ही कार्य करने वाली हूँ, अत: विवाह के लिये उनकी अनुमति चाहिये।'

भगवान शंकर ने सप्तर्षियों को बुलाकर सबकी सम्मति से हिमवान् के पास संदेश भेजा और विधिपूर्वक विवाह भी सम्पन्न हो गया। उस विवाह में बारातियों की सेवा के लिये पार्वती ने अपनी तपःसिद्धि से ऋद्धि सिद्धि को उत्पन्न कर यथाविधि सेवा सत्कार कर सबको संतुष्ट किया। यह देखकर ब्रह्मादि देवगण आश्चर्य में पड़ गये और उन्होंने अनेक प्रकार से उनकी स्तुति तथा दैत्यों से रक्षा की प्रार्थना भी की। पार्वती देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें अभय-दान दिया। विवाह के पश्चात् भगवान् शिव पार्वती के साथ कैलास चले आये और हजार वर्षो तक आनन्द में निमग्र रहे। काम-प्रद्युम्न की धृष्टता देखकर भगवान् शंकर ने उसे भस्म कर अनङ्गरूप में कर दिया। उसकी पत्नी रति की प्रार्थना पर भगवान ने कहा-'तुम प्राणियों के हृदय में निवास करोगी। यह स्वारोचिष मन्वन्तर है। वैवस्वत मन्वन्तर के अट्ठाईसवें द्वापर में भगवान् श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्र को तुम पतिरूप में प्राप्त करोगी। ऐसा कहकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये।' (बाद में कुमारस्वामी स्कन्द की उत्पत्ति हुई, जिन्होंने तारकासुर का वधकर देवताओं को शान्त एवं प्रसन्न किया तथा सम्पूर्ण संसार के साथ स्वर्ग को सुस्थिर कर दिया।)

सूतजी ने कहा-मुने! देवगुरु बृहस्पति से यह सुनकर भगवान् भव ने अपने मुख से अपने उत्तम अंश को उत्पन्न कर गोदावरी के किनारे आचार्यशर्मा के पुत्र रूप में जन्म ग्रहण किया। वे आचार्य रामानुज के नाम से विख्यात हुए और रामशर्मा के अनुज हुए।

स्तोत्र... भविष्य पुराण
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वैशाख की कहानियाँ (पंचभीखम की कथा)

वैशाख की कहानियाँ (पंचभीखम की कथा)
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एक साहूकार के बेटे की बहू थी, जो बहुत सुबह उठकर कार्तिक के महीने में रोजना गंगा जी नहाने जाती। पराए पुरुष का मुँह नहीं देखती। एक राजा का लड़का था। जब भी रोजाना गंगा जी नहाने जाता और सोचता कि मैं इतनी सुबह नहाने आता हूँ तो भी मेरे से पहले कौन नहा लेता है। 
         
पाँच दिन कार्तिक के रह गए। उस दिन साहूकार की बहू तो नहा के जा रही थी, राजा का बेटा आ रहा था। खुढ़का सुनकर वह जल्दी-जल्दी जाने लगी, तो उसकी माला-मोचड़ी छूट गई। राजा आया उसने सोचा जब माला-मोचड़ी इतनी सुंदर है तो इसे पहनने वाली कितनी सुंदर होगी, सारी नगरी में राजा के लड़के ने हेलो फिरा दिया कि जिसकी यह माला-मोचड़ी है, वह मेरे पास पाँच दिन आएगी, तब मैं उसकी माला-मोचड़ी दूँगा। 
         
साहूकार के बेटे की बहू ने कहलवा दिया कि मैं पाँच दिन आऊँगी, पर किसी को साख भरने के लिए बैठा दियो। राजा ने गंगा जी पर बिछावन करके, एक तोते को पिंजरे में टांग कर रख दिया। वह सुबह आई, पहली पैड़ी पर पैर रखा, वह बोली कि 'हे कातक ठाकुर-राय दामोदर-पांचू पांडू-छठो नारायण-भीसम राजा" उस पापी को नींद आ जाए। मैं सत की हूँ तो मेरा सत रखना। (श्रीजी की चरण सेवा" की सभी धार्मिक, आध्यात्मिक एवं धारावाहिक पोस्टों के लिये हमारे पेज से जुड़े रहें) राजा को नींद आ गई और वह नहा-धोकर जाने लगी, तो तोते (सुवा) से बोली कि 'सुवा-सुवा सुवटा-गल घालूँगी हार-साख भरिए मेरा वीरा। 'सुवा बोला कि कोई वीर भी साख भरा करता है ? जब वह बोली कि सुवा-सुवा सुबटा-पग घालूँगी नेवर साख भरिये मेरा देवर।' सुवा ने कहा अच्छा भाभी मैं साख भरूँगा। वह तो कहकर चली गई। 
         
राजा हड़बड़ाकर उठा, सुवा से पूछा, 'सुवा-सुवा वह आई थी, कैसी थी ?' सुवा बोला, 'आभा की सी बिजली, होली की सी झल, केला की सी कामनी, गुलाब का सा रंग।' राजा ने सोचा कि कल मैं अपनी उँगली चीर के बैठ जाऊँगा, तो नींद नहीं आएगी। दूसरे दिन उँगली चीर के बैठ गया। वह आई उसने वैसे ही प्रार्थना करी, बस उसको नींद आ गई। नहा के जाने लगी तो सुवा ने साख भरा दी। राजा ने उठते ही फिर सुवा से पूछा। सुवा ने कल जैसा ही जवाब दे दिया।
         
उसने सोचा, कल तो मैं आँख में मिर्च डालकर बैठ जाऊँगा। तीसरे दिन आँख में मिर्च डालकर बैठ गया, सारी रात हाय-हाय करके बिताई। वह आई, उसने वैसे ही प्रार्थना की, राजा को नींद आ गई। नहा के सुवा से साख भराके चली गई। राजा ने सोचा कि कल तो मैं काँटों की सेज बिछाकर बैठूँगा चौथे दिन काँटों की सेज पर बैठकर हाय-हाय करता रहा, पर जब पर वह आई उसको नींद आ गई वह प्रार्थना करके नहा के, सुवा से साख भरा के चली गई पाँचवे दिन राजा आग जलाकर उसकी राख पर बैठ गया। वह उस दिन भी प्रार्थना करती आई कि आज भी मेरा सत रख दियो।
         
राजा को नींद आ गई उसने सुवा से साख भरा ली और कहा कि उस पाजी से कह दियो, मेरे पाँच दिन पूरे हो गए हैं। अब मेरी माला-मोचड़ी मेरे घर भेज देगा। राजा ने उठते ही सुवा पूछा वह आई थी क्या ? सुवा बोला आई थी, अपनी माला-मोचड़ी मँगाई है।
         
थोड़े दिन बाद राजा के कोढ़ निकल आए, त्राहि-त्राहि पुकारने लगा। पुरोहित को बुलाकर पूछा कि सारे शरीर में जलन कैसे लग गई। पुरोहित बोला कि यह कोई पतिव्रता स्त्री का पाप धरा है, जिससे लगी है। राजा ने पूछा कि अब कैसे ठीक होगा। पुरोहित बोला कि उसको तुम धर्म की बहन बनाओ और उसके नहाए हुए जल से नहाओगे, तो तुम्हारा जलन, कोढ़ ठीक होगा। 
         
राजा माला-मोचड़ी लेकर उसके घर गया और साहूकार से बोला कि ये तेरी बहू गंगा पर भूल गई थी, यह उसे दे दो और कह देना कि अपने नहाए हुए जल मुझे नहला दे। साहूकार बोला कि वह तो पराए पुरुष का मुँह नहीं देखती, तू इस नाली के नीचे बैठ जा, वह नहाएगी तो तेरे ऊपर पानी पड़ जाएगा। राजा नाली के नीचे बैठ गया। वह नहायी तो जल गिरने से उसकी काया कंचन-सी हो गई। 
         
'हे पचंभीखम देवता, जैसे साहूकार की बहू का सत रखा, ऐसा सबका रखियो।      
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भगवान शिव का नाम त्रिपुरारी कैसे पड़ा

भगवान शिव का नाम त्रिपुरारी कैसे पड़ा
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प्राचीन समय में तारकासुर नाम का एक महाभयंकर दैत्य हुआ था। जिसका वध शिव पुत्र कार्तिकेय के द्वारा हुआ था. उस तारकासुर के तीन पुत्र थे. जिनका नाम तारकाक्ष, विद्युन्माली, कमलाक्ष था. वह तीनो अपने पिता की तरह शिव द्रोही नहीं थे. वह तीनो परम शिवभक्त थे. यद्यपि देवताओं ने कुमार कार्तिकेय का सहारा लेकर उनके पिता का वध करवा दिया था इसलिए वह देवताओं से घृणा करते थे।

अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए वह तीनो मेरु पर्वत पर चले गए और मेरु पर्वत की एक कंदरा में समस्त भोगो का त्याग करके ब्रह्माजी की कठिन तपस्या करने लगे. उन तीनो की हजारों वर्षो की तपस्या के बाद ब्रह्माजी उनपर प्रसन्न हुए और वहां पर प्रकट हुए. ब्रह्माने प्रसन्न होकर उन तीनों को वरदान मांगने के लिए कहा।

ब्रह्माजी की बात सुनकर वह तीन असुर बोले परमपिता ब्रह्माजी अगर आप हम पर प्रसन्न हो तो हमें यह वर दे कि हम सभी के लिए अवध्य हो जाये. हमारे जरा और रोग जैसे शत्रु सदा के लिए नष्ट हो जाए. सभी देवता हमसे पराजित हो जाए. उनकी बात सुनकर ब्रह्मा ने उनसे कहा है महान असुरो इस सृष्टि में जिसने जन्म लिया उसे मरना तो पड़ता है है. किसी को अमरता का वरदान देना मेरे सामर्थ्य की बात नहीं है. इसलिये तुम कुछ ऐसा उपाय करके वरदान मांगो जिससे मृत्यु का तुम्हारे निकट आना असंभव हो जाए।

ब्रह्मा की बात सुनकर तीनो भाई विचार में पड़ गए और बहुत सोच विचार कर ब्रह्माजी से कहा है परमपिता हम तीनो के पास ऐसा कोई स्थान नहीं है जहां रहकर हम देवताओं से सुरक्षित रह सके. आप हमारे लिए ऐसे तीन नगरों का निर्माण करवाए जहां पर पहूंचना देवताओं के लिए असंभव हो. वह तीनो नगर अदृश्य होकर अंतरीक्ष में घूमते रहे. उन नगरों में सभी प्रकार की सुख सुविधा हो. उसके बाद तारकाक्ष ने सुवर्णमय नगर का, विद्युन्माली ने चांदी का और कमलाक्ष ने वज्र के सामान लोहे के नगर का ब्रह्माजी से वरदान मांगा।

वह तीनो शिवजी के परमभक्त थे इसलिए उन्होंने सोचा कि शिवजी हमारा वध कभी नहीं करेंगे. यह सोचकर उन्होंने अपनी मृत्यु का विकल्प इस प्रकार पसंद किया. उन तारकपुत्रों ने ब्रह्माजी से कहा जब चंद्रमा पुष्य नक्षत्र में स्थित हो और जब पुष्करावर्त के कालमेघो को की वर्षा हो रही हो तब तीनो नगर परस्पर एक दिशा में मिले अन्यथा न मिले. ऐसा दुर्लभ संयोग हजारों वर्षो में एक बार होता है तब भगवान शिव एक दुर्लभ रथ पर चड़कर एक ही बाण से इन तीन नगरों का नाश करे तो ही हमारा वध हो।

ब्रह्माजी ने उस समय उन दैत्यों से कहा ऐसा ही होगा उसके बाद उन्होंने मय दानव जो असुरो के शिल्पी है उनका आह्वान किया और उन्हें तारकासुर के पुत्रों के लिए तीन प्रकार के भवन निर्माण करने का आदेश दिया. वह तीनो भवन वरदान के अनुसार सुवर्ण, चांदी और लोहे के बने हुए थे. उस नगरों में कैलास शिखर के समान बड़े बड़े भवन थे. उन नगरों में सभी वृक्ष कल्पवृक्ष के समान कामना को पूर्ण करने वाले थे. उन नगरो में उन तीनो भाइयों ने बहुत लंबे समय तक सुख पूर्वक निवास किया।

उन असुरों ने बहुत लंबे समय तक वहां पर शिव की भक्ति करते हुए निवास किया. वह जानते थे कि शिव उनके भक्तो का कभी अहित नहीं करते. इसलिए वह निर्भय हो गए थे. उन्होंने देवताओं को अपने प्रभाव से दग्ध कर दिया था. उनके नगरों में वेद और पुराणों की ध्वनी गूंजती रहती थी. इस कारण से उनके नगर और भी शक्तिशाली बन रहे थे. एक तरफ वह शिव भक्ति के कारण बलवान बन रहे थे तो दूसरी तरफ उन्होंने पृथ्वी पर यज्ञों, हवनो और वेदध्वनी पर प्रतिबंध रख दिया. अग्निहोत्री ब्राह्मणों की हत्या कर दी जिससे देवताओं को बल प्राप्त न हो।

पुराणों बहुत से असुर बतलाये गए जो बड़े शिव भक्त थे. रावण भी एक महान शिव भक्त था परंतु जब भगवान का भक्त ही अधर्म का कारण बन जाये तो भगवान को स्वयं अपने भक्तो का उद्धार करना पड़ता है. ऐसा ही तारक पुत्रो के साथ हुआ. सभी देवतागण ब्रह्मा और विष्णु को साथ में लेकर शिवजी की शरण में चले गए और शिवजी से तारकासुर के पुत्रों के विनाश के लिए प्राथना की. उस समय शिवजी ने देवताओं से कहा जब तक वह तीन महान दैत्य मेरे भक्त है में उनका अहित नहीं करूँगा फिर भी वह तीनो मेरी भक्ति से बलवान होकर सृष्टि में अधर्म का फैलाव कर रहे है इसलिए तुम सब मिलकर ऐसा कुछ उपाय करो कि वह तीनों मेरी भक्ति से विमुख हो जाए।

शिवजी की आज्ञा के अनुसार देवताओं का यह कार्य करने के लिए भगवान विष्णु ने एक सुंदर दिव्य स्वरूप धारण किया. वह मुनि वेश में तीनो नगरों में गए और वहां वेदों के विरुद्ध उपदेश किया. उन नगरों के असुरों को अपने वाणी से शिव भक्ति से दूर कर दिया. उस वेद विरुद्ध उपदेश से प्रभावित होकर उन नगरों की स्त्रियों ने पतिव्रत धर्म छोड़ दिया. जब वह तीनो नगर शिव भक्ति से विमुख हो गए तब पुनः देवता गण शिवजी की पास आये और उन्हें उन तीन असुरों का उनके नगर के साथ नष्ट करने के लिए प्राथना की।

उस समय शिवजी ने देवताओं से कहा यद्यपि वह तीन असुर मेरी भक्ति से विमुख हुए है परंतु एक समय था वह मेरे परम भक्त है. इसलिए में उनका विनाश क्यों करू उनका विनाश भगवान विष्णु को करना चाहिए जिन्होंने उन्हें मेरी भक्ति से विमुख किया है. उस समय सभी देवता उदास हो गए. यह देखकर ब्रह्माजी ने शिवजी से कहा है प्रभु आप हम सब के राजा है. भगवान विष्णु आप के युवराज है और में आप का पुरोहित हूँ. यह सब देवता आप की प्रजा है जो आप की शरण में आई है. मेरे वरदान के अनुसार उन तीन असुर आप के आलावा सभी के लिए अवध्य है. इसलिए हम सब की रक्षा करे और उन असुरों का वध करे।

ब्रह्मा की बात सुनकर शिवजी ने मुस्कराते हुए कहा आप मुझे राजा कह रहे है परंतु मेरे पास कोई ऐसा रथ नहीं जो राजा के पास होता है और न ही मेरे पास कोई राजा के योग्य शस्त्र है. में उनका विनाश कैसे करू. उस समय ब्रह्माजी की आज्ञा से शिवजी से लिए एक दिव्य रथ का निर्माण करवाया गया. वह रथ सोने का बना हुआ था. उसके दाहिने चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विद्यमान थे. अंतरीक्ष उस रथ का ऊपर का भाग था और मंदराचल उस रथ का बैठने का स्थान था. ब्रह्माजी उस रथ के सारथि बने. हिमालय से धनुष बनाया गया और वासुकी को प्रत्यंचा बनाया गया. भगवान विष्णु उस धनुष के बाण और अग्नि उस बाण की नोक बने. वेद उस रथ के अश्व बन गए. संसार में जो भी कुछ तत्व तह वह सभी उस रथ में मौजूद थे।

उस समय ब्रह्माजी ने भगवान शिव से रथ पर सवार होने के लिए प्राथना की. शिव के सवार होते ही वह रथ शिव के भार से निचे झुक गया. वेदरूपी अश्व शिवजी का भार सहन न कर पाए और जमीन पर बैठ गए. सबको लगा कोई भूकंप आ गया है. उस समय नंदी जी वहां पर उपस्थित हुए और उस रथ के निचे जाकर शिवजी के भार को स्वयं सहन करने लगे. वह भी बड़ी मुश्किल से शिवजी की कृपा से शिवजी का भार सहन कर सके।

उस समय भगवान शिव की आज्ञा से सभी देवतागण पशुभाव में स्थित हो गए. भगवान शिव उनके अधिपति हुए इसलिए उन्हें पशुपति भी कहा जाता है. उसके बाद ब्रह्मा ने उस रथ को हांकना शुरू किया परंतु वह रथ आगे नहीं बढ़ा तब शिव की आज्ञा से सभी देवताओं ने विघ्न को दुर करने वाले गणनायक गणपति से प्राथना की और वह रथ आगे बढ़ने लगा।

उसके बाद जब भगवान शिव ने अपना रौद्र स्वरूप धारण किया. उस समय संयोग वश वह तीनो नगर एक ही रेखा में बने हुए थे. शिव ने वह हिमालय स्वरूप धनुष पर विष्णु स्वरूप बाण का संधान किया. बाण के संधान करते ही शिवजी के क्रोध से प्रभावित होकर वह तीनो नगर जलने लगे. शिवजी के उस महान धनुष के द्वारा एक ही बाण में तारकासुर के तीनो पुत्रो का संहार हो गया. शिवजी की कृपा से उन तीनो असुरों को मोक्ष की प्राप्ति हुई. देवताओं का कार्य भी सिद्ध हुआ. उन तीन नगर में जो लोग शिव की भक्ति से विमुख नहीं हुए थे उनकी शिवजी ने रक्षा की. इस तरह भगवान शिव ने तारकासुर के तीनो पुतोर्ण का अंत किया और त्रिपुरारी कहलाये।
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रविवार, 12 मई 2024

बैंकों को लूटकर देश छोड़कर भागे लोगों की लिस्ट:-

बैंकों को लूटकर देश छोड़कर भागे लोगों की लिस्ट:-

1. विजय माल्या

2. मेहुल चौकसी

3. नीरव मोदी

4. निशांत मोदी

5. पुष्पेश पद्य

6. आशीष जोबनपुत्र

7. सनी कालरा

8. आरती हैजा

9. संजय कालरा

10. वर्षा कालरा

11. सुधीर कालरा

12. जादिन मेहता

13. उमेश पतले

14. कमलेश पतला

15. नीलेश परिहो

16. विनय मित्तल

17. एकवचन जाली

18.चेतन जयंतीलाल दारा

19. नितिन जयंतीलाल दारा

20. दीप्तिबन चेतन

21. साविया सेठा

22. राजीव गोयल

23. अलका गोयल

24. ललित मोदी

25. रितेश जैनी

26. हितेश एन पटेल

27. मयूरीबेहन पटेल

28. आशीष सुरेशबाई

कुल डकैती: 10,000,000,000,000/- (दस ट्रिलियन रुपये)

इनमें से कोई भी ....

आरएसएस से नहीं।

बजरंग दल का कोई नहीं है।

श्री राम सेना का कोई नहीं है।

हिन्दू विजिलेंस फोरम का कोई सदस्य नहीं है।

इनमें से कोई भी बीजेपी का नहीं है।

इनमें से कोई भी विश्व हिंदू परिषद से संबंधित नहीं है।

एक और बात, इन सब नाम में से किसी ने भी 1 मई 2014 के बाद से किसी भी बैंक से कर्ज नहीं लिया है। बैंक डकैती का दौर था... 2004 - 2014 तक जब /सोनिया/वाड्रा कांग्रेस सत्ता में थी। और आज ये सभी बेशर्म कांग्रेसी मोदी को चोर कहते हैं।

जबकि...... मोदी जी के आते ही सारे खेल थम गए...

ज्यादा से ज्यादा शेयर करें... देश को बचाना है तो देशद्रोहियों का पर्दाफाश करना होगा।

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जिस हाल में आज पाकिस्तान हैं, एैसे ही हाल में छोड़ के गए थे राजीव गाँधी भारत को...

सोनिया ने पर्दे के पीछे किस कदर लूट की होगी ? सोचिये...

तब 40 करोड़ के लिए सोना गिरवी रखा था... जबकि 64 करोड़ की दलाली तो सिर्फ बोफोर्स में खाई गयी थी...

RBI गवर्नर रहे Y.V रेड्डी की पुस्तक ADVISE AND DECENT से साभार...

काँग्रेस के शासनकाल में सिर्फ 40 करोड़ रुपए के लिए हमें अपना 47 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था ।

ये स्थिति थी भारतीय इकॉनॉमी की ।

मुझे याद हैं नब्बे के शुरुआती दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था को, वो दिन भी देखना पड़ा था जब, भारत जैसे देश को भी अपना सोना विश्व बैंक में गिरवी रखना पड़ा था...

राजीव गाँधी के शासनकाल में देश की तिजोरी खाली हो चुकी थी । और तभी प्रधान मंत्री राजीव गाँधी की हत्या लिट्टे के आतंकियों ने कर दी थी...

चन्द्रशेखर तब नए नए प्रधान मंत्री बने थे... तिजोरी खाली थी । वे घबरा गए । करें तो क्या करें ?

Reddy अपने पुस्तक मे लिखते हैं कि पूरे देश में एक तरह का निराशा भरा माहौल था... राजीव गाँधी ने अपने शासनकाल में कोई रोज़गार नहीं दिया था।

नया उद्योग धन्धा नहीं... एक बिजनेस डालने जाओ तो पचास जगह से NOC लेकर आना पड़ता था।

काँग्रेस द्वारा स्थापित लाइसेंस परमिट के उस दौर में, चारों तरफ बेरोज़गारी और हताशा क आलम था...

दूसरी तरफ देश में मंडल और कमंडल की लड़ाई छेड़ी हुई थी...

1980 से 1990 के दशक तक देश में काँग्रेस ने Economy को ख़त्म कर दिया था... उसी दौरान बोफोर्स तोपों में दलाली का मामला सामने आया...

किताब में Reddy लिखते हैं कि, गाँधी परिवार की अथाह लूट ने, देश की अर्थ व्यवस्था को रसातल में पहुँचा दिया था।

Reddy अपनी किताब में लिखते हैं कि, उन दिनों भारत का विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम हो गया था कि रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने अपना सोना विश्व बैंको में गिरवी रखने का फैसला किया... हालात ये हो गए थे कि देश के पास तब केवल 15 दिनों का आयात करने लायक ही पैसा था।

तब तत्कालीन प्रधान मंत्री चन्द्रशेखर के आदेश से, भारत ने 47 टन सोना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में गिरवी रखा था...

उस समय एक दिलचस्प और भारतीय जनमानस को शर्म सार करने वाली घटना घटी... RBI को बैंक ऑफ़ इंग्लैंड में 47 टन सोना पहुँचाना था। ये वो दौर था जब मोबाइल तो होते नहीं थे और लैंड लाइन भी सीमित मात्रा में हुआ करती थी।

नयी दिल्ली स्थित RBI का इतना बुरा हाल था की बिल्डिंग से 47 टन सोना नयी दिल्ली एयर पोर्ट पर एक वैन द्वारा पहुँचाया जाना था. वहां से ये सोना इंग्लैंड जाने वाले जहाज पर लादा जाना था, खैर बड़ी मशक्कत के बाद ये 47 टन सोना इंग्लैंड पहुँचा और ब्रिटेन ने भारत को 40.05 करोड़ रुपये कर्ज़ दिये।

भारतीय अर्थ व्यवस्था से जुडी इस पुरानी तथा मन को दुःखी करने वाली घटना का उदाहरण मैंने इसलिए दिया ताकि, लोगों को पता चले कि काँग्रेस के जो बेशर्म नेता और समर्थक, मोदीजी के ऊपर, देश की अर्थ व्यवस्था चौपट करने का इल्जाम लगाते हैं, उस कमअक्ल लुटेरे गाँधी परिवार की लापरवाही की वजह से ही, देश को अपना सोना महज़ 40 करोड़ का कर्ज पाने के लिए गिरवी रखना पड़ा था ।

किसी देश के लिए इससे ज्यादा अपमान और शर्म की बात क्या हो सकती हैं ।

मुझे बेहद हँसी, हैरानी और गुस्सा आता हैं जब, देश को महज़ 40 करोड़ रुपये के लिए गिरवी रखने वाले लोग कहते हैं कि, मोदीजी ने भारत की अर्थ व्यवस्था को बर्बाद कर दिया.

श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय, एक मशहूर कम्पनी, एनरॉन नें, महाराष्ट्र के दाभोल में कारखाना लगाने की प्लानिंग की ..!!

लेकिन, यह स्थानीय लोगों के प्रतिरोध के कारण, हो न सका !!

फलस्वरूप, बदलती विषम परिस्थितियों से नाराज एनरॉन नें, भारत सरकार पर ₹38,000 करोड़ के नुकसान की भरपाई का मुकदमा दायर कर दिया ..।।

वाजपेयी सरकार ने हरीश सालवे (सालवे जी नें, कुलभूषण जाधव का मुकदमा इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में लड़ कर जीता ..) को भारत सरकार का वकील नियुक्त किया ..।।

पर आप जान कर चोंक जाएंगे कि, एनरॉन के वकील पी. चिदंबरम बनें ..!! यानी, पी चिदंबरम भारत के विरुद्ध ..।।

समय बीतता चला गया ..!! बादमें 'यूपीए' सरकार बनी ..!! कैबिनेट मंत्री चिदंबरम, एनरॉन की तरफ से मुकदमा नहीं लड़ सकते थे ..!! पर वो कानूनी सलाहकार बने रहे और, वो मुकदमे को एनरॉन के पक्ष में करने में सक्षम थे ..।।

😠 *अगला खुलासा* *और चौकानें वाला* *है* !!

चिदंबरम ने तुरंत हरीश सालवे को एनरॉन केस से हटा दिया ..।। हरीश साल्वे की जगह, खबर कुरेशी को नियुक्त किया गया ..।।आप ठीक समझे, ये वही पाकिस्तानी वकील है जिसनें, कुलभूषण जाधव केस में, पाकिस्तान सरकार का मुकदमा लड़ा ..!!

कांग्रेस ने भारत सरकार कि तरफ से, पाकिस्तानी वकील को ₹1400/- करोड़ दिये वकील कि फीस के रुप में ..।। अंततः भारत मुकदमा हार गया और भारत सरकार को ₹38,000/- करोड़ का भारी भरकम मुआवजा देना पड़ा ..।। लेकिन, लुटीयन मिडिया ने ये खबर या तो गोल दी या सरसरी तौर पर नहीं दिखाई !!

अब सोचिए कि ₹38000/- करोड़ का मुकदमा लडने के लिए फीस कितनी ली होगी ..?? जो पाठक किसी क्लेम के केस मे वकील कि फीस तय करते है उन्हें पता होगा कि, वकील केस देखकर दस प्रतिशत से लेकर साठ प्रतिशत तक फीस लेता है ..।।

--- *सोचिए इस पर* *कोई हंगामा नही हुआ ..??*

अगर ये केस मोदी के समय मे होता, और भारत सरकार कोर्ट में हार जाती तो ..?? चमचो की छोड़िए, भक्त भी डंडा लेकर मोदी के पीछे दोड़ते ..।।

और एक मजेदार बात .. जिन कम्पनियों का एनरॉन मे निवेश करके यह प्रोजेक्ट केवल फाईल किया था उनका निवेश महज मात्र 300 मिलियन डालर .. याने उस वक्त कि डालर रुपया विनियम दर के हिसाब से, महज ₹1530/- करोड़ था, और वह भी बैठे बिठाये ..।। महज सात साल मे ₹38,000/- करोड़ का फायदा ..!! वो भी एक युनिट बिजली का संयंत्र लगाये बिना ..??

😠 *कांग्रेस हमारी सोचने की* *क्षमता से भी ज्यादा* *विनाशकारी है !!*

(यह थी 'विश्व प्रसिद्ध' अर्थशास्त्री, अनुभवी और पढे लिखे लुटेरो की सरकार ..!!) *जिस किसी को भी कोई शंका* *हो वो गूगल में जाकर देख सकता है।*

🔥जन जागरण अभियान के लिए जारी किया गया।

आज जितने भी लोग मोदीजी को और उनकी सरकार को बदनाम करने की साजिश कर रहे हैं उस समय सब मौन धारण करे हुए थे वो सब ये बात जानते थे कि कांग्रेस क्या कुछ कर सकती है।

अगर आज ऐसे लोग सुरक्षित हैं तो केवल मोदीजी के कारण, *आज भारत का विदेशी मुद्रा भंडार विश्व में चौथे स्थान पर है* मगर ग़ुलाम कहते हैं कि Modi ने किया ही क्या है।

*आदरणीय बन्धुओ कांग्रेस नें जो गद्दारी देश के साथ की है , इनके कुकर्मो का* *ढिंढोरा सोशल मीडिया पर खूब वायरल करना चाहिए, जिससे हमारी युवा पीढ़ी को भी जानकारी होनी चाहिए, कि देश अन्य देशों से इन 70 सालों में पीछे कैसे रह गया.*

*हम लोग इतना तो कर ही सकते है*

🇮🇳🇮🇳🇮🇳 *जय हिन्द जय भारत* 🚩🚩🚩

संत कवि सूरदास जिसने जगत को दिखाई श्री कृष्णलीला

संत सूरदास जन्मोत्सव विशेष
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संत कवि सूरदास जिसने जगत को दिखाई श्री कृष्णलीला
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महाकवि सूरदास जिन्होंने जन-जन को भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं से परिचित करवाया। जिन्होंनें जन-जन में वात्सल्य का भाव जगाया। नंदलाल व यशोमति मैया के लाडले को बाल गोपाल बनाया। कृष्ण भक्ति की धारा में सूरदास का नाम सर्वोपरि लिया जाता है। सूरदास जिन्हें बताया तो जन्मांध जाता है लेकिन जो उन्होंने देखा वो कोई न देख पाया। गुरु वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग पर सूरदास ऐसे चले कि वे इस मार्ग के जहाज तक कहाये। अपने गुरु की कृपा से भगवान श्री कृष्ण की जो लीला सूरदास ने देखी उसे उनके शब्दों में चित्रित होते हुए हम भी देखते हैं। वैशाख शुक्ल पंचमी को सूरदास जी की जयंती मनाई जाती है। आइये जानते हैं इनके जीवन के बारे में।
 
सूरदास का संक्षिप्त जीवन परिचय
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सूरदास का संपूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में बीता है। उन्होंने कृष्ण की लीलाओं पर पद लिखे व गाये। यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी उनके गुरु वल्लभाचार्य ने। सूरदास के जन्म को लेकर विद्वानों के मत अलग-अलग हैं। कुछ उनका जन्म स्थान गांव सीही को मानते हैं जो कि वर्तमान में हरियाणा के फरीदाबाद जिले में पड़ता है तो कुछ मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक ग्राम को उनका जन्मस्थान मानते हैं। सूरदास एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्में थे। इनके पिता रामदास भी गायक थे। इनके बारे में प्रचलित है कि ये बचपन से साधु प्रवृति के थे। इन्हें सगुन बताने कला वरदान रूप में मिली थी। जल्द ही ये बहुत प्रसिद्ध भी हो गये थे। लेकिन इनका मन वहां नहीं लगा और अपने गांव को छोड़कर समीप के ही गांव में तालाब किनारे रहने लगे। जल्द ही ये वहां से भी चल पड़े और आगरा के पास गऊघाट पर रहने लगे। यहां ये जल्द ही स्वामी के रूप में प्रसिद्ध हो गये। यहीं पर इनकी मुलाकात वल्लभाचार्य जी से हुई। उन्हें इन्हें पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी और श्री कृष्ण की लीलाओं का दर्शन करवाया। वल्लभाचार्य ने इन्हें श्री नाथ जी के मंदिर में लीलागान का दायित्व सौंपा जिसे ये जीवन पर्यंत निभाते रहे।
 
सूरदास की जन्मतिथि
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सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। "साहित्य लहरी' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना-काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है -

मुनि पुनि के रस लेख।
दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख॥

इसका अर्थ संवत् 1607 ईस्वी में माना गया है, अतएव "साहित्य लहरी' का रचना काल संवत् 1607 वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु श्री वल्लभाचार्य थे।

सूरदास का जन्म सं० 1540 ईस्वी के लगभग ठहरता है, क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म-तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी, संवत् 1535 वि० समीचीन जान पड़ती है। 

क्या सूरदास जन्मान्ध थे ?
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सूरदास श्रीनाथ की "संस्कृतवार्ता मणिपाला', श्री हरिराय कृत "भाव-प्रकाश", श्री गोकुलनाथ की "निजवार्ता' आदि ग्रन्थों के आधार पर, जन्म के अन्धे माने गए हैं। लेकिन राधा-कृष्ण के रूप सौन्दर्य का सजीव चित्रण, नाना रंगों का वर्णन, सूक्ष्म पर्यवेक्षणशीलता आदि गुणों के कारण अधिकतर वर्तमान विद्वान सूर को जन्मान्ध स्वीकार नहीं करते।

श्यामसुन्दर दास ने इस सम्बन्ध में लिखा है - "सूर वास्तव में जन्मान्ध नहीं थे, क्योंकि शृंगार तथा रंग-रुपादि का जो वर्णन उन्होंने किया है वैसा कोई जन्मान्ध नहीं कर सकता।" डॉक्टर [(हजारीप्रसाद द्विवेदी)] ने लिखा है - "सूरसागर के कुछ पदों से यह ध्वनि अवश्य निकलती है कि सूरदास अपने को जन्म का अन्धा और कर्म का अभागा कहते हैं, पर सब समय इसके अक्षरार्थ को ही प्रधान नहीं मानना चाहिए।"

सूरदास एक कृष्ण भक्त के रूप में 
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इनके विषय में कई कथा प्रचलित हैं कहते हैं एक बार ये एक कुंये में गिर जाते हैं और वहाँ भी कृष्ण भक्ति में लीन हो जाते हैं तब स्वयं कृष्ण भगवान ने उनकी जान बचाई थी तब देवी रुक्मणि नेश्री कृष्ण से पूछा था कि वे क्यूँ स्वयं सूरदास जी की जान बचा रहे हैं तब कृष्ण ने कहा था मैं एक सच्चे भक्त की मदद कर रहा हूँ यह उसकी उपासना का फल हैं.जब कृष्ण उन्हें बचाने गये तब उन्होंने सुरदार को उनकी नेत्र ज्योति दी तब सूरदास ने अपने इष्ट को देखा. तब कृष्ण ने सूरदास से कहा कि वे कोई भी वरदान मांगे. तब सूरदास ने उत्तर दिया उसे सब कुछ मिल चूका है और वो चाहता हैं कि उसे वापस अँधा कर दे क्यूंकि वो अपने इस इष्ट को देखने के बाद किसी अन्य को देखना नहीं चाहते. कृष्ण ने सुरदास की इच्छा पूरी की और उन्हें जन्म जन्मांतर तक ख्याति प्राप्त हो ऐसा आशीर्वाद दिया।

सूरदास एक कवी के रूप में
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सूरदास हिंदी भाषा के सूर्य कहे जाते हैं इनकी रचनाओं में कृष्ण की भक्ति का वर्णन मिलता हैं. इनकी सूरसागर, सूर सारावली, साहित्य लहरी, नल दमयन्ती,ब्याहलों रचनाये प्रसिद्ध हैं।सूरदास जी ने अपने पदों के द्वारा यह संदेश दिया हैं कि भक्ति सभी बातों से श्रेष्ठ हैं। उनके पदों में वात्सल्य, श्रृंगार एवम शांत रस के भाव मिलते हैं। सूरदास जी कूट नीति के क्षेत्र में भी काव्य रचना करते हैं। उनके पदों में कृष्ण के बाल काल का ऐसा वर्णन हैं मानों उन्होंने यह सब स्वयं देखा हो. यह अपनी रचनाओं में सजीवता को बिखेरते हैं। इनकी रचनाओं में प्रकृति का भी वर्णन हैं जो मन को भाव विभोर कर देता हैं। सूरदास जी भावनाओं के घनी हैं इसलिए उनकी रचनायें भावनात्कम दृष्टि कोण से अत्यंत लुभावनी हैं। सूरदास जी के पद ब्रज भाषा में लिखे गये है। सूरसागर नामक इनकी रचना सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं।

 रचनाएं
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सूरदास जी द्वारा लिखित पाँच मुख्य ग्रंथ

(1) सूरसागर 👉 जो सूरदास की प्रसिद्ध रचना है। जिसमें सवा लाख पद संग्रहित थे। किंतु अब सात-आठ हजार पद ही मिलते हैं।

(2)👉 सूरसारावली

(3) साहित्य-लहरी 👉 जिसमें उनके कूट पद संकलित हैं।

(4) 👉 नल-दमयन्ती

(5) 👉 ब्याहलो

(6) 👉  '''''पद संग्रह' दुर्लभ पद 

उपरोक्त में अन्तिम दो अप्राप्य हैं।
नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित हस्तलिखित पुस्तकों की विवरण तालिका में सूरदास के 16 ग्रन्थों का उल्लेख है। इनमें सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल-दमयन्ती, ब्याहलो के अतिरिक्त दशमस्कंध टीका, नागलीला, भागवत्, गोवर्धन लीला, सूरपचीसी, सूरसागर सार, प्राणप्यारी, आदि ग्रन्थ सम्मिलित हैं। इनमें प्रारम्भ के तीन ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं, साहित्य लहरी की प्राप्त प्रति में बहुत प्रक्षिप्तांश जुड़े हुए हैं।
साहित्य लहरी, सूरसागर, सूर की सारावली।श्रीकृष्ण जी की बाल-छवि पर लेखनी अनुपम चली।।

सूरसागर का मुख्य वर्ण्य विषय श्री कृष्ण की लीलाओं का गान रहा है।

सूरसारावली में कवि ने जिन कृष्ण विषयक कथात्मक और सेवा परक पदों का गान किया उन्ही के सार रूप में उन्होंने सारावली की रचना की है। सहित्यलहरी मैं सूर के दृष्टिकूट पद संकलित हैं।

कैसे हुई सूरदास की मृत्यु
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अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका मृत्यु संवत् 1620 से 1648 ईस्वी के मध्य स्वीकार किया जाता है। रामचन्द्र शुक्ल जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् 1540 वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् 1620 ईस्वी के आसपास माना जाता है।

मान्यता है कि इन्हें अपने देहावसान का आभास पहले से ही हो गया था। इनकी मृत्यु का स्थान गांव पारसौली माना जाता है। मान्यता है कि यहीं पर भगवान श्री कृष्ण ने रासलीला की थी। श्री नाथ जी की आरती के समय जब सूरदास वहां मौजूद नहीं थे तो वल्लाभाचार्य को आभास हो गया था कि सूरदास का अंतिम समय निकट है। उन्होंने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए इसी समय कहा था कि पुष्टिमार्ग का जहाज़ जा रहा है जिसे जो लेना हो ले सकता है। आरती के बाद सभी सूरदास जी के निकट आये। तो अचेत पड़े सूरदास जी में चेतना आयी। कहते हैं कि जब उनसे सभी ज्ञान ग्रहण कर रहे थे तो चतुर्भुजदास जो कि वल्लाभाचार्य के ही शिष्य थे ने शंका प्रकट की कि सूरदास ने सदैव भगवद्भक्ति के पद गाये हैं गुरुभक्ति में कोई पद नहीं गाया। तब उन्होंने कहा कि उनके लिये गुरु व भगवान में कोई अंतर नहीं है जो भगवान के लिये गाया वही गुरु के लिये भी। तब उन्होंने भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो नामक पद गाया। इसके बाद चित्त और नेत्र की वृति को लेकर विट्ठलनाथ जी द्वारा पूछे प्रश्न पर बलि बलि हों कुमरि राधिका नंद सुवन जासों रति मानी और खंजन नैन रूप रस माते पद गाये। यही उनके अंतिम पद भी थे जो उन्होंने गाये। इसके बाद पुष्टिमार्ग का जहाज़ गोलोक को गमन कर गया।

सूरदास जी के पद 
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सूरदास एक महान कवि थे जिनकी बहुत सारी रचनाएँ ज्ञात हैं, और उनमे उनके पद भी शामिल हैं जिनमे निम्न पद प्रमुख है।

1 हरि पालनैं झुलावै

2 मुख दधि लेप किए

3 कबहुं बढ़ैगी चोटी

4 दाऊ बहुत खिझायो

5 मैं नहिं माखन खायो

6 हरष आनंद बढ़ावत

7 भई सहज मत भोरी

8 अरु हलधर सों भैया

9 कबहुं बोलत तात

10 चोरि माखन खात

11 गाइ चरावन जैहौं

12 धेनु चराए आवत

13 मुखहिं बजावत बेनु

14 कौन तू गोरी

15 मिटि गई अंतरबाधा

सूरदास के 11 पद अर्थ सहित 
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1👉 चरन कमल बंदौ हरि राई ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई ।
सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई ॥1॥

अर्थ👉 श्रीकृष्ण की कृपा होने पर लंगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को लाँघ लेता है, अन्धे को सबकुछ दिखाई देने लगता है, बहरा व्यक्ति सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है, और गरीब व्यक्ति भी अमीर हो जाता है. ऐसे दयालु श्रीकृष्ण की चरण वन्दना कौन नहीं करेगा.

👉 अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥2॥

अर्थ👉 यहाँ अव्यक्त उपासना को मनुष्य के लिए क्लिष्ट बताया है. निराकार ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है. वह मन और वाणी का विषय नहीं है. ठीक उसी प्रकार जैसे किसी गूंगे को मिठाई खिला दी जाय और उससे उसका स्वाद पूछा जाए, तो वह मिठाई का स्वाद नहीं बता सकता है. उस मिठाई के रस का आनंद तो उसका अंतर्मन हीं जानता है. निराकार ब्रह्म का न रूप है, न गुण. इसलिए मन वहाँ स्थिर नहीं हो सकता है, सभी तरह से वह अगम्य है. इसलिए सूरदास सगुण ब्रह्म अर्थात श्रीकृष्ण की लीला का ही गायन करना उचित समझते हैं.

👉 अब कै माधव मोहिं उधारि।
मगन हौं भाव अम्बुनिधि में कृपासिन्धु मुरारि॥
नीर अति गंभीर माया लोभ लहरि तरंग।
लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥
मीन इन्द्रिय अतिहि काटति मोट अघ सिर भार।
पग न इत उत धरन पावत उरझि मोह सिबार॥
काम क्रोध समेत तृष्ना पवन अति झकझोर।
नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥
थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल सुनहु करुनामूल।
स्याम भुज गहि काढ़ि डारहु सूर ब्रज के कूल॥3॥

अर्थ👉  संसार रूपी सागर में माया रूपी जल भरा हुआ है, लालच की लहरें हैं, काम वासना रूपी मगरमच्छ है, इन्द्रियाँ मछलियाँ हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हुई है. इस समुद्र में मोह सवार है. काम-क्रोध आदि की वायु झकझोर रही है. तब एक हरि नाम की नाव हीं पार लगा सकती है. स्त्री और बेटों का माया-मोह इधर-उधर देखने हीं नहीं देता. भगवान हीं हाथ पकड़कर हमारा बेड़ा पार कर सकते हैं।

👉 मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी।
ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥
पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी।
मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥
एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी।
भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥
मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी।
स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥
सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी।
अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी॥4॥

अर्थ👉  हे प्रभु, मैंने तुमसे एक होड़ लगा ली है. तुम्हारा नाम पापियों का उद्धार करने वाला है, लेकिन मुझे इस पर विश्वास नहीं है. आज मैं यह देखने आया हूँ कि तुम कहाँ तक पापियों का उद्धार करते हो. तुमने उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह कर रखा है. इस बाजी में देखना है कौन जीतता है. मैं तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों से बचकर, पाप-पहाड़ की गुफा में छिपकर बैठ गया हूं।

मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
मोसौं कहत मोल कौ लीन्हौ, तू जसुमति कब जायौ?
कहा करौं इहि के मारें खेलन हौं नहि जात।
पुनि-पुनि कहत कौन है माता, को है तेरौ तात?
गोरे नन्द जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै-दै ग्वाल नचावत हँसत-सबै मुसकात।
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुँ न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं, जसुमति सुनि-सुनि रीझै।
सुनहु कान्ह बलभद्र चबाई, जनमत ही कौ धूत।
सूर स्याम मौहिं गोधन की सौं, हौं माता तो पूत॥5।।

अर्थ👉 बालक श्रीकृष्ण मैया यशोदा से कहते हैं, कि बलराम भैया मुझे बहुत चिढ़ाते हैं. वे कहते हैं कि तुमने मुझे दाम देकर खरीदा है, तुमने मुझे जन्म नहीं दिया है. इसलिए मैं उनके साथ खेलने नहीं जाता हूँ, वे बार-बार मुझसे पूछते हैं कि तुम्हारे माता-पिता कौन हैं. नन्द बाबा और मैया यशोदा दोनों गोरे हैं, तो तुम काले कैसे हो गए. ऐसा बोल-बोल कर वे नाचते हैं, और उनके साथ सभी ग्वाल-बाल भी हँसते हैं. तुम केवल मुझे हीं मारती हो, दाऊ को कभी नहीं मारती हो. तुम शपथ पूर्वक बताओ कि मैं तेरा हीं पुत्र हूँ. कृष्ण कि ये बातें सुनकर यशोदा मोहित हो जाती है.
 
👉 मुख दधि लेप किए सोभित कर नवनीत लिए।
घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥
चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए।
लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥
कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए।
धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥6।।

👉 अर्थ👉 भगवान श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल चलते हैं. उनके छोटे से हाथ में ताजा मक्खन है और वे उस मक्खन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं. उनके शरीर पर मिट्टी लगी हुई है. मुँह पर दही लिपटा है, उनके गाल सुंदर हैं और आँखें चपल हैं. ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है. बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं. जब वे घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भौंरा मधुर रस पीकर मतवाले हो गए हैं. उनका सौंदर्य उनके गले में पड़े कंठहार और सिंह नख से और बढ़ जाती है. सूरदास जी कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाए. अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन हो तो निरर्थक हीं है।।7।।
 
👉 बूझत स्याम कौन तू गोरी।
कहां रहति काकी है बेटी देखी नहीं कहूं ब्रज खोरी॥
काहे कों हम ब्रजतन आवतिं खेलति रहहिं आपनी पौरी।
सुनत रहति स्त्रवननि नंद ढोटा करत फिरत माखन दधि चोरी॥
तुम्हरो कहा चोरि हम लैहैं खेलन चलौ संग मिलि जोरी।
सूरदास प्रभु रसिक सिरोमनि बातनि भुरइ राधिका भोरी॥
अर्थ👉 श्रीकृष्ण जब पहली बार राधा से मिले, तो उन्होंने राधा से पूछा कि हे गोरी! तुम कौन हो? कहाँ रहती हो? किसकी पुत्री हो? मैंने तुम्हें पहले कभी ब्रज की गलियों में नहीं देखा है. तुम हमारे इस ब्रज में क्यों चली आई? अपने ही घर के आंगन में खेलती रहती. इतना सुनकर राधा बोली, मैं सुना करती थी कि नंदजी का लड़का माखन चोरी करता फिरता है. तब कृष्ण बात बदलते हुए बोले, लेकिन तुम्हारा हम क्या चुरा लेंगे. अच्छा चलो, हम दोनों मिलजुलकर खेलते हैं. सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार कृष्ण ने बातों ही बातों में भोली-भाली राधा को भरमा दिया।।8।।
 
👉 मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृंदावन की रेनु।
नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥
मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन।
चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥
इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु।
सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥9।।

अर्थ👉  यह ब्रज की मिट्टी धन्य है जहाँ श्रीकृष्ण गायों को चराते हैं तथा अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं. उस भूमि पर कृष्ण का ध्यान करने से मन को बहुत शांति मिलती है. सूरदास मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तुम क्यों इधर-उधर भटकते हो. ब्रज में हीं रहो, यहाँ न किसी से कुछ लेना है, और न किसी को कुछ देना है. ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ मिले उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है. सूरदास कहते हैं कि ब्रजभूमि की समानता कामधेनु गाय भी नहीं कर सकती है।।10।।
 
👉 चोरि माखन खात चली ब्रज घर घरनि यह बात।
नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥
कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ।
कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥
कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम।
हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥
कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि।
कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥
सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार।
जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥

अर्थ👉 ब्रज के घर-घर में यह बात फ़ैल गई है कि श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं. एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें आपस में चर्चा कर रही थी. उनमें से कोई ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पहले हीं वो मेरे घर आए थे. कोई बोली कि मुझे दरवाजे पर खड़ी देखकर वे भाग गए. एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं. मैं तो उन्हें इतना ज्यादा और बढ़िया माखन दूँ जितना वे खा सकें. लेकिन किसी तरह वे मेरे घर तो आएँ. तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिख जाएँ तो मैं उन्हें गोद में भर लूँ. एक और ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वे मिल जाएँ तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुड़ा ही न सके. सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु से मिलने की जुगत बिठा रही थी. कुछ ग्वालिनें यह भी कह कर रही थी कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएँ तो वह हाथ जोड़कर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें।
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संन्त सूरदास जी ने क्यों किया अपनी आँखों का त्याग

संन्त सूरदास जी ने क्यों किया अपनी आँखों का त्याग
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आपका जन्म से असली नाम मदन मोहन था जन्म से सूरदास अन्धे नहीं थे।

जवानी तक आपकी आंखें ठीक रहीं तथा विद्या ग्रहण की। विद्या के साथ-साथ राग सीखा।

हे भक्त जनो! जब किसी पुरुष के पास गुण तथा ज्ञान आ जाए, फिर उसको किसी बात की कमी नहीं रहती। गुण भी तो प्रभु की एक देन है, जिस पर प्रभु दयाल हुए उसी को ही ऐसी मेहर वरदान होती है।

मदन मोहन कविताएं गाकर सुनाता तो लोग प्रेम से सुनते तथा उसको धन, वस्त्र तथा उत्तम वस्तुएं भी दे देते। इस तरह मदन मोहन की चर्चा तथा यश होने लगा, दिन बीतते गए। मदन मोहन कवि के नाम से पहचाना जाने लगा।

 सूरदास बनना
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मदन मोहन एक सुंदर नवयुवक था तथा हर रोज़ सरोवर के किनारे जा बैठता तथा गीत लिखता रहता एक दिन ऐसा कौतुक हुआ, जिसने उसके मन को मोह लिया।

वह कौतुक यह था कि सरोवर के किनारे, एक सुन्दर नवयुवती, गुलाब की पत्तियों जैसा उसका तन था। पतली धोती बांध कर वह सरोवर पर कपड़े धो रही थी। उस समय मदन मोहन का ध्यान उसकी तरफ चला गया, जैसे कि आंखों का कर्म होता है, सुन्दर वस्तुओं को देखना। सुन्दरता हरेक को आकर्षित करती है।

उस सुन्दर युवती की सुन्दरता ने मदन मोहन को ऐसा आकर्षित किया कि वह कविता लिखने से रुक गया तथा मनोवृति एकाग्र करके उसकी तरफ देखने लगा।

उसको इस तरह लगता था जैसे यमुना किनारे राधिका स्नान करके बैठी हुई वस्त्र साफ करने के बहाने मोहन मुरली वाले का इंतजार कर रही थी, वह देखता गया।

उस भाग्यशाली रूपवती ने भी मदन मोहन की तरफ देखा। कुछ लज्जा की, पर उठी तथा निकट हो कर कहने लगी - 'आप मदन मोहन हैं?

हां, मैं मदन मोहन कवि हूं गीत लिखता हूं, गीत गाता हूं।

यहां गीत लिखने आया था तो आप की तरफदेखा 'क्यों?'

'क्योंकि आपका रूप सुन्दर लगा आप!'
'सुन्दर, बहुत सुन्दर-राधा प्रतीत हो रही हो यमुना किनारे-मान सरोवर किनारे अप्सरा-जो जीवन दे मेरी आंखों की तरफ देख सकोगे।

'हां, देख रही हूं 'क्या दिखाई दे रहा है'

'मुझे अपना चेहरा आपकी आंखों में दिखाई दे रहा है। मदन मोहन ने कहा, कल भी आओगी?' 'आ जाउंगी! जरूर आ जाउंगी! ऐसा कह कर वह पीछे मुड़ी तथा सरोवर में स्नान करके घर को चली गई।

अगले दिन वह फिर आई। मदन मोहन ने उसके सौंदर्य पर कविता लिखी, गाई तथा सुनाई। वह भी प्यार करने लग पड़ी। प्यार का सिलसिला इतना बढ़ा कि बदनामी का कारण बन गया। मदन मोहन का पिता नाराज हुआ तो वह घर से निकल गया और बाहर मंदिर में आया, फिर भी मन संतुष्ट न हुआ। वह चलता-चलता मथुरा आ गया। वृंदावन में इस तरह घूमता रहा। मन में बेचैनी रही। वह नारी सौंदर्य को न भूला एक दिन वह मंदिर में गया। मंदिर में वही सुन्दर स्त्री जो शादीशुदा थी उसके चेहरे की पद्मनी सूरत देख कर मदन मोहन का मन मोहित हो गया। वह मंदिर में से निकल कर घर को गई तो मदन मोहन भी उसके पीछे-पीछे चल दिया।

वह चलते-चलते-चलते उसके घर के आगे जा खड़ा हुआ। जब वह घर के अंदर गई तो मदन मोहन ने घर का दरवाज़ा खट-खटाया। उसका पति बाहर आया उसने मदन मोहन को देखा और उसकी संतों वाली सूरत पर वह बोला बताओ महात्मा जी?

मदन मोहन अभी जो आई है वह आप की भी कुछ लगती होगी पति-'हां, महात्मा जी! 

हुक्म करो क्या बात हुई? मदन मोहन-'हुआ कुछ नहीं बात यह है कि  मैं विनती करना चाहता हूं पति-'आओ! अंदर आओ बैठो,सेवा बताओ,  जो कहोगे किया जाएगा सब आप महात्मा पुरुषों की तो माया है। मदन मोहन घर के अंदर चला गया।

अंदर जा कर बैठा तो उसकी पत्नी को बुलाया। वह आ कर बैठ गई तो मदन मोहन ने कहा-हे भक्त जनो! दो सिलाईयां गर्म करके ले आओ भगवान आप का भला करेगा वे दम्पति समझ न सके कि किया मामला है। स्त्री सलाईयां गर्म करके ले आई।

मदन मोहन ने सलाईयां पकड़ ली तथा मन को कहता गया देख लो जी भर कर देख लो फिर नहीं देखना यह कह कर सलाईयों को आंखों में चुभो लिया तथा सूरदास बन गया वह स्त्री-पुरुष स्तब्ध तथा दुखी हुए उन्होंने महीना भर मदन मोहन को घर रख कर सेवा की आंखों के जख्म ठीक किये तथा फिर सूरदास बन कर मदन मोहन वहां से चल पड़ा।

बादशाही कोप 
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सूरदास गीत गाने लगा वह इतना विख्यात हो गया कि दिल्ली के बादशाह के पास भी उसकी शोभा जा पहुंची।

अपने अहलकारों द्वारा बादशाह ने सूरदास को अपने दरबार में बुला लिया।

उसके गीत सुन कर वह इतना खुश हुआ कि सूरदास को एक कस्बे का हाकिम बना दिया,  पर ईर्ष्या करने वालों ने बादशाह के पास चुगली करके फिर उसे बुला लिया और जेल में नज़रबंद कर दिया। 

सूरदास जेल में रहता था उसने जब जेल के दरोगा से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है?

तो उसने कहा -'तिमर' यह सुन कर सूरदास बहुत हैरान हुआ। कवि था, ख्यालों की उड़ान में सोचा,

 'तिमर.....मेरी आंखें नहीं मेरा जीवन तिमर (अन्धेर) में, बंदीखाना तिमर (अन्धेरा) तथा रक्षक भी तिमर (अन्धेर)!'

उसने एक गीत की रचना की तथा उस गीत को बार-बार गाने लगा।

*वह गीत जब बादशाह ने सुना तो खुश होकर सूरदास को आज़ाद कर दिया*

तथा सूरदास दिल्ली जेल में से निकल कर मथुरा की तरफ चला गया।

 रास्ते में कुआं था, उसमें गिरा, पर बच गया तथा मथुरा-वृंदावन पहुंच गया। वहां भगवान कृष्ण का यश गाने लगा।

सूर-सागर की रचना सूरदास भगवान श्री कृष्ण जी की नगरी में पहुंचा। अनुभवी प्रकाश से उसकी आंखों के आगे श्री कृष्ण लीला आई। 

उसने स्वामी 'वल्लभाचार्य' जी को गुरु माना तथा कहना मान कर 'गऊ घाट' बैठ कर  'श्री मद्भागवत' को भाषा कविता में उच्चारण करना शुरू किया एक आदमी लिखने के लिए रखा।

 *सूरदास बोलते जाते तथा लिखने वाला लिखते रहा*

 *सूरदास जी ने 75000 चरण लिखे थे कि आप का देहांत हो गया* 'सूर-सागर' आप की एक अटल स्मृति है। आपकी बाणी का एक शब्द है -

हरि के संग बसे हरि लोक|| 
तनु मनु अरपि सरबसु सभु अरपिओ अनद सहज धुनि झोक||१|| रहाउ ||
दरसनु पेखिभए निरबिखई पाए है सगले थोक|| 
आन बसतु सिउ काजुन कछुऐ सुंदर बदन अलोक ||१|| 
सिआम सुंदर तजि आन जुचाहत जिउ कुसटी तनि जोक || 
सूरदास मनु प्रभि हथि लीनोदीनो इहु परलोक ||२||

परमार्थ-परमात्मा के भक्त परमात्मा के साथ ही रहते हैं।

उन्होंने तो अपना सब कुछ हरि को अर्पण कर दिया है।

वह सदा सहज प्यार तथा खुशी को अनुभव करते रहते हैं। भगवान के दर्शनों ने उनको ऐसा संयम वाला बना दिया है कि उन्होंने इन्द्रियों पर काबू पा लिया है।

जिसका फल यह हुआ कि भगवान ने उनको सब पदार्थ दिए हैं।

जब प्रभु का खिलता मुख देखते हैं,

तो किसी के दीदार की आवश्यकता नहीं रहती| 
परमात्मा को छोड़ कर जो लोग अन्य तरफ घूमते हैं, वे अपने तन-मन को नष्ट करते हैं।

सूरदास जी कहते हैं, मैं तो उनका हूं,
 वह मेरे हैं भक्त प्रभु के हैं। 
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