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शनिवार, 4 सितंबर 2021

बच्छ-बारस पर थोड़ा-सा आत्म-मन्थन



(बच्छ-बारस पर थोड़ा-सा आत्म-मन्थन)
"नन्दिनी! आज तो बड़ी चमक रही हो! पीली साड़ी में सज-धज कर कहाँ से आ रही हो? और वो भी इतनी सुबह-सुबह!" पास में रहने वाली सुरभी सजी-धजी नन्दिनी को देख कर पूछ बैठी।
"अरे हाँ! आज हमारे यहाँ बच्छ-बारस की पूजा होती है। तो मैं भी सुबह जल्दी ही तैयार हो कर शहर की गोशाला गई थी, बछड़े और गाय की पूजा करने।"
"हो गई पूजा अच्छे से!"
"नहीं" चिढ़े हुए स्वर में नन्दिनी बोली।
"क्यूँ? क्या गोशाला में भी गाय-बछड़े नहीं मिले?" सुरभी को आश्चर्य हुआ।
"नहीं सुरभी! गायें तो वहाँ पर बहुत थी, पर‐‐‐‐"
"पर क्या नन्दिनी! तुम्हारा तो नाम भी कामधेनु की बेटी के नाम पर ही रखा हुआ है। तुम्हारी ही कामना अधूरी रह गई, ऐसा कैसे!" सुरभी ने चुटकी ली।
"अब क्या बताऊँ तुम्हें सुरभी!" हताशा भरे स्वर में नन्दिनी बोली।
"अरे, वही बता जो हुआ है। मुझे बहुत अचरज हो रहा है कि गायें होने पर भी तुम पूजा कर के क्यों नहीं आई।"
पूरी बात बताने के लिए नन्दिनी सुरभी के घर की सीढ़ियों पर थाली रख कर बैठ गई और लम्बी साँस छोड़ते हुए बोलने लगी। 
"आज सुबह तो मैं बड़ी जल्दी उठी। सुबह से क्या कल रात से ही शादी के बाद की पहली बच्छ-बारस की तैयारी कर रही हूँ। रात में ही बाजरे का आटा ले कर आई, तैयार भीगे हुए मूंग-मोठ भी लाई, साड़ी-गहने सभी रख कर सोई ताकि जल्दी से पूजा कर पाऊँ। गोशाला भी समय पर पहुँच गई। वहाँ और भी कई परिवार आए हुए थे पूजा के लिए। पर वहाँ पहुँच कर पता चला कि गोशाला प्रबन्धक कुछ लोगों को तो पूजा के लिए द्वार खोल कर आगे भेज रहा था और कुछ को लौट जाने को कह रहा था। जब हमारी बारी आई तो पता चला कि जिन लोगों ने भी चमड़े का बना कोई भी सामान पहना था, उनसे कहा जा रहा था कि चमड़ा त्याग कर प्रतिज्ञा करें कि भविष्य में कोई भी चमड़े की वस्तु नहीं खरीदेंगे।"
"अरे! ये क्या बात हुई? चमड़े के सामान का पूजा से क्या सम्बन्ध?" जिज्ञासा भरी सुरभी पूछ बैठी।
"ये ही मैंने भी पूछा उन अंकल से, तो उन्होंने लम्बा-सा भाषण ही दे दिया।"
"बेटा जी! ये चमड़ा इसी गो और उसके अजन्मे बच्चे को 200 डिग्री के गर्म पानी के फव्वारे के नीचे रख, आधा गला छुरी से काट कर अर्द्ध-मृत स्थिति में ही उसकी खाल उधेड़ कर प्राप्त किया जाता है। उसी से ये सब बनता है। बालों को बान्धने का बैण्ड, कलाई घड़ी का बेल्ट, जैकेट, जूते, पर्स वगैरह।"
नन्दिनी आगे बोली "मैंने तो तपाक से कह दिया - क्या अंकल! आप भी बिना सिर-पैर की बातें कर रहे हो। ना तो ऐसा कहीं कुछ होता है और ना ही हम ऐसा कुछ करने के लिए किसी को कहते हैं। अगर ऐसा होता भी हो तो हम क्या कर सकते हैं! लेकिन वो अंकल भी कहाँ मानने वाले थे। फिर शुरू हो गए।" 
"बेटा, आप पूरी बात बताने पर भी समझे नहीं हो तो मैं जो कह रहा हूँ उस विषय में इन्टरनेट पर पढ़ सकते हो। बिजली के खुले तार पर हाथ चाहे जान-बूझकर रखो या भूल से, झटका तो लगेगा ही। आप ने तो नहीं कहा, लेकिन जब आप खरीदने जाते हो और बिक्री बढ़ती है तो बेचने वाला भी बार-बार इन मूक गायों को अधिक से अधिक वध करने लगता है। माँग और पूर्ति का नियम तो समझते हो ना! जितना खरीदोगे उतना ही बिकेगा और तुम भी उस पाप के भागीदार बनोगे।"
नन्दिनी झुंझला कर बोली "मेरे तो कान ही पक गए उनकी बातें सुन-सुन कर। मैंने भी कह दिया क्या बात करते हैं अंकल! हम कहाँ से पाप से भागीदार हो गए? पर अंकल तो मानने को ही तैयार नहीं।"
"इन सब से बचने के लिए किसी एक को तो आगे आना ही होगा। आप बच्छ-बारस का त्यौहार मनाते हो, किन्तु इसकी गहराई समझे बिना। ये त्यौहार इसलिए मनाया जाता है ताकि गो सम्वर्द्धन हो सके। बछड़े हृष्ट-पुष्ट हो सके। धरती की धुरी, धर्म की आत्मा, कान्हा की आस्था, शिव का वाहन, स्वर्ग की समृद्धि का आधार कामधेनु, राजा राम के पूर्वजों को वंशज देने वाली पूजित कामधेनु पुत्री नन्दिनी-सुरभी आदि गोमाता को सनातन धर्म में इसीलिए इतना महत्व दिया गया है। दुर्भाग्य से ये सब हम ने हमारे बच्चों से साझा ही नहीं किया और ये ज्ञान आगे नहीं पहुँचा। इसीलिए आज बच्छ-बारस के इस शुभ अवसर पर मैंने सोचा कि ये जन-जागृति लाऊँ और गो-सम्वर्द्धन की लम्बी-मजबूत जंजीर के लिए एक कड़ी बनूँ।"
सुरभी चकित सुन ही रही थी कि नन्दिनी फिर से भनभनाती हुई बोली "अब तो मैंने हाथ जोड़ दिया। मैं बोली रूकिये अंकल, बहुत हो गया आपका प्रवचन। ये सब बातें मेरी समझ के बाहर हैं। आप तो यूँ कह रहे हो जैसे काई महाराज कथा-वाचन कर रहे हो। ये सब चीज़ें फेंकना या भविष्य में न खरीदना तो सम्भव नहीं है। आप तो ये बताओ कि हम पूजा कर सकते हैं या नहीं। पर अंकल तो अंकल हैं। जाते-जाते और ज्ञान ढोल गए।"
"यहाँ तो नहीं कर सकते हो मैडम। हाँ, शहर में एक जगह गोवध होता है, वहीं चले जाओ। पूजा भी कर लेना और लौटते हुए कुछ चमड़े की वस्तुएँ भी खरीद लेना।"
ठण्डी आँह भरते हुए नन्दिनी बोली "मैं भी वहाँ से आ गई। और रास्ते में मैंने मम्मी से बात कर ली। मम्मी ने भी कहा कि कोई सनकी बूढ़ा होगा। मम्मी ने मुझे सही युक्ति सुझाते हुए कहा कि तू तो घर पर ही मेरी दी हुई चाँदी की गाय की पूजा कर के व्रत पूरा कर लेना। अब मैं जाती हूँ, बहुत भूख लगी है।"
हतप्रभ सुरभी नन्दिनी को जाते हुए देखती रह गई।

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