रविवार, 2 अगस्त 2015

क्यों है सावन की विशेषता?


सावन महीने को देवों के देव महादेव भगवान महेशजी का प्रिय महीना माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महादेव-पार्वती ब्रम्हांड की अमर जोड़ी (युगल / कपल) है। महादेव-पार्वती पति-पत्नी के रुप में अमर-अटूट-सफल प्रेम की दास्ताँ है। श्रावण मास को महादेव-पार्वती के मिलन का मास माना जाता है। इस तरह सावन मास शक्ति (पार्वती) और शक्तिमान (शिव) दोनों के मिलन का केन्द्र हैं। श्मशानी रुद्र ग्रहस्थ बनकर विवाह रचाते हैं। यह पुरुष और प्रकृति का मिलन है।

इस संबंध में पौराणिक कथा है कि जब सनत कुमारों ने महादेव से उन्हें सावन महीना प्रिय होने का कारण पूछा तो महादेव भगवान शिव ने बताया कि जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के घर में योगशक्ति से शरीर त्याग किया था, उससे पहले देवी सती ने महादेव को हर जन्म में पति के रूप में पाने का प्रण किया था। अपने दूसरे जन्म में देवी सती ने पार्वती के नाम से हिमाचल और रानी मैना के घर में पुत्री के रूप में जन्म लिया। पार्वती ने युवावस्था के सावन महीने में निराहार रह कर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया, जिसके बाद ही महादेव के लिए यह मास विशेष हो गया।


क्यों है सावन की विशेषता? :-
रौद्रावतार भगवान शिव की सौम्य मूर्ति एवं रूप का दर्शन मात्र श्रावण मास में ही संभव है। जैसा कि पुराणों में या विविध ग्रन्थों में या लोकमत के रूप में यह प्रसिद्ध है कि भगवान रुद्र के 11 ही अवतार है। जो भाद्रपद से लेकर आषाढ़ माह तक 11 महीनों में नाम के अनुरूप मासों में पूजित एवं सिद्ध किए जाते हैं। किन्तु श्रावण माह में शान्त, सौम्य, सुन्दर, प्रफुल्लित एवं सन्तुष्ट भगवान शिव की अनुपम एवं मनमोहक मूर्ति सद्यः प्रसन्न एवं वरदायिनी होती है। माहेश्वरी महादेव के सौम्य रूप की आराधना करते है इसलिए माहेश्वरीयों में "पत्नी पार्वती और गोद में पुत्र गणेश के साथ विराजमान महेशजी" इस परिवारपालक, सौम्य रूपकी भक्ति-आराधना की परंपरा रही है।

इस महीने में भगवान शिव मुँह माँगा वरदान देने के लिए तत्पर रहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस श्रावण माह में सीधे-सादे भगवान महेशजी को प्रसन्न करके जो वरदान चाहें वह माँग लें। जगत मोहिनी माता पार्वती के साथ भूतभावन भगवान भोलेनाथ निर्विकार अपने हर्ष से भरे हृदय के साथ उन्मुक्त मन से अपने भक्तों को इस महीने सब कुछ दे देने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।

बेलपत्र और समीपत्र (माहेश्वरीयों में रही है महेशजी को 'समीपत्र' चढाने की परंपरा) :-
भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र चढ़ाते हैं। लेकिन माहेश्वरीयों में महेशजी को समीपत्र (शमीपत्र) चढाने की परंपरा रही है। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 89 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र (शमीपत्र) का महत्व होता है।

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