शनिवार, 1 दिसंबर 2012

अपूर्व सुंदरी रानी पद्मिनी और 16 हजार महिलाओं के जौहर की दास्तान

अपूर्व सुंदरी रानी पद्मिनी और 16 हजार महिलाओं के जौहर की दास्तान
जयपुर. विश्व की सभी जातियां अपनी स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए और समृद्धि के लिए निरंतर बलिदान करती आई हैं। मनुष्य जाति में परस्पर युद्धों की शुरुआत भी इसी आशंका से हुई कि कोई उसकी स्वतंत्रता छिनने आ रहा हैं। राजस्थान की युद्ध परंपरा में जौहर एवं शाकों का विशिष्ठ स्थान है। जहां पराधीनता के बजाय मृत्यु का आलिंगन किया जाता था।

युद्ध के...दौरान परिस्थितियां ऐसी बन जाती थी कि शत्रु के घेरे में रहकर जीवित नहीं रहा जा सकता था। तब जौहर और शाके (महिलाओं को अपनी आंखों के आगे जौहर की ज्वाला में कूदते देख पुरूष कसुम्बा पान कर, रणक्षेत्र में उतर पड़ते थे कि या तो विजयी होकर लोटेंगे अन्यथा विजय की कामना हृदय में लिए अन्तिम दम तक शौर्यपूर्ण युद्ध करते हुए दुश्मन सेना का ज्यादा से ज्यादा नाश करेंगे। या फिर रणभूमि में चिरनिंद्रा में शयन करेंगे।

पुरुषों का यह आत्मघाती कदम शाका के नाम से विख्यात हुआ) किए जाते थे।

पहला साका सन् 1303 में हुआ जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर विजय के बाद चित्तौड़ को आक्रांत किया। अलाउद्दीन की महत्वाकांक्षा और राणा रतनसिंह की अनिंद्य सुंदरी रानी पद्मिनी को पाने की लालसा हमले का कारण बनी। चित्तौड़ के दुर्ग में सबसे पहला जौहर चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 हजार रमणियों ने अगस्त 1303 में किया था।

दूसरा साका सन् 1534 में हुआ जब गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने एक विशाल सेना के साथ चित्तौड़ पर हमला किया। राजमाता हाड़ी (कर्णावती) और दुर्ग की सैकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर का अनुष्ठान कर अपने प्राणों की आहुति दी।

तीसरा साका सन् १५६८-६९ में हुआ जब मुगल बादशाह अकबर ने राणा उदयसिंह के शासन काल में चित्तौड़ पर जोरदार आक्रमण किया। यह साका जयमल राठौड़ और फत्ता सिसोदिया के पराक्रम और बलिदान के प्रसिद्ध है।

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