बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

किसने माँ का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ ले जाए - आजाद

अग्निपुंज की यादें

आगरा के एक मकान में आजाद, भगत सिंह राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा, विजयकुमार सिन्हा, जयदेव कपूर, डॉ गया प्रसाद, वैशम्पायन, सदाशिव आदि दल के सभी सक्रिय सदस्य बैठे थे। विनोद चल रहा था कि कौन कैस पकड़ा जाएगा, पकड़े जाने पर कौन क्या करेगा और सरकार से किसे क्या सजा मिलेगी?

भगत सिंह ने आजाद से विनोद करते हुए कहा- “पंडित जी, आपके लिए दो रस्सों की जरूरत पड़ेगी। एक आपके गले के लिए और दूसरा आपके इस भारी भरकम पेट के लिए।” आजाद तुरंत हँसकर बोले- “देख, फाँसी जाने का शौक मुझे नहीं है। वह तुझे मुबारक हो, रस्सा-फुस्सा तुम्हारे गले के लिए है। जबतक यह बमतुल बुखारा (आज़ाद ने अपनी माउजर पिस्तौल का यही विचित्र नाम रखा था) मेरे पास है, किसने माँ का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ ले जाए।”
एक मित्र अपना प्रेम गीत सुना रहा था, तभी क्या साला प्रेम-फ्रेम पिनपिनाता रहता है। अबे क्यों अपना और दूसरों का मन खराब करता रहता है। कहाँ मिलेगा इस जिन्दगी में प्रेम-फ्रेम का अवसर? कल कहीं सड़क पर पुलिस की गोली खाकर लुढ़कते नजर आएँगे। मन्मथशर-कनमथशर! हमें मतलब मन्मथशर से है। अरे कुछ ‘बम फटकर, पिस्तौल झटकर, ऐसा कुछ गा। देख मैं गाऊँ अपनी एक ही कविता जिसे जिन्दगी में कर जाने के लिए जिन्दा हूँ।’ फिर आजाद ने अपने गले को और भारी-भरकम बनाते हुए स्वरों पर स्टीम रोलर-सा चलाना शुरू किया-
“दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे,
आज़ाद ही रहे हैं आज़ाद ही रहेंगे।”
देख इसे कहते हैं कविता! क्या साला ‘हृद्य लागी’, ‘प्रेम की बात’, ‘मन्मथशर’ पिनपिनाता रहता है? हृद्य में लगेगी थ्री नाट थ्री की एक गोली, मन्मथशर-फनमथशर नहीं। इन्हीं दो पंक्ति को 27 फरवरी 1931 के आज के दिन इलाहाबाद एल्फ्रेड पार्क में अपनी पिस्तौल के साज पर, गले से नहीं, अपने कर्मठ हाथों से गाया और स्याही से कागज पर नहीं, भारत की उज्जवल क्रान्तिकारी कर्मभूमि पर अपने रक्त से लिखा, उसे ‘चरितार्थ’ करके अमर कर दिया, उसे काव्य नहीं, ‘कृत’ बना दिया!
आजाद के पिता का नाम पं सीताराम तिवारी और माता श्रीमती जगरानी देवी जी ने बताया था कि चन्द्रशेखर का जन्म सावन सुदीदूज सोमवार को दिन के दो बजे हुआ था। संवत् माता जी को विस्मृत हो गया था। पुराने पंचागों को देखने से आज़ाद की जन्मतिथि का निश्चय किया गया है जो है तारीख 23 जुलाई सन् 1906 ई.।
आज़ाद ने सन् 1922 में क्रांतिकारी पार्टी में प्रवेश किया था। उससे पूर्व 1921 के असहयोग आन्दोलन में पिकेटिंग के अपराध में उन पर मुकदमा चला था। अदालत ने बालक सत्याग्रही से प्रश्न किया- “तुम्हारा नाम क्या है?”
“आजाद।”
“पिता का नाम?”
“स्वाधीनता।”
“घर?”
“जेलखाना”
इन उत्तरों से चिढ़कर मजिस्ट्रेट ने उन्हें पन्द्रह बेंतों की सजा दी। जिस समय बेंत लगाने के लिए आज़ाद को टिकटिकी में बाँधा गया तो उन्होंने हर बेंत पर ‘महात्मा गाँधी की जय’ का नारा लगाया। बालक चन्द्रखेसर ने आगे चलकर अपने ‘आजाद’ नाम को तो सार्थक किया पर जेल को उन्होंने अपना घर एक दिन के लिए भी नहीं बनाया।
आज़ाद को देखकर गोस्वामी तुलसीदास के शब्द थिरक उठते थे-
‘मानहुँ वीर रस धरे सरीरा’
उन्नत ललाट। चौड़ा वक्षस्थल। आजानु बाहु। गठीला बदन और चेहरे पर चेचक के दाग। यही चन्द्रशेखर आज़ाद की आकृति थी। उनेक रोम-रोम से वीरता और उत्साह फूट पड़ता था।
आज़ाद और उनके साथी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को सफल बनाने की साध में कर्मक्षेत्र में अविरल गति से अपना काम कर रहे थे और भारतीय क्रान्ति के अग्रदूत के रूप में खलेआम ग्राम-ग्राम, नगर-नगर, सड़कों और गली-कूचों में अलख जगाते हुए मानो प्रगाढ़ निद्रामग्न अलसित देशवासियों के कानों में ऋषियों के अमर सन्देश का उद्घोष करते फिर रहे थे-
‘उतिष्ठित जागृत प्राप्त वर्णम्य बोधत।’
उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषों के पास जाकर आत्मबोध प्राप्त करो।

प्रायः चन्द्रशेखर आज़ाद कमीज, खुले गले का कोट और धोती पहने देखे जाते थे। बाएँ हाथ की कलाई में रिस्टवाच खूब फबती थी। दोनों जेबों में दो रिवाल्वर डाले खुलेआम सड़क पर मस्तानी चाल से चलते हुए उन्हें देखकर कवि के यह शब्द आए बिना न रहते थे-
जब से सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर पे कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं।
आज़ाद के ऊपर इंडिया के प्रसिद्ध षड्यंत्रों में सक्रिय क्रियात्मक रूप से भाग लेने के आरोप थे। यदि विदेशी नौकरशाही की पुलिस उन्हें जीवित पकड़ पाती तो फाँसी पर चढ़ाने से पहले उनका कैसे कीमा बनती, इस बात से आज़ाद गाफिल नहीं थे। संभवतः इसी बात को ध्यान में रखकर वह अपनी बलिष्ठ कलाइयों पर नज़र डालते-डालते बहुधा कह उठते थे- “इन हाथों में पुलिस की हथकड़ियाँ कभी नहीं पड़ सकतीं।”
पुलिस को छकाने और मौका पड़ने पर उससे अच्छी तरह निपट लेने में आज़ाद को कमाल हासिल था।

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