शनिवार, 29 सितंबर 2012

इस जमीं पर हुआ था जलियांवाला बाग से बड़ा नरसंहार !



इस जमीं पर हुआ था जलियांवाला बाग से बड़ा नरसंहार !
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जयपुर. अंग्रेजों की क्रूरता का गवाह जलियांवाला बाग की घटना से शायद ही कोई भारतीय अंजान हो। लेकिन इसी देश में अंग्रेजों ने राजस्थान की सात रियासतों के साथ मिलकर एक ऐसे नरसंहार को अंजाम दिया।

विडंबना है कि 121 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले इस मुल्क में करोड़ों लोगों को इस नरसंहार की कोई जानकारी नहीं। दूर की तो छोडि़ए उदयपुर के करीब हुए इस घटनाक्रम के बारे में स्थानीय लोग भी अनजान है।

राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बसे मानगढ़ की कहानी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों के विद्रोह की गाथा हैं। बांसवाड़ा, मानगढ़, भीलवाड़ा और डूंगरपुर को मिलाकर बनने वाले इस संभाग को वागड़ के नाम से भी जाना जाता है। यह पूरा इलाका आदिवासी बहुल है।

राजस्थान और गुजरात की सीमा पर बसे मानगढ़ की कहानी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आदिवासियों के विद्रोह की गाथा हैं। बांसवाड़ा, मानगढ़, भीलवाड़ा और डूंगरपुर को मिलाकर बनने वाले इस संभाग को वागड़ के नाम से भी जाना जाता है। यह पूरा इलाका आदिवासी बहुल है।

मानगढ़ में आदिवासियों के नरसंहार पर बामनवास के रहने वाले रिटायर्ड आईजी हरिराम मीणा ने गहन शोध किया है। इस शोध के बाद उन्होंने "जंगल-जंगल जलियांवाला" किताब लिखी। इस पुस्तक के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है।

उन्होंने ने कहा कि अंग्रेजों की तत्कालीन नई आबकारी नीति ने आदिवासियों के जीवन को बहुत प्रभावित किया। इस नीति में देसी शराब निकालने के खिलाफ ठेकेदारी की प्रथा, वनोपज, महुआ, गोंद, जंगलात पर निगरानी, पोस्ट ऑफिस, ऑन पेमेंट जैसे प्रावधानों ने आदिवासियों के मन में अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की चिंगारी जला दी। ये दौर जनरल टांड का था। हालांकि बाद में अंग्रेजों के साथ संधियों का दौर भी चला, जो बहुत सफल नहीं रहा।

गोबिंद गुरु का सामाजिक धार्मिक आंदोलन अब राजनीतिक रंग में ढलने लगा था। आगे चलकर आदिवासियों की ओर से बांसवाड़ा, कुशलगढ़, प्रतापगढ़ और मेवाड़ जैसे प्रमुख क्षेत्रों को मिलाकर अलग भील राज्य बनाने की मांग उठी। आदिवासियों की इस मांग ने रियासतों को एकजुट कर दिया। गोबिंद गुरु का मूवमेंट चलता रहा। लेकिन अंग्रेजों, रियासतों और आदिवासियों में सुलह की कोई संभावना नहीं बनी।

1913 में कैप्टन इस्टॉकले की अगुआई में अंग्रेजों की प्रशिक्षित सेना और सात रियासतों ने आदिवासियों के खिलाफ युद्ध की शुरुआत कर दी। इस बीच गोबिंद गुरु ने शांति स्थापित करने की कोशिश की। लेकिन उनके प्रयास विफल साबित हुए।

मीणा के मुताबिक आदिवासियों के खिलाफ इस युद्ध में बड़ौदा राइफल्स, 11वीं राजपूत बटालियन, 9वीं और 7वीं जाट बटालियन, मेवाड़ की कैवेलरी और घुड़सवार दास्तां प्रमुख रूप से शामिल थे। उन्होंने कहा कि इस बारे में कमिश्नर बोरो की एडवांस सर्वे रिपोर्ट उपलब्ध हैं।

600 फीट से ज्यादा ऊंचे पहाड़ी इलाकों में अंग्रेजों ने गधों और खच्चरों की मदद से तोपें पहाड़ों पर चढ़ाई। मीणा ने बताया कि उपलब्ध दस्तावेजों के मुताबिक 700 फोर्स, जिनमें 5 फुल कंपनियां थी। और इसमें एक आदमी के पास 100 गोलियां थी। उन्होंने ने कहा कि इस बारे में गोबिंद गुरु की एक दो चिट्ठियां भी मौजूद हैं। जो उन्होंने 12 और 13 नवम्बर 1913 को लिखी थी।

17 नवंबर 1913 को हुई घटना में 800 के करीब आदिवासियों मौके पर ही मारे गए। अंग्रेजों के आधुनिक गोला बारूद के आगे आदिवासियों के परंपरागत हथियार टिक नहीं पाए। इस भीषण नरसंहार के बाद सैकड़ों आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया गया। जबकि 900 से ज्यादा घायल आदिवासियों ने बाद में दम तोड़ दिया।

आदिवासियों के नेता गोबिंद गुरु को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके साथ 38 आदिवासियों को मुकदमा चलाकर सजा दी गई। गोबिंद गुरु दोबारा डूंगरपुर और बांसवाड़ा में ना जाएं। इसके लिए उन पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए गए। हालांकि बाद में अंग्रेजों ने उनके अच्छे व्यवहार के चलते उन्हें रिहा कर दिया। गुजरात के कंबोई में उनका देहांत हो गया।

आदिवासियों के रणक्षेत्र मानगढ़ में आज भी मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को उन अनजाने शहीदों की याद में मेला लगता है। हजारों की तादाद में आदिवासी समुदाय के लोग इकट्ठे होते हैं और शहीदों की याद में प्रज्जवलित हो रहे अग्निकुंड में नारियल फोड़कर श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं

हालांकि भारत सरकार ने 86 साल बाद इस तथ्य को स्वीकारते हुए मानगढ़ में 54 फीट की ऊंचाई का शहीद स्मारक बनवाया है। आदिवासियों के संघर्ष के प्रतीक इस स्मारक को अब राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग उठने लगी हैं। दिलचस्प है कि 1 अरब से ज्यादा की आबादी वाले इस देश में करोड़ों लोग इस आदिवासी संघर्ष से अनभिज्ञ हैं। जिसका शताब्दी वर्ष महज तीन महीने बाद शुरू होने जा रहा है।

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