गुरुवार, 30 मई 2013

कर्पूर का उपयोग

कर्पुर गौरम करुणाअवतारं संसार सारं भुजगेन्द्र हारम् । सदावसन्तम हृदया विंदे भवम भवानी सहितम नमामि । ।
- हिंदू धर्म में किए जाने वाले विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों तथा पूजन में उपयोग की जाने वाली सामग्री के पीछे सिर्फ धार्मिक कारण ही नहीं है इन सभी के पीछे कहीं न कहीं हमारे ऋषि-मुनियों की वैज्ञानिक सोच भी निहित है।


- प्राचीन समय से ही हमारे देश में विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों में कर्पूर का उपयोग किया जाता है। कर्पूर का सबसे अधिक उपयोग आरती में किया जाता है। प्राचीन काल से ही हमारे देश में देशी घी के दीपक व कर्पूर के देवी-देवताओं की आरती करने की परंपरा चली आ रही है।

- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान आरती करने के प्रसन्न होते हैं व साधक की मनोकामना पूर्ण करते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि कर्पूर जलाने से देवदोष व पितृदोष का शमन होता है। कर्पूर अति सुगंधित पदार्थ होता है। इसके दहन से वातावरण सुगंधित हो जाता है।

- वैज्ञानिक शोधों से यह भी ज्ञात हुआ है कि इसकी सुगंध से जीवाणु, विषाणु आदि बीमारी फैलाने वाले जीव नष्ट हो जाते हैं जिससे वातावरण शुद्ध हो जाता है तथा बीमारी होने का भय भी नहीं रहता।यही कारण है कि पूजन, आरती आदि धार्मिक कर्मकांडों में कर्पूर का विशेष महत्व बताया गया है।

- कपूर को जलाने से पहले उसकी कंपनशक्ति कम होती है, परंतु जलाने के बाद कंपनशक्ति बढ़ जाती है। तिरुपति भगवान के प्रसाद के लड्डू में भी खाने वाले कपूर का प्रयोग किया जाता है।
- उड़नशील वानस्पतिक द्रव्य है। यह सफेद रंग का मोम की तरह का पदार्थ है। इसमे एक तीखी गंध होती है। कपूर को संस्कृत में कर्पूर, फारसी में काफ़ूर और अंग्रेजी में कैंफ़र कहते हैं।

- कपूर उत्तम वातहर, दीपक और पूतिहर होता है। त्वचा और फेफड़ों के द्वारा उत्सर्जित होने के कारण यह स्वेदजनक और कफघ्न होता है। न्यूनाधिक मात्रा में इसकी क्रिया भिन्न-भिन्न होती है। साधारण औषधीय मात्रा में इससे प्रारंभ में सर्वाधिक उत्तेजन, विशेषत: हृदय, श्वसन तथा मस्तिष्क, में होता है। पीछे उसके अवसादन, वेदनास्थापन और संकोच-विकास-प्रतिबंधक गुण देखने में आते हैं। अधिक मात्रा में यह दाहजनक और मादक विष हो जाता है।
कपूर के वृक्ष होते है , जिसके हर भाग में इसका तेल पाया जाता है , जिससे कपूर बनाया जाता है। भारत में यह देहरादून , सहारनपूर, कोलकाता, निलगिरी व मैसूर आदि जगहों पर पाया जाता है.. जहां से यह प्राप्त होता है , उस आधार पर यह तीन प्रकार का होता है :

(1) चीनी अथवा जापानी कपूर,

(2) भीमसेनी अथवा बरास कपूर,

(3) हिंदुस्तानी अथवा पत्रीकपूर, - औषधीय दृष्टि से यहीं महत्वपूर्ण है.

उपर्युक्त तीनों प्रकार के कपूर के अतिरिक्त आजकल संश्लिष्ट (synthesized) कपूर भी तैयार किया जाता है।
कपूर का औषधीय महत्त्व --
- खुजली और जलन जैसे त्वचा समस्या वाले प्रभावित क्षेत्र पर कपूर लगाने से इलाज किया जा सकता है।
- उबटन में भी थोड़ा सा कपूर मिलाया जा सकता है.

- पानी में कपूर के एक टुकड़े को डुबोने के बाद उसे जले हुए निशान पर रगडें। जले निशान को कम करने के लिए दिन में एक बार ऐसा करें। बस यह सुनिश्चित कर लें कि जला निशान ताजा नहीं होना चाहिये। वरना यह अवांछित त्वचा में सूजन और जलन पैदा कर सकता है।

- कपूर मुँहासे के लिये अच्‍छा इलाज माना जाता है। कपूर का तेल और मुंहासों पर लगाने से वे ठीक हो जाते हैं।

- फटी एडियों की देखभाल के लिए कपूर और पानी के घोल में अपने पैरों को डाल कर बैठ जाइये और अच्‍छे स्‍क्रब से पैरों की सफाई कीजिये।
- बालों को बढाने के लिये इसे अन्य हर्बल तेलों के साथ मिला कर लगाएं। इसेस दिमाग को आराम और तनाव से छुटकारा भी मिलता है। कपूर के तेल में आप दही मिला कर लगा सकते हैं।

- अपने सिर की कपूर के तेल से मसाज करें और बाल झड़ने की समस्या से छुटकारा पाएं।
- दक्षिण भारत में तीर्थ के जल में कपूर भी मिलाया जाता है.
- इसकी थोड़ी सी मात्रा दिल के मरिजों के लिए दवा साबित होती है. पर यह किसी कुशल वैद्य की निगरानी में लेना चाहिए.
- कपूर वाले तेल से मालिश करने पर कफ आसानी से निकलता है.
- कपूर वाला तेल लागाने से दर्द और सूजन दूर होती है.
- इसे रखने से चीटियाँ दूर भागती है.

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