गुरुवार, 24 जनवरी 2019

जेनेरिक और ब्रांडेड दवाइयों में ऐसा क्या अंतर हैं कि डॉक्टर हमें जेनेरिक दवाई नही लिखते?

जेनेरिक और ब्रांडेड दवाइयों में ऐसा क्या अंतर हैं कि डॉक्टर हमें जेनेरिक दवाई नही लिखते?
ये हैं एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव। ये भाई साहब तय करते है कि हम और आप कौन सी दवाइयां लेंगे। आपने प्राइवेट डॉक्टर की क्लीनिक के बाहर 1–2 लोगो को गले मे टाई लगाए, हाथों में एक ब्रीफ़केस लिए देखा होगा जो मरीज़ों से भी ज़्यादा उतावले होते है डॉक्टर के केबिन में घुसने के लिए।
एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव अपनी कंपनी की दवाओं का प्रचार करता है। डॉक्टर को मनाता है कि वो उसकी ब्रांडेड महंगी दवाइयां मरीज़ों को लिखें।
पर इनका क्या दोष ये तो सिर्फ़ अपनी नौकरी कर रहें है।

इसके एवज में डॉक्टरों को ईनाम दिया जाता है। कई बार cash में कई बार kind में। cash का मतलब कुछ भी हो सकता है, अच्छी घड़ी, नकद रक़म, या कुछ बड़ा जैसा डॉक्टर वैसा ईनाम। उसी तरह kind में थाईलैंड, सिंगापुर की सैर। कभी कभी रिसर्च पेपर में authorship भी मिलती है। [1]एक बहुत बड़ा मायाजाल है जिसे तोड़ पाना मुश्किल लगता है।
सरकार क्या कर रही है?
जनता के स्वास्थ्य का मामला है तो सरकार ने कुछ ज़रूरी नियम बनाये है। डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने के लिए ज़रूरी निर्देश भी दिए गए है। 2016 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया न डॉक्टरों को यह कहा है कि वो ज़्यादा से ज़्यादा जेनेरिक दवाइयां मरीज़ों को दें। [2] उन्होंने Indian Medical Council (Professional Conduct, Etiquette and Ethics) Regulations, 2002 में बदलाव कर जेनेरिक दवाओं के लिए रास्ता बनाया है। ऐसा न करने वाले डॉक्टरों के लिए दंड का प्रावधान भी है।
मौजूदा सरकार की यह कोशिश है कि गरीबों को दवाइयां सस्ते दामों पर मिले जो अपने आप मे अच्छा है। पर डॉक्टरों की भी कुछ आशंकाएं है।
डॉक्टर क्या कहते है?
डॉक्टरों के ऊपर यह थोप तो दिया गया है पर डॉक्टर भी अपनी चिंता व्यक्त करते है कि वो क्यों जेनेरिक दवा नही देना चाहते। डॉक्टर कहते है कि जेनेरिक दवाओं में कुछ खामियां होती है जिनसे वो उन्हें मरीज़ों को नही देना चाहते। जेनेरिक दवाओं की bioavailibility (एक पैमाना की कितने प्रतिशत दवा शरीर मे रह पाती है।)
डॉक्टरों का मानना है कि जेनेरिक दवाओं कि

बायोआवैलिबिलिटी संतोषजनक नही होती।
जेनेरिक दवाओं को बनाने के समय उनकी गुणवत्ता का ध्यान नही रखा जाता।
जेनेरिक दवाओं का कोई क्लीनिकल ट्रायल नही होता और मरीज़ों पर उनके असर का कोई अध्यन नही किया जाता।
ऐसा शोध भी उपलब्ध नही है कि जेनेरिक बिल्कुल ब्रांडेड दवाओं जैसा ही काम करता है। [3]

कुछ हद तक यह बातें सही भी हैं। जेनेरिक दवाओं की क़्वालिटी कंट्रोल बड़ी ढुलमुल होती है।
फार्मा इंडस्ट्री की बात करें तो sub-contracting शायद इसमें जिम्मेदार है। कई बार बड़ी कंपनियां ग्राहकों से आर्डर ले कर छोटी कंपनियों को दवा बनाने दे देती हैं। भले ही फार्मूला बड़ी कंपनी का हो पर जिस जगह वो बन रही होती है वहाँ नियमों का सख्ती से पालन नही किया जाता। इन सबसे दवाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ता है। मेरे हिसाब से अगर लोग एक न्यूनतम स्टैण्डर्ड का भी पालन करे तो गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।
बात केवल डॉक्टरों तक ही सीमित नही है कई बार मरीज़ सरकारी अस्पताल जाकर भी बाहर से ब्रांडेड दवाएं लिखने का आग्रह करते हैं। शायद उन्हें खुद भी जेनेरिक दवाओं पर उतना भरोसा नही होता।[4]
भारत वैसे तो विश्व मे सबसे बड़ा जेनेरिक दवाओं का निर्माता है पर अभी गुणवत्ता में काफी सुधार की ज़रूरत है।
डॉक्टरों को पूरी तरह से इसके लिए दोषी ठहराना सही नही होगा। जेनेरिक दवाओं को उनके ब्रांडेड के समतुल्य ला कर इस समस्या से निपटा जा सकता है।
सुझावों का स्वगात है और असहमति भी आपका अधिकार है।
धन्यवाद।


फुटनोट
[1] Want to bribe a doctor? Gift authorship of medical papers - Times of India
[2] Doctors to face action unless they only prescribe generic drugs: MCI - Times of India
[3] Doctors wary as Centre pushes for generic drugs
[4] Neither doctors nor patients opt for generic drugs

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