रविवार, 27 नवंबर 2011

~~सच की राह~~



यह उस समय की बात है जब महादेव गोविंद रानाडे बालक थे। एक दिन वह घर में अकेले थे। उनका मन नहीं लग रहा था। वह बाहर बरामदे में खड़े-खड़े सोच रहे थे कि क्या करें। तभी उन्हें ख्याल आया कि कोई ऐसा खेल खेलना चाहिए जो अकेले खेला जा सके। उन्होंने सोचा क्यों न चौपड़ ही खेल लूं। उन्होंने मकान के एक खंभे को अपना साथी बनाया।

खंभे के लिए अपना दायां हाथ व अपने लिए बायां हाथ निश्चित किया। फिर उन्होंने खेलना आरंभ किया। पहले दाएं हाथ से पासा फेंका। यह था खंभे का दांव। फिर बाएं हाथ से पासा फेंका। यह दांव उनका अपना था। थोड़ी ही देर में रानाडे हार गए। रानाडे को पता नहीं था कि उनका खेल सामने सड़क पर खड़े कुछ लोग देख रहे थे।

उन्होंने पूछा, 'क्यों भैया, तुम खंभे से हार गए?' इस पर रानाडे बोले, 'क्या करूं? बाएं हाथ से पासा फेंकने की आदत नहीं है। खंभे का दाहिना हाथ था, सो वह जीत गया।' जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने दायां हाथ अपने लिए और बायां हाथ खंभे के लिए क्यों नहीं रखा, तो रानाडे बोले, 'हार गया तो क्या हुआ। कोई मुझे बेईमान तो नहीं कह सकता न। अपने लिए दायां हाथ रखता और बेजान खंभे के लिए बायां, तो बेईमान कहलाता। बेचारे खंभे के साथ अन्याय हो जाता। अन्याय करना तो बहुत ही बुरा होता है।' रानाडे की बात सुनकर लोग भौंचक रह गए। सच के प्रति रानाडे की यह भावना आजीवन बनी रही।



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