रविवार, 27 नवंबर 2011

अगर भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया तो ? - योगेंद्र सारस्वत


मान के चलिए कि अन्ना जी के आंदोलन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया और लोगों के दिमाग़ बदलने लग गये | लोगों ने रिश्वत लेना और देना बंद कर दिया , कमीशन से भी तौबा कर ली |नेताओं और अधिकारियों के मन ने उनको धिक्कारना शुरू कर दिया | घर में रिश्वत के पैसे लाने पर बीवी और बच्चों ने ताने देने शुरू कर दिए | मतलब ये कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों की आत्मा ने उन्हें कचॉटना शुरू कर दिया | उनका जमीर जाग गया तो ....? सोचिए कितना बड़ा नुकसान हो जाएगा | अगर ऐसा हो गया तो ? फिल्म वालों के लिए वैसे ही कहानी का अकाल पड़ा रहता है , हर तीसरी फिल्म तो भ्रष्टाचार पर होती है| भ्रष्टाचार नही रहेगा तो फिर कहानी कैसे मिलेगी | सोचिए उस बेचारे मुसद्दी का जिसने ऑफीस ऑफीस खेलते खेलते ही अपने बच्चो को पाला और उसको हीरो भी बना दिया | सुनते हैं अब वही मुसद्दी एक फिल्म 'मौसम' भी बना रहा है | आप ही बताइए अगर ये भ्रष्टाचार नाम का धंधा ना रहा होता तो ये बेचारे कैसे जीवन यापन करते ? और अपना वो राम गोपाल वर्मा , जानते तो हैं न ? वो तो कहीं मूँगफली ही बेच रहा होता ! फिर भी आप कहते हैं कि इस भ्रष्टाचार को ख़त्म करो ! काहे भाई ! काहे औरों के पेट पर लात मार देना चाहते हैं ? तनिक उनका भी ख्याल करो जो नेता जी के इधर उधर लगे रहते हैं |भले ही दुनियाँ उन्हें चमचा कहे मगर उन्हें भी तो अपना घर चलना है कि नही ? अगर नेता जी को कहीं से कमीशन या नज़राना नही मिलेगा तो वो अपने चम्चो को क्या देंगे ? घंटा ! और अगर चम्चो को चासनी नही मिलेगी तो वो उधर क्यों मुँह मारने जाएँगे ? और जो वो मुँह मारने नही जाएँगे तो नेता जी को पूछेगा कौन ? फिर कैसी राजनीति और काहे की राजनीति ? बिना किसी फय्दे के कोई कुछ करता है क्या ? अब वो भगवान श्री कृष्णा तो हैं नही कि सोच लें 'कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर इस भ्रष्टाचार के खेल से जाने कितनो के घर चलते हैं | टी. वी. की टी. आर. पी. बढ़ने से रिपोर्टर की तनख़्वाह बढ़ती है , अख़बारों के समाचारों से पत्रकारों का काम चलता है | कुछ नही तो कम से कम हम जैसे तुछ साहित्यकारों का ही कुछ सोचिए जिन्हें भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लिखकर ही कुछ संतुष्टि मिल जाती है | तो भइया जैसा चल रहा है , वैसा ही चलने देने में क्या बुराई है ? जब हमारे गुणी और योग्य प्रधानमंत्री को कोई बुराई नज़र नही आती तो आप काहे परेशान हो?मान के चलिए कि अन्ना जी के आंदोलन ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया और लोगों के दिमाग़ बदलने लग गये | लोगों ने रिश्वत लेना और देना बंद कर दिया , कमीशन से भी तौबा कर ली |नेताओं और अधिकारियों के मन ने उनको धिक्कारना शुरू कर दिया | घर में रिश्वत के पैसे लाने पर बीवी और बच्चों ने ताने देने शुरू कर दिए | मतलब ये कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों की आत्मा ने उन्हें कचॉटना शुरू कर दिया | उनका जमीर जाग गया तो ....? सोचिए कितना बड़ा नुकसान हो जाएगा | अगर ऐसा हो गया तो ? फिल्म वालों के लिए वैसे ही कहानी का अकाल पड़ा रहता है , हर तीसरी फिल्म तो भ्रष्टाचार पर होती है| भ्रष्टाचार नही रहेगा तो फिर कहानी कैसे मिलेगी | सोचिए उस बेचारे मुसद्दी का जिसने ऑफीस ऑफीस खेलते खेलते ही अपने बच्चो को पाला और उसको हीरो भी बना दिया | सुनते हैं अब वही मुसद्दी एक फिल्म 'मौसम' भी बना रहा है | आप ही बताइए अगर ये भ्रष्टाचार नाम का धंधा ना रहा होता तो ये बेचारे कैसे जीवन यापन करते ? और अपना वो राम गोपाल वर्मा , जानते तो हैं न ? वो तो कहीं मूँगफली ही बेच रहा होता ! फिर भी आप कहते हैं कि इस भ्रष्टाचार को ख़त्म करो ! काहे भाई ! काहे औरों के पेट पर लात मार देना चाहते हैं ? तनिक उनका ��ी ख्याल करो जो नेता जी के इधर उधर लगे रहते हैं |भले ही दुनियाँ उन्हें चमचा कहे मगर उन्हें भी तो अपना घर चलना है कि नही ? अगर नेता जी को कहीं से कमीशन या नज़राना नही मिलेगा तो वो अपने चम्चो को क्या देंगे ? घंटा ! और अगर चम्चो को चासनी नही मिलेगी तो वो उधर क्यों मुँह मारने जाएँगे ? और जो वो मुँह मारने नही जाएँगे तो नेता जी को पूछेगा कौन ? फिर कैसी राजनीति और काहे की राजनीति ? बिना किसी फय्दे के कोई कुछ करता है क्या ? अब वो भगवान श्री कृष्णा तो हैं नही कि सोच लें 'कर्म किए जा फल की इच्छा मत कर इस भ्रष्टाचार के खेल से जाने कितनो के घर चलते हैं | टी. वी. की टी. आर. पी. बढ़ने से रिपोर्टर की तनख़्वाह बढ़ती है , अख़बारों के समाचारों से पत्रकारों का काम चलता है |
कुछ नही तो कम से कम हम जैसे तुछ साहित्यकारों का ही कुछ सोचिए जिन्हें भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लिखकर ही कुछ संतुष्टि मिल जाती है | तो भइया जैसा चल रहा है , वैसा ही चलने देने में क्या बुराई है ? जब हमारे गुणी और योग्य प्रधानमंत्री को कोई बुराई नज़र नही आती तो आप काहे परेशान हो?
  - योगेंद्र सारस्वत

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