बुधवार, 18 जुलाई 2012

व्यवस्था बदलनी है तो

आज़ादी के 65 सालों के बाद भी खाप पंचायतों की पहचान और प्रचलन उसी तरह से चलता आया है जैसे कभी यह अस्तित्व में आयी होंगी...राजनीति,राजनीतिक पार्टियां और खाप पंचायतों का घनिष्ठ रिश्ता पहले भी था और आज भी है...अपने तुगलकी फरमानों से यह खाप पंचायतें अक्सर हैरान परेशान करती रहीं हैं और आज भी कर रही हैं जबकि ग्राम पंचायतों को सत्ता में पूरी तरह से भागीदार बनाने की ज़रूरत है और खाप पंचायतों को ध्यान न देते हुये उनके प्रचलन को समाप्त कर दिया जाना चाहिए था ....खाप पंचायतें कोई विकास कार्यक्रम न चलाती हैं और न ही चला सकती हैं क्योंकि इनका आधार सामुदायिक एवं जातीय होता है और यह खाप पंचायतें राजनीति,राजनीतिक पार्टियों और राजनीतिक लोगों के लिए वरदान साबित होती रही हैं और आज भी हो रही हैं...यही खाप पंचायतें राजनीति के लिए वोट बैंक होती हैं...!!

राजनीति,पार्टियां और राजनीतिक लोग अक्सर इन्हीं खाप पंचायतों के आगे नतमस्तक रहते हैं और सरंक्षण भी प्रदान करते हैं...इन खाप पंचायतों के फैसले भी शायद राजनीति के इशारों पर ही होते हैं क्योंकि राजनीति तो लोगों को बांटने में विश्वास करती है और यह खाप पंचायतें उसी दिशा में विशेषज्ञ साबित होती हैं....चाहे वो किसी भी धर्म,समुदाय,जाति का प्रतिनिधित्व करती हों लेकिन धंधा उनका वही होता है...वोट बैंक बनकर चलना...किसी भी पार्टी या नेता के साथ समय देखकर पाला बदलने में भी महारत रहती है इन खाप पंचायतों के पास...!!

हम आप देख रहे हैं कि राजनीतिक लोग और पार्टियां इतनी जनता के सड़कों पर उतरने के बाद भी किस घमंड में चूर हैं और आम लोगों के लिए किसी भी पार्टी में कोई संवेदना है ही नहीं इन्हीं खाप पंचायतों के बूते पर राजनीति,पार्टियां और राजनीतिक लोग फलफूल रहे हैं और आम आदमी आजतक पिस रहा है...राजनीति,पार्टियां और राजनीतिक लोग इन्हीं खाप पंचायतों के दम पर आम आदमी को नज़रअंदाज़ करती आयी हैं...क्योंकि राजनीति वाले समझते हैं कि उनका वोट बैंक तो है ही उनके साथ...और आम आदमी को इस खाप पंचायत संस्कृति के पीछे के खेल की समझ नहीं है...!!

व्यवस्था बदलनी है तो ग्राम स्वराज का रास्ता ग्राम पंचायत से होकर निकलता है...खाप पंचायत से नहीं...खाप पंचायत के प्रचलन को अपने समाज से कैसे हटाना है...सोचना चाहिए हमको...!!
 आजकल खाप पंचायत याने जात पंचायत पर काफी बहस होती दिखाई दे रही है. एक समय में माहेश्वरी समाज के प्रबंधन में माहेश्वरी पंचायत की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, समस्याओं को पंचायत में ही सुलझाया जाता था. फिर धीरे-धीरे माहेश्वरी पंचायते बंद होती गयी. कुछ समाजशास्त्री कहते है की जात पंचायते समाज को जोड़े रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है समाज की समस्याओं को भी सुलझाती है. यह एक ऐसी व्यवस्था है जहाँ समाज के लोग अपना समय देकर, बिनाशुल्क समस्या सुलझाते है. जात पंचायतों के विरोधियों का कहना होता है की, पंचायतों के फैसले/ निर्णय कई बार गलत होते है. पंचायतों के समर्थक कहते है की पुलिस भी कई बार गलत काम कर जाती है; कोर्ट के फैसले भी कई बार गलत साबित हुए है तो क्या उन व्यवस्थाओं को बंद करने की बाते होती है? नहीं! तो जात पंचायतों के बारेमें ही ऐसा क्यों सोचा जाता है. हर एक व्यवस्था में समय के अनुसार सुधार होते रहते है; जात पंचायतों में भी उचित सुधार करते हुए इस व्यवस्था का लाभ लिया जाना चाहिए.
शायद आज माहेश्वरी पंचायत कार्यरत होती तो कहीं पर भी बूढ़े माँ-बाप को उनके बच्चे घरसे बाहर ना निकाल पाते, शायद लड़कियाँ अन्य जातिमे शादियाँ नही करती, अन्य लोगोंसे समाज के भाई- बहनों को, बेपारियों को कही कोई तकलीफ नही होती. समाज के संगठन भी एक तरह से जात पंचायतों का ही आधुनिक स्वरुप है लेकिन यह संगठन जात पंचायतों की तरह काम में कारगर या असरदार नही दिखाई देते है, जात पंचायतों की तरह विश्वसनीयता पाने में भी सफल नही हुए है.

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