बुधवार, 18 जुलाई 2012

आचार्य की परीक्षा

 आचार्य की परीक्षा
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आचार्य विष्णु गुप्त, जो बाद में चाणक्य के नाम से प्रसिद्ध हुए, उन दिनों तक्षशिला में पढ़ाते थे। वे सैद्धांतिक की तुलना में व्यवहारिक ज्ञान देना ज्यादा महत्वपूर्ण मानते थे। उनका मानना था कि व्यावहारिक ज्ञान के माध्यम से ही शिष्यों का व्यक्तित्व समग्र विकास पाता है। गुरुकुल का एक सत्र पूर्ण होने के पश्चात आचार्य अपने शिष्यों की अंतिम परीक्षा लेते थे। ऐसे ही एक सत्र पूर्ण होने पर आचार्य विष्णु गुप्त ने शिष्यों को बांस की टोकरियां देते हुए कहा- इनमें नदी से जल भर लाओ। उससे गुरुकुल की सफाई करनी है।

शिष्य आचार्य की आज्ञा सुनकर चकरा गए कि बांस की टोकरी में जल भरकर लाना असंभव है। मगर सभी ने नदी पर जाकर प्रयास किया। बांस की टोकरियों में जल भरने से वह छिद्रों में से रिस जाता। आखिर एक शिष्य को छोड़कर सभी लौट आए। उस शिष्य के मन में आचार्य के प्रति पूर्ण निष्ठा थी और वह यह सोचकर बार-बार जल भरता कि गुरुदेव ने सोच-समझकर ही ऐसी आज्ञा दी होगी। शाम तक वह जल भरने का प्रयास करता रहा।

बांस की टोकरी के सुबह से शाम तक जल में रहने के कारण बांस की तीलियां फूल गईं और छिद्र बंद हो गए। आखिर शाम को वह टोकरी में जल भरकर आचार्य के पास लौटा। तब आचार्य ने अन्य शिष्यों से कहा- मैंने तुम्हें दुरूह कार्य सौंपा था किंतु विवेक, धैर्य, लगन व निरंतर प्रयास से यह संभव था। कड़े परिश्रम और लगन से असंभव दिखाई देने वाला कार्य भी संभव हो जाता है, इसलिए कभी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए।
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