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मंगलवार, 22 नवंबर 2011

सोच रहा हूँ मैं भी नेता बन जाऊं,

सोच रहा हूँ मैं भी नेता बन जाऊं,
मंच पर खड़े होकर सबको बेवकूफ बनाऊं,
अगर भूले से जीत गया ,
समझो फिर तो देश गया,
खूब ही मौज उड़ाऊंगा,
रिश्वत भी जमकर खाऊंगा,
सांसद निधि का क्या सोचना है,
वो तो माल ही अपना है,
शुरु करूँगा बड़ी बड़ी योजनायें,
सब खाएं और सबसे ज्यादा मुझको खिलाएं,
एक बार के कार्यकाल में ,
जिन्दगी भर रहूँगा भौकाल में,
नहीं होगा कोई मेरा सानी,
पलक झपकते ही बन जाऊंगा अम्बानी,
जनता से मुझको क्या मतलब,
दिखाऊंगा एक से एक करतब,
ख़बरों में रोज मैं आऊंगा ,
झूठे इल्जाम लगाऊंगा,
होगा सब तरफ मेरा ही चर्चा,
लाखों में होगा मेरा रोज का खर्चा,
पर देखता हूँ जब फूटपाथ पर पड़े बच्चे को,
भूख से बिलखते देश के भविष्य को ,
चूर चूर हो जाता है नेता बनने का सपना,
लूटता है जो देश को बोलकर अपना,
गरीब पिसता रहता है राजनीति के खेल में,
नेता मौज उड़ाते है कभी संसद में कभी जेल में,
क्या मैं ईमानदार नेता बन पाऊंगा,
क्या देश की सच्ची सेवा कर पाउँगा,
अरे मैं कुछ भूल रहा हूँ,
हाँ सुन लो सब मैं पूछ रहा हूँ,
क्या कोई पार्टी देशभक्त को टिकट देगी?
और दे भी दी तो जनता भी क्या ईमानदार को वोट देगी? ........ दिव्येन्द्र कुमार


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