रविवार, 26 अगस्त 2012

बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में

एक समय की बात है |
बादशाह अकबर के राज के दौरान एक भगत था ध्यानु भगत | वह माँ ज्वाला जी का सच्चा भक्त था | एक बार वह माता के दर्शनकरने के लिए जा रहा था कि अकबर के सैनिकों ने उसे पकड़ लिया और अकबर के सामने पेश किया |
अकबर के पूछने पर उसने बताया कि वह माता के दर्शन के लिए जा रहा है | अकबर ने पूछा कि तुम्हारी माता क्या कर सकती है ?
ध्यानु बोला, "माँ तो सर्वशक्तिमान है, उनके लिए सब कुछ संभव है"
तो अकबर
ने उसके घोड़े का सिर काट दिया और पूछा, " क्या तुम्हारी माँ इस घोड़े का सिर वापिस लगा सकती है?"
भगत ध्यानु ने माँ के मंदिर जाकर माँ ज्वाला देवी से प्रार्थना की और घोड़ा वापिस जिंदा हो गया | बादशाह अकबर हैरान हो गया | उसने अपनी सेना बुलाई और खुद नंगे पाँव मंदिर की तरफ चल पड़ा | वहाँ पहुँच कर फिर उसके मन में शंका हुई | उसने अपनी सेना से पूरे मंदिर में पानी डलवाया, लेकिन माता की ज्वाला बुझी नहीं| तब जाकर उसे माँ की महिमा का यकीन हुआ और उसने सोने का छतर चढ़ाया | लेकिन माता ने वह छतर कबूल नहीं किया और वह छतर किसी अन्य पदार्थ में परिवर्तित हो गया |
आप आज भी वह बादशाह अकबर का छतर ज्वाला देवी के मंदिर में देख सकते हैं |
जय माता दी _/\_ —

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