मंगलवार, 22 जनवरी 2019

राजस्थान पत्रिका:- भाजपा विरोध से देश विरोध तक

*मेरी पीड़ा जरूर पड़े*

राजस्थान पत्रिका:-

भाजपा विरोध से देश विरोध तक

संपादक महोदय,
(आदरणीय या माननीय कहने का अब मन नहीं करता, और ना ही हम पाठकों के मन में आपके प्रति ऐसा मान रहा)

जब से पढ़ना सीखा है, शायद उससे पहले से आपके अखबार से नाता था। 'हो सकता है मैं आपके विचारों से सहमत न हो पाऊं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करूंगा - वाल्तेयर' ये पंक्तियां जब पहली बार 8 साल की उम्र से अखबार पढ़ना शुरू किया था, तब समझ नहीं आयी थी, पर जैसे जैसे उम्र बढ़ी, आपके अखबार के इन पंक्तियों को आत्मसात करते देखना, हमारे लिए गर्वोन्नत होने का एक संपूर्ण कारण था। आज भी याद है कि जब पत्रिका को पहली बार एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तो हमें लगा जैसे पत्रिका का पाठक होने के नाते उस पुरस्कार पर हमारा भी कोई हक़ है, अधिकार है जैसे।
जिस दिन बारिशों के कारण, हॉकर मौहल्ले में पेपर नहीं डाल पाता था, दिन भर एक बेचैनी रहती थी की आज पत्रिका नहीं पढ़ पाए । ये ही हालत तब भी होती थी जब कोई पड़ोसी अखबार ले जाता और वापस नहीं लाता था।
ख़ैर, आज आप 'राजस्थान पत्रिका' को उस मुकाम पर ले आये हैं, जहां थोड़ी ज्यादा देर अखबार की ओर देख ले तो उबकाई सी आने लगती हैं।

वसुंधरा सरकार ने शायद अपने शासन के पहले ही साल में आपको विज्ञापन देना बंद कर दिया था, जिसके विरोध में आप सुप्रीम कोर्ट में जीत कर आये। और उसके बाद वसुंधरा सरकार के विरुद्ध, भाजपा के विरुद्ध आपका एजेंडा क्रिस्टल क्लियर दिख रहा था। पर कोई बात नहीं। देश की 99% प्रतिशत मीडिया वैसे भी किसी ना किसी के चरणों में दण्डवत है। आप भी कहीं लेट गए हैं तो कोई घोर आश्चर्य नहीं। पर ये भाजपा या वसुंधरा या मोदी के विरोध में होते होते आप कब देश के विरोधी होने लग गए, आपको पता ही नहीं चला। डॉ भार्गव के लिखे अद्भुत वेद-वेदांग के लेखों की जगह कब योगेंद यादव जैसे लोगों ने ले ली, जिनका हर हफ्ते एक आर्टिकल आपके अखबार में होना तय है।
चलिये, ये सब भी कुछ नहीं।

पर आज तो जो हद हुई है, शायद अक्षम्य है। आज के जोधपुर ग्रामीण के बिलाड़ा पीपाड़ संस्करण की एक फोटो संलग्न कर रहा हूँ। जयपुर में कांग्रेस अध्यक्ष की एक रैली हुई जिसकी हैडलाइन 'किसान-युवा अब फ्रंट फुट पर खेलेंगे' आपके पहले पेज पर छाया हुआ है। पहले पेज का 10% रूटीन विज्ञापन को देने के बाद बाकी में से लगभग 60% आपने इस रैली को समर्पित किया है, वो भी ठीक। जयपुर की इस रैली को प्रदेश के हर शहर, हर ग्रामीण संस्करण में आपने पहले पेज पे दिया है। और उतने ही 60% कवरेज के साथ। ये बात और है कि अभी तो कोई चुनाव भी नहीं नजदीक के एक महीने में, और एक बात और ये भी कि आपने सरदार पटेल को समर्पित 'स्टेचू ऑफ यूनिटी' के प्रधानमंत्री द्वारा किये गए उद्घाटन को आपने 14वें पेज पर छापा था। और आज जब, देश का हर एक मीडिया हाउस, हर अखबार 'आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)' को दिए जाने वाले 10% आरक्षण के लिए पारित हुए 124वें संशोधन को प्राथमिकता देता है, यह किसी आश्चर्य से कम नहीं कि आपने लगभग हर ग्रामीण संस्करण में इसे दरकिनार कर पीछे की ओर फेक दिया है। और हां, हर शहर में आखिरी पेज पर 'संघ के निर्देश पर सरकार ने खेला सामान्य वर्ग के आरक्षण का दावं' - ये लिखने से आप नहीं चूके। कांग्रेस सरकार द्वारा घोषित कर्जमाफी जो लोगों को बस सरकारी सहायता पे निर्भर बना देती है, उसपर आपके तेवर के लिए तो सब प्रतीक्षा ही करते रह गए। 
(और अगली बार दांव ढंग से लिखियेगा, प्रदेश के सबसे बड़े अखबार है, ऐसी छोटी गलतियां शोभा नहीं देती)
चलिये, ये सब भी कुछ नहीं। ये भी सहन कर लेंगे। बाकी, जानते हम सब हैं कि कांग्रेस की तरफ से राजस्थान, मध्यप्रदेश में फ्रंट फुट पर कौन खेल रहा है। आपके दिसंबर18 के चुनावों में की गई मेहनत कांग्रेस कभी नहीं भुला सकती, जब आप कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से भी ज्यादा ओवरटाइम कर रहे थे कांग्रेस की सरकार तीनों राज्यों में बनाने के लिए। वो प्रधानमंत्री मोदी को 'चैंपियन ऑफ अर्थ' से सम्मानित होने पर झरोखा नामक आपके कार्टून कोने में 'किसमें, जुमलेबाजी में' लिखते हुए ये भूल जाना कि वो सम्मान सिर्फ़ मोदी को ही नहीं, अपितु देश को था। पर इस बात में भी चूंकि 'मोदी' शामिल था, और आपकी राजनैतिक मजबूरियाँ हर बीतते दिन के साथ कांच जैसे साफ होती जा रही हैं, इसे भी हम भूल जाते हैं।

पर आज बिलाड़ा संस्करण में पहले पेज के अंत में आईएएस शाह फैसल के इस्तीफे को प्रमुखता मिली। मिलनी भी थी, क्योंकि मोदी के विरोध में कोई भी हो, आपका साथ उसे मिलना अवश्यम्भावी है। ख़ैर, हैडलाइन पर ही आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा।

'हत्याओं पर केन्द्र के रवैये से खफा आईएएस टॉपर ने छोड़ी नौकरी'।

'हत्याएं..??' जहां देश के सैनिक घर-बार, परिजनों को छोड़ दुर्गम परिस्थितियों में देश की संप्रभुता की रक्षा कर रहे हैं, असंख्य पत्थर खा कर भी संयम रखते हैं, भीड़ की आड़ ले छुपे आतंकियों को उनके अंजाम तक पहुँचाने में वहां की भीड़ द्वारा फेंके गए पत्थरों की अति होने पर जवाब में भीड़ को तितर बितर करते हैं तो वो 'हत्याएं' हैं..?
कश्मीर के रास्ते से यही सब जो देश भर में मनमर्जियों से धमाके करके जो कोहराम मचाते थे, उन्हें 5 साल से रोका हुआ है। उन धमाकों में जो असंख्य निर्दोष निहत्थे भारतीय मरे थे, उनकी मौत को 'हत्या' कहते हैं। जब 8-10 सैनिकों के दल पर 500-1000 की भीड़, बस आतंकियों को बचाने के लिए बस पत्थरों की बारिश कर देती हैं, उसे 'हत्या' कहते हैं।

आतंकवादियों को ख़त्म करना, नेस्तनाबूद कर देना हत्याएं नहीं होती। उनके समर्थन पर पत्थरबाज़ी करने वालों को रोकना, वो भी पूरी सावधानी के साथ कि जनहानि ना हो, हत्या नहीं होती। अगर इन आतंकियो को ना रोका जाए, और फिर जब ट्रेनों में, सड़को पर, मंदिरों में लोगों के चीथड़े उड़ जाते हैं, उसे किस अलंकार से सुशोभित करेंगी आपकी कलम..?
'हत्याएं' ये ही शब्द पाकिस्तान उपयोग में लेता है, संयुक्त राष्ट्र और दूसरे अंतराष्ट्रीय मंचों पर, कश्मीर मुद्दे पर भारत को घसीटने के लिए।

आपका विरोध वसुंधरा से, मोदी से, भाजपा से, यहां तक कि आज की तारीख में वृहत हिन्दू समुदाय से हैं (जो आपके संस्करण के 16वें एवं 'अंतिम' पेज की खबर, हैडलाइन और कंटेंट से पता चलता है), वो भी सहनीय है। पर एक पार्टी के चरणों मे आज आप देश-विरोध पर आमदा हो गए हैं। और ये आज की खबर किसी देश-द्रोह से कम नहीं।

जिस अखबार से हमारा बचपन, हमारी सुबह की चाय, गांवों की हथाई, चुल्हे चौखट से निपट कर अखबार बांचते सांस लेने वाली गृहिणियों का क्षणिक विश्राम, और ना जाने क्या-क्या जुड़ा था। 60 साल की उस विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को आपने अपने मौद्रिक और बुद्धजीवी कहलाने के लालच में पिछले 5 सालों में नाली में बहा दिया है। मेरे खुद के परिवार ने 40 सालों के नाता पिछले ही हफ्ते तोड़ा है।

शायद आप अपने इस अखबार को उस मुकाम तक ले आये हैं, जहां से पीछे मुड़ना अब आपके लिए संभव नहीं। वो कहता हैं ना, if you are going through hell, keep going. बाकी अब तो देश के विरोध में खड़े होने का ठान ही लिया है तो उसमें भी लगे रहिये।
हो सकता है, हम आपके विचारों से सहमत न हो पाएं फिर भी विचार प्रकट करने के आपके अधिकारों की रक्षा करेंगे, पर शायद इस राष्ट्र की कीमत पर नहीं। जब जब जरूरी होगा, ऐसे ही याद दिलाता रहूंगा।

शुभकामनाएं सहित,

आपकी गिरती हुई (या बहुत गिर चुकी) पत्रकारिता से निराश,
आपका एक भूतपूर्व पाठक।

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