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गुरुवार, 11 नवंबर 2021

उत्सव के बाद का नीरव सन्नाटा हमें गहरे तक परेशान करता है।


 उत्सव के बाद का नीरव सन्नाटा हमें गहरे तक परेशान करता है।
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        हम भारतीय उत्सव को मनाते नहीं, उत्सव में सराबोर होते हैं। उत्सव हमारे मन में छिपी गुदगुदी होती है जिसे हम बड़ी मासूमियत से साल भर अपने अंदर संजोकर रखते हैं.....हमारे अपनों के लिए, हमारे प्रिय, हमारे परिजन, हमारे दोस्तों के लिए। उत्सव मौका होता है हम सब के लिए इकट्ठा होने का, मिलने का, स्मृतियों को जीने का, नई स्मृतियों को रचने का। आज जो कुछ लिख रहा हूँ वो अपने परिवार, अपने ऑफिस, अपने काम या अपने काम से जुडी किसी योजना से जुड़ी बात नहीं है। बात हम हर आम भारतीय की है, उसके अंदर गहरे तक रचे-बसे इमोशन की है। अब जबकि दीपावली की रौनक और उल्लास खत्म हो चुकी है तो मैं इस उत्सव के बाद के नीरव सन्नाटे के बारे में सोच रहा हूँ, इस नीरवता को भीतर तक महसूस कर रहा हूँ। छुट्टियां खत्म हुई है और अब किसी का बेटा, किसी की बिटिया, किसी का भाई, किसी की बहिन, किसी की बहू, पोते-पोतियां वापिस वहां जाने की तैयारी में होंगे, शायद किसी के तो जा भी चुके होंगे। जाना वहाँ, जहां वो काम करते है, पढ़ाई करते हैं। उल्लास के बाद का ये विरह सोचिये। घर से लौटकर अब ये सभी वापिस किराए और शेयरिंग के बोझिल मकान, खाली फ्लैट, पराये हॉस्टल में जाएंगे। पीछे अपने घर को मकान बनाकर और अब अपने नये मकां को घर बनाने की फिराक में।
दुनिया में कोई एजेंसी ऐसी नहीं है जो उत्सव के बाद के इस विरह, नीरवता, माँ-बाप की अपने बेटे-बेटियों के सकुशल यात्रा की चिंता, उनके कन्सर्न, इमोशन, बच्चों की खुद के भविष्य की चिंता, असुरक्षा का डाटा तैयार कर सके। आज बस-स्टैंड, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट पर कितने आंसू निकले होंगे, कितने दिल बोझिल हुए होंगे, कितनो ने अपनी भावनायें छिपाकर नकली मजबूती दिखाते हुए पूछा होगा- इस बार लंबी छुट्टी लेकर आना, कोई नही जानता। भारतीय माँ और पिता की वही हमेशा वाली बाते हुई होंगी- बेटा, पानी ले लिया ना। छुट्टे पैसे तो होंगे ना। खाना खा लेना टाइम पर। मिठाई खुद भी खाना, हमेशा जैसे दोस्तों में बाँट मत देना। टैक्सी कर लेना, तंग मत होना। एक दादी अपने पोते को ट्रेन से रवाना होने से पहले तक अपनी बहू को नही देती। उन हाथों को मस्क को रूह तक उतारना है उसे। उसकी अपनी बहू से लाख तरह की नौक-झौंक और शिकायत होगी पर उसे भी मालूम है कि यही खट्टा-मीठा रिश्ता शायद हर घर की रौनक होती है जिसकी कमी उसको खलेगी। ट्रेन की सीटी बजती है और पोते को दादी के हाथों से लेकर बहु पैर छूती है। नर्म हाथों से छुए बूढ़े पैरो में सिहरन है, आँखों में नमी और दिल में बोझ। इस उम्र में अपना शहर छोड़ जा नहीं सकने की मजबूरी और अपनों के बिन भी रह पाने की कमजोरी।
हम और हमारे इमोशन। गुडबाय से पहले के इमोशन। अगले कुछ दिन, कुछ महीनों, कुछ साल के लिए होने वाले इस गुडबाय में सारा प्यार, अफेक्शन और चिंता इन अंतिम 20 मिनिट में सिमट कर क्यों आ जाती है। क्यों रवाना होने से पहले का ये गुडबाय बोलना जरूरी होता है। घर से ही गुडबाय क्यों नहीं होता। घर वाला गुडबाय स्टेशन, बस-स्टैंड और एयरपोर्ट जैसी यांत्रिक और निर्जीव जगह पर ही क्यों निकलता है। इतनी पवित्र भावनाओ का मशीनी जगह पर आना भी कम कमाल नहीं है। मशीनों के बीच मानव मन। ट्रैन, बस और एयरोप्लैन धीरे धीरे आगे बढ़ जाते हैं। अपने पीछे कुछ छोड़ कर, कुछ अंदर तक तोड़ कर।
*कहीं से लौट आने और कहीं से लौट जाने के बीच एक पूरी दुनिया होती है।☺🌹

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