शिवरात्रि: आध्यात्मिक जागरण की पावन रात्रि
शिवरात्रि का पर्व भगवान शिव की आराधना का एक विशेष अवसर है, जो आत्मा को शुद्ध करने और ईश्वर के प्रति अटूट भक्ति व्यक्त करने का संदेश देता है। यह रात्रि आध्यात्मिक शक्ति, ध्यान, और आत्म-साक्षात्कार का अद्भुत संगम है। शिव भक्त इस दिन उपवास रखते हैं, रुद्राभिषेक करते हैं, और पूरी रात जागरण कर भगवान शिव के ध्यान में लीन रहते हैं।
शिव का दिव्य स्वरूप
भगवान शिव अनादि, अनंत और संहार के देवता हैं। उनका स्वरूप रहस्यमय और दिव्य है—त्रिशूलधारी, मस्तक पर चंद्रमा, तीसरी आँख की ज्योति, गले में नागों की माला और शरीर पर भस्म का लेप। वे न केवल संहार के प्रतीक हैं, बल्कि करुणा, प्रेम, और कल्याण के स्रोत भी हैं।
शिवरात्रि की इस पावन रात्रि में, भक्तगण भगवान शिव का ध्यान करते हुए इस श्लोक का उच्चारण करते हैं:
बं बं भो । बं बं भो
बं बं भो । बं बं भो
बं बं भो । बं बं भो
बं बं भो । बं बं भो
शिवरात्रि का महत्व
शास्त्रों के अनुसार, यह वह रात है जब भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया था, और इसी रात वे तांडव नृत्य में लीन हुए थे, जो सृष्टि के चक्र को चलाने का प्रतीक है। यह दिन हमें यह भी सिखाता है कि आत्म-संयम, भक्ति और ध्यान के माध्यम से हम अपने भीतर छिपे दिव्यता को जाग्रत कर सकते हैं।
पंचभूतलिंगeshwara का आशीर्वाद:
शिव पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश) से संबद्ध हैं, और उनके आशीर्वाद से यह समस्त ब्रह्मांड संचालित होता है। वे समस्त प्राणियों के आत्मलिंग हैं और संसार में संतुलन बनाए रखते हैं।
शिवरात्रि की रात्रि—भक्ति और साधना
इस रात्रि में शिवलिंग का अभिषेक करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्तजन जल, दूध, शहद, और बेलपत्र अर्पित कर भगवान शिव का पूजन करते हैं। कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई साधना और उपवास से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं, और आत्मा मोक्ष की ओर अग्रसर होती है।
शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए करें ये कार्य:
- रुद्राभिषेक – दूध, शहद, और जल से भगवान शिव का अभिषेक करें।
- मौन व्रत – शिवरात्रि की रात मौन रहकर ध्यान करने से आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
- शिव मंत्रों का जाप – "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करने से आत्मिक शांति और शक्ति मिलती है।
- भस्म धारण – शिव की भक्ति में भस्म का महत्व अत्यधिक है, जो हमारी नश्वरता का प्रतीक है।
- शिव कथा का श्रवण – इस दिन शिव पुराण, शिवमहिम्न स्तोत्र, और तांडव स्तोत्र का पाठ करना अत्यंत लाभकारी होता है।
शिव ही सत्य हैं
शिव हमें यह सिखाते हैं कि जीवन परिवर्तनशील है, और हर अंत एक नए आरंभ का संकेत होता है। वे हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे कर्मों और आचरण में भी परिलक्षित होनी चाहिए। शिवरात्रि का पर्व हमें अपने भीतर के अज्ञान और अंधकार को समाप्त कर ज्ञान और भक्ति के प्रकाश की ओर ले जाता है।
(डमरुकम्)
बं बं भो । बं बं भो
बं बं भो । बं बं भो
बं बं भो । बं बं भो
बं बं भो । बं बं भो
सर्पप्रावितृ दर्पप्राभव विप्रप्रेरित परा ।
दिक्पूरप्रद कर्पूरप्रभ अर्पिंतुमु शङ्करा ॥
शिव शिव शङ्कर हर हर शङ्कर
जय जय शङ्कर दिगि-रा-रा ।
प्रिय-ताण्डव शङ्कर प्रकट-शुभङ्कर
प्रळय-भयङ्कर दिगि-रा-रा ॥
ॐ परमेश्वरा परा ॐ निखिलेश्वरा हरा ॐ जीवेश्वरेश्वरा गण-रा-रा ।
ॐ मन्त्रेश्वरा-स्वरा ॐ यन्त्रेश्वरा-स्थिरा ॐ तन्त्रेश्वरा-वरा रा-वे-रा ॥
आकशलिङ्गमय आवहिञ्चरा
डम-डम-मणि डमरुक-ध्वनि सलिपि जडतनि वदिलिञ्चरा ।
श्री वायुलिङ्गमय सञ्चरिञ्चरा
अणुवणुवणुवुन तन तनुवुन निलचि चलनमे कलिगिञ्चरा ।
भस्मं चेसेय् असुरुलनु अग्निलिङ्गमय प्रलयकारा
वरदै मुञ्चेय् जललिङ्गमय घोरा
वरमै वशमै प्रबलमौ भूलिङ्गमय बलमिडरा
जगमे नडिपे पञ्चभूतलिङ्गेश्वरा करुणिञ्चरा ॥
विश्वेशलिङ्गमय खणिकरिञ्चरा
विधिलिखितमुनिक पर पर पर चेरिपि अमृतमे कुरिपिञ्चरा
रामेशलिङ्गमय महिमा चूपरा
पलु शुभमुलु गनि अभयमुलिडि हितमु सततमु अन्दिञ्चरा
ग्रहणं निधनं बापरा काळहस्तिलिङ्गेश्वरा
प्राणं नीवै आलिङ्गनम्मीरा
ऐदलो कोलुवै हरहरा आत्मलिङ्गमय निलबडरा
द्युतिवै गति
वै सर्वजीवलोकेश्वरा रक्षिञ्चरा ॥
ॐ नमः शिवाय! हर हर महादेव!
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