रविवार, 27 फ़रवरी 2011

हुस्न से नहीं हुस्नवालों से डर लगता है

हुस्न से नहीं हुस्नवालों से डर लगता है
हमें दिल से नहीं दिलवालों से डर लगता है
सब्र करने के लिए अहले मुक़द्दर ने हमें चुना है
सब्र करने से नहीं सब्र का बांध टूट जाने से डर लगता है
वो एहले इल्म क्या तनक़ीद करेंगे मेरे फसानो पर
उन्हें इल्म से नहीं मुझ दीवाने से डर लगता है
यूँ निभाते रहे दर्द से दर्द के रिश्ते यारों
अब तो दर्द को भी दर्द होने से डर लगता है
वक़्त-ए-नाज़ुक वो हमें सरेराह छोड़ गए
उनके छोड़ जाने पर नहीं उनके वापस लौटकर आने पर डर लगता है
कुछ इस तरह से कर ली है हमने कांटो से मोहब्बत
के चमन के सारे गुलाबों से डर लगता है
मेरे कलाम पर दानिश्वरों ने यूँ कहा
आज बता दो "अक्षय" तुझे किस से डर लगता है
संभल संभल कर जब जुबां जोश में आई थी
तब सब ने कहा बस कर दे
हमें तेरे दर्द के दर्द से डर लगता है
वहां खुशियोंभरा चमन उनका
यहाँ राह तकती अंगारें
वह उनकी सजी है महफ़िल
यहाँ बेबसी के नज़ारे
वहां उनके रोनकें वहां उनके मस्तियाँ
यहाँ अश्क भरे सिसकिया बेसबब बरबादिया
अब बचा ही लो "अक्षय" को यारों उसे इन सब से डर लगता है

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