शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

देशी दीपावली अभियान ::

देशी दीपावली अभियान ::

दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति। 
 दीपावली शब्द ‘दीप’ एवं ‘आवली’ की संधि से बना है। आवली अर्थात पंक्ति, इस प्रकार दीपावली शब्द का अर्थ है, दीपों की पंक्ति। इसे दीपोत्सव भी कहते हैं लेकिन आधुनिकता की दौड़ में दीपावली के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण दीपक और लक्ष्मी गणेश की मूर्तियाँ गढ़ने वाले कुम्हार अपने घरों को रोशन करने से वंचित हैं और अपनी पुस्तैनी कला एवं व्यवसाय से जैसे विमुख हो रहे हैं। कुम्हारों के लिए दीपावली मात्र एक पर्व न होकर जीवन यापन का बड़ा जरिया है।

सदियों से मिटटी के बनाये गए दीपक को घरों में जलाकर हम दीपावली मानते चले आये हैं, लेकिन आज के समय बाजार मे आये चीन के दीपकों ने मिटटी के दियों की महक को छीन लिया है। जिसके चलते कुम्हार बदहाल हुए जा रहे हैं। मंहगाई और मरता हुआ व्यापार कहीं कुम्हारों को कहानी न बना दे। आधुनिकता की मार दीपावली में घर घर प्रकाश से जगमगा देने वाले दीप, कुलिया बनाने वाले कुम्हारों के घर भी पड़ी है। जिस कारण दीप बनाने वाले स्वयं दीप जलाने से वंचित रह जाते हैं और उनके घर अंधेरा ही रहता है। आधुनिकता के दौर में पूजा आदि के आयोजनों पर प्रसाद वितरण के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी के प्याले, कुल्हड़ एवं भोज में पानी के लिए मिट्टी के ग्लास आदि भी प्रचालन में अब नहीं रह गए हैं इसकी जगह अब प्लास्टिक ने ले ली है। पारंपरिक दीप की जगह मोमबत्ती एवं बिजली के रंज बिरंगे बल्बों ने ले ली है।

आने वाले समय में ऐसा दिन ना आ जाए जब कभी हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को कहानी सुनानी पड़े की, "एक था कुम्हार", जिस तरह से कुम्हार के जीवन यापन करने वाले बाजार पर चीन जैसे दीपक हावी होते जा रहे हैं। उससे तो यही लगता है की शायद कुम्हार का घूमता हुआ चाक रुक जाएगा और कुम्हार सिर्फ कहानियो मे ही सुनने को मिलेंगे। हाडतोड़ मेहनत के बाद दीये बनाने बाले कुम्हार फुटपाथ पर दूकान लगाकर जहां बाजार मे एक एक ग्राहक को तरस रहा है, वहीँ चाईनीज दीपकों की बिक्री हाथों हाथ हो जाती है। दीपावली असत्य पर सत्य की जीत सहित रौशनी का भी त्यौहार है, लेकिन एक सत्य यह भी है की हमारी माटी की महक पर चाईनीज भारी पड़ गए। जिसके चलते आने वाले दिनों मे हजारों कुम्हारों के घरों मे दीपक क्या चूल्हे भी नहीं जल पायेंगे।

इस दीपावली पर कुम्हारों द्वारा बनाये जा रहे भारतीय परम्परा के मिटटी के दिये और उनके बनाये गए मिट्टी के खिलौने अवश्य खरीदें और हाँ, खरीदते समय किसी प्रकार का मोल-भाव न करें, नहीं तो तब आप के आगे आने वाली पीढ़ी को यह दीप, खिलौने बनाने वाले नहीं दिखेंगे। इस काम में काफी श्रम लगता है और मुनाफा कम है लेकिन इनमें भारतीय परम्परा को ज़िंदा रखने का जूनून है...इस जुनून में आप भी अपने भारतीय होने की भूमिका अवश्य निभायें। दीपावली में मिट्टी के दीप अवश्य जलाएँ...क्योंकि आप चीन से बनी 'झालर' खरीदने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे...चीन का सामान कम से कम खरीदें जिससे आप भारत के गरीबों द्वारा बनाये गए सामान खरीदने का पैसा बचा सके।

मिट्टी के दीपक, लक्ष्मी जी के पाने, खील-बताशे, झाड़ू, रंगोली, रंगीन पन्नियाँ इत्यादि बेचने वालों से क्या मोलभाव करना ?? जब हम टाटा- बिरला- अंबानी- भारती के किसी भी उत्पाद में मोलभाव नहीं करते (कर ही नहीं सकते), तो दीपावली के समय चार पैसे कमाने की उम्मीद में बैठे इन रेहड़ी- खोमचे- ठेले वालों से "कठोर मोलभाव" करना एक प्रकार का अन्याय ही है।

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"कुम्हारों द्वारा बनाये जा रहे भारतीय परम्परा के मिटटी के दिये ही जलाएँ (मोमबत्ती नहीं)। दीयों से वातावरण शुद्ध होता है नकारत्मक शक्तिया भागती हैं खुशियों का आगमन होता है और दियों से जगमगाते घर-आंगन दिवाली के त्योहार को रोशन कर देते हैं।"

"अब वक़्त बदलेगा क्यूंकि अब हम बदलेंगे....
इतिहास पढ़ते सब है हम नया इतिहास लिखेंगे..."

दीपावली की अग्रिम हार्दिक शुभकामनायें !!

स्वदेशी, स्वाभिमानी, स्वावलंबी भारत !

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