बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

आप छिलके को खाए जा रहे है ; जीवन रस की तलाश में ?---

आप छिलके को खाए जा रहे है ; जीवन रस की तलाश में ?---
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क्या आपने कभी गन्ना चूसा है? पहले तो बहुत मधुर रस आता है फिर हम चबाते जाते है पर अब बस उसके रेशे है जो अब कोई स्वाद नहीं दे रहे। च्युइंग गम जब तक नई है मुंह में बहुत स्वाद है बाद में वह चबाते रहने पर कोई स्वाद नहीं देती। आखिर में हम परेशान हो कर उसे थूक देते है। आज जीवन में हर कोई सुख की तलाश में है। हर कोई रस चाहता है और उस रसपान में खो कर आखिर में रह जाता है सिर्फ कडवापन , खिन्नता और टूटे रिश्ते।
आज का समय असंयम का है। छोटे छोटे बच्चे फ़िल्में और टी वी देखकर समय से पहले ही सब कुछ जान जाते है। इसलिए उन्हें स्कूलों में इस बात की शिक्षा दी जाती है की किस बात में सावधानी रखनी है! जबकि होना यह चाहिए की यह समय सिर्फ और सिर्फ विद्यार्जन के लिए होना चाहिए। अन्य बातें उनके लिए विष के सामान है।यह बच्चों का स्वभाव होता है की जिस बात के लिए रोका जाए वही करते है।
आज हम अखबारों में और अन्यत्र समाचार पढ़ते है और सुनते है की छोटी छोटी बच्चियों से भी दुष्कर्म हो रहा है। इसके अपराधी कौन है? वह तो है ही जो करते है। पर गहराई से सोचा जाए तो वे भी शिकार है आज के असंयम का। आज फ़िल्मी हीरोइनों और आइटम गानों के रूप में देह का व्यापार करने वालियां इन्हें उकसाती है। इनके वस्त्र , नृत्य और भाव भंगिमाएं सभी उकसाऊ होते है।ये स्वयं तो जनता से दूर सुरक्षा घेरे में रहती है। कभी गलती से जनता के हाथ लग जाती है तो हंगामा करती है। अब उकसाए हुए लोगों को आस पास तो कोई उपलब्ध नहीं हो ; तो जो भी आस पास मिल जाए उन्ही से ये अपनी विकृति शांत कर लेते है। ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।
आज सरकार ही विज्ञापन देती है इमरजेंसी पिल्स और अन्य साधनों के बारे में। यानी की कुछ भी दुष्कर्म करो लेकिन बच्चें ना होने देना बस इतनी सावधानी रखो यह स्वयं प्रशासन सिखा रहा है । क्या जानवर और इंसान में आज कोई फर्क नहीं रह गया? पवित्र गृहस्थाश्रम की अवधारणा आज रह ही नहीं है।माँ बाप भी स्वतंत्रता चाहते है और बेटा बहु तो है ही आज कल के ....
आज वह समय आ गया है की शरीर के सुख के लिए गलत सम्बन्ध बनाने को भी मान्यता देने की मांग होने लगी है। वह दिन दूर नहीं जब अपने ही सम्बन्धियों से , जानवरों से सम्बन्ध को भी सही ठहराने की मांग होने लगे।
सतयुग वह समय था जब संकल्प मात्र से संतान पैदा करने की जीवनी शक्ति इंसान में थी जो आज हमें चमत्कार की तरह असंभव लगता है । द्वापर के प्रारम्भ के साथ इंसान ने शरीर संबंध बनाना शुरू किये जिसका ज़िक्र एडम और इव के सेब खाने के रूप में मिलता है। इससे इंसान की प्राण शक्ति या जीवनी शक्ति में कमी आई। उसकी आयु , उसका शरीर बल और लम्बाई घटती गई। धीरे धीरे आपस में वैमनस्य , शत्रुता , कटुता आती गई और अब तो विकृति भी आ गई है। जिस तरह से पागल खुद को कभी पागल नहीं कहता ; उसी तरह आज इंसान ये नहीं समझ पा रहा की उसमे विकृति आ गई है। बड़े बड़े विद्वान और समझदार लोग अपने शिष्यों को , अपने फँस को गलत संबंधों को अपनाने की , नियमित पर सुरक्षित सम्बन्ध बनाने की ज़रुरत की सलाह देते है। ऐसा ना करना ही वे विकृति समझते है।
वे ऐसा इसलिए करते है क्योंकि असली सुख तो उन्होंने कभी भी चखा ही नहीं। विद्यार्थी जीवन में इसके बारे में पूरी तरह अज्ञान , गृहस्थाश्रम में संयम ही सतत रस की कुंजी है। अन्यथा जीवन च्युइंग गम और चुसे हुए आम के छिलके की तरह रसहीन लगेगा। फिर इस रस की तलाश में पारिवारिक विघटन , गलत सम्बन्ध , अपराध आदि होंगे। परम योगी तो जब समाधि में लीन होते है तो वह चरम सुख पाते है जो कभी समाप्त नहीं हो पाता। वे अपने आप को आत्म रती कहते है और संसारियों का देह सुख उसके सामने कुछ भी नहीं पाते। —

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