मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

ये जनता ही बनाएगी, नेता की तकदीर।।


गंगाजी के घाट पर, जुटी है भारी भीर।
ट्रक में चढ़ा लाए इन्हें, ये चुनाव के वीर।।
कम्बल हैं बांटे गए, मिली पूड़ी और खीर।
ये जनता ही बनाएगी, नेता की तकदीर।।
निर्वाचन के दौर में, सपने खूब दिखाएं।
जीत गए, मंत्री बने तब, रोटी को तरसाएं।
ऊंची कुर्सी पाए के, पाएं सभी से फूल।
 अपनी जेबें भर चले, जनता को गए भूल।।
नेता आवत देख के, जनता करे पुकार।
वोट मांगकर ले गए, अब सोती सरकार।।
जनता नेता से कहे, तू ले खूब तरसाए।
 इस चुनाव में प्रजा तुम्हें, वोटों को तरसाए।
गैरों ने लूटा हमें, लूट गए परदेश।
अब अपने हैं लूटते, जनता को ये क्लेश।।
प्रजातंत्र सरकार में, प्रजा ही दुख से रोए।
 रोज बनाएं दल नए, मारा-मारी होए।।
भ्रष्टाचार ये देख के, बापू का मन रोए।
 स्वारथ की चक्की चले, दिखे इन्हें नहिं कोए।।
रामराज्य के सब सपने, हुए हैं चकनाचूर।
 रक्षक ही भक्षक बने, जनता सुख से दूर।।

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