शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

" समर्पण " :- असीमित पुण्य

प्रणाम !!!
आप सभी का अभिनंदन हैं ||

" समर्पण " :-

एक बार गुजरात की एक रियासत की राजमाता मीलण देवी ने सोमनाथ जी का विधिवत अभिषेक किया | उन्होंने सोने का तुलादान कर उसे सोमनाथ जी को अपित् कर दिया | सोने का तुलादान कर उनके मन में अहंकार भर गया और वह सोचने लगी कि आज तक किसी ने भी इस तरह भगवान का तुलादान नहीं किया होगा | इसके बाद वह अपने महल मे आज गई |
रात में उन्हें सोमनाथ जी के दर्शन हुए | भगवान ने उनसे कहा, मेरे मंदिर मे एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई हैं | उसके संचित पुण्य असीमित हैं | उसमें से कुछ पुण्य तुम उसे सोने की मुद्राएं लेकर खरीद लो |परलोक मे काम आएंगे | नींद टूटते ही राजमाता बेचैन हो गई | उन्होंने अपने सैनिकों को मंदिर से उस महिला को राजभवन लाने के लिए कहा |

सैनिक मंदिर पहुँचे और वहाँ से पकड़कर ले आए| गरीब महिला थर- थर कांप रही थी | राजमाता ने उस गरीब महिला से कहा,मुझे अपने संचित पुण्य दे दो,बदले मे मैं तम्हे सोने की मुद्राएं दूंगी| राजमाता की बात सुनकर वह बोली, महारानी जी, मुझ गरीब से भला पुण्य कार्य कैसे हो सकते हैं |

मैं तो खुद दर-दर भीख मागंती हूँ | भीख मे मिले चने चबाते-चबाते मैं तीर्थयात्रा को निकली थी |कल मंदिर मे दर्शन करने से पहले एक मुट्ठी सत्तू मुझे किसी ने दिए थे | उसमें से आधे सत्तू से भगवान सोमनाथ को भोग लगाया तथा बाकी सत्तू एक भूखे भिखारी को खिला दिया | जब मैं भगवान को ठीक ढंग से प्रसाद ही नही चढ़ा पाई तो मुझे पुण्य कहाँ से मिलेगा ? गरीब महिला की बात सुनकर राजमाता का अंहकार नष्ट हो गया | वह समझ गई कि नि:स्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर ही भगवान सोमनाथ ने उस महिला को असीमित पुण्य प्रदान किए हैं | इसके बाद राजमाता ने अहंकार त्याग दिया और मानव सेवा को ही अपना सवोर्परि धर्म बना लिया |

विशेष :
प्रभु को वह भक्त अति प्रिय होते है जो बिना किसी स्वार्थ से उन्हें पुजते है | सच्ची श्रद्धा-भाव और अटूट विश्वास-आस्था ही सही मायने मे भक्ति कह लगती है | क्योंकि जहाँ भाव है वही देव हैं |

ऊँ सोमेश्वराय: नमः !!!


:- रीना शिगांणे  " भक्ति-सागर"

प्रभु के नाम का जयकारा जरूर लगाए |  और जीवन को आनन्दमय बनाए |
आप सभी पर शिवाजी की कृपा बनी रहे और आप सभी का दिन मंगलमय हो |

यही हमारी प्रथना है |

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